महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
१४२-
द्विचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः
धृतराष्ट्रके आदेशसे पाण्डवोंकी वारणावत-यात्रा
वैशम्पायन उवाच
ततो दुर्योधनो राजा सर्वाः प्रकृतयः शनैः ।
अर्थमानप्रदानाभ्यां संजहार सहानुजः ॥ १ ॥
धृतराष्ट्रप्रयुक्तास्ते केचित् कुशलमन्त्रिणः ।
कथयांचक्रिरे रम्यं नगरं वारणावतम् ॥ २ ॥
अयं समाजः सुमहान् रमणीयतमो भुवि ।
उपस्थितः पशुपतेर्नगरे वारणावते ॥ ३ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! तदनन्तर राजा दुर्योधन और उसके छोटे भाइयोंने धन देकर तथा आदर-सत्कार करके सम्पूर्ण अमात्य आदि प्रकृतियोंको धीरे-धीरे अपने वशमें कर लिया। कुछ चतुर मन्त्री धृतराष्ट्रकी आज्ञासे (चारों ओर) इस बातकी चर्चा करने लगे कि ‘वारणावत नगर बहुत सुन्दर है। उस नगरमें इस समय भगवान् शिवकी पूजाके लिये जो बहुत बड़ा मेला लग रहा है, वह तो इस पृथ्वीपर सबसे अधिक मनोहर है’ ॥ १—३ ॥
सर्वरत्नसमाकीर्णे पुंसां देशे मनोरमे ।
इत्येवं धृतराष्ट्रस्य वचनाच्चक्रिरे कथाः ॥ ४ ॥
‘वह पवित्र नगर समस्त रत्नोंसे भरा-पूरा तथा मनुष्योंके मनको मोह लेनेवाला स्थान है।’ धृतराष्ट्रके कहनेसे वह इस प्रकारकी बातें करने लगे ॥ ४ ॥
कथ्यमाने तथा रम्ये नगरे वारणावते ।
गमने पाण्डुपुत्राणां जज्ञे तत्र मतिर्नृप ॥ ५ ॥
राजन्! वारणावत नगरकी रमणीयताका जब इस प्रकार (यत्र-तत्र) वर्णन होने लगा, तब पाण्डवोंके मनमें वहाँ जानेका विचार उत्पन्न हुआ ॥ ५ ॥
यदा त्वमन्यत नृपो जातकौतूहला इति ।
उवाचैतानेत्य तदा पाण्डवानम्बिकासुतः ॥ ६ ॥
जब अम्बिकानन्दन राजा धृतराष्ट्रको यह विश्वास हो गया कि पाण्डव वहाँ जानेके लिये उत्सुक हैं, तब वे उनके पास जाकर इस प्रकार बोले— ॥ ६ ॥
(अधीतानि च शास्त्राणि युष्माभिरिह कृत्स्नशः ।
अस्त्राणि च तथा द्रोणाद् गौतमाच्च विशेषतः ॥
इदमेवंगते ताताश्चिन्तयामि समन्ततः ।
रक्षणे व्यवहारे च राज्यस्य सततं हिते ॥)
ममैते पुरुषा नित्यं कथयन्ति पुनः पुनः ।
रमणीयतमं लोके नगरं वारणावतम् ॥ ७ ॥
‘बेटो! तुमलोगोंने सम्पूर्ण शास्त्र पढ़ लिये। आचार्य द्रोण और कृपसे अस्त्र-शस्त्रोंकी भी विशेष-रूपसे शिक्षा प्राप्त कर ली। प्रिय पाण्डवो! ऐसी दशामें मैं एक बात सोच रहा हूँ। सब ओरसे राज्यकी रक्षा, राजकीय व्यवहारोंकी रक्षा तथा राज्यके निरन्तर हित-साधनमें लगे रहनेवाले मेरे ये मन्त्रीलोग प्रतिदिन बारंबार कहते हैं कि वारणावत नगर संसारमें सबसे अधिक सुन्दर है ॥ ७ ॥
ते ताता यदि मन्यध्वमुत्सवं वारणावते ।
सगणाः सान्वयाश्चैव विहरध्वं यथामराः ॥ ८ ॥
‘पुत्रो! यदि तुमलोग वारणावत नगरमें उत्सव देखने जाना चाहो तो अपने कुटुम्बियों और सेवकवर्गके साथ वहाँ जाकर देवताओंकी भाँति विहार करो ॥ ८ ॥
ब्राह्मणेभ्यश्च रत्नानि गायकेभ्यश्च सर्वशः ।
प्रयच्छध्वं यथाकामं देवा इव सुवर्चसः ॥ ९ ॥
कंचित् कालं विहृत्यैवमनुभूय परां मुदम् ।
इदं वै हास्तिनपुरं सुखिनः पुनरेष्यथ ॥ १० ॥
‘ब्राह्मणों और गायकोंको विशेषरूपसे रत्न एवं धन दो तथा अत्यन्त तेजस्वी देवताओंके समान कुछ कालतक वहाँ इच्छानुसार विहार करते हुए परम सुख प्राप्त करो। तत्पश्चात् पुनः सुखपूर्वक इस हस्तिनापुर नगरमें ही चले आना’ ॥ ९-१० ॥
वैशम्पायन उवाच
धृतराष्ट्रस्य तं काममनुबुध्य युधिष्ठिरः ।
आत्मनश्चासहायत्वं तथेति प्रत्युवाच तम् ॥ ११ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! युधिष्ठिर धृतराष्ट्रकी उस इच्छाका रहस्य समझ गये, परंतु अपनेको असहाय जानकर उन्होंने ‘बहुत अच्छा’ कहकर उनकी बात मान ली ॥ ११ ॥
ततो भीष्मं शांतनवं विदुरं च महामतिम् ।
द्रोणं च बाह्निकं चैव सोमदत्तं च कौरवम् ॥ १२ ॥
कृपमाचार्यपुत्रं च भूरिश्रवसमेव च ।
मान्यानन्यान्मात्यांश्च ब्राह्मणांश्च तपोधनान् ॥ १३ ॥
पुरोहितांश्च पौरांश्च गान्धारीं च यशस्विनीम् ।
युधिष्ठिरः शनैर्दीन उवाचेदं वचस्तदा ॥ १४ ॥
तदनन्तर युधिष्ठिरने शांतनुनन्दन भीष्म, परम बुद्धिमान् विदुर, द्रोण, बाह्निक, कुरुवंशी सोमदत्त, कृपाचार्य, अश्वत्थामा, भूरिश्रवा, अन्यान्य माननीय मन्त्रियों, तपस्वी ब्राह्मणों,
पुरोहितों, पुरवासियों तथा यशस्विनी गान्धारीदेवीसे मिलकर धीरे-धीरे दीनभावसे इस प्रकार कहा— ।। १२—१४ ।।
रमणीये जनाकीर्णे नगरे वारणावते ।
सगणास्तत्र यास्यामो धृतराष्ट्रस्य शासनात् ।। १५ ।।
'हम महाराज धृतराष्ट्रकी आज्ञासे रमणीय वारणावत नगरमें, जहाँ बड़ा भारी मेला लग रहा है, परिवारसहित जानेवाले हैं ।। १५ ।।
प्रसन्नमनसः सर्वे पुण्या वाचो विमुञ्चत ।
आशीर्भिर्बृंहितानस्मान् न पापं प्रसहिष्यते ।। १६ ।।
'आप सब लोग प्रसन्नचित्त होकर हमें अपने पुण्यमय आशीर्वाद दीजिये। आपके आशीर्वादसे हमारी वृद्धि होगी और पापका हमपर वश नहीं चल सकेगा' ।। १६ ।।
एवमुक्तास्तु ते सर्वे पाण्डुपुत्रेण कौरवाः ।
प्रसन्नवदना भूत्वा तेऽन्ववर्तन्त पाण्डवान् ।। १७ ।।
स्वस्त्यस्तु वः पथि सदा भूतेभ्यश्चैव सर्वशः ।
मा च वोऽस्त्वशुभं किंचित् सर्वशः पाण्डुनन्दनाः ।। १८ ।।
पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरके इस प्रकार कहनेपर वे समस्त कुरुवंशी प्रसन्नवदन होकर पाण्डवोंके अनुकूल हो कहने लगे—'पाण्डुकुमारो! मार्गमें सर्वदा सब प्राणियोंसे तुम्हारा कल्याण हो। तुम्हें कहींसे किसी प्रकारका अशुभ न प्राप्त हो' ।। १७-१८ ।।
ततः कृतस्वस्त्ययना राज्यलम्भाय पार्थिवाः ।
कृत्वा सर्वाणि कार्याणि प्रययुर्वारणावतम् ।। १९ ।।
तब राज्य-लाभके लिये स्वस्तिवाचन करा समस्त आवश्यक कार्य पूर्ण करके राजकुमार पाण्डव वारणावत नगरको गये ।। १९ ।।
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि जतुगृहपर्वणि वारणावतयात्रायां
द्विचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः ।। १४२ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत जतुगृहपर्वमें वारणावतयात्राविषयक एक सौ बयालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १४२ ।।
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके २ श्लोक मिलाकर कुल २१ श्लोक हैं)