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सर्वकोश
मलूकदास जी की बानी (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - ज्ञानपरोछी, साखी एवं अमर पद संग्रह)

मलूकदास जी की बानी (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - ज्ञानपरोछी, साखी एवं अमर पद संग्रह)

Malukdas Ji Ki Bani: Belvedere Steam Printing Press Allahabad

सन्त मलूकदास (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा

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३६ मलूकदासजी की बानी
देंही होय न आपनी, समझ परी है मोहिं ।
अबहीं तें तजि राख तूँ, आखिर तजिहै तोहिं ॥८३॥
॥ मिश्रित ॥
काम मिलावै राम को, जो राखै यह जीत ।
दास मलूका यों कहै, जो मन आवै परतीत ॥८४॥
वहाँ न कोई पहूँचा, जहाँ बसत हैं राम ।
महा बिकट वो पंथ है, पैंड़ा मारै काम ॥८५॥
जहाँ जहाँ दुख पाइया, गुरु को थापा सोय ।
जबहीं सिर टक्कर लगै, तब हरि सुमिरन होय ॥८६॥
आदर मान महत्व सत, बालापन को नेह ।
यह चारो तबहीं गये, जबहिं कहा कछु देह ॥८७॥
हरि रस में नाहीं रचा, किया काँच व्योहार ।
कह मलूक वोही पचा, प्रभुता को संसार ॥८८॥
प्रभुताही को सब मरै, प्रभु को मरै न कोय ।
जो कोई प्रभु को मरै, तो प्रभुता दासी होय ॥८९॥
मानुष बैठे चुप करे, कदर न जानै कोय ।
जबहीं मुख खोलै कली, प्रगट बास तब होय ॥९०॥
सब कलियन में बास है, बिना बास नहि कोय ।
अति सुचित्त में पाइये, जो कोइ फूली होय ॥९१॥