मलूकदास जी की बानी (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - ज्ञानपरोछी, साखी एवं अमर पद संग्रह)
Malukdas Ji Ki Bani: Belvedere Steam Printing Press Allahabad
सन्त मलूकदास (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३२ मलूकदासजी की बानी
करै पखावज प्रेम का, हृदय बजावै तार ।
मनै नचावै मगन होय, तिन का मता अपार ॥३५॥
॥ ज्ञान ॥
जब लग थो अँधियार घर, मूस थके सब चोर ।
जब मंदिल दीपक बरयो, वही चोर धन मोर ॥३६॥
मन मिरगा बिन मूड़ का, चहुँदिस चरने जाय ।
हाँक ले आया ज्ञान तब, बाँधा ताँत लगाय ॥३७॥
॥ गुप्त की महिमा ॥
जो तेरे घट प्रेम है, तो कहि कहि न सुनाव ।
अंतरजामी जानिहै, अंतरगत का भाव ॥३८॥
गुप्त प्रगट जेती करी, मेरे मन की खूम ।
अंतरजामी रामजी, सब तुम को मालूम ॥३६॥
सुमिरन ऐसा कीजिये, दूजा लखै न कोय ।
ओंठ न फरकत देखिये, प्रेम राखिये गोय ॥४०॥
माला जपौं न कर जपौं, जिभ्या कहौं न राम ।
सुमिरन मेरा हरि करै, मैं पाया बिसराम ॥४१॥
॥ मूर्त्ति पूजा, तीर्थ भ्रमन, कर्म्म धर्म्म ॥
साधो दुनियाँ बावरी, पत्थर पूजन जाय ।
मलूक पूजै आतमा, कछु माँगै कछु खाय ॥४२॥
जेती देखै आतमा, तेते सालिग्राम ।
बोलनहारा पूजिये, पत्थर से क्या काम ॥४३॥
आतम राम न चीन्हही, पूजत फिरै पषान ।
कैसेहु मुक्ति न होयगी, कोटिक सुनो पुरान ॥४४॥
किरतिम देव न पूजिये, ठेस लगे फुटि जाय ।
कहैं मलूक सुभ आतमा, चारो जुग ठहराय ॥४५॥
देवल पुजे कि देवता, की पूजे पहाड़ ।
पूजन को जाँता भला, जो पीस खाय संसार ॥४६॥