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महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

अध्याय (पृष्ठ 354)

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अष्टचत्वारिंशोऽध्यायः

वासुकि नागकी चिन्ता, बहिनद्वारा उसका निवारण तथा आस्तीकका जन्म एवं विद्याध्ययन

सौतिरुवाच

गतमात्रं तु भर्तारं जरत्कारुरवेदयत् ।
भ्रातुः सकाशमागत्य याथातथ्यं तपोधन ॥ १ ॥
**उग्रश्रवाजी कहते हैं—**तपोधन शौनक! पतिके निकलते ही नागकन्या जरत्कारुने अपने भाई वासुकिके पास जाकर उनके चले जानेका सब हाल ज्यों-का-त्यों सुना दिया ॥ १ ॥

ततः स भुजगश्रेष्ठः श्रुत्वा सुमहदप्रियम् ।
उवाच भगिनीं दीनां तदा दीनतरः स्वयम् ॥ २ ॥
यह अत्यन्त अप्रिय समाचार सुनकर सर्पोंमें श्रेष्ठ वासुकि स्वयं भी बहुत दुःखी हो गये और दुःखमें पड़ी हुई अपनी बहिनसे बोले ॥ २ ॥

वासुकिरुवाच

जानासि भद्रे यत् कार्यं प्रदाने कारणं च यत् ।
पन्नगानां हितार्थाय पुत्रस्ते स्यात् ततो यदि ॥ ३ ॥
**वासुकिने कहा—**भद्रे! सर्पोंका जो महान् कार्य है और मुनिके साथ तुम्हारा विवाह होनेमें जो उद्देश्य रहा है, उसे तो तुम जानती ही हो। यदि उनके द्वारा तुम्हारे गर्भसे कोई पुत्र उत्पन्न हो जाता तो उससे सर्पोंका बहुत बड़ा हित होता ॥ ३ ॥

स सर्पसत्रात् किल नो मोक्षयिष्यति वीर्यवान् ।
एवं पितामहः पूर्वमुक्तवांस्तु सुरैः सह ॥ ४ ॥
वह शक्तिशाली मुनिकुमार ही हमलोगोंको जनमेजयके सर्पयज्ञमें जलनेसे बचायेगा; यह बात पहले देवताओंके साथ भगवान् ब्रह्माजीने कही थी ॥ ४ ॥

अप्यस्ति गर्भः सुभगे तस्मात् ते मुनिसत्तमात् ।
न चेच्छाम्यफलं तस्य दारकर्म मनीषिणः ॥ ५ ॥
कार्यं च मम न न्याय्यं प्रष्टुं त्वां कार्यमीदृशम्।
किंतु कार्यगरीयस्त्वात् ततस्त्वाहमचूचुदम् ॥ ६ ॥
सुभगे! क्या उन मुनिश्रेष्ठसे तुम्हें गर्भ रह गया है? तुम्हारे साथ उन मनीषी महात्माका विवाह-कर्म निष्फल हो, यह मैं नहीं चाहता। मैं तुम्हारा भाई हूँ, ऐसे कार्य (पुत्रोत्पत्ति)-के

विषयमें तुमसे कुछ पूछना मेरे लिये उचित नहीं है, परंतु कार्यके गौरवका विचार करके मैंने तुम्हें इस विषयमें सब बातें बतानेके लिये प्रेरित किया है॥ ५-६॥
दुर्वार्यतां विदित्वा च भर्तुस्तेऽतितपस्विनः।
नैनमन्वागमिष्यामि कदाचिद्धि शपेत् स माम्॥ ७॥
तुम्हारे महातपस्वी पतिको जानेसे रोकना किसीके लिये भी अत्यन्त कठिन है, यह जानकर मैं उन्हें लौटा लानेके लिये उनके पीछे नहीं जा रहा हूँ। लौटनेका आग्रह करूँ तो कदाचित् वे मुझे शाप भी दे सकते हैं॥ ७॥
आचक्ष्व भद्रे भर्तुः स्वं सर्वमेव विचेष्टितम्।
उद्धरस्व च शल्यं मे घोरं हृदि चिरस्थितम्॥ ८॥
अतः भद्रे! तुम अपने पतिकी सारी चेष्टा बताओ और मेरे हृदयमें दीर्घकालसे जो भयंकर काँटा चुभा हुआ है, उसे निकाल दो॥ ८॥
जरत्कारुस्ततो वाक्यमित्युक्ता प्रत्यभाषत।
आश्वासयन्ती संतप्तं वासुकिं पन्नगेश्वरम्॥ ९॥
भाईके इस प्रकार पूछनेपर तब जरत्कारु अपने संतप्त भ्राता नागराज वासुकिको धीरज बँधाती हुई इस प्रकार बोली॥ ९॥

जरत्कारुरुवाच

पृष्टो मयापत्यहेतोः स महात्मा महातपाः।
अस्तीत्युत्तरमुद्दिश्य ममेदं गतवांश्च सः॥ १०॥
**जरत्कारुने कहा—**भाई! मैंने संतानके लिये उन महातपस्वी महात्मासे पूछा था। मेरे गर्भके विषयमें ‘अस्ति’ (तुम्हारे गर्भमें पुत्र है) इतना ही कहकर वे चले गये॥ १०॥
स्वैरेष्वपि न तेनाहं स्मरामि वितथं वचः।
उक्तपूर्वं कुतो राजन् साम्पराये स वक्ष्यति॥ ११॥
न संतापस्त्वया कार्यः कार्यं प्रति भुजङ्गमे।
उत्पत्स्यति च ते पुत्रो ज्वलनार्कसमप्रभः॥ १२॥
इत्युक्त्वा स हि मां भ्रातर्गंतो भर्ता तपोधनः।
तस्माद् व्येतु परं दुःखं तवेदं मनसि स्थितम्॥ १३॥
राजन्! उन्होंने पहले कभी विनोदमें भी झूठी बात कही हो, यह मुझे स्मरण नहीं है। फिर इस संकटके समय तो वे झूठ बोलेंगे ही क्यों? भैया! मेरे पति तपस्याके धनी हैं। उन्होंने जाते समय मुझसे यह कहा—‘नागकन्ये! तुम अपनी कार्य-सिद्धिके सम्बन्धमें कोई चिन्ता न करना। तुम्हारे गर्भसे अग्नि और सूर्यके समान तेजस्वी पुत्र उत्पन्न होगा।’ इतना कहकर वे तपोवनमें चले गये। अतः भैया! तुम्हारे मनमें जो महान् दुःख है, वह दूर हो जाना चाहिये॥ ११—१३॥

सौतिरुवाच

एतच्छ्रुत्वा स नागेन्द्रो वासुकिः परया मुदा ।
एवमस्त्विति तद् वाक्यं भगिन्याः प्रत्यगृह्णत ॥ १४ ॥
उग्रश्रवाजी कहते हैं—शौनक! यह सुनकर नागराज वासुकि बड़ी प्रसन्नतासे बोले—'एवमस्तु' (ऐसा ही हो)। इस प्रकार उन्होंने बहिनकी बातको विश्वासपूर्वक ग्रहण किया ॥ १४ ॥

सान्त्वमानार्थदानैश्च पूजया चानुरूपया ।
सोदर्या पूजयामास स्वसारं पन्नगोत्तमः ॥ १५ ॥
सर्पोंमें श्रेष्ठ वासुकि अपनी सहोदरा बहिनको सान्त्वना, सम्मान तथा धन देकर एवं सुन्दररूपसे उसका स्वागत-सत्कार करके उसकी समाराधना करने लगे ॥ १५ ॥

ततः प्रववृधे गर्भो महातेजा महाप्रभः ।
यथा सोमो द्विजश्रेष्ठ शुक्लपक्षोदितो दिवि ॥ १६ ॥
द्विजश्रेष्ठ! जैसे शुक्लपक्षमें आकाशमें उदित होनेवाला चन्द्रमा प्रतिदिन बढ़ता है, उसी प्रकार जरत्कारुका वह महातेजस्वी और परम कान्तिमान् गर्भ बढ़ने लगा ॥ १६ ॥

अथ काले तु सा ब्रह्मन् प्रजज्ञे भुजगस्वसा ।
कुमारं देवगर्भाभं पितृमातृभयापहम् ॥ १७ ॥
ब्रह्मन्! तदनन्तर समय आनेपर वासुकिकी बहिनने एक दिव्य कुमारको जन्म दिया, जो देवताओंके बालक-सा तेजस्वी जान पड़ता था। वह पिता और माता—दोनों पक्षोंके भयको नष्ट करनेवाला था ॥ १७ ॥

ववृधे स तु तत्रैव नागराजनिवेशने ।
वेदांश्चाधिजगे साङ्गान् भार्गवाच्च्यवनान्मुनेः ॥ १८ ॥
वह वहीं नागराजके भवनमें बढ़ने लगा। बड़े होनेपर उसने भृगुकुलोत्पन्न च्यवन मुनिसे छहों अंगोंसहित वेदोंका अध्ययन किया ॥ १८ ॥

चीर्णव्रतो बाल एव बुद्धिसत्त्वगुणान्वितः ।
नाम चास्याभवत् ख्यातं लोकेष्वास्तीक इत्युत ॥ १९ ॥
वह बचपनसे ही ब्रह्मचर्यव्रतका पालन करनेवाला, बुद्धिमान् तथा सत्त्वगुणसम्पन्न हुआ। लोकमें आस्तीक नामसे उसकी ख्याति हुई ॥ १९ ॥

अस्तीत्युक्त्वा गतो यस्मात् पिता गर्भस्थमेव तम् ।
वनं तस्मादिदं तस्य नामास्तीकेति विश्रुतम् ॥ २० ॥
वह बालक अभी गर्भमें ही था, तभी उसके पिता 'अस्ति' कहकर वनमें चले गये थे। इसलिये संसारमें उसका आस्तीक नाम प्रसिद्ध हुआ ॥ २० ॥

स बाल एव तत्रस्थश्चरन्नमितबुद्धिमान् ।
गृहे पन्नगराजस्य प्रयत्नात् परिरक्षितः ॥ २१ ॥

भगवानिव देवेशः शूलपाणिर्हिरण्मयः ।
विवर्धमानः सर्वांस्तान् पन्नगानभ्यहर्षयत् ॥ २२ ॥

अमित बुद्धिमान् आस्तीक बाल्यावस्थामें ही वहाँ रहकर ब्रह्मचर्यका पालन एवं धर्मका आचरण करने लगा। नागराजके भवनमें उसका भलीभाँति यत्नपूर्वक लालन-पालन किया गया। सुवर्णके समान कान्तिमान् शूलपाणि देवेश्वर भगवान् शिवकी भाँति वह बालक दिनोदिन बढ़ता हुआ समस्त नागोंका आनन्द बढ़ाने लगा ॥ २१-२२ ॥

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि आस्तीकपर्वणि आस्तीकोत्पत्तौ
अष्टचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४८ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत आस्तीकपर्वमें आस्तीककी उत्पत्तिविषयक अड़तालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ४८ ॥