महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
अध्याय (पृष्ठ 714)
षण्णवतितमोऽध्यायः
महाभिषको ब्रह्माजीका शाप तथा शापग्रस्त वसुओंके साथ गंगाकी बातचीत
वैशम्पायन उवाच
इक्ष्वाकुवंशप्रभवो राजाऽऽसीत् पृथिवीपतिः ।
महाभिष इति ख्यातः सत्यवाक् सत्यविक्रमः ॥ १ ॥
सोऽश्वमेधसहस्रेण राजसूयशतेन च ।
तोषयामास देवेशं स्वर्गं लेभे ततः प्रभुः ॥ २ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! इक्ष्वाकु-वंशमें उत्पन्न महाभिष नामसे प्रसिद्ध एक राजा हो गये हैं, जो सत्यवादी होनेके साथ ही सत्यपराक्रमी भी थे। उन्होंने एक हजार अश्वमेध और एक सौ राजसूय यज्ञोंद्वारा देवेश्वर इन्द्रको संतुष्ट किया और उन यज्ञोंके पुण्यसे उन शक्तिशाली नरेशने स्वर्गलोग प्राप्त कर लिया ॥ १-२ ॥
ततः कदाचिद् ब्रह्माणमुपासांचक्रिरे सुराः ।
तत्र राजर्षयो ह्यासन् स च राजा महाभिषः ॥ ३ ॥
तदनन्तर एक समय सब देवता ब्रह्माजीकी सेवामें उनके समीप बैठे हुए थे। वहाँ बहुत-से राजर्षि तथा पूर्वोक्त राजा महाभिष भी उपस्थित थे ॥ ३ ॥
अथ गङ्गा सरिच्छ्रेष्ठा समुपायात् पितामहम् ।
तस्या वासः समुद्धूतं मारुतेन शशिप्रभम् ॥ ४ ॥
इसी समय सरिताओंमें श्रेष्ठ गंगा ब्रह्माजीके समीप आयी। उस समय वायुके झोंकेसे उसके शरीरका चाँदनीके समान उज्ज्वल वस्त्र सहसा ऊपरकी ओर उठ गया ॥ ४ ॥
ततोऽभवन् सुरगणाः सहसावाङ्मुखास्तदा ।
महाभिषस्तु राजर्षिरशङ्को दृष्टवान् नदीम् ॥ ५ ॥
यह देख सब देवताओंने तुरंत अपना मुँह नीचेकी ओर कर लिया; किंतु राजर्षि महाभिष निःशंक होकर देवनदीकी ओर देखते ही रह गये ॥ ५ ॥
सोऽपध्यातो भगवता ब्रह्मणा तु महाभिषः ।
उक्तश्च जातो मर्त्येषु पुनर्लोकानवाप्स्यसि ॥ ६ ॥
ययाऽऽहृतमनाश्चासि गङ्गया त्वं हि दुर्मते ।
सा ते वै मानुषे लोके विप्रियाण्याचरिष्यति ॥ ७ ॥
तब भगवान् ब्रह्माने महाभिषको शाप देते हुए कहा—'दुर्मते! तुम मनुष्योंमें जन्म लेकर फिर पुण्यलोकोंमें आओगे। जिस गंगाने तुम्हारे चित्तको चुरा लिया है, वही
मनुष्यलोकमें तुम्हारे प्रतिकूल आचरण करेगी ।। ६-७ ।।
यदा ते भविता मन्युस्तदा शापाद् विमोक्ष्यसे ।
'जब तुम्हें गंगापर क्रोध आ जायगा, तब तुम भी शापसे छूट जाओगे।'
वैशम्पायन उवाच
स चिन्तयित्वा नृपतिर्नृपानन्यांस्तपोधनान् ।। ८ ।।
प्रतीपं रोचयामास पितरं भूरितेजसम् ।
महाभिषं तु तं दृष्ट्वा नदी धैर्याच्च्युतं नृपम् ।। ९ ।।
तमेव मनसा ध्यायन्त्युपावर्तत् सरिद्वरा ।
सा तु विध्वस्तवपुषः कश्मलाभिहतान् नृप ।। १० ।।
ददर्श पथि गच्छन्ती वसून् देवान् दिवौकसः ।
तथारूपांश्च तान् दृष्ट्वा पप्रच्छ सरितां वरा ।। ११ ।।
वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! तब राजा महाभिषने अन्य बहुत-से तपस्वी राजाओंका चिन्तन करके महातेजस्वी राजा प्रतीपको ही अपना पिता बनानेके योग्य चुना—उन्हींको पसंद किया। महानदी गंगा राजा महाभिषको धैर्य खोते देख मन-ही-मन उन्हींका चिन्तन करती हुई लौटी। मार्गसे जाती हुई गंगाने वसुदेवताओंको देखा। उनका शरीर स्वर्गसे नीचे गिर रहा था। वे मोहाच्छन्न एवं मलिन दिखायी दे रहे थे। उन्हें इस रूपमें देखकर नदियोंमें श्रेष्ठ गंगाने पूछा— ।। ८—११ ।।
किमिदं नष्टरूपाः स्थ कच्चित् क्षेमं दिवौकसाम् ।
तामूचुर्वसवो देवाः शप्ताः स्मो वै महानदि ।। १२ ।।
अल्पेऽपराधे संरम्भाद् वसिष्ठेन महात्मना ।
विमूढा हि वयं सर्वे प्रच्छन्नमृषिसत्तमम् ।। १३ ।।
संध्यां वसिष्ठमासीनं तमत्यभिस्रुताः पुरा ।
तेन कोपाद् वयं शप्ता योनौ सम्भवतेति ह ।। १४ ।।
तुमलोगोंका दिव्य रूप नष्ट कैसे हो गया? देवता सकुशल तो हैं न? तब वसुदेवताओंने गंगासे कहा—'महानदी! महात्मा वसिष्ठने थोड़े-से अपराधपर क्रोधमें आकर हमें शाप दे दिया है। पहलेकी बात है एक दिन जब वसिष्ठजी पेड़ोंकी आड़में संध्योपासना कर रहे थे, हम सब मोहवश उनका उल्लंघन करके चले गये (और उनकी धेनुका अपहरण कर लिया)। इससे कुपित होकर उन्होंने हमें शाप दिया कि 'तुमलोग मनुष्ययोनिमें जन्म लो' ।। १२—१४ ।।
न निवर्तयितुं शक्यं यदुक्तं ब्रह्मवादिना ।
त्वमस्मान् मानुषी भूत्वा सृज पुत्रान्-वसून् भुवि ।। १५ ।।
‘उन ब्रह्मवादी महर्षिने जो बात कह दी है, वह टाली नहीं जा सकती; अतः हमारी प्रार्थना है कि तुम पृथ्वीपर मानवपत्नी होकर हम वसुओंको अपने पुत्ररूपसे उत्पन्न करो ।। १५ ।।
न मानुषीणां जठरं प्रविशेम वयं शुभे ।
इत्युक्ता तैश्च वसुभिस्तथेत्युक्त्वाब्रवीदिदम् ।। १६ ।।
‘शुभे! हमें मानुषी स्त्रियोंके उदरमें प्रवेश न करना पड़े, इसीलिये हमने यह अनुरोध किया है।' वसुओंके ऐसा कहनेपर गंगाजी 'तथास्तु' कहकर यों बोलीं ।। १६ ।।
गङ्गोवाच
मर्त्येषु पुरुषश्रेष्ठः को वः कर्ता भविष्यति ।
**गंगाजीने कहा—**वसुओ! मर्त्यलोकमें ऐसे श्रेष्ठ पुरुष कौन हैं; जो तुमलोगोंके पिता होंगे।
वसव ऊचुः
प्रतीपस्य सुतो राजा शान्तनुर्लोकविश्रुतः ।
भविता मानुषे लोके स नः कर्ता भविष्यति ।। १७ ।।
**वसुगण बोले—**प्रतीपके पुत्र राजा शान्तनु लोकविख्यात साधु पुरुष होंगे। मनुष्यलोकमें वे ही मारे जनक होंगे ।। १७ ।।
गङ्गोवाच
ममाप्येवं मतं देवा यथा मां वदतानघाः ।
प्रियं तस्य करिष्यामि युष्माकं चैतदीप्सितम् ।। १८ ।।
**गंगाजीने कहा—**निष्पाप देवताओ! तुमलोग जैसा कहते हो, वैसा ही मेरा भी विचार है। मैं राजा शान्तनुका प्रिय करूँगी और तुम्हारे इस अभीष्ट कार्यको भी सिद्ध करूँगी ।। १८ ।।
वसव ऊचुः
जातान् कुमारान् स्वानप्सु प्रक्षेप्तुं वै त्वमर्हसि ।
यथा न चिरकालं नो निष्कृतिः स्यात् त्रिलोकगे ।। १९ ।।
**वसुगण बोले—**तीनों लोकोंमें प्रवाहित होनेवाली गंगे! हमलोग जब तुम्हारे गर्भसे जन्म लें, तब तुम पैदा होते ही हमें अपने जलमें फेंक देना; जिससे शीघ्र ही हमारा मर्त्यलोकसे छुटकारा हो जाय ।। १९ ।।
गङ्गोवाच
एवमेतत् करिष्यामि पुत्रस्तस्य विधीयताम् ।
नास्य मोघः संगमः स्यात् पुत्रहेतोर्मया सह ॥ २० ॥
**गंगाजीने कहा—**ठीक है, मैं ऐसा ही करूँगी; परंतु उस राजाका मेरे साथ पुत्रके लिये किया हुआ सम्बन्ध व्यर्थ न हो जाय, इसलिये उनके लिये एक पुत्रकी भी व्यवस्था होनी चाहिये ॥ २० ॥
वसव ऊचुः
तुरीयार्धं प्रदास्यामो वीर्यस्यैकैकशो वयम् ।
तेन वीर्येण पुत्रस्ते भविता तस्य चेप्सितः ॥ २१ ॥
**वसुगण बोले—**हम सब लोग अपने तेजका एक-एक अष्टमांश देंगे। उस तेजसे जो तुम्हारा एक पुत्र होगा, वह उस राजाकी इच्छाके अनुरूप होगा ॥ २१ ॥
न सम्पत्स्यति मर्त्येषु पुनस्तस्य तु संततिः ।
तस्मादपुत्रः पुत्रस्ते भविष्यति स वीर्यवान् ॥ २२ ॥
किंतु मर्त्यलोकमें उसकी कोई संतान न होगी। अतः तुम्हारा वह पुत्र संतानहीन होनेके साथ ही अत्यन्त पराक्रमी होगा ॥ २२ ॥
एवं ते समयं कृत्वा गङ्गया वसवः सह ।
जग्मुः संहृष्टमनसो यथासंकल्पमञ्जसा ॥ २३ ॥
इस प्रकार गंगाजीके साथ शर्त करके वसुगण प्रसन्नतापूर्वक अपनी इच्छाके अनुसार चले गये ॥ २३ ॥
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि महाभिषोपाख्याने
षण्णवतितमोऽध्यायः ॥ ९६ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें महाभिषोपाख्यानविषयक
छानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ९६ ॥