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मलूकदास जी की बानी (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - ज्ञानपरोछी, साखी एवं अमर पद संग्रह)

Malukdas Ji Ki Bani: Belvedere Steam Printing Press Allahabad

सन्त मलूकदास (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा

DevanagariHindipublished45 पृष्ठ

मिश्रित २१
॥ मिश्रित ॥
॥ शब्द १ ॥
अब मैं अनुभव पदहिं समाना ॥टेक॥
सब देवन को भर्म भुलाना, अविगति हाथ बिकाना ॥ १ ॥
पहिला पद है देई देवा, दूजा नेम अचारा ।
तीजे पद में सब जग बंधा, चौथा अपरम्पारा ॥ २ ॥
सुन्न महल में महल हमारा, निरगुन सेज बिंछाई ।
चेला गुरु दोउ सैन करत हैं, बड़ी असाइस१ पाई ॥ ३ ॥
एक कहै चल तीरथ जइये, (एक) ठाकुरद्वार बतावै ।
परम जोति के देखे संतो, अब कछु नजर न आवै ॥ ४ ॥
आवा गवन का संसय छूटा, काटी जम की फाँसी ।
कह मलूक मैं यही जानिके, मित्र कियो अबिनासी ॥ ५ ॥
॥ शब्द २ ॥
सबहिन के हम सबै हमारे । जीव जंतु मोहिं लगैं पियारे । १ ।
तीनों लोक हमारी माया । अंत कतहूँसे कोई नहि लाया । २ ।
छत्तिस पवन हमारी जात । हमहीं दिन और हमहीं रात । ३

२२ मलूकदासजी की बानी
हमहीं रावन हमहीं कंस । हमहीं मारा अपना बंस ॥३॥
हमहिं जियावैं हमहीं मारैं । हमहीं बोरैं हमहीं तारैं ॥४॥
जहाँ तहाँ सब जोति हमारी । हमहिं पुरुष हमहीं है नारी ॥५॥
ऐसी बिधि कोई लव लावै । सो अविगत से टहल करावै ॥६॥
सहै कुसबद और सुमिरै नाँव । सब जग देखै एकै भाव ॥७॥
या पद का कोई करै निबेरा । कह मलूक मैं ता का चेरा ॥८॥
॥ शब्द ३ ॥
बाबा मन का है सिर तले ॥ टेक ॥
माया के अभिमान भूले, गर्ब ही में गले ॥ १ ॥
जिभ्या कारन खून कीये, बाँधि जमपुर चले ॥ २ ॥
रामजी सों भये बेमुख, अगिन अपनी जले ॥ ३ ॥
हरि भजे से भये निरभय, टारहू नहिं टरे ॥ ४ ॥
कह मलूका जहँ गरीबी, तेई सब से भले ॥ ५ ॥
॥ शब्द ४ ॥
तू साहेब लीये खड़ा, बन्दा नासबूरा ।
जैसा जिसको चाहिये, देता भरपूरा ॥ १ ॥
लाख करोड़ जो गाँठि में, तौ भी यह रोवै ।
मरता मारे फिकिर के, सुख कबहुँ न सोवै ॥ २ ॥
आँखें फेरै बुरी भाँति, देखत डर लागै ।
लेखा जो कौड़ी चले, दिन चारक जागे ॥ ३ ॥
बिन संतोष दुखी भया, बहुते भरमाया ।
कहत मलूक यह जानकर, सरनागति आया ॥ ४ ॥
॥ शब्द ५ ॥
राम मैं ससा भयो तन धरि के ।
प्रभु की सरन में कीन्ह बिलावट आनि घुसा मैं डरिके ॥ १ ॥
कुकरा पाँच पचीस कुकरिया सदा रहें मोहिं घेरे ।
ठाढ़ होउँ तौ पिंडुरी पकरैं बैठे आँखि गुरेरैं ॥ २ ॥

मिश्रित २३
कलुवा कबरा मोतिया झबरा बुचवा मोहिं डेरवावे ।
जब तें लियो तिहारो पीछा कोऊ निकट न आवे ॥ ३ ॥
इन पाँचो में देखा बिष ही एकौ नहिं मन माना ।
काटि काटि मैं कीन्ह अहेरा कहत मलूक दिवाना ॥ ४ ॥
॥ शब्द ६ ॥
बन्दे दुनियाँ की दीन गँवाया१ ।
सो दुनियाँ तेरे संग न लागी, मूड़ अजाब चढ़ाया ॥ १ ॥
करम जो लागा बदी खलक की, किन तुझको फर्माया ।
गुनहगार तूँ हुआ सरासर, दोजख बाँध चलाया ॥ २ ॥
खाक सेती जिन पैदा कीन्हा, सो साहेब बिसराया ।
मोहकम२ मार पड़ी गुरजन की, तब कछु जवाब न आया ॥ ३ ॥
अब किसहूँ को दोष न दीजै, गन्दा अमल कमाया ।
कह मलूक जस खिदमत पहुँचा, सोई नतीजा पाया ॥ ४ ॥
॥ शब्द ७ ॥
मन नहिं तौलै यार, का रे तौलै बनियाँ ॥ टेक ॥
घाट बाट सोध लेइ, सम रहै नकुनियाँ३ ।
बिसरै ना सुरति, नाहिं फेरि होय तनियाँ ॥ १ ॥
पाँच औ पचीस चोर, लूटिहैं दुकनियाँ ।
सुनहि ना गोहार कोउ, हाकिम हैरनियाँ ॥ २ ॥
कहत मलूकदास, तौलै जब चार रास ।
साहेब मिल साहु होय, मिलै तब दमनियाँ४ ॥ ३ ॥
॥ शब्द ८ ॥
दीन-बंधु दीना-नाथ मेरी तन हेरिये ॥ टेक ॥
भाई नाहि बन्धु नाहिं कुटुम परिवार नाहिं,
ऐसा कोई मित्र नाहिं जाके ढिग जाइये ॥ १ ॥
(१) स्वार्थ के लिये परमार्थ खोया । (२) भारी । (३) डण्डी के सिरे । (४) दाम ।

२४ मलूकदासजी की बानी
सोने की सलैया नाहिं रूपे का रुपैया नाहिं,
कौड़ी पैसा गाँठ नहीं जासे कछु लीजिये ॥ २ ॥
खेती नाहिं बारी नाहिं बनिज ब्यौपार नाहिं,
ऐसा कोई साहु नाहिं जासों कछु माँगिये ॥ ३ ॥
कहत मलूकदास छोड़दे पराई आस,
राम धनी पाय के अब का की सरन जाइये ॥ ४ ॥
कबित्त
( १ )
परम दयाल राया राय परसोत्तम जी,
ऐसो प्रभु छाँड़ि और कौन के कहाइये ॥ १ ॥
सीतल सुभाव जा के तामस को लेस नहीं,
मधुर बचन कहि राखै समझाइये ॥ २ ॥
भक्त - बछल गुन - सागर कला - निधान,
जाको जस पाँत नित बेदन में गाइये ॥ ३ ॥
कहत मलूक बल जाउँ ऐसे दरस की,
अधम - उधार जा के देखे सुख पाइये ॥ ४ ॥
( २ )
जौन कोई भूखा गोपाल की मोहब्बत का।
तौन दुर्वेसन का पैंड़ा निराला है ॥ १ ॥
रहते महजूज१ वे तो साहेब की सूरत पर।
दुनियाँ को तर्क२ मार दीन को सम्हाला है ॥ २ ॥
किसी से न करें सवाल उनका कुछ और ख्याल।
फिरते अलमस्त वजूद३ भी बिसारा है ॥ ३ ॥
कहता मलूक उन्हें सूझता है बेचुगून४।
किसी की गरज नहीं अन्दर अँधियारा है ॥ ४ ॥
(१) पगे हुए। (२) त्याग कर। (३) देंह। (४) बेचून। (५) बेमिस्ल।

कवित्त २५
( ३ )
माला कहाँ औ कहाँ तसबीह,
अब चेत इनहिं कर टेक न टेकै ॥ १ ॥
काफिर कौन मलेच्छ कहावत,
संध्या निवाज समय करि देखै ॥ २ ॥
है जमराज कहाँ जबरील है,
काजी है आप हिसाब के लेखै ॥ ३ ॥
पाप औ पुन्य जमा कर बूझत,
देत हिसाब कहाँ धरि फेकै ॥ ४ ॥
दास मलूक कहा भरमौ तुम,
राम रहीम कहावत एकै ॥ ५ ॥
( ४ )
माला कहाँ और कहाँ तसबीह,
अब चेत इनहिं कर टेक न टेकी ॥ १ ॥
बाँधे डोल अकास पताल लौं,
भूलन जात कहे हरि सेती ॥ २ ॥
लोक की लाज में होत अकाज है,
कौन सहै मेरे साँसत एती ॥ ३ ॥
दास मलूक दिन दुइ की बात है,
पायो राम छुट्यो जम सेती ॥ ४ ॥
( ५ )
बीर रघुबीर पैगम्बर खोदा मेरे,
कादिर करीम काजी माया मत खोई है ॥ १ ॥
राम मेरे प्रान रहमान मेरे दीन इमान,
भूल गयो भैया सब लोक लाज धोई है ॥ २ ॥
कहत मलूक मैं तो दुबिधा न जानौ दूजी,
जोई मेरे मन में नैनन में सोई है ॥ ३ ॥
४

हरि हजरत मोहिं माधव मकुन्द की सौं,
छाँड़ि केसवराय मेरो दूसरो न कोई है ॥ ४ ॥
( ६ )
जिसके दीदार को मुसाफिरी को दिल हुआ ।
बहुत खूब ऐसा जो नगींच१ कर पाइये ॥ १ ॥
खाब सी दुनियाँ को दिल कौन करै सात पाँच२ ।
बन्दे हैं जिसके क्यों न तिसके कहलाइये ॥ २ ॥
अगम अगोचर सबहिन में रहता नियार ।
जा को जस नीत बत्त संतन बार बार गाइये ॥ ३ ॥
कहता मलूक महबूब पिया खूब यार ।
सिर लगाय जमीं में सिरदा३ कराइये ॥ ४ ॥
( ७ )
बार बार करता हूँ नसीहत मैं तेरी तईं ।
क्यों बे हरामखोर साँईं तू बिसारा है ॥ १ ॥
जिसका नित नोन खात मुतलक भी ना डरात ।
अच्छा वजूद पाय औरत से हारा है ॥ २ ॥
कौल से बेकौल हुआ किसी की न लेत दुआ ।
दोजख४ के लिये दिल कौन कौन मारा है ॥ ३ ॥
कहता मलूक अब तोबा कर साहेब से ।
छाँड़ि दे कुराह जिन जारे पर जारा है ॥ ४ ॥
( ८ )
बंदा तैं गंदा गुनाह करै बार बार ।
साँईं तू सिरजनहार मन में न आनिये ॥ १ ॥
हाथ कछु मेरे नाहीं हाथ सब तेरे साँईं ।
खलक के हिसाब बीच मुझको मत सानिये ॥ २ ॥
(१) पास । (२) हैरान, डाँवाडोल । (३) सिजदा । (४) पेट ।

कबित्त २७
रहम की नजर कर कुरहम दिल से दूर कर ।
किसी के कहे सुने चुगलो मत मानिये ॥ ३ ॥
कहता मलूक मैं रहता पनाह तेरी ।
दाता दयाल मुझे अपना कर जानिये ॥ ४ ॥
( ६ )
गाफिल है बंदा गुनाह करै बार बार ।
काम पड़े साहेब धौं कैसा फरमावैगा ॥ १ ॥
आखिर जमाने को डरता है मेरा दिल ।
जब जबरील१ हाथ गुर्ज लिये आवैगा ॥ २ ॥
खाब सी दुनियाँ दिल को न करै सात पाँच ।
काली पीली आँखें कर फिरिस्ता दिखलावैगा ॥ ३ ॥
कहता मलूक किसी मुल्क में बचाव नहीं ।
अब कीजै किरपा तब मेरे मन भावैगा ॥ ४ ॥
( १० )
भील कद करी थी भलाई जिया आप जान ।
फील कद हुआ था मुरीद कहु किसका ॥ १ ॥
गीध कद ज्ञान की किताब का किनारा छुवा ।
व्याध और बधिक निसाफ२ कहु तिसका ॥ २ ॥
नाग कद माला लैके बंदगी करी थी बैठ ।
मुझको भी लगा था अजामिल का हिसका ॥ ३ ॥
एते बदराहों को बदी करी थी माफ ।
जन मलूक अजाती पर एतो करी रिस का ॥ ४ ॥
( ११ )
मेहर की कफनी औ कुताह भी मेहर का ।
मेहर का मुतंगा३ इस कमर में लगाइये ॥ १ ॥
(१) मौत का फिरिश्ता। (२) इन्साफ। (३) मूँझ की करधनी जो साधू लोग पहिनते हैं।

३८ मलूकदासजी की बानी
मेहर का जामा और तोमा१ भी मेहर का।
मेहर का आपा इस दिल को पिलाइये ॥ २ ॥
मेहर का आसा२ और तमासा भी मेहर का।
मेहर के महल बिच मेहरबान को मनाइये ॥ ३ ॥
कहता मलूक बन्दे कहर की लहर में।
कोटिक बह गये बिन मेहर मेहरबान किस राह से पाइये ॥४॥
( १२ )
अदम कबित्त का जिसकी कबिताई करूँ,
याद करूँ उसको जिन पैदा मुझे किया है ॥ १ ॥
गर्भ बास पाला आतस में नहिं जाला,
तिसको मैं बिसारूँ तो मैं किसकी आस जिया हूँ ॥ २ ॥
नालत इस दुनियाँ को जो दीन से बेदीन करै,
खाक ऐसे खाने जिन ईमान बेंच लिया है ॥ ३ ॥
कहता मलूक मैं बिकाना हरि मूरत पर,
जिस के दीदार से जुड़ाता मेरा हिया है ॥ ४ ॥
( १३ )
सुपने के सुख देख मोह रहे मूढ़ नर,
जानत हमारे दिन ऐसहिं बिहायँगे ॥ १ ॥
क्या करेंगे भोग अच्छी सुन्दरी रमेंगे नित्त,
छाँह कौ लै चारि जून खूँद खूँद खायँगे ॥ २ ॥
सीकरा सो काल है कलसरी३ सी लपेट लेहै,
चंगुल के तले दबे चिचयायँगे ॥ ३ ॥
कहत मलूकदास लेखा देत होइहै दुक्ख,
बड़े दरबार जाय अन्त पछितायँगे ॥ ४ ॥
( १४ )
दीन-दयाल सुनी जब तैं तब तैं हिया में कछु ऐसी बसी है।
तेरो कहाय के जाउँ कहाँ मैं तेरे हित की पट४ खैंच कसी है ॥१॥
(१) तोंबा। (२) डण्डा, छड़ी। (३) गौरैया चिड़िया। (४) पटका।

साखी २६
तेरोई एक भरोस मलूक को तेरे समान न दूजो जसी है।
एहो मुरारि पुकारि कहौं अब मेरी हँसी नहिं तेरो हँसी है ॥२॥
साखी
॥ गुरुदेव ॥
जीती बाजी गुर प्रताप तें, माया मोह निवार।
कहैं मलूक गुरु कृपा तें, उतरा भवजल पार ॥ १ ॥
सुखद पंथ गुरुदेव यह, दीन्हो मोहिं बताय ।
ऐसो ऊपट१ पाय अब, जग मग चलै बलाय ॥ २ ॥
भ्रम भागा गुरु बचन सुनि, मोह रहा नहिं लेस।
तब माया छल हित किया, महा मोहनी भेस ॥ ३ ॥
ता को आवत देखि कै, कही बात समुझाय ।
अब मैं आया हरि सरन, तेरी कछु न बसाय ॥ ४ ॥
मलूका सोई पीर है, जो जानै पर पीर ।
जो पर पीर न जानही, सो फकीर बेपीर ॥ ५ ॥
बहुतक पीर कहावते, बहुत करत हैं भेस ।
यह मन कहर खोदाय का, मारे सो दुरवेस ॥ ६ ॥
पीर पीर सब कोई कहे, पीरे चीन्हत नाहिं ।
जिन्दा पीर को मारि के, मुरदहिं ढूँढ़न जाहिं ॥७ ॥
॥ साध जन ॥
जहाँ जहाँ बच्छा फिरै, तहाँ तहाँ फिरै गाय ।
कहैं मलूक जहाँ संत जन, तहाँ रमैया जाय ॥ ८ ॥
भेष फकीरी जे करै, मन नहिं आवै हाथ ।
दिल फकीर जे हो रहे, साहेब तिनके साथ ॥ ६ ॥
॥ नाम ॥
जीवहुँ तें प्यारे अधिक, लागैं मोहीं राम ।
बिन हरि नाम नहीं मुझे, और किसी से काम ॥१०॥
(१) ऊपरवार।

३० मलूकदासजी की बानी
कह मलूक हम जबहि तें, लीन्ही हरि की ओट ।
सोवत हैं सुख नींद भरि, डारि भरम की पोट ॥११॥
उहाँ न कबहुँ जाइये, जहाँ न हरि का नाम ।
डीगंबर१ के गाँव में, धोबी का क्या काम ॥१२॥
राम राम के नाम को, जहाँ नहीं लवलेस ।
पानी तहाँ न पीजिये, परिहरिये सो देस ॥१३॥
गाँठो सत कुपीन२ में, सदा फिरै निःसंक ।
नाम अमल माता रहे, गिने इन्द्र को रंक ॥१४॥
राम नाम जिन जानिया, तेई बड़े सपूत ।
एक राम के भजन बिन, काँगा३ फिरै कपूत ॥१५॥
राम नाम एकै रती, पाप के कोटि पहाड़ ।
ऐसी महिमा नाम की, जारि करै सब छार ॥१६॥
राम नाम औषध करो, हिरदै राखो याद ।
संकट में लौ लाइये, दुर करै सब व्याध ॥१७॥
धर्महिं का सौदा भला, दाया जग व्योहार ।
राम नाम की हाट ले, बैठा खोल किवार ॥१८॥
रहूँ भरोसे राम के, बनिजे४ कबहुँ न जावँ ।
दास मलूका यों कहै, हरि बिड़वे५ मैं खावँ ॥१६॥
साहेब मेरा सिर खड़ा, पलक पलक सुधि ले ।
जबहीं गुरु किरपा करें, तबहिं राम कछु दे ॥२०॥
मोदी सब संसार है, साहेब राजा राम ।
जा पर चिट्ठो ऊतरे, सोई खरचे दाम ॥२१॥
औरहिं चिन्ता करन दे, तू मत मारै आह ।
जा के मोदी राम से, ताहि कहा परवाह ॥२२॥
(१) नागा। (२) लँगोटी। (३) कंगाल । (४) ब्यौपार को । (५) कमाय ।

साखी ३१
॥ बिनती ॥
नमो निरंजन निरंकार, अविगति पुरुष अलेख ।
जिन संतन के हित धर्यो, जुग जुग नाना भेख ॥२३॥
हरि भक्तन के काज हित, जुग जुग करी सहाय ।
सो सिव सेस न कहि सकै, कहा कहूँ मैं गाय ॥२४॥
राम राय असरन सरन, मोहिं आपन करि लेहु ।
संतन सँग सेवा करौं, भक्ति मजूरी देहु ॥२५॥
भक्ति मजूरी दीजिये, कीजै भवजल पार ।
बोरत है माया मुझे, गहे बाँह वरियार ॥२६॥
॥ प्रेम ॥
प्रेम नेम जिन ना कियो, जीतो नाहीं मैन १ ।
अलख पुरुष जिन ना लख्यो, छार परो तेहि नैन ॥२७॥
कठिन पियाला प्रेम का, पिये जो हरि के हाथ ।
चारो जुग माता रहै, उतरै जिय के साथ ॥२८॥
बिना अमल माता रहै, बिन लस्कर बलवंत ।
बिना विलायत साहेबी, अंत माहिं बेअंत ॥२६॥
रात न आवै नींदड़ी, थरथर काँपै जीव ।
ना जानूँ क्या करेगा, जालिम मेरा पीव ॥३०॥
करै भक्ति भगवंत की, करै कबहूँ नहिं चूक ।
हरि रस में राचो रहै, साँची भक्ति मलूक ॥३१॥
मलूक सो माता सुंदरी, जहाँ भक्त औतार ।
और सकल बाँझे भई, जनमे खर कतवार ॥३२॥
सोई पूत सपूत है, जो भक्ति करे चित लाय ।
जरा मरन तें छुटि परै, अजर अमर होइ जाय ॥३३॥
सब बाजे हिरदे बजैं, प्रेम पखावज तार ।
मंदिर ढूँढ़त को फिरै, मिल्यो बजावनहार ॥३४॥
(१) कामदेव ।

३२ मलूकदासजी की बानी
करै पखावज प्रेम का, हृदय बजावै तार ।
मनै नचावै मगन होय, तिन का मता अपार ॥३५॥
॥ ज्ञान ॥
जब लग थो अँधियार घर, मूस थके सब चोर ।
जब मंदिल दीपक बरयो, वही चोर धन मोर ॥३६॥
मन मिरगा बिन मूड़ का, चहुँदिस चरने जाय ।
हाँक ले आया ज्ञान तब, बाँधा ताँत लगाय ॥३७॥
॥ गुप्त की महिमा ॥
जो तेरे घट प्रेम है, तो कहि कहि न सुनाव ।
अंतरजामी जानिहै, अंतरगत का भाव ॥३८॥
गुप्त प्रगट जेती करी, मेरे मन की खूम ।
अंतरजामी रामजी, सब तुम को मालूम ॥३६॥
सुमिरन ऐसा कीजिये, दूजा लखै न कोय ।
ओंठ न फरकत देखिये, प्रेम राखिये गोय ॥४०॥
माला जपौं न कर जपौं, जिभ्या कहौं न राम ।
सुमिरन मेरा हरि करै, मैं पाया बिसराम ॥४१॥
॥ मूर्त्ति पूजा, तीर्थ भ्रमन, कर्म्म धर्म्म ॥
साधो दुनियाँ बावरी, पत्थर पूजन जाय ।
मलूक पूजै आतमा, कछु माँगै कछु खाय ॥४२॥
जेती देखै आतमा, तेते सालिग्राम ।
बोलनहारा पूजिये, पत्थर से क्या काम ॥४३॥
आतम राम न चीन्हही, पूजत फिरै पषान ।
कैसेहु मुक्ति न होयगी, कोटिक सुनो पुरान ॥४४॥
किरतिम देव न पूजिये, ठेस लगे फुटि जाय ।
कहैं मलूक सुभ आतमा, चारो जुग ठहराय ॥४५॥
देवल पुजे कि देवता, की पूजे पहाड़ ।
पूजन को जाँता भला, जो पीस खाय संसार ॥४६॥

साखी ३३
हम जानत तीरथ बड़े, तीरथ हरि की आस।
जिनके हिरदे हरि बसै, कोटि तिरथ तिन पास ॥४७॥
संध्या तरपन सब तजा, तीरथ कबहुँ न जाउँ ।
हरि हीरा हिरदे बसै, ताही भीतर न्हाउँ ॥४८॥
मक्का मदिना द्वारका, बद्री और केदार ।
बिना दया सब झूठ है, कहैं मलूक बिचार ॥४६॥
राम राय घट में बसे, ढूँढ़त फिरैं उजाड़ ।
कोइ कासी कोइ प्राग में, बहुत फिरैं झख मार ॥५०॥
॥ दया ॥
दुखिया जन कोइ दुखवै, दुखिए अति दुख होय ।
दुखिया रोय पुकारिहै, सब गुड़ माटी होय ॥५१॥
हरी डारि ना तोड़िये, लागै छूरा बान ।
दास मलूका यौं कहै, अपना सा जिव जान ॥५२॥
जे दुखिया संसार में, खोवो तिन का दुख ।
दलिद्दर सौंप मलूक को, लोगन दीजै सुख ॥५३॥
॥ हिंसा ॥
पीर सभन की एक सी, मूरख जानत नाहिं ।
काँटा चूभे पीर होय, गला काट कोउ खाय ॥५४॥
कुंजर चींटी पशू नर, सब में साहेब एक ।
काटे गला खोदाय का, करै सूरमा लेख ॥५५॥
सब कोउ साहेब बन्दते, हिन्दू मूसलमान ।
साहेब तिन को बन्दता, जिसका ठौर इमान ॥५६॥
॥ दया ॥
दया धर्म हिरदे बसै, बोलै अमृत बैन ।
तेई ऊँचे जानिये, जिन के नीचे नैन ॥५७॥
सब पानी की चूपरी, एक दया जग सार ।
जिन पर-आतम चीन्हिया, तेही उतरे पार ॥५८॥

कलपि!

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      ३४ (at the left)
      मलूकदासजी की बानी (center)
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    • Line 2:
      ॥ दुर्जन ॥
      Marker: ॥ दुर्जन ॥

    • Line 3:
      मलूक बाद न कीजिये, क्रोधै देव बहाय ।
      Let's check each word:
      मलूक (Maluk)
      बाद (bād - debate/dispute)
      न (na)
      कीजिये, (kījiye,) - note the comma
      क्रोधै (krodhai - with anger) - wait, is it क्रोधै or क्रोधे? Look at top: two matras ै: क्रोधै.
      देव (deva)
      बहाय । (bahāya .)
      Marker: मलूक बाद न कीजिये, क्रोधै देव बहाय ।

    • Line 4:
      `हार मानु अनजान तैं, बक बक मरै बलाय

साखी ३५

॥ माया ॥

माया मिसरी की छुरी, मत कोई पतियाय ।
इन मारे रसबाद के, ब्रह्महिं ब्रह्म लड़ाय ॥७१॥
माया मगन महंत के, तुम मत बैठो पास ।
कौड़ी कारन लड़ि मरै, कथनी कथै पचास ॥७२॥
नारी नाहिं निहारिये, करै नैन की चोट ।
कोइ एक हरि जन ऊबरे, पारब्रह्म की ओट ॥७३॥
नारी घोंटी अमल की, अमली सब संसार ।
कोइ ऐसा सूफी ना मिला, जो सँग उतरै पार ॥७४॥

॥ चेतावनी ॥

जागो रे अब जागो भैया, सिर पर जम की धार ।
ना जानूँ कौने घरी, केहि लेजैहै मार ॥७५॥
गर्ब भुलाने देंह के, रचि रचि बाँधे पाग ।
सो देंही नित देखि के, चोंच सँवारे काग ॥७६॥
सुन्दर देंही पाय के, मत कोइ करै गुमान ।
काल दरेरा खायगा, क्या बूढ़ा क्या ज्वान ॥७७॥
सुन्दर देंही देखि के, उपजत है अनुराग ।
मढ़ी न होती चाम की, तो जीवत खाते काग ॥७८॥
उतरे आय सराय में, जाना है बड़ कोह ।
अटका आकिल काम बस, ली भठियारी मोह ॥७९॥
जेते सुख संसार के, इकट्ठे किये बटोर ।
कन थोरे काँकर घने, देखा फटक पछोर ॥८०॥
इस जीने का गर्ब क्या, कहाँ देंह की प्रीत ।
बात कहत ढह जात है, बारू की सी भीत ॥८१॥
मलूक कोटा झाँझरा, भीत परी भहराय ।
ऐसा कोई ना मिला, जो फेर उठावै आय ॥८२॥

३६ मलूकदासजी की बानी
देंही होय न आपनी, समझ परी है मोहिं ।
अबहीं तें तजि राख तूँ, आखिर तजिहै तोहिं ॥८३॥
॥ मिश्रित ॥
काम मिलावै राम को, जो राखै यह जीत ।
दास मलूका यों कहै, जो मन आवै परतीत ॥८४॥
वहाँ न कोई पहूँचा, जहाँ बसत हैं राम ।
महा बिकट वो पंथ है, पैंड़ा मारै काम ॥८५॥
जहाँ जहाँ दुख पाइया, गुरु को थापा सोय ।
जबहीं सिर टक्कर लगै, तब हरि सुमिरन होय ॥८६॥
आदर मान महत्व सत, बालापन को नेह ।
यह चारो तबहीं गये, जबहिं कहा कछु देह ॥८७॥
हरि रस में नाहीं रचा, किया काँच व्योहार ।
कह मलूक वोही पचा, प्रभुता को संसार ॥८८॥
प्रभुताही को सब मरै, प्रभु को मरै न कोय ।
जो कोई प्रभु को मरै, तो प्रभुता दासी होय ॥८९॥
मानुष बैठे चुप करे, कदर न जानै कोय ।
जबहीं मुख खोलै कली, प्रगट बास तब होय ॥९०॥
सब कलियन में बास है, बिना बास नहि कोय ।
अति सुचित्त में पाइये, जो कोइ फूली होय ॥९१॥