महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
अध्याय (पृष्ठ 1569)
श्रीकृष्ण और अर्जुनका देवताओंसे युद्ध
अर्जुन और श्रीकृष्णको इन्द्रका वरदान
निकृत्ताः शतशः सर्वा निपेतुरनलं क्षणात् ।
उस चक्रके प्रहारसे पीड़ित हो दानव, निशाचर आदि समस्त क्षुद्र प्राणी सौ-सौ टुकड़े होकर क्षणभरमें आगमें गिर गये ॥ ७१/२ ॥
तत्रादृश्यन्त ते दैत्याः कृष्णचक्रविदारिताः ॥ ८ ॥
वसारुधिरसम्पृक्ताः संध्यायामिव तोयदाः ।
श्रीकृष्णके चक्रसे विदीर्ण हुए दैत्य मेदा तथा रक्तमें सनकर संध्याकालके मेघोंकी भाँति दिखायी देने लगे ॥ ८१/२ ॥
पिशाचान् पक्षिणो नागान् पशूंश्चैव सहस्रशः ॥ ९ ॥
निघ्नंश्चरति वार्ष्णेयः कालवत् तत्र भारत ।
भारत! भगवान् श्रीकृष्ण वहाँ सहस्रों पिशाचों, पक्षियों, नागों तथा पशुओंका वध करते हुए कालके समान विचर रहे थे ॥ ९१/२ ॥
क्षिप्तं क्षिप्तं पुनश्चक्रं कृष्णस्यामित्रघातिनः ॥ १० ॥
छित्त्वानेकानि सत्त्वानि पाणिमेति पुनः पुनः ।
शत्रुघाती श्रीकृष्णके द्वारा बार-बार चलाया हुआ वह चक्र अनेक प्राणियोंका संहार करके पुनः उनके हाथमें चला आता था ॥ १०१/२ ॥
तथा तु निघ्नतस्तस्य पिशाचोरगराक्षसान् ॥ ११ ॥
बभूव रूपमत्युग्रं सर्वभूतात्मनस्तदा ।
इस प्रकार पिशाच, नाग तथा राक्षसोंका संहार करनेवाले सर्वभूतात्मा भगवान् श्रीकृष्णका स्वरूप उस समय बड़ा भयंकर जान पड़ता था ॥ १११/२ ॥
समेतानां च सर्वेषां दानवानां च सर्वशः ॥ १२ ॥
विजेता नाभवत् कश्चित् कृष्णपाण्डवयोर्मृधे ।
वहाँ सब ओरसे सम्पूर्ण दानव एकत्र हो गये थे, तथापि उनमेंसे एक भी ऐसा नहीं निकला, जो युद्धमें श्रीकृष्ण और अर्जुनको जीत सके ॥ १२१/२ ॥
तयोर्बलात् परित्रातुं तं च दावं यदा सुराः ॥ १३ ॥
नाशक्नुवञ्छमयितुं तदाभूवन् पराङ्मुखाः ।
जब देवतालोग उन दोनोंके बलसे खाण्डववनकी रक्षा करने और उस आगको बुझानेमें सफल न हो सके, तब पीठ दिखाकर चल दिये ॥ १३१/२ ॥
शतक्रतुस्तु सम्प्रेक्ष्य विमुखानमरांस्तथा ॥ १४ ॥
बभूव मुदितो राजन् प्रशंसन् केशवार्जनौ ।
राजन्! शतक्रतु इन्द्र देवताओंको विमुख हुआ देख श्रीकृष्ण और अर्जुनकी प्रशंसा करते हुए बड़े प्रसन्न हुए ॥ १४१/२ ॥
निवृत्तेष्वथ देवेषु वागुवाचाशरीरिणी ॥ १५ ॥
शतक्रतुं समाभाष्य महागम्भीरनिःस्वना ।
देवताओंके लौट जानेपर इन्द्रको सम्बोधित करके बड़े गम्भीर स्वरसे आकाशवाणी हुई — ॥ १५१/२ ॥
न ते सखा संनिहितस्तक्षको भुजगोत्तमः ॥ १६ ॥
दाहकाले खाण्डवस्य कुरुक्षेत्रं गतो ह्यसौ ।
‘वासव! तुम्हारे सखा नागप्रवर तक्षक इस समय यहाँ नहीं हैं। वे खाण्डवदाहके समय कुरुक्षेत्र चले गये थे ॥ १६१/२ ॥
न च शक्यौ युधा जेतुं कथंचिदपि वासव ॥ १७ ॥
वासुदेवार्जुनौवेतौ निबोध वचनान्मम ।
नरनारायणावेतौ पूर्वदेवौ दिवि श्रुतौ ॥ १८ ॥
भवानप्यभिजानाति यद्वीर्यौ यत्पराक्रमौ ।
नैतौ शक्यौ दुराधर्षौ विजेतुमजितौ युधि ॥ १९ ॥
‘भगवान् वासुदेव तथा अर्जुनको किसी प्रकार युद्धसे जीता नहीं जा सकता। मेरे कहनेसे तुम इस बातको समझ लो। ये दोनों पहलेके देवता नर और नारायण हैं। देवलोकमें भी इनकी ख्याति है। इनका बल और पराक्रम कैसा है, यह तुम भी जानते हो। ये अपराजित और दुर्धर्ष वीर हैं। सम्पूर्ण लोकोंमें किसीके द्वारा भी ये युद्धमें जीते नहीं जा सकते ॥ १७—१९ ॥
अपि सर्वेषु लोकेषु पुराणावृषिसत्तमौ ।
पूजनीयतमावेतावपि सर्वैः सुरासुरैः ॥ २० ॥
यक्षराक्षसगन्धर्वनरकिन्नरपन्नगैः ।
‘ये दोनों पुरातन ऋषिश्रेष्ठ नर-नारायण सम्पूर्ण देवताओं, असुरों, यक्षों, राक्षसों, गन्धर्वों, मनुष्यों, किन्नरों तथा नागोंके लिये भी परम पूजनीय हैं ॥ २०१/२ ॥
तस्मादितः सुरैः सार्धं गन्तुमर्हसि वासव ॥ २१ ॥
दिष्टं चाप्यनुपश्यैतत् खाण्डवस्य विनाशनम् ।
‘अतः इन्द्र! तुम्हें देवताओंके साथ यहाँसे चले जाना ही उचित है। खाण्डववनके इस विनाशको तुम प्रारब्धका ही कार्य समझो’ ॥ २११/२ ॥
इति वाक्यमुपश्रुत्य तथ्यमित्यमरेश्वरः ॥ २२ ॥
क्रोधामर्षौ समुत्सृज्य सम्प्रतस्थे दिवं तदा ।
यह आकाशवाणी सुनकर देवराज इन्द्रने इसे ही सत्य माना और क्रोध तथा अमर्ष छोड़कर वे उसी समय स्वर्गलोकको लौट गये ॥ २२१/२ ॥
तं प्रस्थितं महात्मानं समवेक्ष्य दिवौकसः ॥ २३ ॥
सहिताः सेनया राजन्ननुजग्मुः पुरंदरम् ।
राजन्! महात्मा इन्द्रको वहाँसे प्रस्थान करते देख समस्त स्वर्गवासी देवता सेनासहित उनके पीछे-पीछे चले गये ॥ २३ १/२ ॥
देवराजं तदा यान्तं सह देवैरवेक्ष्य तु ।। २४ ।।
वासुदेवार्जुनौ वीरौ सिंहनादं विनेदतुः ।
उस समय देवताओंसहित देवराज इन्द्रको जाते देख वीरवर श्रीकृष्ण और अर्जुनने सिंहनाद किया ॥ २४ १/२ ॥
देवराजे गते राजन् प्रहृष्टौ केशवार्जुनौ ।। २५ ।।
निर्विशङ्कं वनं वीरौ दाहयामासतुस्तदा ।
राजन्! देवराजके चले जानेपर वीरवर केशव तथा अर्जुन अत्यन्त प्रसन्न हो उस समय बेखटके खाण्डववनका दाह कराने लगे ॥ २५ १/२ ॥
स मारुत इवाभ्राणि नाशयित्वार्जुनः सुरान् ।। २६ ।।
व्यधमच्छरसङ्घातैर्देहिनः खाण्डवालयान् ।
जैसे प्रबल वायु बादलोंको छिन्न-भिन्न कर देती है, उसी प्रकार अर्जुनने देवताओंको भगाकर अपने बाणोंके समुदायसे खाण्डववासी प्राणियोंको मारना आरम्भ किया ॥ २६ १/२ ॥
न च स्म किंचिच्छक्नोति भूतं निश्चरितुं ततः ।। २७ ।।
संछिद्यमानमिषुभिरस्यता सव्यसाचिना ।
सव्यसाची अर्जुनके बाण चलाते समय उनके बाणोंसे कट जानेके कारण कोई भी जीव वहाँसे बाहर न निकल सका ॥ २७ १/२ ॥
नाशक्नुवंश्च भूतानि महान्त्यपि रणेऽर्जुनम् ।। २८ ।।
निरीक्षितुममोघास्त्रं योद्धुं चापि कुतो रणे ।
शतं चैकेन विव्याध शतेनैकं पतत्रिणाम् ।। २९ ।।
अमोघ अस्त्रधारी अर्जुनको उस समय बड़े-से-बड़े प्राणी देख भी न सके, फिर रणभूमिमें युद्ध तो कर ही कैसे सकते थे। वे कभी एक ही बाणसे सैकड़ोंको बींध डालते थे और कभी एकहीको सौ बाणोंसे घायल कर देते थे ॥ २८-२९ ॥
व्यसवस्तेऽपतन्नग्नौ साक्षात् कालहता इव ।
न चालभन्त ते शर्म रोधस्सु विषमेषु च ।। ३० ।।
वे सभी प्राणी प्राणशून्य होकर साक्षात् कालसे मारे हुएकी भाँति आगमें गिर पड़ते थे। वे वनके किनारे हों या दुर्गम स्थानोंमें हों, कहीं भी उन्हें शान्ति नहीं मिलती थी ॥ ३० ॥
पितृदेवनिवासेषु संतापश्चाप्यजायत ।
भूतसङ्घाश्च बहवो दीनाश्चक्रुर्महास्वनम् ।। ३१ ।।
पितरों और देवताओंके लोकमें भी खाण्डववनके दाहकी गर्मी पहुँचने लगी। बहुतेरे प्राणियोंके समुदाय कातर हो जोर-जोरसे चीत्कार करने लगे ।। ३१ ।।
रुरुदुर्वारणाश्चैव तथा मृगतरक्षवः ।
तेन शब्देन वित्र्रेसुर्गङ्गोदधिचरा झषाः ।। ३२ ।।
हाथी, मृग और चीते भी रोदन करते थे। उनके आर्तनादसे गङ्गा तथा समुद्रके भीतर रहनेवाले मत्स्य भी थर्रा उठे ।। ३२ ।।
विद्याधरगणाश्चैव ये च तत्र वनौकसः ।
न त्वर्जुनं महाबाहो नापि कृष्णं जनार्दनम् ।। ३३ ।।
निरीक्षितुं वै शक्नोति कश्चिद् योद्धुं कुतः पुनः ।
उस वनमें रहनेवाले जो विद्याधर-जातिके लोग थे, उनकी भी यही दशा थी। महाबाहो! उस समय कोई श्रीकृष्ण और अर्जुनकी ओर आँख उठाकर देख भी नहीं सकता था; फिर युद्ध करनेकी तो बात ही क्या है ।। ३३ १/२ ।।
एकायनगता येऽपि निष्पेतुस्तत्र केचन ।। ३४ ।।
राक्षसा दानवा नागा जघ्ने चक्रेण तान् हरिः ।
जो कोई राक्षस, दानव और नाग वहाँ एक साथ संघ बनाकर निकलते थे, उन सबको भगवान् श्रीहरि चक्रद्वारा मार देते थे ।। ३४ १/२ ।।
ते तु भिन्नशिरोदेहाश्चक्रवेगाद् गतासवः ।। ३५ ।।
पेतुरन्ये महाकायाः प्रदीप्ते वसुरेतसि ।
वे तथा दूसरे विशालकाय प्राणी चक्रके वेगसे शरीर और मस्तक छिन्न-भिन्न हो जानेके कारण निर्जीव हो प्रज्वलित आगमें गिर पड़ते थे ।। ३५ १/२ ।।
स मांसरुधिरौघैश्च वसाभिश्चापि तर्पितः ।। ३६ ।।
उपर्य्याकाशगो भूत्वा विधूमः समपद्यत ।
दीप्ताक्षो दीप्तजिह्वश्च सम्प्रदीप्तमहाननः ।। ३७ ।।
इस प्रकार वनजन्तुओंके मांस, रुधिर और मेदके समूहसे अत्यन्त तृप्त हो अग्निदेव ऊपर आकाशचारी होकर धूमरहित हो गये। उनकी आँखें चमक उठीं, जिह्वामें दीप्ति आ गयी और उनका विशाल मुख भी अत्यन्त तेजसे प्रकाशित होने लगा ।। ३६-३७ ।।
दीप्तोर्ध्वकेशः पिङ्गाक्षः पिबन् प्राणभृतां वसाम् ।
तां स कृष्णार्जुनकृतां सुधां प्राप्य हुताशनः ।। ३८ ।।
बभूव मुदितस्तृप्तः परां निर्वृतिमागतः ।
उनके चमकीले केश ऊपरकी ओर उठे हुए थे, आँखें पिंगलवर्णकी थीं और वे प्राणियोंके मेदेका रस पी रहे थे। श्रीकृष्ण और अर्जुनका दिया हुआ वह इच्छानुसार भोजन पाकर अग्निदेव बड़े प्रसन्न और पूर्ण तृप्त हो गये। उन्हें बड़ी शान्ति मिली ।। ३८ १/२ ।।
तथासुरं मयं नाम तक्षकस्य निवेशनात् ।। ३९ ।।
विप्रद्रवन्तं सहसा ददर्श मधुसूदनः ।
इसी समय तक्षकके निवासस्थानसे निकलकर सहसा भागते हुए मयासुरपर भगवान् मधुसूदनकी दृष्टि पड़ी ॥ ३९½ ॥
तमग्निः प्रार्थयामास दिधक्षुर्वातसारथिः ॥ ४० ॥
शरीरवाञ्जटी भूत्वा नदन्निव बलाहकः ।
वातसारथि अग्निदेव मूर्तिमान् हो सिरपर जटा धारण किये मेघके समान गर्जना करने लगे और उस असुरको जला डालनेकी इच्छासे माँगने लगे ॥ ४०½ ॥
विज्ञाय दानवेन्द्राणां मयं वै शिल्पिनां वरम् ॥ ४१ ॥
जिघांसुर्वासुदेवस्तं चक्रमुद्यम्य धिष्ठितः ।
स चक्रमुद्यतं दृष्ट्वा दिधक्षन्तं च पावकम् ॥ ४२ ॥
अभिधावार्जुनेत्येवं मयस्त्राहीति चाब्रवीत् ।
मय दानवेन्द्रोंके शिल्पियोंमें श्रेष्ठ था, उसे पहचानकर भगवान् वासुदेव उसका वध करनेके लिये चक्र लेकर खड़े हो गये। मयने देखा एक ओर मुझे मारनेके लिये चक्र उठा है, दूसरी ओर अग्निदेव मुझे भस्म कर डालना चाहते हैं; तब वह अर्जुनकी शरणमें गया और बोला—'अर्जुन! दौड़ो मुझे बचाओ, बचाओ' ॥ ४१-४२½ ॥
तस्य भीतस्वनं श्रुत्वा मा भैरिति धनंजयः ॥ ४३ ॥
प्रत्युवाच मयं पार्थो जीवयन्निव भारत ।
भारत! उसका भययुक्त स्वर सुनकर कुन्तीकुमार धनंजयने उसे जीवनदान देते हुए कहा—‘डरो मत’ ॥ ४३१/२ ॥
तं न भेतव्यमित्याह मयं पार्थो दयापरः ॥ ४४ ॥
अर्जुनके मनमें दया आ गयी थी, अतः उन्होंने मयासुरसे फिर कहा—‘तुम्हें डरना नहीं चाहिये’ ॥ ४४ ॥
तं पार्थेनाभये दत्ते नमुचेर्भ्रातरं मयम् ।
न हन्तुमैच्छद् दाशार्हः पावको न ददाह च ॥ ४५ ॥
अर्जुनके अभयदान देनेपर भगवान् श्रीकृष्णने नमुचिके भ्राता मयासुरको मारनेकी इच्छा त्याग दी और अग्निदेवने भी उसे नहीं जलाया ॥ ४५ ॥
वैशम्पायन उवाच
तद् वनं पावको धीमान् दिनानि दश पञ्च च ।
ददाह कृष्णपार्थाभ्यां रक्षितः पाकशासनात् ॥ ४६ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—परम बुद्धिमान् अग्निदेवने श्रीकृष्ण और अर्जुनके द्वारा इन्द्रके आक्रमणसे सुरक्षित रहकर खाण्डववनको पंद्रह दिनोंतक जलाया ॥ ४६ ॥
तस्मिन् वने दह्यमाने षडग्निर्न ददाह च ।
अश्वसेनं मयं चैव चतुरः शार्ङ्गकांस्तथा ॥ ४७ ॥
उस वनके जलाये जाते समय अश्वसेन नाग, मयासुर तथा चार शार्ङ्गक नामवाले पक्षियोंको अग्निने नहीं जलाया ॥ ४७ ॥
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि मयदर्शनपर्वणि मयदानवत्राणे
सप्तविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २२७ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत मयदर्शनपर्वमें मयदानवकी रक्षाविषयक दो सौ सत्ताईसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २२७ ॥