सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

सदाराः सानुयात्राश्च शतशोऽथ सहस्रशः ॥ ६ ॥
ततो हलधरः क्षीबो रेवतीसहितः प्रभुः ।
अनुगम्यमानो गन्धर्वैरचरत् तत्र भारत ॥ ७ ॥
द्वारकापुरीके निवासी सैकड़ों-हजारों मनुष्य अपनी स्त्रियों और सेवकोंके साथ पैदल चलकर अथवा छोटी-बड़ी सवारियोंके द्वारा आकर उस उत्सवमें सम्मिलित हुए थे। भारत! भगवान् बलराम हर्षोन्मत्त होकर वहाँ रेवतीके साथ विचर रहे थे। उनके पीछे-पीछे गन्धर्व (गायक) चल रहे थे ॥ ६-७ ॥

तथैव राजा वृष्णीनामुग्रसेनः प्रतापवान् ।
अनुगीयमानो गन्धर्वैः स्त्रीसहस्रसहायवान् ॥ ८ ॥
वृष्णिवंशके प्रतापी राजा उग्रसेन भी वहाँ आमोद-प्रमोद कर रहे थे। उनके पास बहुतसे गन्धर्व गा रहे थे और सहस्रों स्त्रियाँ उनकी सेवा कर रही थीं ॥ ८ ॥

रौक्मिणेयश्च साम्बश्च क्षीबौ समरदुर्मदौ ।
दिव्यमाल्याम्बरधरौ विजहातेऽमराविव ॥ ९ ॥
युद्धमें दुर्मद वीरवर प्रद्युम्न और साम्ब दिव्य मालाएँ तथा दिव्य वस्त्र धारण करके आनन्दसे उन्मत्त हो देवताओंकी भाँति विहार करते थे ॥ ९ ॥

अक्रूरः सारणश्चैव गदो बभ्रुर्विदूरथः ।
निशठश्चारुदेष्णश्च पृथुर्विपृथुरेव च ॥ १० ॥
सत्यकः सात्यकिश्चैव भङ्गकारमहारवौ ।
हार्दिक्य उद्धवश्चैव ये चान्ये नानुकीर्तिताः ॥ ११ ॥
एते परिवृताः स्त्रीभिर्गन्धर्वैश्च पृथक् पृथक् ।
तमुत्सवं रैवतके शोभायाञ्चक्रिरे तदा ॥ १२ ॥
अक्रूर, सारण, गद, बभ्रु, विदूरथ, निशठ, चारुदेष्ण, पृथु, विपृथु, सत्यक, सात्यकि, भंगकार, महारव, हृदिकपुत्र कृतवर्मा, उद्धव और जिनका नाम यहाँ नहीं लिया गया है, ऐसे अन्य यदुवंशी भी सब-के-सब अलग-अलग स्त्रियों और गन्धर्वोंसे घिरे हुए रैवतक पर्वतके उस उत्सवकी शोभा बढ़ा रहे थे ॥ १०—१२ ॥

चित्रकौतूहले तस्मिन् वर्तमाने महाद्भुते ।
वासुदेवश्च पार्थश्च सहितौ परिजग्मतुः ॥ १३ ॥
उस अत्यन्त अद्भुत विचित्र कौतूहलपूर्ण उत्सवमें भगवान् श्रीकृष्ण और अर्जुन एक साथ घूम रहे थे ॥ १३ ॥

तत्र चङ्क्रममाणौ तौ वसुदेवसुतां शुभाम् ।
अलंकृतां सखीमध्ये भद्रां ददृशतुस्तदा ॥ १४ ॥
इसी समय वहाँ वसुदेवजीकी सुन्दरी पुत्री सुभद्रा शृंगारसे सुसज्जित हो सखियोंसे घिरी हुई उधर आ निकली। वहाँ टहलते हुए श्रीकृष्ण और अर्जुनने उसे देखा ॥ १४ ॥

दृष्ट्वैव तामर्जुनस्य कन्दर्पः समजायत ।
तं तदैकाग्रमनसं कृष्णः पार्थमलक्षयत् ॥ १५ ॥
उसे देखते ही अर्जुनके हृदयमें कामाग्नि प्रज्वलित हो उठी। उनका चित्त उसीके चिन्तनमें एकाग्र हो गया। भगवान् श्रीकृष्णने अर्जुनकी इस मनोदशाको भाँप लिया ॥ १५ ॥

अब्रवीत् पुरुषव्याघ्रः प्रहसन्निव भारत ।
वनेचरस्य किमिदं कामेनालोड्यते मनः ॥ १६ ॥
फिर वे पुरुषोतम हँसते हुए-से बोले—'भारत! यह क्या, वनवासीका मन भी इस तरह कामसे उन्मथित हो रहा है? ॥ १६ ॥

ममैषा भगिनी पार्थ सारणस्य सहोदरा ।
सुभद्रा नाम भद्रं ते पितुर्मे दयिता सुता ।
यदि ते वर्तते बुद्धिर्वक्ष्यामि पितरं स्वयम् ॥ १७ ॥
'कुन्तीनन्दन! यह मेरी बहिन और सारणकी सगी बहिन है, तुम्हारा कल्याण हो, इसका नाम सुभद्रा है। यह मेरे पिताकी बड़ी लाड़िली कन्या है। यदि तुम्हारा विचार इससे ब्याह करनेका हो तो मैं पितासे स्वयं कहूँगा' ॥ १७ ॥

अर्जुन उवाच

दुहिता वसुदेवस्य वासुदेवस्य च स्वसा ।
रूपेण चैषा सम्पन्ना कमिवैषा न मोहयेत् ॥ १८ ॥
अर्जुनने कहा—यह वसुदेवजीकी पुत्री, साक्षात् आप वासुदेवकी बहिन और अनुपम रूपसे सम्पन्न है, फिर यह किसका मन न मोह लेगी ॥ १८ ॥

कृतमेव तु कल्याणं सर्वं मम भवेद् ध्रुवम् ।
यदि स्यान्मम वार्ष्णेयी महिषीयं स्वसा तव ॥ १९ ॥
सखे! यदि यह वृष्णिकुलकी कुमारी और आपकी बहिन सुभद्रा मेरी रानी हो सके तो निश्चय ही मेरा समस्त कल्याणमय मनोरथ पूर्ण हो जाय ॥ १९ ॥

प्राप्तौ तु क उपायः स्यात् तं ब्रवीहि जनार्दन ।
आस्थास्यामि तदा सर्वं यदि शक्यं नरेण तत् ॥ २० ॥
जनार्दन! बताइये, इसे प्राप्त करनेका क्या उपाय हो सकता है? यदि मनुष्यके द्वारा कर सकने योग्य होगा तो वह सारा प्रयत्न मैं अवश्य करूँगा ॥ २० ॥

वासुदेव उवाच

स्वयंवरः क्षत्रियाणां विवाहः पुरुषर्षभ ।
स च संशयितः पार्थ स्वभावस्यानिमित्ततः ॥ २१ ॥

भगवान् श्रीकृष्ण बोले—नरश्रेष्ठ पार्थ! क्षत्रियोंके विवाहका स्वयंवर एक प्रकार है, परंतु उसका परिणाम संदिग्ध होता है; क्योंकि स्त्रियोंका स्वभाव अनिश्चित हुआ करता है (पता नहीं, वे स्वयंवरमें किसका वरण करें) ॥ २१ ॥
प्रसह्य हरणं चापि क्षत्रियाणां प्रशस्यते ।
विवाहहेतुः शूराणामिति धर्मविदो विदुः ॥ २२ ॥
बलपूर्वक कन्याका हरण भी शूरवीर क्षत्रियोंके लिये विवाहका उत्तम हेतु कहा गया है; ऐसा धर्मज्ञ पुरुषोंका मत है ॥ २२ ॥
स त्वमर्जुन कल्याणीं प्रसह्य भगिनीं मम ।
हर स्वयंवरे ह्यस्याः को वै वेद चिकीर्षितम् ॥ २३ ॥
अतः अर्जुन! मेरी राय तो यही है कि तुम मेरी कल्याणमयी बहिनको बलपूर्वक हर ले जाओ। कौन जानता है, स्वयंवरमें उसकी क्या चेष्टा होगी—वह किसे वरण करना चाहेगी? ॥ २३ ॥
ततोऽर्जुनश्च कृष्णश्च विनिश्चित्येति कृत्यताम् ।
शीघ्रगान् पुरुषानन्याम् प्रेषयामासतुस्तदा ॥ २४ ॥
धर्मराजाय तत् सर्वमिन्द्रप्रस्थगताय वै ।
श्रुत्वैव च महाबाहुरनुजज्ञे स पाण्डवः ॥ २५ ॥
तब अर्जुन और श्रीकृष्णने कर्तव्यका निश्चय करके कुछ दूसरे शीघ्रगामी पुरुषोंको इन्द्रप्रस्थमें धर्मराज युधिष्ठिरके पास भेजा और सब बातें उन्हें सूचित करके उनकी सम्मति जाननेकी इच्छा प्रकट की। महाबाहु युधिष्ठिरने यह सुनते ही अपनी ओरसे आज्ञा दे दी ॥ २४-२५ ॥
(भीमसेनस्तु तच्छ्रुत्वा कृतकृत्योऽभ्यमन्यत ।
इत्येवं मनुजैः सार्धमुक्त्वा प्रीतिमुपेयिवान् ॥)
भीमसेन यह समाचार सुनकर अपनेको कृतकृत्य मानने लगे और दूसरे लोगोंके साथ ये बातें करके उनको बड़ी प्रसन्नता हुई।

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सुभद्राहरणपर्वणि युधिष्ठिरानुज्ञायामष्टादशाधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २१८ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सुभद्राहरणपर्वमें युधिष्ठिरकी आज्ञासम्बन्धी दो सौ अठारहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २१८ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल २६ श्लोक हैं)

ततः संवादिते तस्मिन्ननुज्ञातो धनंजयः ।

⬅ विषय-सूची (TOC)

एकोनविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः

यादवोंकी युद्धके लिये तैयारी और अर्जुनके प्रति बलरामजीके क्रोधपूर्ण उद्गार

वैशम्पायन उवाच

ततः संवादिते तस्मिन्ननुज्ञातो धनंजयः ।
गतां रैवतके कन्यां विदित्वा जनमेजय ॥ १ ॥
वासुदेवाभ्यनुज्ञातः कथयित्वेतिकृत्यताम् ।
कृष्णस्य मतमादाय प्रययौ भरतर्षभः ॥ २ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! तदनन्तर उस विवाहसम्बन्धी संदेशपर युधिष्ठिरकी आज्ञा मिल जानेके पश्चात् धनंजयको जब यह मालूम हुआ कि सुभद्रा रैवतक पर्वतपर गयी हुई है, तब उन्होंने भगवान् श्रीकृष्णसे सलाह ली। श्रीकृष्णने उन्हें आगे क्या करना है, यह बताकर सुभद्रासे विवाह करने तथा उसे हर ले जानेकी अनुमति दे दी। श्रीकृष्णकी सम्मति पाकर भरतश्रेष्ठ अर्जुन अपने विश्रामस्थानपर चले गये ॥ १-२ ॥

रथेन काञ्चनाङ्गेन कल्पितेन यथाविधि ।
शैब्यसुग्रीवयुक्तेन किङ्किणीजालमालिना ॥ ३ ॥
सर्वशस्त्रोपपन्नेन जीमूतखनादिना ।
ज्वलिताग्निप्रकाशेन द्विषतां हर्षघातिना ॥ ४ ॥
संनद्धः कवची खड्गी बद्धगोधाङ्गुलित्रवान् ।
मृगयाव्यपदेशेन प्रययौ पुरुषर्षभः ॥ ५ ॥
(भगवान्‌की आज्ञासे दारुकने) उनके सुवर्णमय रथको विधिपूर्वक सजाकर तैयार किया था। उसमें स्थान-स्थानपर छोटी-छोटी घंटिकाएँ तथा झालरें लगा दी थीं और शैब्य, सुग्रीव आदि अश्व भी उसमें जोत दिये थे। उस रथके भीतर सब प्रकारके अस्त्र-शस्त्र मौजूद थे। उसकी घर्घराहटसे मेघकी गर्जनाके समान आवाज होती थी। वह प्रज्वलित अग्निके समान तेजस्वी जान पड़ता था। उसे देखते ही शत्रुओंका हर्ष हवा हो जाता था। नरश्रेष्ठ धनंजय कवच और तलवार बाँधकर एवं हाथोंमें दस्ताने पहनकर उसी रथके द्वारा शिकार खेलनेके बहाने रैवतक पर्वतपर गये ॥ ३—५ ॥

सुभद्रा त्वथ शैलेन्द्रमभ्यर्च्यैव हि रैवतम् ।
दैवतानि च सर्वाणि ब्राह्मणान् स्वस्ति वाच्य च ॥ ६ ॥
प्रदक्षिणं गिरेः कृत्वा प्रययौ द्वारकां प्रति ।
तामभिद्रुत्य कौन्तेयः प्रसह्यारोपयद् रथम् ।

सुभद्रां चारुसर्वाङ्गीं कामबाणप्रपीडितः ॥ ७ ॥
उधर सुभद्रा गिरिराज रैवतक तथा सब देवताओंकी पूजा करके ब्राह्मणोंसे स्वस्तिवाचन कराकर पर्वतकी परिक्रमा पूरी करके द्वारकाकी ओर लौट रही थी। अर्जुन कामदेवके बाणोंसे अत्यन्त पीड़ित हो रहे थे। उन्होंने दौड़कर सर्वाङ्गसुन्दरी सुभद्राको बलपूर्वक रथपर बिठा लिया ॥ ६-७ ॥

ततः स पुरुषव्याघ्रस्तामादाय शुचिस्मिताम् ।
रथेन काञ्चनाङ्गेन प्रययौ स्वपुरं प्रति ॥ ८ ॥
इसके बाद पुरुषसिंह धनंजय पवित्र मुसकानवाली सुभद्राको साथ ले उस सुवर्णमय रथद्वारा अपने नगरकी ओर चल दिये ॥ ८ ॥
ह्रियमाणां तु तां दृष्ट्वा सुभद्रां सैनिका जनाः ।
विक्रोशन्तोऽद्रवन् सर्वे द्वारकामभितः पुरीम् ॥ ९ ॥
सुभद्राका अपहरण होता देख समस्त सैनिकगण हल्ला मचाते हुए द्वारकापुरीकी ओर दौड़े गये ॥ ९ ॥
ते समासाद्य सहिताः सुधर्मामभितः सभाम् ।
सभापालस्य तत् सर्वमाचख्युः पार्थविक्रमम् ॥ १० ॥
उन्होंने एक साथ सुधर्मासभामें पहुँचकर सभापालसे अर्जुनके उस साहसपूर्ण पराक्रमका सारा हाल कह सुनाया ॥ १० ॥
तेषां श्रुत्वा सभापालो भेरीं सांनाहिकीं ततः ।

समाजघ्ने महाघोषां जाम्बूनदपरिष्कृताम् ॥ ११ ॥
उनकी बातें सुनकर सभापालने सबको युद्धके लिये तैयार होनेकी सूचना देनेके उद्देश्यसे सुवर्णखचित नगाड़ा बजाया, जिसकी आवाज बहुत ऊँची और दूरतक फैलनेवाली थी ॥ ११ ॥

क्षुब्धास्तेनाथ शब्देन भोजवृष्ण्यन्धकास्तदा ।
अन्नपानमपास्याथ समापेतुः समन्ततः ॥ १२ ॥
उसकी आवाज सुनकर भोज, वृष्णि और अन्धकवंशके वीर क्षुब्ध हो उठे और खाना-पीना छोड़कर चारों ओरसे दौड़े आये ॥ १२ ॥

तत्र जाम्बूनदाङ्गानि स्पर्ध्यास्तरणवन्ति च ।
मणिविद्रुमचित्राणि ज्वलिताग्निप्रभाणि च ॥ १३ ॥
भेजिरे पुरुषव्याघ्रा वृष्ण्यन्धकमहारथाः ।
सिंहासनानि शतशो धिष्ण्यानीव हुताशनाः ॥ १४ ॥
उस सभामें सैकड़ों सिंहासन रखे गये थे, जिनमें सुवर्ण जड़ा गया था। उन सिंहासनोंपर बहुमूल्य बिछौने पड़े थे। वे सभी आसन मणि और मूँगोंसे चित्रित होनेके कारण प्रज्वलित अग्निके समान प्रकाशित हो रहे थे। भोज, वृष्णि और अन्धकवंशके पुरुषसिंह महारथी वीर उन्हीं सिंहासनोंपर आकर बैठे, मानो यज्ञकी वेदियोंपर प्रज्वलित अग्निदेव शोभा पा रहे हों ॥ १३-१४ ॥

तेषां समुपविष्टानां देवानामिव संनये ।
आचख्यौ चेष्टितं जिष्णोः सभापालः सहानुगः ॥ १५ ॥
देवसमूहकी भाँति वहाँ बैठे हुए उन यदुवंशियोंके समुदायमें सेवकोंसहित सभापालने अर्जुनकी वह सारी करतूत कह सुनायी ॥ १५ ॥

तच्छ्रुत्वा वृष्णिवीरास्ते मदसंरक्तलोचनाः ।
अमृष्यमाणाः पार्थस्य समुत्पेतुरहंकृताः ॥ १६ ॥
यह सुनते ही युद्धोन्मादसे लाल नेत्रोंवाले वृष्णि-वंशी वीर अर्जुनके प्रति अमर्षसे भर गये और गर्वसे उछल पड़े ॥ १६ ॥

योजयध्वं रथानाशु प्रासानाहरतेति च ।
धनूंषि च महार्हाणि कवचानि बृहन्ति च ॥ १७ ॥
(वे बड़ी उतावलीसे कहने लगे—) ‘जल्दी रथ जोतो, फौरन प्रास ले आओ, धनुष तथा बहुमूल्य एवं विशाल कवच लाओ’ ॥ १७ ॥

सूतानुच्चुक्रुशुः केचिद् रथान् योजयतेति च ।
स्वयं च तुरगान् केचिदयुञ्जन् हेमभूषितान् ॥ १८ ॥
कोई सारथियोंको पुकारकर कहने लगे—‘अरे! जल्दी रथ जोतो।’ कुछ लोग स्वयं ही सोनेके आभूषणोंसे विभूषित घोड़ोंको रथोंमें जोतने लगे ॥ १८ ॥

रथेष् plug -> रथेष्वा नीयमानेषु कवचेषु ध्वजेषु च ।
अभिक्रन्दे नृवीराणां तदासीत् तुमुलं महत् ॥ १९ ॥
रथ, कवच और ध्वजाओंके लाये जाते समय चारों ओर उन नर-वीरोंके कोलाहलसे वहाँ बड़ी भारी तुमुल ध्वनि व्याप्त हो गयी ॥ १९ ॥
वनमाली ततः क्षीबः कैलासशिखरोपमः ।
नीलवासा मदोत्सिक्त इदं वचनमब्रवीत् ॥ २० ॥
तदनन्तर कैलासशिखरके समान गौरवर्णवाले नील वस्त्र और वनमाला धारण करनेवाले बलरामजी उन यादवोंसे इस प्रकार बोले— ॥ २० ॥
किमिदं कुरुथाप्रज्ञास्तूष्णींभूते जनार्दने ।
अस्य भावमविज्ञाय संक्रुद्धा मोघगर्जिताः ॥ २१ ॥
'मूर्खो! श्रीकृष्ण तो चुपचाप बैठे हैं, तुम यह क्या कर रहे हो? इनका अभिप्राय जाने बिना ही तुम इतने कुपित हो उठे। तुमलोगोंकी यह गर्जना व्यर्थ ही है ॥ २१ ॥
एष तावदभिप्रायमाख्यातु स्वं महामतिः ।
यदस्य रुचिरं कर्तुं तत् कुरुध्वमतन्द्रिताः ॥ २२ ॥
'पहले परम बुद्धिमान् श्रीकृष्ण अपना अभिप्राय बतावें। तदनन्तर जो कर्तव्य इन्हें उचित जान पड़े, उसीका आल

मन्यमानः कुले जातमात्मानं पुरुषः क्वचित् ॥ २७ ॥
‘अपनेको कुलीन माननेवाला कौन ऐसा मनुष्य है, जो जिस बर्तनमें खाये, उसीमें छेद करे ॥ २७ ॥

इच्छन्नेव हि सम्बन्धं कृतं पूर्वं च मानयन् ।
को हि नाम भवेनार्थी साहसेन समाचरेत् ॥ २८ ॥
‘सम्बन्धकी इच्छा रहते हुए भी कौन ऐसा कल्याणकामी पुरुष होगा, जो पहलेके उपकारको मानते हुए ऐसा दुःसाहसपूर्ण कार्य करे ॥ २८ ॥

सोऽवमन्य तथास्माकमनादृत्य च केशवम् ।
प्रसह्य हृतवानद्य सुभद्रां मृत्युमात्मनः ॥ २९ ॥
‘उसने हमलोगोंका अपमान और केशवका अनादर करके आज बलपूर्वक सुभद्राका अपहरण किया है, जो उसके लिये अपनी मृत्युके समान है ॥ २९ ॥

कथं हि शिरसो मध्ये कृतं तेन पदं मम ।
मर्षयिष्यामि गोविन्द पादस्पर्शमिवोरगः ॥ ३० ॥
‘गोविन्द! जैसे सर्प पैरकी ठोकर नहीं सह सकता, उसी प्रकार मैं उसने जो मेरे सिरपर पैर रख दिया है, उसे कैसे सह सकूँगा? ॥ ३० ॥

अद्य निष्कौरवामेकः करिष्यामि वसुंधराम् ।
न हि मे मर्षणीयोऽयमर्जुनस्य व्यतिक्रमः ॥ ३१ ॥
‘अर्जुनका यह अन्याय मेरे लिये असह्य है। आज मैं अकेला ही इस वसुन्धराको कुरुवंशियोंसे विहीन कर दूँगा’ ॥ ३१ ॥

तं तथा गर्जमानं तु मेघदुन्दुभिनिःस्वनम् ।
अन्वपद्यन्त ते सर्वे भोजवृष्ण्यन्धकास्तदा ॥ ३२ ॥
मेघ और दुन्दुभिकी गम्भीर ध्वनिके समान बलरामजीकी वैसी गर्जना सुनकर उस समय भोज, वृष्णि और अन्धकवंशके समस्त वीरोंने उन्हींका अनुसरण किया ॥ ३२ ॥

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सुभद्राहरणपर्वणि बलदेवक्रोधे
एकोनविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २१९ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सुभद्राहरणपर्वमें बलदेवक्रोधविषयक दो सौ उन्नीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २१९ ॥

(हरणाहरणपर्व)

⬅ विषय-सूची (TOC)

(हरणाहरणपर्व)

विंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः

द्वारकामें अर्जुन और सुभद्राका विवाह, अर्जुनके इन्द्रप्रस्थ पहुँचनेपर श्रीकृष्ण आदिका दहेज लेकर वहाँ जाना, द्रौपदीके पुत्र एवं अभिमन्युके जन्म, संस्कार और शिक्षा

वैशम्पायन उवाच

उक्तवन्तो यथा वीर्यमसकृत् सर्ववृष्णयः ।
ततोऽब्रवीद् वासुदेवो वाक्यं धर्मार्थसंयुक्तम् ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! उस समय सभी वृष्णिवंशियोंने अपने-अपने पराक्रमके अनुसार अर्जुनसे बदला लेनेकी बात बार-बार दोहरायी। तब भगवान् वासुदेव यह धर्म और अर्थसे युक्त वचन बोले— ॥ १ ॥

नावमानं कुलस्यास्य गुडाकेशः प्रयुक्तवान् ।
सम्मानोऽभ्यधिकस्तेन प्रयुक्तोऽयं न संशयः ॥ २ ॥

‘निद्राविजयी अर्जुनने इस कुलका अपमान नहीं किया है। अपितु ऐसा करके उन्होंने इस कुलके प्रति अधिक सम्मानका भाव ही प्रकट किया है, इसमें संशय नहीं है ॥ २ ॥

अर्थलुब्धान् न वः पार्थो मन्यते सात्वतान् सदा ।
स्वयंवरमनाधृष्यं मन्यते चापि पाण्डवः ॥ ३ ॥
‘पाण्डुपुत्र अर्जुन यह जानते हैं कि सात्वतवंशके लोग सदासे ही धनके लोभी नहीं हैं, अतः धन देकर कन्या नहीं ली जा सकती। साथ ही पाण्डुपुत्र अर्जुनको यह भी मालूम है कि स्वयंवरमें कन्याके मिल जानेका पूर्ण निश्चय नहीं रहता, अतः वह भी अग्राह्य ही है ॥ ३ ॥

प्रदानमपि कन्यायाः पशुवत् कोऽनुमन्यते ।
विक्रयं चाप्यपत्यस्य कः कुर्यात् पुरुषो भुवि ॥ ४ ॥
‘भला, कौन ऐसा वीर पुरुष होगा, जो पशुकी तरह पराक्रमशून्य होकर कन्यादानकी प्रतीक्षा में बैठा रहेगा एवं इस पृथ्वीपर कौन ऐसा अधम पुरुष होगा, जो धन लेकर अपनी संतानको बेचेगा ॥ ४ ॥

एतान् दोषांस्तु कौन्तेयो दृष्टवानिति मे मतिः ।
अतः प्रसह्य हृतवान् कन्यां धर्मेण पाण्डवः ॥ ५ ॥
‘मेरा विश्वास है कि कुन्तीकुमारने इन सभी दोषोंकी ओर दृष्टिपात किया है; इसीलिये उन्होंने क्षत्रिय-धर्मके अनुसार बलपूर्वक कन्याका अपहरण किया है ॥ ५ ॥

उचितश्चैव सम्बन्धः सुभद्रां च यशस्विनीम् ।
एष चापीदृशः पार्थः प्रसह्य हृतवानिति ॥ ६ ॥
‘मेरी समझमें यह सम्बन्ध बहुत उचित है। सुभद्रा यशस्विनी है और ये कुन्तीपुत्र अर्जुन भी ऐसे ही यशस्वी हैं; अतः इन्होंने सुभद्राका बलपूर्वक हरण किया है ॥ ६ ॥

भरतस्यान्वये जातं शान्तनोश्च यशस्विनः ।
कुन्तिभोजात्मजापुत्रं को बुभूषेत नार्जुनम् ॥ ७ ॥
‘महाराज भरत तथा महायशस्वी शान्तनुके कुलमें जिनका जन्म हुआ है, जो कुन्तिभोजकुमारी कुन्तीके पुत्र हैं, ऐसे वीरवर अर्जुनको कौन अपना सम्बन्धी बनाना न चाहेगा? ॥ ७ ॥

न च पश्यामि यः पार्थं विजयेत रणे बलात् ।
वर्जयित्वा विरूपाक्षं भगनेत्रहरं हरम् ॥ ८ ॥
अपि सर्वेषु लोकेषु सेन्द्ररुद्रेषु मारिष ।
‘आर्य! इन्द्रलोक एवं रुद्रलोकसहित सम्पूर्ण लोकोंमें भगदेवताके नेत्रोंका नाश करनेवाले विकराल नेत्रोंवाले भगवान् रुद्रको छोड़कर दूसरे किसीको मैं ऐसा नहीं देखता, जो संग्राममें बलपूर्वक पार्थको परास्त कर सके ॥ ८ १/२ ॥

स च नाम रथस्तादृङ्‌मदीयास्ते च वाजिनः ॥ ९ ॥

योद्धा पार्थश्च शीघ्रास्त्रः को नु तेन समो भवेत् ।
तमभिद्रुत्य सान्त्वेन परमेण धनंजयम् ।। १० ।।
न्यवर्तयत संहृष्टा ममैषा परमा मतिः ।
‘इस समय अर्जुनके पास मेरा सुप्रसिद्ध रथ है, मेरे ही अद्भुत घोड़े हैं और स्वयं अर्जुन शीघ्रता-पूर्वक अस्त्र-शस्त्र चलानेवाले योद्धा हैं। ऐसी दशामें अर्जुनकी समानता कौन कर सकता है? आपलोग प्रसन्नताके साथ दौड़े जाइये और बड़ी सान्त्वनासे धनंजयको लौटा लाइये। मेरी तो यही परम सम्मति है ।। ९-१० १/२ ।।
यदि निर्जित्य वः पार्थो बलाद् गच्छेत् स्वकं पुरम् ।। ११ ।।
प्रणश्येद् वो यशः सद्यो न तु सान्त्वे पराजयः ।
‘यदि अर्जुन आपलोगोंको बलपूर्वक हराकर अपने नगरमें चले गये, तब तो आपलोगोंका सारा यश तत्काल ही नष्ट हो जायगा और सान्त्वनापूर्वक उन्हें ले आनेमें अपनी पराजय नहीं है’ ।। ११ १/२ ।।
तच्छ्रुत्वा वासुदेवस्य तथा चक्रुर्जनाधिप ।। १२ ।।
जनमेजय! वासुदेवका यह वचन सुनकर यादवोंने वैसा ही किया ।। १२ ।।
निवृत्तश्चार्जुनस्तत्र विवाहं कृतवान् प्रभुः ।
उषित्वा तत्र कौन्तेयः संवत्सरपराः क्षपाः ।। १३ ।।
शक्तिशाली अर्जुन द्वारकामें लौट आये। वहाँ उन्होंने सुभद्रासे विवाह किया और एक सालसे कुछ अधिक दिनतक वे वहीं रहे ।। १३ ।।
विहृत्य च यथाकामं पूजितो वृष्णिनन्दनैः ।
पुष्करे तु ततः शेषं कालं वर्तितवान् प्रभुः ।। १४ ।।
द्वारकामें इच्छानुसार विहार करके वृष्णिवंशियोंद्वारा पूजित होकर अर्जुन वहाँसे पुष्करतीर्थमें चले गये और वनवासका शेष समय वहीं व्यतीत किया ।। १४ ।।
पूर्गे तु द्वादशे वर्षे खाण्डवप्रस्थमागतः ।
(ववन्दे धौम्यमासाद्य मातरं च धनंजयः ।।
बारहवाँ वर्ष पूर्ण होनेपर वे खाण्डवप्रस्थमें आये। उन्होंने धौम्यजीके पास जाकर उनको तथा माता कुन्तीको प्रणाम किया।
स्पृष्ट्वा च चरणौ राज्ञो भीमस्य च धनंजयः ।
यमाभ्यां वन्दितो हृष्टः सस्वजे तौ ननन्द च ।।)
अभिगम्य च राजानं नियमेन समाहितः ।। १५ ।।
अभ्यर्च्य ब्राह्मणान् पार्थो द्रौपदीमभिजग्मिवान् ।

इसके बाद राजा युधिष्ठिर और भीमके चरण छुये। तदनन्तर नकुल और सहदेवने आकर अर्जुनको प्रणाम किया। अर्जुनने भी हर्षमें भरकर उन दोनोंको हृदयसे लगा लिया और उनसे मिलकर बड़ी प्रसन्नताका अनुभव किया। फिर वहाँ राजासे मिलकर नियमपूर्वक एकाग्रचित्त हो उन्होंने ब्राह्मणोंका पूजन किया। तत्पश्चात् वे द्रौपदीके समीप गये ।। १५ ।।

तं द्रौपदी प्रत्युवाच प्रणयात् कुरुनन्दनम् ॥ १६ ॥
तत्रैव गच्छ कौन्तेय यत्र सा सात्वतात्मजा ।
सुबद्धस्यापि भारस्य पूर्वबन्धः श्लथायते ॥ १७ ॥
द्रौपदीने प्रणयकोपवश कुरुनन्दन अर्जुनसे कहा—‘कुन्तीकुमार! यहाँ क्यों आये हो, वहीं जाओ, जहाँ वह सात्वतवंशकी कन्या सुभद्रा है। सच है, बोझको कितना ही कसकर बाँधा गया हो, जब उसे दूसरी बार बाँधते हैं, तब पहला बन्धन ढीला पड़ जाता है (यही हालत मेरे प्रति तुम्हारे प्रेमबन्धनकी है) ।। १६-१७ ।।
तथा बहुविधं कृष्णां विलपन्तीं धनंजयः ।
सान्त्वयामास भूयश्च क्षमयामास चासकृत् ॥ १८ ॥
इस तरह नाना प्रकारकी बातें कहकर कृष्णा विलाप करने लगी। तब धनंजयने उसे पूर्ण सान्त्वना दी और अपने अपराधके लिये उससे बार-बार क्षमा माँगी ॥ १८ ॥
सुभद्रां त्वरमाणश्च रक्तकौशेयवासिनीम् ।
पार्थः प्रस्थापयामास कृत्वा गोपालिकावपुः ॥ १९ ॥
इसके बाद अर्जुनने लाल रेशमी साड़ी पहनकर आयी हुई अनिन्द्यसुन्दरी सुभद्राका ग्वालिनका-सा वेश बनाकर उसे बड़ी उतावलीके साथ महलमें भेजा ।। १९ ।।
साधिकं तेन रूपेण शोभमाना यशस्विनी ।
भवनं श्रेष्ठमासाद्य वीरपत्नी वराङ्गना ॥ २० ॥
ववन्दे पृथुताम्राक्षी पृथां भद्रा यशस्विनी ।
तां कुन्ती चारुसर्वाङ्गीमुपाजिघ्रत मूर्धनि ॥ २१ ॥
वीरपत्नी, वरांगना एवं यशस्विनी सुभद्रा उस वेशमें और अधिक शोभा पाने लगी। उसकी आँखें विशाल और कुछ-कुछ लाल थीं। उस यशस्विनीने सुन्दर राजभवनके भीतर जाकर राजमाता कुन्तीके चरणोंमें प्रणाम किया। कुन्ती उस सर्वांगसुन्दरी पुत्र-वधूको हृदयसे लगाकर उसका मस्तक सूँघने लगी ।। २०-२१ ।।

अध्याय (पृष्ठ 1519)

सुभद्राका कुन्ती और द्रौपदीकी सेवामें उपस्थित होना

प्रीत्या परमया युक्ता आशीर्भिर्युञ्जतातुलाम् ।
ततोऽभिगम्य त्वरिता पूर्णेन्दुसदृशानना ॥ २२ ॥
ववन्दे द्रौपदीं भद्रा प्रेष्याहमिति चाब्रवीत् ।
और उसने बड़ी प्रसन्नताके साथ उस अनुपम वधूको अनेक आशीर्वाद दिये। तदनन्तर पूर्ण चन्द्रमाके सदृश मनोहर मुखवाली सुभद्राने तुरंत जाकर महारानी द्रौपदीके चरण छुए और कहा—'देवि! मैं आपकी दासी हूँ' ॥ २२ १/२ ॥
प्रत्युत्थाय तदा कृष्णा स्वसारं माधवस्य च ॥ २३ ॥
परिष्वज्यावदत् प्रीत्या निःसपत्नोऽस्तु ते पतिः ।
तथैव मुदिता भद्रा तामुवाचैवमस्त्विति ॥ २४ ॥
उस समय द्रौपदी तुरंत उठकर खड़ी हो गयी और श्रीकृष्णकी बहिन सुभद्राको हृदयसे लगाकर बड़ी प्रसन्नतासे बोली—'बहिन! तुम्हारे पति शत्रुरहित हों।' सुभद्राने भी आनन्दमग्न होकर कहा—'बहिन! ऐसा ही हो' ॥ २३-२४ ॥
ततस्ते हृष्टमनसः पाण्डवेया महारथाः ।
कुन्ती च परमप्रीता बभूव जनमेजय ॥ २५ ॥
श्रुत्वा तु पुण्डरीकाक्षः सम्प्राप्तं स्वं पुरोत्तमम् ।
अर्जुनं पाण्डवश्रेष्ठमिन्द्रप्रस्थगतं तदा ॥ २६ ॥
आजगाम विशुद्धात्मा सह रामेण केशवः ।
वृष्ण्यन्धकमहामात्रैः सह वीरैर्महारथैः ॥ २७ ॥

जनमेजय! तत्पश्चात् महारथी पाण्डव मन-ही-मन हर्षविभोर हो उठे और कुन्तीदेवी भी बहुत प्रसन्न हुईं। कमलनयन भगवान् श्रीकृष्णने जब यह सुना कि पाण्डवश्रेष्ठ अर्जुन अपने उत्तम नगर इन्द्रप्रस्थ पहुँच गये हैं, तब वे शुद्धात्मा श्रीकृष्ण एवं बलराम तथा वृष्णि और अन्धकवंशके प्रधान-प्रधान वीर महारथियोंके साथ वहाँ आये।। २५-२७।।

भ्रातृभिश्च कुमारैश्च योधैश्च बहुभिर्वृतः।
सैन्येन महता शौरिरभिगुप्तः परंतपः।। २८ ।।

शत्रुओंको संताप देनेवाले श्रीकृष्ण भाइयों, पुत्रों और बहुतेरे योद्धाओंके साथ घिरे हुए तथा विशाल सेनासे सुरक्षित होकर इन्द्रप्रस्थमें पधारे।। २८ ।।

तत्र दानपतिर्धीमानाजगाम महायशाः।
अक्रूरो वृष्णिवीराणां सेनापतिररिंदमः।। २९ ।।

उस समय वहाँ वृष्णिवीरोंके सेनापति शत्रुदमन महायशस्वी और परम बुद्धिमान् दानपति अक्रूरजी भी आये थे ।। २९ ।।

अनाधृष्टिर्महातेजा उद्धवश्च महायशाः।
साक्षाद् बृहस्पतेः शिष्यो महाबुद्धिर्महामनाः।। ३० ।।

इनके सिवा महातेजस्वी अनाधृष्टि तथा साक्षात् बृहस्पतिके शिष्य परम बुद्धिमान् महामनस्वी एवं परम यशस्वी उद्धव भी आये थे ।। ३० ।।

सत्यकः सात्यकिश्चैव कृतवर्मा च सात्वतः।
प्रद्युम्नश्चैव साम्बश्च निशठः शङ्कुरेव च।। ३१ ।।
चारुदेष्णश्च विक्रान्तो झिल्ली विपृथुरेव च।
सारणश्च महाबाहुर्गदश्च विदुषां वरः।। ३२ ।।
एते चान्ये च बहवो वृष्णिभोजान्धकास्तथा।
आजग्मुः खाण्डवप्रस्थमादाय हरणं बहु ।। ३३ ।।

सत्यक, सात्यकि, सात्वतवंशी कृतवर्मा, प्रद्युम्न, साम्ब, निशठ, शंकु, पराक्रमी चारुदेष्ण, झिल्ली, विपृथु, महाबाहु सारण तथा विद्वानोंमें श्रेष्ठ गद—ये तथा और दूसरे भी बहुत-से वृष्णि, भोज और अन्धकवंशके लोग दहेजकी बहुत-सी सामग्री लेकर खाण्डवप्रस्थमें आये थे ।। ३१-३३ ।।

ततो युधिष्ठिरो राजा श्रुत्वा माधवमागतम्।
प्रतिग्रहार्थं कृष्णस्य यमौ प्रास्थापयत् तदा ।। ३४ ।।

महाराज युधिष्ठिरने भगवान् श्रीकृष्णका आगमन सुनकर उन्हें आदरपूर्वक लिवा लानेके लिये नकुल और सहदेवको भेजा ।। ३४ ।।

ताभ्यां प्रतिगृहीतं तु वृष्णिचक्रं महर्द्धिमत्।
विवेश खाण्डवप्रस्थं पताकाध्वजशोभितम् ।। ३५ ।।

उन दोनोंके द्वारा स्वागतपूर्वक लाये हुए वृष्णि-वंशियोंके उस परम समृद्धिशाली समुदायने खाण्डवप्रस्थमें प्रवेश किया। उस समय ध्वजा-पताकाओंसे सजाया हुआ वह नगर सुशोभित हो रहा था ।। ३५ ।।

संमृष्टसिक्तपन्थानं पुष्पप्रकरशोभितम् ।
चन्दनस्य रसैः शीतैः पुण्यगन्धैर्निषेवितम् ।। ३६ ।।
नगरकी सड़कें झाड़-बुहारकर साफ की गयी थीं। उनके ऊपर जलका छिड़काव किया गया था। स्थान-स्थानपर फूलोंके गजरोंसे नगरकी सजावट की गयी थी। शीतल चन्दन, रस तथा अन्य पवित्र सुगन्धित पदार्थोंकी सुवास सब ओर छा रही थी ।। ३६ ।।

दह्यतागुरुणा चैव देशे देशे सुगन्धिना ।
हृष्टपुष्टजनाकीर्णं वणिग्भिरुपशोभितम् ।। ३७ ।।
जगह-जगह जलते हुए अगुरुकी सुगन्ध फैल रही थी, सारा नगर हृष्ट-पुष्ट मनुष्योंसे भरा था। कितने ही व्यापारी उसकी शोभा बढ़ा रहे थे ।। ३७ ।।

प्रतिपेदे महाबाहुः सह रामेण केशवः ।
वृष्ण्यन्धकैस्तथा भोजैः समेतः पुरुषोत्तमः ।। ३८ ।।
महाबाहु पुरुषोत्तम श्रीकृष्णने बलरामजी तथा वृष्णि, अन्धक एवं भोजवंशी वीरोंके साथ नगरमें प्रवेश किया ।। ३८ ।।

सम्पूज्यमानः पौरैश्च ब्राह्मणैश्च सहस्रशः ।
विवेश भवनं राज्ञः पुरन्दरगृहोपमम् ।। ३९ ।।
पुरवासी मनुष्यों तथा सहस्रों ब्राह्मणोंद्वारा सम्मानित हो उन्होंने राजभवनके भीतर प्रवेश किया। वह घर इन्द्रभवनकी शोभाको भी तिरस्कृत कर रहा था ।। ३९ ।।

युधिष्ठिरस्तु रामेण समागच्छद् यथाविधि ।
मूर्ध्नि केशवमाघ्राय बाहुभ्यां परिषस्वजे ।। ४० ।।
युधिष्ठिरजी बलरामजीके साथ विधिपूर्वक मिले और श्रीकृष्णका मस्तक सूँघकर उन्हें दोनों भुजाओंमें कस लिया ।। ४० ।।

तं प्रीयमाणो गोविन्दो विनयेनाभिपूजयन् ।
भीमं च पुरुषव्याघ्रं विधिवत् प्रत्यपूजयत् ।। ४१ ।।
भगवान् श्रीकृष्णने प्रसन्न होकर विनीतभावसे युधिष्ठिरका सम्मान किया। नरश्रेष्ठ भीमसेनका भी उन्होंने विधिवत् पूजन किया ।। ४१ ।।

तांश्च वृष्ण्यन्धकश्रेष्ठान् कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः ।
प्रतिजग्राह सत्कारैर्यथाविधि यथागतम् ।। ४२ ।।
कुन्तीनन्दन युधिष्ठिरने वृष्णि और अन्धकवंशके श्रेष्ठ पुरुषोंका विधिपूर्वक यथायोग्य स्वागत-सत्कार किया ।। ४२ ।।

गुरुवत् पूजयामास कांश्चित् कांश्चिद् वयस्यवत् ।

कांश्चिदभ्यवदत् प्रेम्णा कैश्चिदप्यभिवादितः ॥ ४३ ॥
कुछ लोगोंका उन्होंने गुरुकी भाँति पूजन किया, कितनोंको समवयस्क मित्रोंकी भाँति गलेसे लगाया, कुछ लोगोंसे प्रेमपूर्वक वार्तालाप किया और कुछ लोगोंने उन्हींको प्रणाम किया ॥ ४३ ॥

तेषां ददौ हृषीकेशो जन्यार्थे धनमुत्तमम् ।
हरणं वै सुभद्राया ज्ञातिदेयं महायशाः ॥ ४४ ॥
महायशस्वी भगवान् श्रीकृष्णने वधू तथा वरपक्षके लोगोंके लिये उत्तम धन अर्पित किया। वरके कुटुम्बीजनोंको देनेयोग्य दहेज पहले नहीं दिया गया था, उसीकी पूर्ति उन्होंने इस समय की ॥ ४४ ॥

रथानां काञ्चनाङ्गानां किङ्किणीजालमालिनाम् ।
चतुर्युजामुपेतानां सूतैः कुशलशिक्षितैः ॥ ४५ ॥
सहस्रं प्रददौ कृष्णो गवामयुतमेव च ।
श्रीमान् माथुरदेश्यानां दोग्ध्रीणां पुण्यवर्चसाम् ॥ ४६ ॥
किंकिणी और झालरोंसे सुशोभित सुवर्णखचित एक हजार रथ जिनमेंसे प्रत्येकमें चार-चार घोड़े जुते हुए थे और प्रत्येकमें पूर्ण शिक्षित चतुर सारथि बैठा हुआ था, श्रीमान् कृष्णने समर्पित किये तथा मथुरामण्डलकी पवित्र तेजवाली दस हजार दुधारू गौएँ दीं ॥ ४५-४६ ॥

वडवानां च शुद्धानां चन्द्रांशुसमवर्चसाम् ।
ददौ जनार्दनः प्रीत्या सहस्रं हेमभूषितम् ॥ ४७ ॥
चन्द्रमाके समान श्वेत कान्तिवाली विशुद्ध जातिकी एक हजार सुवर्णभूषित घोड़ियाँ भी जनार्दनने प्रेमपूर्वक भेंट कीं ॥ ४७ ॥

तथैवाश्वतरीणां च दान्तानां वातरंहसाम् ।
शतान्यञ्जनकेशीनां श्वेतानां पञ्च पञ्च च ॥ ४८ ॥
इसी प्रकार पाँच सौ काले अयालवाली और पाँच सौ सफेद रंगवाली खच्चरियाँ समर्पित कीं, जो सभी वशमें की हुई तथा वायुके समान वेगवाली थीं ॥ ४८ ॥

स्नानपानोत्सवे चैव प्रयुक्तं वयसान्वितम् ।
स्त्रीणां सहस्रं गौरीणां सुवेषाणां सुवर्चसाम् ॥ ४९ ॥
सुवर्णशतकण्ठीनामरोमाणां स्वलंकृताम् ।
परिचर्यासु दक्षाणां प्रददौ पुष्करेक्षणः ॥ ५० ॥
स्नान, पान और उत्सवमें जिनका उपयोग किया गया था, जो वयःप्राप्त थीं, जिनके वेष सुन्दर और कान्ति मनोहर थी, जिन्होंने सोनेके सौ-सौ मणियोंकी कण्ठियाँ पहन रखी थीं, जिनके शरीरमें रोमावलियाँ नहीं प्रकट हुई थीं, जो वस्त्राभूषणोंसे अलंकृत तथा सेवाके

काममें पूर्ण दक्ष थीं, ऐसी एक हजार गौरवर्णा कन्याएँ भी कमलनयन भगवान् श्रीकृष्णने भेंट कीं ॥ ४९-५० ॥

पृष्ठ्यानामपि चाश्वानां बाह्लिकानां जनार्दनः ।
ददौ शतसहस्राख्यं कन्याधनमनुत्तमम् ॥ ५१ ॥
जनार्दनने उत्तम दहेजके रूपमें बाह्लीकदेशके एक लाख घोड़े दिये, जो पीठपर सवारी ढोनेवाले थे ॥ ५१ ॥

कृताकृतस्य मुख्यस्य कनकस्याग्निवर्चसः ।
मनुष्यभारान् दाशार्हो ददौ दश जनार्दनः ॥ ५२ ॥
दाशार्हवंशके रत्न भगवान् श्रीकृष्णने अग्निके समान देदीप्यमान कृत्रिम सुवर्ण (मोहर) और अकृत्रिम विशुद्ध सुवर्णके (डले) दस भार उपहारमें दिये ॥ ५२ ॥

गजानां तु प्रभिन्नानां त्रिधा प्रस्रवतां मदम् ।
गिरिकूटनिकाशानां समरेष्वनिवर्तिनाम् ॥ ५३ ॥
क्लृप्तानां पटुघण्टानां चारूणां हेममालिनाम् ।
हस्त्यारोहैरुपैतानां सहस्रं साहसप्रियः ॥ ५४ ॥
रामः पाणिग्रहणिकं ददौ पार्थाय लाङ्गली ।
प्रीयमाणो हलधरः सम्बन्धं प्रतिमानयन् ॥ ५५ ॥
जिन्हें साहसका काम प्रिय है और जो हाथमें हल धारण करते हैं, उन बलरामने प्रसन्न होकर इस नूतन सम्बन्धका आदर करते हुए अर्जुनको पाणिग्रहणके दहेजके रूपमें एक हजार मतवाले हाथी भेंट किये, जो तीन अंगोंसे मदकी धारा बहानेवाले थे। वे हाथी युद्धमें कभी पीछे नहीं हटते थे और देखनेमें पर्वतशिखरके समान जान पड़ते थे। उनके मस्तकोंपर सुन्दर वेषरचना की गयी थी। उन सबके पार्श्वभागमें मजबूत घण्टे लटक रहे थे तथा गलेमें सोनेके हार शोभा दे रहे थे। वे सभी हाथी बड़े सुन्दर लगते थे और उन सबके साथ महावत थे ॥ ५३—५५ ॥

स महाधनरत्नौघो वस्त्रकम्बलफेनवान् ।
महागजमहाग्राहः पताकाशैवलाकुलः ॥ ५६ ॥
पाण्डुसागरमाविद्धः प्रविवेश महाधनः ।
पूर्णमापूरयंस्तेषां द्विषच्छोकावहोऽभवत् ॥ ५७ ॥
जैसे नदियोंके जलका महान् प्रवाह समुद्रमें मिलता है, उसी प्रकार वह महान् धन और रत्नोंका भारी प्रवाह, जिसमें वस्त्र और कम्बल फेनके समान जान पड़ते थे, बड़े-बड़े हाथी महान् ग्राहोंका भ्रम उत्पन्न करते थे और जहाँ ध्वजा-पताकाएँ सेवारका काम कर रही थीं, पाण्डवरूपी महासागरमें जा मिला। यद्यपि पाण्डव-समुद्र पहलेसे ही परिपूर्ण था तथापि इस महान् धनप्रवाहने उसे और भी पूर्णतर बना दिया। यही कारण था कि वह पाण्डव-महासागर शत्रुओंके लिये शोकदायक प्रतीत होने लगा ॥ ५६-५७ ॥

प्रतिजग्राह तत् सर्वं धर्मराजो युधिष्ठिरः ।
पूजयामास तांश्चैव वृष्ण्यन्धकमहारथान् ॥ ५८ ॥
धर्मराज युधिष्ठिरने वह सारा धन ग्रहण किया और वृष्णि तथा अन्धकवंशके उन सभी महारथियोंका भलीभाँति आदर-सत्कार किया ॥ ५८ ॥

ते समेता महात्मानः कुरुवृष्ण्यन्धकोत्तमाः ।
विजहुरमरावासे नराः सुकृतिनो यथा ॥ ५९ ॥
जैसे पुण्यात्मा मनुष्य देवलोकमें सुख भोगते हैं, उसी प्रकार कुरु, वृष्णि और अन्धकवंशके वे श्रेष्ठ महात्मा पुरुष एकत्र होकर इच्छानुसार विहार करने लगे ॥ ५९ ॥

तत्र तत्र महानादैरूत्कृष्टतलनादितैः ।
यथायोगं यथाप्रीति विजहुः कुरुवृष्णयः ॥ ६० ॥
वे कौरव और वृष्णिवंशके वीर जहाँ-तहाँ वीणाकी उत्तम ध्वनिके साथ गाते-बजाते और संगीतका आनन्द लेते हुए यथावसर अपनी-अपनी रुचिके अनुसार विहार करने लगे ॥ ६० ॥

एवमुत्तमवीर्यास्ते विहृत्य दिवसान् बहून् ।
पूजिताः कुरुभिर्जग्मुः पुनर्द्वारवतीं प्रति ॥ ६१ ॥
इस प्रकार वे उत्तम पराक्रमी यदुवंशी बहुत दिनोंतक इन्द्रप्रस्थमें विहार करते हुए कौरवोंसे सम्मानित हो फिर द्वारका चले गये ॥ ६१ ॥

रामं पुरस्कृत्य ययुर्वृष्ण्यन्धकमहारथाः ।
रत्नान्यादाय शुभ्राणि दत्तानि कुरुसत्तमैः ॥ ६२ ॥
वृष्णि और अन्धकवंशके महारथी कुरुप्रवर पाण्डवोंके दिये हुए उज्ज्वल रत्नोंकी भेंट ले बलरामजीको आगे करके चले गये ॥ ६२ ॥

वासुदेवस्तु पार्थेन तत्रैव सह भारत ।
उवास नगरे रम्ये शक्रप्रस्थे महात्मना ॥ ६३ ॥
जनमेजय! परंतु भगवान् वासुदेव महात्मा अर्जुनके साथ रमणीय इन्द्रप्रस्थमें ही ठहर गये ॥ ६३ ॥

व्यचरद् यमुनातीरे मृगयां स महायशाः ।
मृगान् विध्यन् वराहांश्च रेमे सार्धं किरीटिना ॥ ६४ ॥
महायशस्वी श्रीकृष्ण अर्जुनके साथ शिकार खेलते और जंगली वराहों तथा हिंस्र पशुओंका वध करते हुए यमुनाजीके तटपर विचरते थे। इस प्रकार वे किरीटधारी अर्जुनके साथ विहार करते थे ॥ ६४ ॥

ततः सुभद्रा सौभद्रं केशवस्य प्रिया स्वसा ।
जयन्तमिव पौलोमी ख्यातिमन्तमजीजनत् ॥ ६५ ॥

तदनन्तर कुछ कालके पश्चात् श्रीकृष्णकी प्यारी बहिन सुभद्राने यशस्वी सौभद्रको जन्म दिया; ठीक वैसे ही, जैसे शचीने जयन्तको उत्पन्न किया था ।। ६५ ।।
दीर्घबाहुं महोरस्कं वृषभाक्षमरिंदमम् ।
सुभद्रा सुषुवे वीरमभिमन्युं नरर्षभम् ।। ६६ ।।
सुभद्राने वीरवर नरश्रेष्ठ अभिमन्युको उत्पन्न किया, जिसकी बड़ी-बड़ी बाँहें, विशाल वक्षःस्थल और बैलोंके समान विशाल नेत्र थे। वह शत्रुओंका दमन करनेवाला था ।। ६६ ।।
अभिश्च मन्युमांश्चैव ततस्तमरिमर्दनम् ।
अभिमन्युमिति प्राहुराजुर्निं पुरुषर्षभम् ।। ६७ ।।
वह अभि (निर्भय) एवं मन्युमान् (क्रुद्ध होकर लड़नेवाला) था, इसीलिये पुरुषोत्तम अर्जुनकुमारको ‘अभिमन्यु’ कहते हैं ।। ६७ ।।
स सात्वत्यामतिरथः सम्बभूव धनंजयात् ।
मखे निर्मथनेनेव शमीगर्भाद्धुताशनः ।। ६८ ।।
जैसे यज्ञमें मन्थन करनेपर शमीके गर्भसे उत्पन्न अश्वत्थसे अग्नि प्रकट होती है, उसी प्रकार अर्जुनके द्वारा सुभद्राके गर्भसे उस अतिरथी वीरका प्रादुर्भाव हुआ था ।। ६८ ।।
यस्मिञ्जाते महातेजाः कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः ।
अयुतं गा द्विजातिभ्यः प्रादान्निष्कांश्च भारत ।। ६९ ।।
भारत! उसके जन्म लेनेपर महातेजस्वी कुन्तीपुत्र युधिष्ठिरने ब्राह्मणोंको दस हजार गौएँ तथा बहुत-सी स्वर्णमुद्राएँ दानमें दीं ।। ६९ ।।
दयितो वासुदेवस्य बाल्यात् प्रभृति चाभवत् ।
पितृणामिव सर्वेषां प्रजानामिव चन्द्रमाः ।। ७० ।।
जैसे समस्त पितरों और प्रजाओंको चन्द्रमा प्रिय लगते हैं, उसी प्रकार अभिमन्यु बचपनसे ही भगवान् श्रीकृष्णका अत्यन्त प्रिय हो गया था ।। ७० ।।
जन्मप्रभृति कृष्णश्च चक्रे तस्य क्रियाः शुभाः ।
स चापि ववृधे बालः शुक्लपक्षे यथा शशी ।। ७१ ।।
श्रीकृष्णने जन्मसे ही उसके लालन-पालनकी सुन्दर व्यवस्थाएँ की थीं। बालक अभिमन्यु शुक्लपक्षके चन्द्रमाकी भाँति दिनोंदिन बढ़ने लगा ।। ७१ ।।
चतुष्पादं दशविधं धनुर्वेदमरिंदमः ।
अर्जुनाद् वेद वेदज्ञः सकलं दिव्यमानुषम् ।। ७२ ।।
उस शत्रुदमन बालकने वेदोंका ज्ञान प्राप्त करके अपने पिता अर्जुनसे चार पदों³, और दशविध³ अंगोंसे युक्त दिव्य एवं मानुष³ सब प्रकारके धनुर्वेदका ज्ञान प्राप्त कर लिया ।। ७२ ।।
विज्ञानेष्वपि चास्त्राणां सौष्ठवे च महाबलः ।