महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
अध्याय (पृष्ठ 1997)
चतुश्चत्वारिंशोऽध्यायः
भीष्मकी बातोंसे चिढ़े हुए शिशुपालका उन्हें फटकारना तथा भीष्मका श्रीकृष्णसे युद्ध करनेके लिये समस्त राजाओंको चुनौती देना
भीष्म उवाच
नैषा चेदिपतेर्बुद्धिर्यया त्वाऽऽह्वयतेऽच्युतम् ।
नूनमेष जगत्कर्तुः कृष्णस्यैव विनिश्चयः ॥ १ ॥
भीष्मजी कहते हैं— भीमसेन यह चेदिराज शिशुपालकी बुद्धि नहीं है, जिसके द्वारा वह युद्धसे कभी पीछे न हटनेवाले तुम-जैसे महावीरको ललकार रहा है, अवश्य ही सम्पूर्ण जगत्के स्वामी भगवान् श्रीकृष्णका ही यह निश्चित विधान है ॥ १ ॥
को हि मां भीमसेनाद्य क्षितावर्हति पार्थिवः ।
क्षेप्तुं कालपरीतात्मा यथैष कुलपांसनः ॥ २ ॥
भीमसेन! कालने ही इसके मन और बुद्धिको ग्रस लिया है, अन्यथा इस भूमण्डलमें कौन ऐसा राजा होगा, जो मुझपर इस तरह आक्षेप कर सके, जैसे यह कुलकलंक शिशुपाल कर रहा है ॥ २ ॥
एष ह्यस्य महाबाहुस्तेजोंऽशश्च हरेर्ध्रुवम् ।
तमेव पुनरादातुमिच्छत्युत तथा विभुः ॥ ३ ॥
यह महाबाहु चेदिराज निश्चय ही भगवान् श्रीकृष्णके तेजका अंश है। ये सर्वव्यापी भगवान् अपने उस अंशको पुनः समेट लेना चाहते हैं ॥ ३ ॥
येनैष कुरुशार्दूल शार्दूल इव चेदिराट् ।
गर्जत्यतीव दुर्बुद्धिः सर्वानस्मानचिन्तयन् ॥ ४ ॥
कुरुसिंह भीम! यही कारण है कि यह दुर्बुद्धि शिशुपाल हम सबको कुछ न समझकर आज सिंहके समान गरज रहा है ॥ ४ ॥
वैशम्पायन उवाच
ततो न ममृषे चैद्यस्तद् भीष्मवचनं तदा ।
उवाच चैनं संक्रुद्धः पुनर्भीष्ममथोत्तरम् ॥ ५ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! भीष्मकी यह बात शिशुपाल न सह सका। वह पुनः अत्यन्त क्रोधमें भरकर भीष्मको उनकी बातोंका उत्तर देते हुए बोला ॥ ५ ॥
शिशुपाल उवाच
द्विषतां नोऽस्तु भीष्मैष प्रभावः केशवस्य यः ।
यस्य संस्तववक्ता त्वं वन्दिवत् सततोत्थितः ॥ ६ ॥
शिशुपालने कहा— भीष्म! तुम सदा भाटकी तरह खड़े होकर जिसकी स्तुति गाया करते हो, उस कृष्णका जो प्रभाव है, वह हमारे शत्रुओंके पास ही रहे ॥ ६ ॥
संस्तवे च मनो भीष्म परेषां रमते यदि ।
तदा संस्तौषि राजंस्त्वमिमं हित्वा जनार्दनम् ॥ ७ ॥
भीष्म! यदि तुम्हारा मन सदा दूसरोंकी स्तुतिमें ही लगता है तो इस जनार्दनको छोड़कर इन राजाओंकी ही स्तुति करो ॥ ७ ॥
दरदं स्तुहि बाह्लीकमिमं पार्थिवसत्तमम् ।
जायमानेन येनेयमभवद् दारिता मही ॥ ८ ॥
ये दरददेशके राजा हैं, इनकी स्तुति करो। ये भूमिपालोंमें श्रेष्ठ बाह्लीक बैठे हैं, इनके गुण गाओ। इन्होंने जन्म लेते ही अपने शरीरके भारसे इस पृथ्वीको विदीर्ण कर दिया था ॥ ८ ॥
वङ्गाङ्गविषयाध्यक्षं सहस्राक्षसमं बले ।
स्तुहि कर्णमिमं भीष्म महाचापविकर्षणम् ॥ ९ ॥
भीष्म! ये जो वंग और अंग दोनों देशोंके राजा हैं, इन्द्रके समान बल-पराक्रमसे सम्पन्न हैं तथा महान् धनुषकी प्रत्यंचा खींचनेवाले हैं, इन वीरवर कर्णकी कीर्तिका गान करो ॥ ९ ॥
यस्येमे कुण्डले दिव्ये सहजे देवनिर्मिते ।
कवचं च महाबाहो बालार्कसदृशप्रभम् ॥ १० ॥
महाबाहो! इन कर्णके ये दोनों दिव्य कुण्डल जन्मके साथ ही प्रकट हुए हैं। किसी देवताने ही इन कुण्डलोंका निर्माण किया है। कुण्डलोंके साथ-साथ इनके शरीरपर यह दिव्य कवच भी जन्मसे ही पैदा हुआ है, जो प्रातःकालके सूर्यके समान प्रकाशित हो रहा है ॥ १० ॥
वासवप्रतिमो येन जरासंधोऽतिदुर्जयः ।
विजितो बाहुयुद्धेन देहभेदं च लम्भितः ॥ ११ ॥
जिन्होंने इन्द्रके तुल्य पराक्रमी तथा अत्यन्त दुर्जय जरासंधको बाहुयुद्धके द्वारा केवल परास्त ही नहीं किया, उनके शरीरको चीर भी डाला, उन भीमसेनकी स्तुति करो ॥ ११ ॥
द्रोणं द्रौणिं च साधु त्वं पितापुत्रौ महारथौ ।
स्तुहि स्तुत्यावुभौ भीष्म सततं द्विजसत्तमौ ॥ १२ ॥
द्रोणाचार्य और अश्वत्थामा दोनों पिता-पुत्र महारथी हैं तथा ब्राह्मणोंमें श्रेष्ठ हैं, अतएव स्तुत्य भी हैं। भीष्म! तुम उन दोनोंकी अच्छी तरह स्तुति करो ॥ १२ ॥
ययोरन्यतरो भीष्म संक्रुद्धः सचराचराम् ।
इमां वसुमतीं कुर्यान्निःशेषामिति मे मतिः ॥ १३ ॥
भीष्म! इन दोनों पिता-पुत्रोंमेंसे यदि एक भी अत्यन्त क्रोधमें भर जाय, तो चराचर प्राणियोंसहित इस सारी पृथ्वीको नष्ट कर सकता है, ऐसा मेरा विश्वास है ॥ १३ ॥
द्रोणस्य हि समं युद्धे न पश्यामि नराधिपम् ।
नाश्वत्थाम्नः समं भीष्म न च तौ स्तोतुमिच्छसि ॥ १४ ॥
भीष्म! मुझे तो कोई भी ऐसा राजा नहीं दिखायी देता, जो युद्धमें द्रोण अथवा अश्वत्थामाकी बराबरी कर सके। तो भी तुम इन दोनोंकी स्तुति करना नहीं चाहते ॥ १४ ॥
पृथिव्यां सागरान्तायां यो वै प्रतिसमो भवेत् ।
दुर्योधनं त्वं राजेन्द्रमतिक्रम्य महाभुजम् ॥ १५ ॥
जयद्रथं च राजानं कृतास्त्रं दृढविक्रमम् ।
द्रुमं किम्पुरुषाचार्यं लोके प्रथितविक्रमम् ।
अतिक्रम्य महावीर्यं किं प्रशंससि केशवम् ॥ १६ ॥
इस समुद्रपर्यन्त सारी पृथ्वीपर जो अद्वितीय अनुपम वीर हैं, उन राजाधिराज महाबाहु दुर्योधनको, अस्त्रविद्यामें निपुण और सुदृढ़पराक्रमी राजा जयद्रथको और विश्वविख्यात विक्रमशाली महाबली किम्पुरुषा-चार्य द्रुमको छोड़कर तुम कृष्णकी प्रशंसा क्यों करते हो? ॥ १५-१६ ॥
वृद्धं च भारताचार्यं तथा शारद्वतं कृपम् ।
अतिक्रम्य महावीर्यं किं प्रशंससि केशवम् ॥ १७ ॥
शरद्वान् मुनिके पुत्र महापराक्रमी कृप भरतवंशके वृद्ध आचार्य हैं। इनका उल्लंघन करके तुम कृष्णका गुण क्यों गाते हो? ॥ १७ ॥
धनुर्धराणां प्रवरं रुक्मिणं पुरुषोत्तमम् ।
अतिक्रम्य महावीर्यं किं प्रशंससि केशवम् ॥ १८ ॥
धनुर्धरोंमें श्रेष्ठ पुरुषरत्न महाबली रुक्मीकी अवहेलना करके तुम केशवकी प्रशंसाके गीत क्यों गाते हो? ॥ १८ ॥
भीष्मकं च महावीर्यं दन्तवक्रं च भूमिपम् ।
भगदत्तं यूपकेतुं जयत्सेनं च मागधम् ॥ १९ ॥
विराटद्रुपदौ चोभौ शकुनिं च बृहद्वलम् ।
विन्दानुविन्दावावन्त्यौ पाण्ड्यं श्वेतमथोत्तरम् ॥ २० ॥
शङ्खं च सुमहाभागं वृषसेनं च मानिनम् ।
एकलव्यं च विक्रान्तं कालिङ्गं च महारथम् ॥ २१ ॥
अतिक्रम्य महावीर्यं किं प्रशंससि केशवम् ।
महापराक्रमी भीष्मक, भूमिपाल दन्तवक्र, भगदत्त, यूपकेतु, जयत्सेन, मगधराज
सहदेव, विराट, द्रुपद, शकुनि, बृहद्वल, अवन्तीके राजकुमार विन्द-अनुविन्द, पाण्ड्यनरेश,
श्वेत, उत्तर, महाभाग शंख, अभिमानी वृषसेन, पराक्रमी एकलव्य तथा महारथी एवं
महाबली कलिंगनरेशकी अवहेलना करके कृष्णकी प्रशंसा क्यों कर रहे हो? ।। १९—२१ १/२
।।
शल्यादीनपि कस्मात् त्वं न स्तौषि वसुधाधिपान् ।
स्तवाय यदि ते बुद्धिर्वर्तते भीष्म सर्वदा ।। २२ ।।
भीष्म! यदि तुम्हारा मन सदा दूसरोंकी स्तुति करनेमें ही लगता है तो इन शल्य आदि
श्रेष्ठ राजाओंकी स्तुति क्यों नहीं करते? ।। २२ ।।
किं हि शक्यं मया कर्तुं यद् वृद्धानां त्वया नृप ।
पुरा कथयतां नूनं न श्रुतं धर्मवादिनाम् ।। २३ ।।
भीष्म! तुमने पहले बड़े-बूढ़े धर्मोपदेशकोंके मुखसे यदि यह धर्मसंगत बात, जिसे मैं
अभी बताऊँगा नहीं सुनी, तो मैं क्या कर सकता हूँ? ।। २३ ।।
आत्मनिन्दाऽऽत्मपूजा च परनिन्दा परस्तवः ।
अनाचरितमार्याणां वृत्तमेतच्चतुर्विधम् ।। २४ ।।
भीष्म! अपनी निन्दा, अपनी प्रशंसा, दूसरेकी निन्दा और दूसरेकी स्तुति—ये चार
प्रकारके कार्य पहलेके श्रेष्ठ पुरुषोंने कभी नहीं किये हैं ।। २४ ।।
यदस्तव्यामिमं शश्वन्मोहात् संस्तौषि भक्तितः ।
केशवं तच्च ते भीष्म न कश्चिदनुमन्यते ।। २५ ।।
भीष्म! जो स्तुतिके सर्वथा अयोग्य है, उसी केशवकी तुम मोहवश सदा भक्तिभावसे
जो स्तुति करते रहते हो, उसका कोई अनुमोदन नहीं करता ।। २५ ।।
कथं भोजस्य पुरुषे वर्गपाले दुरात्मनि ।
समावेशयसे सर्वं जगत् केवलकाम्यया ।। २६ ।।
दुरात्मा कृष्ण तो राजा कंसका सेवक है, उनकी गौओंका चरवाहा रहा है। तुम केवल
स्वार्थवश इसमें सारे जगत्का समावेश कर रहे हो ।। २६ ।।
अथ चैषा न ते बुद्धिः प्रकृतिं याति भारत ।
मयैव कथितं पूर्वं भूलिङ्गशकुनिर्यथा ।। २७ ।।
भारत! तुम्हारी बुद्धि ठिकानेपर नहीं आ रही है। मैं यह बात पहले ही बता चुका हूँ कि
तुम भूलिंग पक्षीके समान कहते कुछ और करते कुछ हो ।। २७ ।।
भूलिङ्गशकुनिर्नाम पार्श्वे हिमवतः परे ।
भीष्म तस्याः सदा वाचः श्रूयन्तेऽर्थविगर्हिताः ।। २८ ।।
भीष्म! हिमालयके दूसरे भागमें भूलिंग नामसे प्रसिद्ध एक चिड़िया रहती है। उसके
मुखसे सदा ऐसी बात सुनायी पड़ती है, जो उसके कार्यके विपरीत भावकी सूचक होनेके
कारण अत्यन्त निन्दनीय जान पड़ती है ॥ २८ ॥
मा साहसमितीदं सा सततं वाशते किल ।
साहसं चात्मनातीव चरन्ती नावबुध्यते ॥ २९ ॥
वह चिड़िया सदा यही बोला करती है—‘मा साहसम्’ (अर्थात् साहसका काम न करो), परंतु वह स्वयं ही भारी साहसका काम करती हुई भी यह नहीं समझ पाती ॥ २९ ॥
सा हि मांसार्गलं भीष्म मुखात् सिंहस्य खादतः ।
दन्तान्तरविलग्नं यत् तदादत्तेऽल्पचेतना ॥ ३० ॥
भीष्म! वह मूर्ख चिड़िया मांस खाते हुए सिंहके दाँतोंमें लगे हुए मांसके टुकड़ेको अपनी चोंचसे चुगती रहती है ॥ ३० ॥
इच्छतः सा हि सिंहस्य भीष्म जीवत्यसंशयम् ।
तद्वत् त्वमप्यधर्मिष्ठ सदा वाचः प्रभाषसे ॥ ३१ ॥
निःसंदेह सिंहकी इच्छासे ही वह अबतक जी रही है। पापी भीष्म! इसी प्रकार तुम भी सदा बढ़-बढ़कर बातें करते हो ॥ ३१ ॥
इच्छतां भूमिपालानां भीष्म जीवस्यसंशयम् ।
लोकविद्विष्टकर्मा हि नान्योऽस्ति भवता समः ॥ ३२ ॥
भीष्म! निःसंदेह तुम्हारा जीवन इन राजाओंकी इच्छासे ही बचा हुआ है; क्योंकि तुम्हारे समान दूसरा कोई राजा ऐसा नहीं है, जिसके कर्म सम्पूर्ण जगत्से द्वेष करनेवाले हों ॥ ३२ ॥
वैशम्पायन उवाच
ततश्चेदिपतेः श्रुत्वा भीष्मः स कटुकं वचः ।
उवाचेदं वचो राजंश्चेदिराजस्य शृण्वतः ॥ ३३ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! शिशुपालका यह कटु वचन सुनकर भीष्मजीने शिशुपालके सुनते हुए यह बात कही— ॥ ३३ ॥
इच्छतां किल नामाहं जीवाम्येषां महीक्षिताम् ।
सोऽहं न गणयाम्येतांस्तृणेनापि नराधिपान् ॥ ३४ ॥
‘अहो! शिशुपालके कथनानुसार मैं इन राजाओंकी इच्छापर जी रहा हूँ; परंतु मैं तो इन समस्त भूपालोंको तिनके-बराबर भी नहीं समझता’ ॥ ३४ ॥
एवमुक्ते तु भीष्मेण ततः संचुक्रुशुर्नृपाः ।
केचिज्जहृषिरे तत्र केचिद् भीष्मं जगर्हिरे ॥ ३५ ॥
भीष्मके ऐसा कहनेपर बहुत-से राजा कुपित हो उठे। कुछ लोगोंको हर्ष हुआ तथा कुछ भीष्मजीकी निन्दा करने लगे ॥ ३५ ॥
केचिदूचुर्महेष्वासाः श्रुत्वा भीष्मस्य तद् वचः ।
पापोऽवलिप्तो वृद्धश्च नायं भीष्मोऽर्हति क्षमाम् ॥ ३६ ॥
कुछ महान् धनुर्धर नरेश भीष्मकी वह बात सुनकर कहने लगे—'यह बूढ़ा भीष्म पापी और घमण्डी है; अतः क्षमाके योग्य नहीं है ॥ ३६ ॥
हन्यतां दुर्मतिर्भीष्मः पशुवत् साध्वयं नृपाः ।
सर्वैः समेत्य संरब्धैर्दह्यतां वा कटाग्निना ॥ ३७ ॥
'राजाओ! क्रोधमें भरे हुए हम सब लोग मिलकर इस खोटी बुद्धिवाले भीष्मको पशुकी भाँति गला दबाकर मार डालें अथवा घास-फूसकी आगमें इसे जीते-जी जला दें' ॥ ३७ ॥
इति तेषां वचः श्रुत्वा ततः कुरुपितामहः ।
उवाच मतिमान् भीष्मस्तानेव वसुधाधिपान् ॥ ३८ ॥
उन राजाओंकी ये बातें सुनकर कुरुकुलके पितामह बुद्धिमान् भीष्मजी फिर उन्हीं नरेशोंसे बोले— ॥ ३८ ॥
उक्तस्योक्तस्य नेहान्तमहं समुपलक्षये ।
यत् तु वक्ष्यामि तत् सर्वं शृणुध्वं वसुधाधिपाः ॥ ३९ ॥
'राजाओ! यदि मैं सबकी बातका अलग-अलग उत्तर दूँ तो यहाँ उसकी समाप्ति होती नहीं दिखायी देती। अतः मैं जो कुछ कह रहा हूँ, वह सब ध्यान देकर सुनो ॥ ३९ ॥
पशुवद् घातनं वा मे दहनं वा कटाग्निना ।
क्रियतां मूर्ध्नि वो न्यस्तं मयेदं सकलं पदम् ॥ ४० ॥
'तुमलोगोंमें साहस या शक्ति हो, तो पशुकी भाँति मेरी हत्या कर दो अथवा घास-फूसकी आगमें मुझे जला दो। मैंने तो तुमलोगोंके मस्तकपर अपना यह पूरा पैर रख दिया ॥ ४० ॥
एष तिष्ठति गोविन्दः पूजितोऽस्माभिरच्युतः ।
यस्य वस्त्वरते बुद्धिर्मरणाय स माधवम् ॥ ४१ ॥
कृष्णमाह्वयतामद्य युद्धे चक्रगदाधरम् ।
यादवस्यैव देवस्य देहं विशतु पातितः ॥ ४२ ॥
'हमने जिनकी पूजा की है, अपनी महिमासे कभी च्युत न होनेवाले वे भगवान् गोविन्द तुमलोगोंके सामने मौजूद हैं। तुमलोगोंमेंसे जिसकी बुद्धि मृत्युका आलिंगन करनेके लिये उतावली हो रही हो, वह इन्हीं यदुकुल-तिलक चक्रगदाधर श्रीकृष्णको आज युद्धके लिये ललकारे और इनके हाथों मारा जाकर इन्हीं भगवान्के शरीरमें प्रविष्ट हो जाय' ॥ ४१-४२ ॥
इति श्रीमहाभारते सभापर्वणि शिशुपालवधपर्वणि भीष्मवाक्ये
चतुश्चत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४४ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत सभापर्वके अन्तर्गत शिशुपालवधपर्वमें भीष्मवाक्यविषयक चौवालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ४४ ।।