महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
(अर्जुनवनवासपर्व)
(अर्जुनवनवासपर्व)
द्वादशाधिकद्विशततमोऽध्यायः
अर्जुनके द्वारा ब्राह्मणके गोधनकी रक्षाके लिये नियमभंग और वनकी ओर प्रस्थान
वैशम्पायन उवाच
एवं ते समयं कृत्वा न्यवसंस्तत्र पाण्डवाः ।
वशे शस्त्रप्रतापेन कुर्वन्तोऽन्यान् महीक्षितः ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! इस प्रकार नियम बनाकर पाण्डवलोग वहाँ रहने लगे। वे अपने अस्त्र-शस्त्रोंके प्रतापसे दूसरे राजाओंको अधीन करते रहते थे ॥ १ ॥
तेषां मनुजसिंहानां पञ्चानाममितौजसाम् ।
बभूव कृष्णा सर्वेषां पार्थानां वशवर्तिनी ॥ २ ॥
कृष्णा मनुष्योंमें सिंहके समान वीर और अमित तेजस्वी उन पाँचों पाण्डवोंकी आज्ञाके अधीन रहती थी ॥ २ ॥
ते तया तैश्च सा वीरैः पतिभिः सह पञ्चभिः ।
बभूव परमप्रीता नागैर्भोगवती यथा ॥ ३ ॥
पाण्डव द्रौपदीके साथ और द्रौपदी उन पाँचों वीर पतियोंके साथ ठीक उसी तरह अत्यन्त प्रसन्न रहती थी जैसे नागोंके रहनेसे भोगवतीपुरी परम शोभायुक्त होती है ॥ ३ ॥
वर्तमानेषु धर्मेण पाण्डवेषु महात्मसु ।
व्यवर्धन् कुरवः सर्वे हीनदोषाः सुखान्विताः ॥ ४ ॥
महात्मा पाण्डवोंके धर्मानुसार बर्ताव करनेके कारण समस्त कुरुवंशी निर्दोष एवं सुखी रहकर निरन्तर उन्नति करने लगे ॥ ४ ॥
अथ दीर्घेण कालेन ब्राह्मणस्य विशाम्पते ।
कस्यचित् तस्करा जह्रुः केचिद् गा नृपसत्तम ॥ ५ ॥
महाराज! तदनन्तर दीर्घकालके पश्चात् एक दिन कुछ चोरोंने किसी ब्राह्मणकी गौएँ चुरा लीं ॥ ५ ॥
ह्रियमाणे धने तस्मिन् ब्राह्मणः क्रोधमूर्च्छितः ।
आगम्य खाण्डवप्रस्थमुदक्रोशत् स पाण्डवान् ॥ ६ ॥
अपने गोधनका अपहरण होता देख ब्राह्मण अत्यन्त क्रुद्ध हो उठा और खाण्डवप्रस्थमें आकर उसने उच्चस्वरसे पाण्डवोंको पुकारा— ।। ६ ।।
ह्रियते गोधनं क्षुद्रैर्नृशंसैरकृतात्मभिः ।
प्रसह्य चास्मद्विषयादभ्यधावत पाण्डवाः ।। ७ ।।
‘पाण्डवो! हमारे गाँवसे कुछ नीच, क्रूर और पापात्मा चोर जबरदस्ती गोधन चुराकर लिये जा रहे हैं। उसकी रक्षाके लिये दौड़ो ।। ७ ।।
ब्राह्मणस्य प्रशान्तस्य हविर्ध्वाङ्क्षैः प्रलुप्यते ।
शार्दूलस्य गुहां शून्यां नीचः क्रोष्टाभिमर्दति ।। ८ ।।
‘आज एक शान्तस्वभाव ब्राह्मणका हविष्य कौए लूटकर खा रहे हैं। नीच सियार सिंहकी सूनी गुफाको रौंद रहा है ।। ८ ।।
अरक्षितारं राजानं बलिषड्भागहारिणम् ।
तमाहुः सर्वलोकस्य समग्रं पापचारिणम् ।। ९ ।।
‘जो राजा प्रजाकी आयका छठा भाग करके रूपमें वसूल करता है, किंतु प्रजाकी रक्षाकी कोई व्यवस्था नहीं करता, उसे सम्पूर्ण लोकोंमें पूर्ण पापाचारी कहा गया है ।। ९ ।।
ब्राह्मणस्वे हृते चौरैर्धर्मार्थे च विलोपिते ।
रोरूयमाणे च मयि क्रियतामस्त्रधारणम् ।। १० ।।
‘मुझ ब्राह्मणका धन चोर लिये जा रहे हैं, मेरे गौके न रहनेपर दुग्ध आदि हविष्यके अभावसे धर्म और अर्थका लोप हो रहा है तथा मैं यहाँ आकर रो रहा हूँ। पाण्डवो! (चोरोंको दण्ड देनेके लिये) अस्त्र धारण करो’ ।। १० ।।
वैशम्पायन उवाच
रोरूयमाणस्याभ्याशे भृशं विप्रस्य पाण्डवः ।
तानि वाक्यानि शुश्राव कुन्तीपुत्रो धनंजयः ।। ११ ।।
श्रुत्वैव च महाबाहुर्मा भैरित्याह तं द्विजम् ।
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! वह ब्राह्मण निकट आकर बहुत रो रहा था। पाण्डुपुत्र कुन्तीनन्दन धनंजयने उसकी कही हुई सारी बातें सुनीं और सुनकर उन महाबाहुने उस ब्राह्मणसे कहा—‘डरो मत’ ।। ११ ½ ।।
आयुधानि च यत्रासन् पाण्डवानां महात्मनाम् ।। १२ ।।
कृष्णया सह तत्रास्ते धर्मराजो युधिष्ठिरः ।
सम्प्रवेशाय चाशक्तो गमनाय च पाण्डवः ।। १३ ।।
महात्मा पाण्डवोंके अस्त्र-शस्त्र जहाँ रखे गये थे, वहीं धर्मराज युधिष्ठिर कृष्णाके साथ एकान्तमें बैठे थे। अतः पाण्डुपुत्र अर्जुन न तो घरके भीतर प्रवेश कर सकते थे और न खाली हाथ चोरोंका ही पीछा कर सकते थे ।। १२-१३ ।।
तस्य चार्थस्य तैर्वाक्यैश्चोद्यमानः पुनः पुनः ।
आक्रन्दे तत्र कौन्तेयश्चिन्तयामास दुःखितः ॥ १४ ॥
इधर उस आर्त ब्राह्मणकी बातें उन्हें बार-बार शस्त्र ले आनेको प्रेरित कर रही थीं। जब वह अधिक रोने-चिल्लाने लगा, तब अर्जुनने दुःखी होकर सोचा— ॥ १४ ॥
ह्रियमाणे धने तस्मिन् ब्राह्मणस्य तपस्विनः ।
अश्रुप्रमार्जनं तस्य कर्तव्यमिति निश्चयः ॥ १५ ॥
'इस तपस्वी ब्राह्मणके गोधनका अपहरण हो रहा है; अतः ऐसे समयमें इसके आँसू पोंछना मेरा कर्तव्य है। यही मेरा निश्चय है ॥ १५ ॥
उपक्षेपणजोऽधर्मः सुमहान् स्यान्महीपतेः ।
यद्यस्य रुदतो द्वारि न करोम्यद्य रक्षणम् ॥ १६ ॥
'यदि मैं राजद्वारपर रोते हुए इस ब्राह्मणकी रक्षा आज नहीं करूँगा, तो महाराज युधिष्ठिरको उपेक्षाजनित महान् अधर्मका भागी होना पड़ेगा ॥ १६ ॥
अनास्तिक्यं च सर्वेषामस्माकमपि रक्षणे ।
प्रतितिष्ठेत लोकेऽस्मिन्नधर्मश्चैव नो भवेत् ॥ १७ ॥
'इसके सिवा लोकमें यह बात फैल जायगी कि हम सब लोग किसी आर्तकी रक्षारूप धर्मके पालनमें श्रद्धा नहीं रखते। साथ ही हमें अधर्म भी प्राप्तहोगा ॥ १७ ॥
अनादृत्य तु राजानं गते मयि न संशयः ।
अजातशत्रोर्नृपतेर्मम चैवानृतं भवेत् ॥ १८ ॥
'यदि राजाका अनादर करके मैं घरके भीतर चला जाऊँ, तो महाराज अजातशत्रुके प्रति मेरी प्रतिज्ञा मिथ्या होगी ॥ १८ ॥
अनुप्रवेशे राज्ञस्तु वनवासो भवेन्मम ।
सर्वमन्यत् परिहृतं धर्षणात् तु महीपतेः ॥ १९ ॥
'राजाकी उपस्थितिमें घरके भीतर प्रवेश करनेपर मुझको वनमें निवास करना होगा। इसमें महाराजके तिरस्कारके सिवा और सारी बातें तुच्छ होनेके कारण उपेक्षणीय हैं ॥ १९ ॥
अधर्मो वै महानस्तु वने वा मरणं मम ।
शरीरस्य विनाशेन धर्म एव विशिष्यते ॥ २० ॥
'चाहे राजाके तिरस्कारसे मुझे नियमभंगका महान् दोष प्राप्त हो अथवा वनमें ही मेरी मृत्यु हो जाय तथापि शरीरको नष्ट करके भी गौ-ब्राह्मण-रक्षारूप धर्मका पालन ही श्रेष्ठ है' ॥ २० ॥
एवं विनिश्चित्य ततः कुन्तीपुत्रो धनंजयः ।
अनुप्रविश्य राजानमापृच्छ्य च विशाम्पते ॥ २१ ॥
धनुरादाय संहृष्टो ब्राह्मणं प्रत्यभाषत ।
जनमेजय! ऐसा निश्चय करके कुन्तीकुमार धनंजयने राजासे पूछकर घरके भीतर प्रवेश करके धनुष ले लिया और (बाहर आकर) प्रसन्नतापूर्वक ब्राह्मणसे कहा— ॥ २१ १/२ ॥
ब्राह्मणागम्यतां शीघ्रं यावत् परधनैषिणः ॥ २२ ॥
न दूरे ते गताः क्षुद्रास्तावद् गच्छावहे सह ।
यावन्निवर्तयाम्यद्य चौरहस्ताद् धनं तव ॥ २३ ॥
‘विप्रवर! शीघ्र आइये। जबतक दूसरोंके धन हड़पनेकी इच्छावाले वे क्षुद्र चोर दूर नहीं चले जाते, तभीतक हम दोनों एक साथ वहाँ पहुँच जायँ। मैं अभी आपका गोधन चोरोंके हाथसे छीनकर आपको लौटा देता हूँ’ ॥ २२-२३ ॥
सोऽनुसृत्य महाबाहुर्धन्वी वर्मी रथी ध्वजी ।
शरैर्विध्वस्य तांश्चौरानवजित्य च तद् धनम् ॥ २४ ॥
ऐसा कहकर महाबाहु अर्जुनने धनुष और कवच धारण करके ध्वजायुक्त रथपर आरूढ़ हो उन चोरोंका पीछा किया और बाणोंसे चोरोंका विनाश करके सारा गोधन जीत
लिया ।। २४ ।।
ब्राह्मणं समुपाकृत्य यशः प्राप्य च पाण्डवः ।
ततस्तद् गोधनं पार्थो दत्त्वा तस्मै द्विजातये ॥ २५ ॥
आजगाम पुरं वीरः सव्यसाची धनंजयः ।
सोऽभिवाद्य गुरून् सर्वान् सर्वैश्चाप्यभिनन्दितः ॥ २६ ॥
फिर ब्राह्मणको वह सारा गोधन देकर प्रसन्न करके अनुपम यशके भागी हो पाण्डुपुत्र सव्यसाची वीर धनंजय पुनः अपने नगरमें लौट आये। वहाँ आकर उन्होंने समस्त गुरुजनोंको प्रणाम किया और उन सभी गुरुजनोंने उनकी बड़ी प्रशंसा एवं अभिनन्दन किया ॥ २५-२६ ॥
धर्मराजमुवाचेदं व्रतमादिश मे प्रभो ।
समयः समतिक्रान्तो भवत्संदर्शने मया ॥ २७ ॥
वनवासो गमिष्यामि समयो ह्येष नः कृतः ।
इसके बाद अर्जुनने धर्मराजसे कहा—'प्रभो! मैंने आपको द्रौपदीके साथ देखकर पहलेके निश्चित नियमको भंग किया है; अतः आप इसके लिये मुझे प्रायश्चित्त करनेकी आज्ञा दीजिये। मैं वनवासके लिये जाऊँगा; क्योंकि हमलोगोंमें यह शर्त हो चुकी है' ॥ २७ ॥
इत्युक्तो धर्मराजस्तु सहसा वाक्यमप्रियम् ॥ २८ ॥
कथमित्यब्रवीद् वाचा शोकार्तः सज्जमानया ।
युधिष्ठिरो गुडाकेशं भ्राता भ्रातरमच्युतम् ॥ २९ ॥
उवाच दीनो राजा च धनंजयमिदं वचः ।
प्रमाणमस्मि यदि ते मत्तः शृणु वचोऽनघ ॥ ३० ॥
अर्जुनके मुखसे सहसा यह अप्रिय वचन सुनकर धर्मराज शोकातुर होकर लड़खड़ाती हुई वाणीमें बोले—'ऐसा क्यों करते हो?' इसके बाद राजा युधिष्ठिर धर्ममर्यादासे कभी च्युत न होनेवाले अपने भाई गुडाकेश धनंजयसे फिर दीन होकर बोले—'अनघ! यदि तुम मुझको प्रमाण मानते हो, तो मेरी यह बात सुनो— ॥ २८—३० ॥
अनुप्रवेशे यद् वीर कृतवांस्त्वं मम प्रियम् ।
सर्वं तदनुजानामि व्यलीकं न च मे हृदि ॥ ३१ ॥
'वीरवर! तुमने घरके भीतर प्रवेश करके तो मेरा प्रिय कार्य किया है, अतः उसके लिये मैं तुम्हें आज्ञा देता हूँ; क्योंकि मेरे हृदयमें वह अप्रिय नहीं है ॥ ३१ ॥
गुरोरनुप्रवेशो हि नोपघातो यवीयसः ।
यवीयसोऽनुप्रवेशो ज्येष्ठस्य विधिलोपकाः ॥ ३२ ॥
'यदि बड़ा भाई घरमें स्त्रीके साथ बैठा हो, तो छोटे भाईका वहाँ जाना दोषकी बात नहीं है; परंतु छोटा भाई घरमें हो, तो बड़े भाईका वहाँ जाना उसके धर्मका नाश करनेवाला
है ॥ ३२ ॥
निवर्तस्व महाबाहो कुरुष्व वचनं मम ।
न हि ते धर्मलोपोऽस्ति न च ते धर्षणा कृता ॥ ३३ ॥
‘अतः महाबाहो! मेरी बात मानो; वनवासका विचार छोड़ दो। न तो तुम्हारे धर्मका लोप हुआ है और न तुम्हारे द्वारा मेरा तिरस्कार ही किया गया है’ ॥ ३३ ॥
अर्जुन उवाच
न व्याजेन चरेद् धर्ममिति मे भवतः श्रुतम् ।
न सत्याद् विचलिष्यामि सत्येनायुधमालभे ॥ ३४ ॥
अर्जुन बोले— प्रभो! मैंने आपके ही मुखसे सुना है कि धर्माचरणमें कभी बहानेबाजी नहीं करनी चाहिये। अतः मैं सत्यकी शपथ खाकर और शस्त्र छूकर कहता हूँ कि सत्यसे विचलित नहीं होऊँगा ॥ ३४ ॥
(आज्ञा तु मम दातव्या भवता कीर्तिवर्धन ।
भवदाज्ञामृते किंचिन्न कार्यमिति निश्चितम् ॥)
यशोवर्धन! मुझे आप वनवासके लिये आज्ञा दें, मेरा यह निश्चय है कि मैं आपकी आज्ञाके बिना कोई कार्य नहीं करूँगा ॥
वैशम्पायन उवाच
सोऽभ्यनुज्ञाय राजानं वनचर्याय दीक्षितः ।
वने द्वादश वर्षाणि वासायानुजगाम ह ॥ ३५ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! राजाकी आज्ञा लेकर अर्जुनने वनवासकी दीक्षा ली और वनमें बारह वर्षोंतक रहनेके लिये वे वहाँसे चल पड़े ॥ ३५ ॥
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि अर्जुनवनवासपर्वणि अर्जुनतीर्थयात्रायां द्वादशाधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २१२ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत अर्जुनवनवासपर्वमें अर्जुनतीर्थयात्राविषयक दो सौ बारहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २१२ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलकर कुल ३६ श्लोक हैं)