महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
११९-
एकोनविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः
पाण्डुका कुन्तीको पुत्र-प्राप्तिके लिये प्रयत्न करनेका आदेश
वैशम्पायन उवाच
तत्रापि तपसि श्रेष्ठे वर्तमानः स वीर्यवान् ।
सिद्धचारणसङ्घानां बभूव प्रियदर्शनः ॥ १ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! वहाँ भी श्रेष्ठ तपस्यामें लगे हुए पराक्रमी राजा पाण्डु सिद्ध और चारणोंके समुदायको अत्यन्त प्रिय लगने लगे—इन्हें देखते ही वे प्रसन्न हो जाते थे ॥ १ ॥
शुश्रूषुरनहंवादी संयतात्मा जितेन्द्रियः ।
स्वर्गं गन्तुं पराक्रान्तः स्वेन वीर्येण भारत ॥ २ ॥
भारत! वे ऋषि-मुनियोंकी सेवा करते, अहंकारसे दूर रहते और मनको वशमें रखते थे। उन्होंने सम्पूर्ण इन्द्रियोंको जीत लिया था। वे अपनी ही शक्तिसे स्वर्गलोकमें जानेके लिये सदा सचेष्ट रहने लगे ॥ २ ॥
केषांचिदभवद् भ्राता केषांचिदभवत् सखा ।
ऋषयस्त्वपरे चैनं पुत्रवत् पर्यपालयन् ॥ ३ ॥
कितने ही ऋषियोंका उनपर भाईके समान प्रेम था। कितनोंके वे मित्र हो गये थे और दूसरे बहुत-से महर्षि उन्हें अपने पुत्रके समान मानकर सदा उनकी रक्षा करते थे ॥ ३ ॥
स तु कालेन महता प्राप्य निष्कल्मषं तपः ।
ब्रह्मर्षिसदृशः पाण्डुर्बभूव भरतर्षभ ॥ ४ ॥
भरतश्रेष्ठ जनमेजय! राजा पाण्डु दीर्घकालतक पापरहित तपस्याका अनुष्ठान करके ब्रह्मर्षियोंके समान प्रभावशाली हो गये थे ॥ ४ ॥
अमावास्यां तु सहिता ऋषयः संशितव्रताः ।
ब्रह्माणं द्रष्टुकामास्ते सम्प्रतस्थुर्महर्षयः ॥ ५ ॥
एक दिन अमावास्या तिथिको कठोर व्रतका पालन करनेवाले बहुत-से ऋषि-महर्षि एकत्र हो ब्रह्माजीके दर्शनकी इच्छासे ब्रह्मलोकके लिये प्रस्थित हुए ॥ ५ ॥
सम्प्रयातानृषीन् दृष्ट्वा पाण्डुर्वचनमब्रवीत् ।
भवन्तः क्व गमिष्यन्ति ब्रूत मे वदतां वराः ॥ ६ ॥
ऋषियोंको प्रस्थान करते देख पाण्डुने उनसे पूछा—'वक्ताओंमें श्रेष्ठ मुनीश्वरो! आपलोग कहाँ जायँगे? यह मुझे बताइये' ॥ ६ ॥
ऋषय ऊचुः
समवायो महानद्य ब्रह्मलोके महात्मनाम् ।
देवानां च ऋषीणां च पितॄणां च महात्मनाम् ।
वयं तत्र गमिष्यामो द्रष्टुकामाः स्वयम्भुवम् ॥ ७ ॥
ऋषि बोले— राजन्! आज ब्रह्मलोकमें महात्मा देवताओं, ऋषि-मुनियों तथा महामना पितरोंका बहुत बड़ा समूह एकत्र होनेवाला है। अतः हम वहीं स्वयम्भू ब्रह्माजीका दर्शन करनेके लिये जायँगे ॥ ७ ॥
वैशम्पायन उवाच
पाण्डुरुत्थाय सहसा गन्तुकामो महर्षिभिः ।
स्वर्गपारं तितीर्षुः स शतशृङ्गादुदङ्मुखः ॥ ८ ॥
प्रतस्थे सह पत्नीभ्यामब्रुवंस्तं च तापसाः ।
उपर्युपरि गच्छन्तः शैलराजमुदङ्मुखाः ॥ ९ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— राजन्! यह सुनकर महाराज पाण्डु भी महर्षियोंके साथ जानेके लिये सहसा उठ खड़े हुए। उनके मनमें स्वर्गके पार जानेकी इच्छा जाग उठी और वे उत्तरकी ओर मुँह करके अपनी दोनों पत्नियोंके साथ शतशृंग पर्वतसे चल दिये। यह देख गिरिराज हिमालयके ऊपर-ऊपर उत्तराभिमुख यात्रा करनेवाले तपस्वी मुनियोंने कहा— ॥ ८-९ ॥
दृष्टवन्तो गिरौ रम्ये दुर्गान् देशान् बहून् वयम् ।
विमानशतसम्बाधां गीतस्वरनिनादिताम् ॥ १० ॥
आक्रीडभूमिं देवानां गन्धर्वाप्सरसां तथा ।
उद्यानानि कुबेरस्य समानि विषमाणि च ॥ ११ ॥
‘भरतश्रेष्ठ! इस रमणीय पर्वतपर हमने बहुत-से ऐसे प्रदेश देखे हैं, जहाँ जाना बहुत कठिन है। वहाँ देवताओं, गन्धर्वों तथा अप्सराओंकी क्रीड़ाभूमि है, जहाँ सैकड़ों विमान खचाखच भरे रहते हैं और मधुर गीतोंके स्वर गूँजते रहते हैं। इसी पर्वतपर कुबेरके अनेक उद्यान हैं, जहाँकी भूमि कहीं समतल है और कहीं नीची-ऊँची ॥ १०-११ ॥
महानदीनितम्बांश्च गहनान् गिरिगुह्वरान् ।
सन्ति नित्यहिमा देशा निर्वृक्षमृगपक्षिणः ॥ १२ ॥
‘इस मार्गमें हमने कई बड़ी-बड़ी नदियोंके दुर्गम तट और कितनी ही पर्वतीय घाटियाँ देखी हैं। यहाँ बहुत-से ऐसे स्थल हैं, जहाँ सदा बर्फ जमी रहती है तथा जहाँ वृक्ष, पशु और पक्षियोंका नाम भी नहीं है ॥ १२ ॥
सन्ति क्वचिन्महादर्यो दुर्गाः काश्चिद् दुरासदाः ।
नातिक्रामेत पक्षी यान् कुत एवेतरे मृगाः ॥ १३ ॥
‘कहीं-कहीं बहुत बड़ी गुफाएँ हैं, जिनमें प्रवेश करना अत्यन्त कठिन है। कइयोंके तो निकट भी पहुँचना कठिन है। ऐसे स्थलोंको पक्षी भी नहीं पार कर सकता, फिर मृग आदि अन्य जीवोंकी तो बात ही क्या है? ।। १३ ।।
वायुरेको हि यात्यत्र सिद्धाश्च परमर्षयः ।
गच्छन्त्यौ शैलराजेऽस्मिन् राजपुत्र्यौ कथं त्विमे ।। १४ ।।
न सीदेतामदुःखार्हे मा गमो भरतर्षभ ।
‘इस मार्गपर केवल वायु चल सकती है तथा सिद्ध महर्षि भी जा सकते हैं। इस पर्वतराजपर चलती हुई ये दोनों राजकुमारियाँ कैसे कष्ट न पायेंगी? भरतवंशशिरोमणे! ये दोनों रानियाँ दुःख सहन करनेके योग्य नहीं हैं; अतः आप न चलिये’ ।। १४ १/२ ।।
पाण्डुरुवाच
अप्रजस्य महाभागा न द्वारं परिचक्षते ।। १५ ।।
स्वर्गे तेनाभितप्तोऽहमप्रजस्तु ब्रवीमि वः ।
पित्र्यादृणादनिर्मुक्तस्तेन तप्ये तपोधनाः ।। १६ ।।
**पाण्डुने कहा—**महाभाग महर्षिगण! संतानहीनके लिये स्वर्गका दरवाजा बंद रहता है, ऐसा लोग कहते हैं। मैं भी संतानहीन हूँ, इसलिये दुःखसे संतप्त होकर आपलोगोंसे कुछ निवेदन करता हूँ। तपोधनो! मैं पितरोंके ऋणसे अबतक छूट नहीं सका हूँ, इसलिये चिन्तासे संतप्त हो रहा हूँ ।। १५-१६ ।।
देहनाशे ध्रुवो नाशः पितॄणामेष निश्चयः ।
ऋणैश्चतुर्भिः संयुक्ता जायन्ते मानवा भुवि ।। १७ ।।
निःसंतान-अवस्थामें मेरे इस शरीरका नाश होने-पर मेरे पितरोंका पतन अवश्य हो जायगा। मनुष्य इस पृथ्वीपर चार प्रकारके ऋणोंसे युक्त होकर जन्म लेते हैं ।। १७ ।।
पितृदेवर्षिमनुजैर्देयं तेभ्यश्च धर्मतः ।
एतानि तु यथाकालं यो न बुध्यति मानवः ।। १८ ।।
न तस्य लोकाः सन्तीति धर्मविद्भिः प्रतिष्ठितम् ।
यज्ञैस्तु देवान् प्रीणाति स्वाध्यायतपसा मुनीन् ।। १९ ।।
(उन ऋणोंके नाम ये हैं—) पितृ-ऋण, देव-ऋण, ऋषि-ऋण और मनुष्य-ऋण। उन सबका ऋण धर्मतः हमें चुकाना चाहिये। जो मनुष्य यथासमय इन ऋणोंका ध्यान नहीं रखता, उसके लिये पुण्यलोक सुलभ नहीं होते। यह मर्यादा धर्मज्ञ पुरुषोंने स्थापित की है। यज्ञोंद्वारा मनुष्य देवताओंको तृप्त करता है, स्वाध्याय और तपस्याद्वारा मुनियोंको संतोष दिलाता है ।। १८-१९ ।।
पुत्रैः श्राद्धैः पितॄंश्चापि आनृशंस्येन मानवान् ।
ऋषिदेवमनुष्याणां परिमुक्तोऽस्मि धर्मतः ।। २० ।।
त्रयाणामितरेषां तु नाश आत्मनि नश्यति ।
पित्र्यादृणादनिर्मुक्त इदानीमस्मि तापसाः ॥ २१ ॥
पुत्रोत्पादन और श्राद्धकर्मोंद्वारा पितरोंको तथा दयापूर्ण बर्तावद्वारा वह मनुष्योंको संतुष्ट करता है। मैं धर्मकी दृष्टिसे ऋषि, देव तथा मनुष्य—इन तीनों ऋणोंसे मुक्त हो चुका हूँ। अन्य अर्थात् पितरोंके ऋणका नाश तो इस शरीरके नाश होनेपर भी शायद ही हो सके। तपस्वी मुनियो! मैं अबतक पितृ-ऋणसे मुक्त न हो सका ।। २०-२१ ।।
इह तस्मात् प्रजाहेतोः प्रजायन्ते नरोत्तमाः ।
यथैवाहं पितुः क्षेत्रे जातस्तेन महर्षिणा ॥ २२ ॥
तथैवास्मिन् मम क्षेत्रे कथं वै सम्भवेत् प्रजा ।
इस लोकमें श्रेष्ठ पुरुष पितृ-ऋणसे मुक्त होनेके लिये संतानोत्पत्तिका प्रयत्न करते और स्वयं ही पुत्ररूपमें जन्म लेते हैं। जैसे मैं अपने पिताके क्षेत्रमें महर्षि व्यासद्वारा उत्पन्न हुआ हूँ, उसी प्रकार मेरे इस क्षेत्रमें भी कैसे संतानकी उत्पत्ति हो सकती है? ।। २२ १/२ ।।
ऋषय ऊचुः
अस्ति वै तव धर्मात्मन् विद्मो देवोपमं शुभम् ॥ २३ ॥
अपत्यमनघं राजन् वयं दिव्येन चक्षुषा ।
दैवोद्दिष्टं नरव्याघ्र कर्मणेहोपपादय ॥ २४ ॥
**ऋषि बोले—**धर्मात्मा नरेश! तुम्हें पापरहित देवोपम शुभ संतान होनेका योग है, यह हम दिव्यदृष्टिसे जानते हैं। नरव्याघ्र! भाग्यने जिसे दे रखा है, उस फलको प्रयत्नद्वारा प्राप्त कीजिये ।। २३-२४ ।।
अक्लिष्टं फलमव्यग्रो विन्दते बुद्धिमान् नरः ।
तस्मिन् दृष्टे फले राजन् प्रयत्नं कर्तुमर्हसि ॥ २५ ॥
अपत्यं गुणसम्पन्नं लब्धा प्रीतिकरं ह्यसि ।
बुद्धिमान् मनुष्य व्यग्रता छोड़कर बिना क्लेशके ही अभीष्ट फलको प्राप्त कर लेता है। राजन्! आपको उस दृष्ट फलके लिये प्रयत्न करना चाहिये। आप निश्चय ही गुणवान् और हर्षोत्पादक संतान प्राप्त करेंगे ।। २५ १/२ ।।
वैशम्पायन उवाच
नच्छ्रुत्वा तापसवचः पाण्डुश्चिन्तापरोऽभवत् ॥ २६ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! तपस्वी मुनियोंका यह वचन सुनकर राजा पाण्डु बड़े सोच-विचारमें पड़ गये ।। २६ ।।
आत्मनो मृगशापेन जानन्नुपहतां क्रियाम् ।
सोऽब्रवीद् विजने कुन्तीं धर्मपत्नीं यशस्विनीम् ।
अपत्योत्पादने यत्नमापदि त्वं समर्थय ॥ २७ ॥
वे जानते थे कि मृगरूपधारी मुनिके शापसे मेरा संतानोत्पादन-विषयक पुरुषार्थ नष्ट हो चुका है। एक दिन वे अपनी यशस्विनी धर्मपत्नी कुन्तीसे एकान्तमें इस प्रकार बोले—'देवि! यह हमारे लिये आपत्तिकाल है, इस समय संतानोत्पादनके लिये जो आवश्यक प्रयत्न हो, उसका तुम समर्थन करो ।। २७ ।।
अपत्यं नाम लोकेषु प्रतिष्ठा धर्मसंहिता ।
इति कुन्ति विदुर्धीराः शाश्वतं धर्मवादिनः ।। २८ ।।
इष्टं दत्तं तपस्तप्तं नियमश्च स्वनुष्ठितः ।
सर्वमेवानपत्यस्य न पावनमिहोच्यते ।। २९ ।।
‘सम्पूर्ण लोकोंमें संतान ही धर्ममयी प्रतिष्ठा है—कुन्ती! सदा धर्मका प्रतिपादन करनेवाले धीर पुरुष ऐसा ही मानते हैं। संतानहीन मनुष्य इस लोकमें यज्ञ, दान, तप और नियमोंका भलीभाँति अनुष्ठान कर ले, तो भी उसके किये हुए सब कर्म पवित्र नहीं कहे जाते ।। २८-२९ ।।
सोऽहमेवं विदित्वैतत् प्रपश्यामि शुचिस्मिते ।
अनपत्यः शुभाँल्लोकान् न प्राप्स्यामीति चिन्तयन् ।। ३० ।।
‘पवित्र मुसकानवाली कुन्तिभोजकुमारी! इस प्रकार सोच-समझकर मैं तो यही देख रहा हूँ कि संतानहीन होनेके कारण मुझे शुभ लोकोंकी प्राप्ति नहीं हो सकती। मैं निरन्तर इसी चिन्तामें डूबा रहता हूँ ।। ३० ।।
मृगाभिशापान्नष्टं मे जननं ह्यकृतात्मनः ।
नृशंसकारिणो भीरु यथैवोपहतं पुरा ।। ३१ ।।
‘मेरा मन अपने वशमें नहीं, मैं क्रूरतापूर्ण कर्म करनेवाला हूँ। भीरु! इसीलिये मृगके शापसे मेरी संतानोत्पादन-शक्ति उसी प्रकार नष्ट हो गयी है, जिस प्रकार मैंने उस मृगका वध करके उसके मैथुनमें बाधा डाली थी ।। ३१ ।।
इमे वै बन्धुदायादाः षट् पुत्रा धर्मदर्शने ।
षडेवाबन्धुदायादाः पुत्रास्ताञ्छृणु मे पृथे ।। ३२ ।।
‘पृथे! धर्मशास्त्रमें ये आगे बताये जानेवाले छः पुत्र ‘बन्धुदायाद’ कहे गये हैं, जो कुटुम्बी होनेसे सम्पत्तिके उत्तराधिकारी होते हैं और छः प्रकारके पुत्र ‘अबन्धुदायाद’ हैं, जो कुटुम्बी न होनेपर भी उत्तराधिकारी बताये गये हैं३। इन सबका वर्णन मुझसे सुनो ।। ३२ ।।
स्वयंजातः प्रणीतश्च तत्समः पुत्रिकासुतः ।
पौनर्भवश्च कानीनः भगिन्यां यश्च जायते ।। ३३ ।।
‘पहला पुत्र वह है, जो विवाहिता पत्नीसे अपने द्वारा उत्पन्न किया गया हो; उसे ‘स्वयंजात’ कहते हैं। दूसरा प्रणीत कहलाता है, जो अपनी ही पत्नीके गर्भसे किसी उत्तम पुरुषके अनुग्रहसे उत्पन्न होता है। तीसरा जो अपनी पुत्रीका पुत्र हो, वह भी उसके ही
समान माना गया है। चौथे प्रकारके पुत्रकी पौनर्भव³ संज्ञा है, जो दूसरी बार ब्याही हुई स्त्रीसे उत्पन्न हुआ हो। पाँचवें प्रकारके पुत्रकी कानीन संज्ञा है (विवाहसे पहले ही जिस कन्याको इस शर्तके साथ दिया जाता है कि इसके गर्भसे उत्पन्न होनेवाला पुत्र मेरा पुत्र समझा जायगा उस कन्याके पुत्रको 'कानीन' कहते हैं)³। जो बहनका पुत्र (भानजा) है, वह छठा कहा गया है ॥ ३३ ॥
दत्तः क्रीतः कृत्रिमश्च उपगच्छेत् स्वयं च यः ।
सहोढो ज्ञातिरेताश्च हीनयोनिधृतश्च यः ॥ ३४ ॥
'अब छः प्रकारके अबन्धुदायाद पुत्र कहे जाते हैं—दत्त (जिसे माता-पिताने स्वयं समर्पित कर दिया हो), क्रीत (जिसे धन आदि देकर खरीद लिया गया हो), कृत्रिम—जो स्वयं मैं आपका पुत्र हूँ, यों कहकर समीप आया हो, सहोढ (जो कन्यावस्थामें ही गर्भवती होकर ब्याही गयी हो, उसके गर्भसे उत्पन्न पुत्र सहोढ कहलाता है), ज्ञातिरेता (अपने कुलका पुत्र) तथा अपनेसे हीन जातिकी स्त्रीके गर्भसे उत्पन्न हुआ पुत्र। ये सभी अबन्धुदायाद हैं ॥ ३४ ॥
पूर्वपूर्वतमाभावं मत्वा लिप्सेत वै सुतम् ।
उत्तमादवराः पुंसः काङ्क्षन्ते पुत्रमापदि ॥ ३५ ॥
'इनमेंसे पूर्व-पूर्वके अभावमें ही दूसरे-दूसरे पुत्रकी अभिलाषा करे। आपत्तिकालमें नीची जातिके पुरुष श्रेष्ठ पुरुषसे भी पुत्रोत्पत्तिकी इच्छा कर सकते हैं ॥ ३५ ॥
अपत्यं धर्मफलदं श्रेष्ठं विन्दन्ति मानवाः ।
आत्मशुक्रादपि पृथे मनुः स्वायम्भुवोऽब्रवीत् ॥ ३६ ॥
'पृथे! अपने वीर्यके बिना भी मनुष्य किसी श्रेष्ठ पुरुषके सम्बन्धसे श्रेष्ठ पुत्र प्राप्त कर लेते हैं और वह धर्मका फल देनेवाला होता है, यह बात स्वायम्भुव मनुने कही है ॥ ३६ ॥
तस्मात् प्रहेष्याम्यद्य त्वां हीनः प्रजननात् स्वयम् ।
सदृशाच्छ्रेयसो वा त्वं विद्ध्यपत्यं यशस्विनि ॥ ३७ ॥
'अतः यशस्विनी कुन्ती! मैं स्वयं सन्तानोत्पादनकी शक्तिसे रहित होनेके कारण तुम्हें आज दूसरेके पास भेजूँगा। तुम मेरे सदृश अथवा मेरी अपेक्षा भी श्रेष्ठ पुरुषसे संतान प्राप्त करो' ॥ ३७ ॥
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि पाण्डुपृथासंवादे
ऊनविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ ११९ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें पाण्डु-पृथा-संवादविषयक एक सौ उन्नीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ११९ ॥
१. बन्धु शब्दका अर्थ संस्कृत-शब्दार्थकौस्तुभमें आत्मबन्धु, पितृबन्धु, मातृबन्धु माना गया है, इसलिये बन्धुका अर्थ कुटुम्बी किया है। दायादका अर्थ उसी कोषमें 'उत्तराधिकारी' है। इसीलिये बन्धुदायादका अर्थ 'कुटुम्बी' होनेसे 'उत्तराधिकारी' किया है। इसके विपरीत, अबन्धुदायादका अर्थ अबन्धु यानी कुटुम्बी न होनेपर उत्तराधिकारी किया है।
२. 'पौनर्भव'का अर्थ पद्मचन्द्रकोषके अनुसार दूसरी बार ब्याही हुई स्त्रीसे उत्पन्न पुत्र लिया गया है।
३. कानीन—यह अर्थ नीलकण्ठजीने अपनी टीकामें किया है।