मलूकदास जी की बानी (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - ज्ञानपरोछी, साखी एवं अमर पद संग्रह)
Malukdas Ji Ki Bani: Belvedere Steam Printing Press Allahabad
सन्त मलूकदास (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसाखी ३५
॥ माया ॥
माया मिसरी की छुरी, मत कोई पतियाय ।
इन मारे रसबाद के, ब्रह्महिं ब्रह्म लड़ाय ॥७१॥
माया मगन महंत के, तुम मत बैठो पास ।
कौड़ी कारन लड़ि मरै, कथनी कथै पचास ॥७२॥
नारी नाहिं निहारिये, करै नैन की चोट ।
कोइ एक हरि जन ऊबरे, पारब्रह्म की ओट ॥७३॥
नारी घोंटी अमल की, अमली सब संसार ।
कोइ ऐसा सूफी ना मिला, जो सँग उतरै पार ॥७४॥
॥ चेतावनी ॥
जागो रे अब जागो भैया, सिर पर जम की धार ।
ना जानूँ कौने घरी, केहि लेजैहै मार ॥७५॥
गर्ब भुलाने देंह के, रचि रचि बाँधे पाग ।
सो देंही नित देखि के, चोंच सँवारे काग ॥७६॥
सुन्दर देंही पाय के, मत कोइ करै गुमान ।
काल दरेरा खायगा, क्या बूढ़ा क्या ज्वान ॥७७॥
सुन्दर देंही देखि के, उपजत है अनुराग ।
मढ़ी न होती चाम की, तो जीवत खाते काग ॥७८॥
उतरे आय सराय में, जाना है बड़ कोह ।
अटका आकिल काम बस, ली भठियारी मोह ॥७९॥
जेते सुख संसार के, इकट्ठे किये बटोर ।
कन थोरे काँकर घने, देखा फटक पछोर ॥८०॥
इस जीने का गर्ब क्या, कहाँ देंह की प्रीत ।
बात कहत ढह जात है, बारू की सी भीत ॥८१॥
मलूक कोटा झाँझरा, भीत परी भहराय ।
ऐसा कोई ना मिला, जो फेर उठावै आय ॥८२॥