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सर्वकोश
मलूकदास जी की बानी (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - ज्ञानपरोछी, साखी एवं अमर पद संग्रह)

मलूकदास जी की बानी (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - ज्ञानपरोछी, साखी एवं अमर पद संग्रह)

Malukdas Ji Ki Bani: Belvedere Steam Printing Press Allahabad

सन्त मलूकदास (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा

DevanagariHindipublished45 पृष्ठ

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साखी ३३
हम जानत तीरथ बड़े, तीरथ हरि की आस।
जिनके हिरदे हरि बसै, कोटि तिरथ तिन पास ॥४७॥
संध्या तरपन सब तजा, तीरथ कबहुँ न जाउँ ।
हरि हीरा हिरदे बसै, ताही भीतर न्हाउँ ॥४८॥
मक्का मदिना द्वारका, बद्री और केदार ।
बिना दया सब झूठ है, कहैं मलूक बिचार ॥४६॥
राम राय घट में बसे, ढूँढ़त फिरैं उजाड़ ।
कोइ कासी कोइ प्राग में, बहुत फिरैं झख मार ॥५०॥
॥ दया ॥
दुखिया जन कोइ दुखवै, दुखिए अति दुख होय ।
दुखिया रोय पुकारिहै, सब गुड़ माटी होय ॥५१॥
हरी डारि ना तोड़िये, लागै छूरा बान ।
दास मलूका यौं कहै, अपना सा जिव जान ॥५२॥
जे दुखिया संसार में, खोवो तिन का दुख ।
दलिद्दर सौंप मलूक को, लोगन दीजै सुख ॥५३॥
॥ हिंसा ॥
पीर सभन की एक सी, मूरख जानत नाहिं ।
काँटा चूभे पीर होय, गला काट कोउ खाय ॥५४॥
कुंजर चींटी पशू नर, सब में साहेब एक ।
काटे गला खोदाय का, करै सूरमा लेख ॥५५॥
सब कोउ साहेब बन्दते, हिन्दू मूसलमान ।
साहेब तिन को बन्दता, जिसका ठौर इमान ॥५६॥
॥ दया ॥
दया धर्म हिरदे बसै, बोलै अमृत बैन ।
तेई ऊँचे जानिये, जिन के नीचे नैन ॥५७॥
सब पानी की चूपरी, एक दया जग सार ।
जिन पर-आतम चीन्हिया, तेही उतरे पार ॥५८॥