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क्षेमकुतूहलम् (क्षेमशर्मा - १६वीं शती का शाही पाकशास्त्र एवं आहार-विज्ञान सटीक)

Kshemakutuhalam of Kshemasharma on Dietetics

क्षेमशर्मा (सम्पादक: चौखम्बा संस्कृत संस्थान) द्वारा

DevanagariSanskritpublished136 पृष्ठ

२२४ क्षेमकुतूहलम्
अन्नं गले विशति तस्य नरस्य तूर्णं
संगृह्यमाण इव राहुजवेन चन्द्रः ॥ ४ ॥
नारङ्गं तु वरं रुच्यं सुगन्धमतिचारुणम्।
वातघ्नं कफदं किञ्चित्पित्तघ्नं विशदं स्मृतम् ॥ ५ ॥
नारङ्गशुदबोधक (वर्धन) योग
क. विधि- बीज रहित नारंग केशर (फल दल), खण्ड तथा मरिच चूर्ण जो व्यक्ति
भक्षण करता है, उसके गले (कण्ठ) में अन्न शीघ्र प्रवेश कर जाता है (विशति
तल्य नस्य तूर्णम्), जैसे राहु के वेग से चन्द्र स्वयं ग्रहित हो जाता है
(संग्रहयमाण इव सहुजवेनचन्द्रः)।
ख. गुण- १. पाचकाग्नि तीव्र कारक (सुधाजनन) २. अन्नरुचिकारक (उत्तम)
३. सुगन्धित ४. अरुण (अतिसुन्दर)
५. वातघ्न ६. कफकारक
७. किंचित् पित्तघ्न ८. विशद
अथ जम्बीरभवक्षुद्बोधकनिर्माणविधिर्गुणाश्च
विभावितं शुभ्रसिताभरीचै
रैलारजोभावनयाऽतिरुच्यम्।
जीवातवे तस्य नरस्य भोक्तु-
र्जम्बीरजं केसरमार्द्रयन्ति ॥ ६ ॥
जम्बीरः पाचनो हृद्यः कफवातहरः परः।
सुरभिर्दीपनो रुच्यो मुखवैशद्यकारकः ॥ ७ ॥
जम्बीर क्षुद्बोधक (वर्धन) योग
क. विधि- शुभ्रसिता, मरिच तथा एला चूर्ण से भावित जम्बीर निम्बूक के सर
(दल), का भक्षण करने वाले मनुष्य के जीवन हेतु औषध को सरस बनाने
वाला हे (जीवातवे तस्य नरस्य भोक्तु)।
ख. गुण- १. पाचन २. हृद्य
३. कफवातहर (परम्) ४. सुरभि
५. दीपन ६. रुच्य
७. मुखवैशद्यकारक
एकादशोत्सवः २२५
अथ बीजपूरकक्षुद्बोधकनिर्माणविधिर्गुणाश्च
सैन्धवार्द्रकसंयुक्तं बीजपूरकमत्ति यः।
शाकिनीभिरिवाकृष्टं विशत्युदरमोदनम् ॥ ८ ॥
केसरं मातुलुङ्गस्य लघु श्लेष्मानिलापहम्।
रोचनं दीपनं हृद्यं गुल्मशूलार्शसां जयेत् ॥ ९ ॥
बीजपूरक क्षुद्वर्धन (बोधक) योग
क. विधि-बीजपूर निम्बूक का सेवन, सैंधव तथा आर्द्रक मिश्रित, का सेवन करने
से, उदर में शाकिनियों द्वारा आकृष्ट (खींचे जाने के समान), ओदन स्वयं उदर
में प्रवेश कर जाता है (विशत्युदरमोदनम्) - इस तरह यह प्रयोग पाचकाग्नि
तथा क्षुधा को तीव्रता प्रदान करता है।
ख. गुण- १. लघु २. श्लेष्मापिलापह
३. रोचन ४. दीपन
५. हृद्य ६. गुल्म
७. शूल ८. अर्श नाशक (६-८)
अथ बीजपूरकस्य षड्ऋतुभक्षणविधिनिरूपणम्
सिन्धूत्थेन घनागमे च सितया काले शरत्सातपे
हेमन्ते लवणाईहिङ्गुमरिचैः सिद्धार्थतैलान्वितैः।
एतैस्तैः शिशिरे मधावपि तथा ग्रीष्मे गुडेनान्यथा
सर्वान् दोषचयान् करोति नितरां द्राग्बीजपूरः सदा ॥ १० ॥
बीजपूरक-विभिन्न ऋतु सेवन
बीजपूरक निम्बूक (बिजौरानीबू) का षड्ऋतु भक्षण विधान का निर्देश (निम्नांकित-
रूपेण) किया गया है-परन्तु इसके विपरीत सेवन समस्त दोष प्रकोपक होगा-
१. वर्षाकाल : सैन्धव लवण
२. शरतकाल (आतप सहित) : सिता (शर्करा)
३. हेमन्त काल : सर्वपतैल युक्त लवण-आर्द्रक के हिंगु-मरिच
४. शिशिर
५. वसन्तकाल : समस्त द्रव्य
६. ग्रीष्मकाल : गुड़

-ट-मां-शान् क्षि-पेत्-त-त्र (८)
तन्-दु-लांस्-त्रि-त्व-चांस्-ति-लान् (८)
It is indeed "तन्दुलांस्त्रित्वचांस्तिलान्"!

Line 33:
"प्रियालपनसाब्जानां मज्जां मात्रासमां क्षिपेत् ॥ १६ ॥"
प्रि-या-ल-प-न-साब्-जा-नां (८)
मज्-जां मा-त्रा-स-मां क्षि-पेत् (८)

Line 34:
"क्षीरार्धं घृतं चैव शर्करा च तथा न्यसेत्।"
क्षी-रार्र्-धं घृ-तं चै-व (८)
शर्-क-रां च त-था न्य-सेत् (८)
Yes, "शर्करां च तथा न्यसेत्।"

Line 35:
"सिद्धे त्रिकटुकोपेतः कूर्परेणाधिवासितः ॥ १७ ॥"
सिद्-धे त्रि-क-टु-को-पे-तः (८)
कूर्-प-रे-णा-धि-वा-सि-तः (८)

Line 36:
"एष विष्यन्दनो नाम देवलोकेऽपि दुर्लभः।"
ए-ष विष्-यन्-द-नो ना-

२२८ क्षेमकुतूहलम्
आम्रपल्लव - मुकुल योग
आम्रपल्लव - आम्र के प्रवाल (ताम्रवर्ण समान नव पल्लव) के खण्डों में लवण
मिश्रित (तथा मर्दित) कर पिण्डीकृत रूप में, घृत तथा (हिंगु-धूप से सुवासितं-घृत तथा
दुग्ध में पाक कर लेते हैं। यह व्यंजन पवन सखा (वायु का मित्र) अग्नि का प्रदीपन करता
है।
मुकुलः सहकारशाखिनः
शतखण्डीकृतसैन्धवान्वितः।
दधिमन्थमरीचसंस्कृत-
श्चिरजामरुचिं छिनत्ति हि ॥ २१॥
कफपित्तहरौ हृद्यौ मुखवैरस्यनाशनौ।
वह्निर्संजननौ रुच्यौ चूतजौ पुष्पपल्लवौ॥२२॥
क. विधि-मुकुल- आम्र मुकल (आम के बौर) को शत खण्डीकृत् रूप में,
लवण तथा दधिमन्थ, मरिचचूर्णसहित, पाक करते हैं। यह व्यंजन चिरकालीन
अरुचि को नष्ट कर देता है।
ख. गुण- चूतज (आम्रजन्य) पल्लव-मुकुल
१. कफपित्तहर २. हृद्य ३. मुखवैरस्यनाशन
४. वह्निर्संजनन ५. रुच्य
अथ मृणालस्य क्षुदबोधनिर्माणविधिर्गुणाश्च
बिशाङ्कुराश्चन्द्रकलानुकारिणो
विभावितः सैन्धवनिम्बुकाभ्याम्।
विकीर्य खण्डीकृतशृङ्गबेर-
जलेऽपि वह्निं लघु दीपयन्ति ॥ २३ ॥
मृणालं शीतलं हृद्यं कषायं कफनाशनम्।
रक्तपित्तहरं स्वादु दुर्जरं दाहनाशनम् ॥ २४॥
मृणालस्य योग
क. विधि- चन्द्र किरण समान कमल के मृणाल तन्तु में सैन्धन तथा निम्बक स्वरस
से मात्रित, आर्द्रक खण्ड स्वरस सम्मिलित कर सेवन कराना चाहिए। इससे
मन्द पाचकाग्नि तीव्र (प्रदीप्त) हो जाती है।


एकादशोन्मेषः २२९
ख. गुण- १. शीतल २. हृद्य
३. कषाय ४. कफनाशन
५. रक्तपित्तहर ६. स्वादु
७. दुर्जर ८. दाहनाशन
अथ शिग्रुमूलक्षुद्बोधकनिर्माणविधिर्गुणाश्च
धौतं कुञ्जरदन्तदीप्तिसदृशं सिन्धूत्थतैलासुरी
पीताभिः क्रमतोत्तरोत्तररसं मूलं नवं शिग्रुजम्।
तस्याहो वन्दनान्तरे निविशते श्रीचन्द्रचूडप्रिया-
पादाम्भोरुहरेणुरञ्जितशिरा यः पूर्वकाले पुमान् ॥ २५ ॥
शिग्रुमूल योग
क. विधि- प्रक्षालित, स्वच्छ, हस्तिदन्त समान श्वेतनवीन शिग्रु (सहिजन) मूल,
सैंधव, सर्षप तैल, राजिका, हरिद्रा (के साथ क्रमशः उत्तरोत्तर) मिश्रणकर भोज्य
पदार्थ का निर्माण कर लेते हैं।
ख. वैशिष्ट्य- वह आहार-पदार्थ, उस व्यक्ति के गुण में प्रवेश करता है, जो पूर्व
जन्म में भगवान शंकर तथा उनकी पत्नी उमा के चरण-कमल धूलि को अपने
सिर पर धारण (रंजित) करता है।
शिग्रुमूलं तु वातघ्नं श्रेष्ठशोविनाशनम्।
शमनं स्नायुरोगस्य पित्तकृत्कफनाशनम् ॥ २६ ॥
गुण
१. वातघ्न २. श्रेष्ठ अर्श विनाशनम् ३. स्नायुरोग शमन
४. पित्तकारक ५. कफघ्न
अथामलकफलस्य क्षुद्बोधकनिर्माणविधिर्गुणाश्च
स्निग्धं धात्रीफलं यज्जवलदनलशिखासन्निभं स्निग्धपात्रे
क्षिप्तं प्रभृष्टहिङ्गुप्रकरजनिरजस्तैलसिन्धूत्थव्योषैः।
संश्लिष्टं जातपाकं कतिपयदिचसैरूल्लसत्सौरभाढ्य
तस्य स्वादानुवादं कथितुमपि वरो नेश्वरः कस्तदन्यः ॥ २७॥

२३० क्षेमकुतूहलम्
आमलक फल योग
क. विधि- ज्वलन्त अग्नि शिला के समान धात्री फल (आमलक) को स्निग्ध पात्र
में छोड़कर भृष्ट हिंगु, हरिद्राचूर्ण, सर्षप तैल, सैन्धव त्रिकटु (व्योष) का चूर्ण
सम्मिलित करते हैं। कुछ दिनों में (संश्लिष्ट जातपाकम्) सुगन्धित (सौरभाढ्य)
फल प्रस्तुत हो जाते हैं।
ख. वैशिष्ट्य- इस प्रकार के आमलक फल (धात्री) के स्वाद (स्वादानुवाद) ईश्वर
भी करने में समर्थ नहीं हो पाते (वरी नेश्वरः कस्तदन्यः), तब अन्य लोगों का
नाश में नहीं होगा।
हन्ति पित्तं तु माधुर्यात् कफं तिक्तकषायतः।
वायुमम्लप्रभावत्वाद्धात्री दोषत्रयापहा ॥ २८ ॥
ग. गुण- १. पित्तनाशक (माधुर्यात्) २. कफघ्न (तिक्तकषायता)
३. वातघ्न (अम्लप्रभावात्) ४. त्रिदोषहार
अग्निसंजननं द्रव्यमुक्तमेकादशोत्सवे।
यदग्निपोषकं वस्तु क्षीरतत्क्रमथोच्यते ॥ २९ ॥
इति श्रीनरवैद्यमन्मथात्मजक्षेमशर्माविनिर्मिते क्षेमकुतूहले ग्रन्थे
क्षुद्बोधकवस्तुप्रशंसनो नामैकादशोत्सवः ॥११॥
उपसंहारात्मक रूपरेखा
एकादश उत्सव में आतिसंजनन द्रव्यों (पदार्थों-योगी-व्यंजनों आदि) का वर्णन
किया गया है। आगामी द्वादशोत्सव में अग्नि पोषक वस्तुओं तथा क्षीर एवं तक्रनिर्मित
द्रव्यों का प्रतिपादन किया जायेगा।
इति हिन्दी व्याख्या सहित क्षेमकुतूहल का क्षुद्बोधक पदार्थ-
वर्णन नामक ग्यारहवां उत्सव समाप्त।
अथै द्वादशोत्सवः
(द्वादश प्रकरण)
अथ गोरसपानकादिकथनम्
अथ चन्द्रप्रभा-क्षीरिकानिर्माणविधिर्गुणाश्च
शुभेऽर्धक्वथिते दुग्धे घृताक्तान् तन्दुलांन्यसेत्।
संसिद्धा मधुसंमिक्ता क्षीरी चन्द्रप्रभा भवेत् ॥ १॥
कुङ्कुमं च विनिक्षिप्य पचेत्पीतत्वहेतुना।
चन्द्रप्रभाकृतिः क्षीरी रक्तपित्तविनाशिनी ॥ २॥
विष्टम्भजननी बल्या धातुपुष्टिप्रदायिनी।
गोरस (दुग्ध) विभिन्न प्रकार तथा दुग्धमिर्र्नित व्यंजनादि
चन्द्रप्रभा-सीरिका
क. विधि- अर्धपक्व दुग्ध में घृत तलित तन्दुल का पाक करते हैं, फिर मधु का
सम्मिश्रण करे। यह चक्रवत् प्रभायुक्त क्षीरिका (खीर) बन जाती है। (संसिद्ध)।
यदि इस (क्षीरिका) को पीत वर्ण की प्रस्तुह करना है। तब कुङ्कुम (केशर)
मिश्रित कर पाक करते हैं।
ख. गुण-
(चन्द्रप्रभाकृति क्षीरी) १. रक्तपित्त विनाशिनी २. विष्टम्भव-जननी
३. बल्य ४. धातुपुष्टिदायक
अथ राजपायसनिर्माणविधिर्गुणाश्च
निर्नीरपाचितपयः प्रहिताष्टभागं
श्यामाकतन्दुलनवं निभृतान्तरोष्मा।
तत्यायसं सरसमावसथं सुधायाः
को लेढि भूपतिमृते घृतखण्डसाकम् ॥ ३ ॥
पायसं दुर्जरं बल्यं धातुपुष्टिविवर्धनम्।
विष्टम्भननं हन्ति रक्तपित्ताग्निमारुतान् ॥ ४ ॥

२३२ क्षेमकुतूहलम्
राजपायस
क. विधि- मिनौर (जलहित) पाय (दुग्ध) में श्यामाक नवीन तनुल (साँवा के
चावल)- अष्टम भाग प्रक्षेपण करके, निभृतन्तरीसना (अन्दर की गर्मी) से पाक
करके, घृत एवं खण्ड (शर्करा) मिश्रित करें। इस रीति से पक्व (सिद्ध) सरस
पायस अमृत सदृश होता है, जो राजा (भूपति) को छोड़कर कौन सेवन कर
सकता है (कोलेदि)।
ख. गुण- १. दुर्जर २. बल्य
३. धातुपुष्टि निवधर्म ४. विष्टम्भ जनन
५. रक्तपित्त ६. अग्निमांद्य
७. वातरोग (नाशक-५-७)
अथ नारङ्गक्षीरिणीनिर्माणविधिर्गुणाश्च
क्षिप्त्वा नारङ्गमज्ञां वै पचेत्सर्पिषि तापिते।
तत्र खण्डं च निक्षिप्य पक्वं मत्वाऽवतारयेत्॥५॥
शीतीभूते विनिक्षिप्य मात्रेवार्धशृतं पयः।
नारङ्गीक्षीरिणी चैषा सुगन्ध्सुरभीकृता॥६॥
नारङ्गक्षीरिणी
१. नारङ्ग मज्जा को तप्त घृत को पका करके, खण्ड (शर्करा) का मिश्रण करे, तथा
पकने पर अग्नि से पृथक करते हैं। शीतभूत (ठंडे होने पर) दुग्ध अर्धपक्व) को
मात्रापूर्वक लेकर, सुगन्धित द्रव्यों से सुवासित करते हैं। इस व्यंजन को
'नारंगक्षीरिणी' कहा जाता है।
यह विष्टम्भिवी, वात-पित्तहर तथा गुरु पाचिका होती है॥५-६॥
अथ नालिकेरक्षीरिकानिर्माणविधिर्गुणाश्च
विष्टम्भिनी हरेद्वातं पित्तं च गुरुपाचिका।
नालिकेरं पयः स्विन्नं खण्डितं सिक्थकाकृतिः॥७॥
मेलयेच्छर्करायुक्ते क्षीरे क्वथितगालिते।
धूपिताऽगुरुणा क्षीरीनालिकेरादिजा भवेत्॥८॥
नालिकेरोद्भवा क्षीरी स्निग्धा शीताऽतिपुष्टिदा।
गुर्वी सुमधुरा वृष्या रुच्या पित्तानिलापहा॥९॥
द्वादशोत्सवः २३३
एवं कूष्माण्डमजदेस्तथा वंशाङ्कुरादपि।
कदलीनां फलामूलात् कर्तव्या क्षीरिका बुधैः॥१०॥
नालिकेर क्षीरिका
क. विधि- नालिकेर (नारियल) सिक्थ (मोम) के समान को खण्ड करके, जल
पक्व करके, (क्ववलित कर) सान्द्र (गाढा) दुग्ध-शर्करायुक्त-दुग्ध मे प्रक्षेपण
करके तथा सुगन्धित कर लेते हैं। इस व्यंजन को 'नालिकेरक्षीरिणी' कहा
जाता है।
ख. गुण- १. स्निग्ध २. शीतल
३. अतिपुष्टिकारक ४. गुरु
५. मधुर ६. वीर्यवर्धक
७. रुच्य ८. पित्त-वातनाशक
ग. अन्य क्षीरिका व्यंजन- कूष्माण्ड आदि फलों की मज्जा, वंशांकुर कदली के
मूल एवं फल से क्षीरिका का निर्माण किया जा सकता है॥७-१०॥
अथ दधिवष्कयिण्याः निर्माणविधिर्गुणाश्च
बहुब्रध्नास्तु गोः क्षीरं महिषं वा विपाचितम्।
सुशीतं स्थापितं पात्रे नवीने तक्रसंस्कृतम्॥११॥
शङ्खानुकारि तच्छुभ्रं चन्द्रवत्सरं दधि।
इष्टं तन्मकराधारैः? स्फोटितं परिवेषितम्॥१२॥
दधि निर्माण
दधिवष्कयिण्या
गो-मल (अधिक व्यधि की प्रसका/प्रसूता) अथवा मासिव (भैंस) के क्षीर (दुग्ध)
पक्व करके शीतल करें, फिर तक्र संस्कृत (मट्ठे का अंश डालकर या जावन देकर)
नवीन पात्र में स्थापित करते हैं। इसरीति से (परिणामः) शंखानुकारि-शुभ्र चन्द्रवत्सर
(चन्द्रमा सदृश खेत वर्णीय) दधि (दही) का निर्माण हो जायेगा।
यह दधि मकराधारों द्वारा स्फोटित एवं परिवेधित दधि उत्तम माना गया है- इस
रूप का दधि श्रेष्ठ वाजीकरण गुण सम्पन्न लेता है॥११-१२॥

२३४ क्षेमकुतूहलम्
एकं शशाङ्कधवलं दधिशुक्लनीरं
संक्षिमसैन्धवयुतं सह शृङ्गवेरम्।
प्रभृष्टजीरसुरभीकृतमस्य योगा-
दुद्दीपितो भवति जाठरजातवेदाः॥१३॥
जठरजातवेदा दधि योग
शशांक धवल दधि शुक्ल नीर (चन्द्रमा सदृशा श्वेत दधि जलयुक्त), सैंधव-
आर्द्रक प्रभृष्ट जीरक (भुना जीरा) से सुगन्धित पानक के समान निर्माण (सेवनयोग्य)
करते हैं। इससे नष्टप्रायः पाचकाग्नि पुनः प्रदीप्त हो जाती है॥१३॥
शृतक्षीराच्च यज्जातं गुणवद्दधि तत्स्मृतम्।
वातपित्तहरं रुच्यं धात्वग्निबलवर्धनम्॥१४॥
शृतक्षीरज दधि
१. शृतक्षीर (दुग्ध को पूर्णतया पका कर) से बना दधि (दही) गुणवान् (गुणवद्दधि)
माना गया है।
२. इस कोटिका दधि इन गुणों से युक्त है—
१. वातहर २. पित्तशामक ३. रुच्य रोचक (रुचिजनन)
४. धातुवर्धक ५. अग्नि वर्धक ६. बल्य
अथ गव्यस्य गुणनिरूपणम्
गव्यं दध्युत्तमं बल्यं स्वाद पाके रुचिप्रदम्।
पवित्रं दीपनं हृद्यं पुष्टिकृद्दोषनाशनम्॥१५॥
गव्यदधि
गाय के दुग्ध से बना (जमाया) दधि उत्तम होता है (गव्यं दध्युत्तमं), जिसके गुण
जिसमे विविध गुण होते हैं—
१. बल्य २. स्वादु ३. मधुरपाकी
४. रुचिप्रद ५. पवित्र ६. दीपन
७. हृद्य ८. पुष्टिकृत ९. दोषनाश (त्रिदोषहर)
द्वादशोत्सवः २३५
अथ माहिषस्यगुणनिरूपणम्
माहिषं मधुरं पाके वृष्यं पित्तानिलापहम्।
बलमेदःकरं स्निग्धं सुशीतं कफकृद्दरम्॥१६॥
माहिष दधि
माहिष दधि (भैंस का दही) विविध गुण युक्त है—
१. मधुरपाक २. वृष्य ३. पित्तशामक
४. अनिलापह ५. बल्य ६. मेदाकर
७. स्निग्ध ८. सुशीत ९. कफकृत्
अथाजस्य गुणनिरूपणम्
दध्याजं कफपित्तघ्नं लघु वातक्षयापहम्।
दुर्नामश्वासकासेषु हितमग्नेश्च दीपनम्॥१७॥
अजाज दधि
अजा जन्य दुग्धोत्पादित दधि (बकरी के दूध का दही)— दध्याज इस तरह
गुणवान् होता है—
१. कफघ्न २. पित्तशामक ३. लघु
४. वातजरोग ५. क्षय ६. दुर्नाम (अर्श)
७. श्वासवृद्धि ८. कास ९. दीपन
अथ दघ्नः सामान्यसेवनविधिर्गुणाश्च
दधि नक्तं न सेवेत सेव्यं चैद्वै ससूपकम्।
सक्षौद्रं शर्करोन्मिश्रं सेवेतामलकैर्युतम्॥१८॥
शरद्सन्तयोर्वैद्यैर्निन्दितं प्रायशो दधि।
प्रावृट्शिशिरहेमन्ते संसेव्यं दधि पण्डितैः॥१९॥
दघ्न सामान्य गुण ऋत्वनुसार सेवन
दधि (दही) का समय (काल) के अनुसार (ऋतु आधारित) सेवन करने का
विधान प्रस्तुत किया गया है—
१. रात्रि को दही नहीं खाना चाहिए (दधि नक्तं स सेवेत्)।

पृष्ठ २३६

२३६ क्षेमकुतूहलम्
२. दधि का सेवन (यदि करना है-सं. १) सूपक (दाल के साथ मिलाकर) मिश्रित
भक्षण कर सकते है।
३. दधि को मधु, शर्करा तथा आमलकी के साथ सेवन करते हैं। (अतिरिक्त
प्रयोग)।
४. शरद तथा वसन्त ऋतुओं में दधि का सेवन निषिद्ध है (प्रायः)।
५. वर्षा, शिशिर तथा हेमन्त ऋतुओं में दधिका सेवन पण्डितों के अनुसार उपयुक्त
है (संसेव्य दधि पण्डितैः)।
शाल्योदनेन संयुक्तं सततं माहिषं दधि।
गोष्ठगोपाङ्गनादत्तं प्रत्यहं स्मरणं हरेः ॥ २०॥
शाल्योदन
१. शालिधान्य (जड़हन चावल) का ओदन (भक्त-भात) के साथ गोष्ठ गोपांगना
(गऊशाला की गोपियों) द्वारा प्रदत्त माहिष दुग्ध का निरन्तर सेवन उपयुक्त है-
तथा प्रतिदिन-सदैव हरिस्मरण करना प्रशस्त-मंगलदायक एवं श्रेयस्कर है
(प्रत्यहं स्मरणं हरेः)।
बल्यं दध्योदनं वातपित्तहत्पुष्टिकारकम् ।
सुरुच्यं ग्राहिकं हृद्यं स्थूलत्वमतिकारकम् ॥ २१ ॥
२. दध्योदन गुण- १. बल्य २. वातघ्न
३. पित्तहृत् ४. पुष्टिकारक
५. सुरुच्य ६. ग्राही
७. हृद्य ८. स्थूलमतिकारकम्
अथ शर्करादिसहितदधिगुणाः
सशर्करं दधि श्रेष्ठं तृष्णापित्तास्त्रदाहजित् ।
सगुडं वातनुद्वृष्यं बृंहणं कफदं गुरु ॥ २२ ॥
सुमधुर दधि
सशर्कर दधि (शर्करा मिश्रित दही उत्तम) तृषा, रक्तपित्त एवं दाहशामक है।
बृंहण एवं गुरु होता है॥२२॥


पृष्ठ २३७

द्वादशोत्सवः २३७
अथर्तुविशेषे दध्नः सेवनविधिन्निषेधञ्च
हेमन्ते शिशिरे चापि वर्षासु दधि शस्यते।
शरद्वसन्तीग्रीष्मेषु प्रायशस्तद्विगर्हितम् ॥ २३ ॥
ऋत्वनुसारेण दधि प्रयोग
सेवन प्रशस्त सेवन निषिद्ध (प्रायः)
१. हेमन्त ऋतु १. शरद ऋतु
२. वर्षा ऋतु २. वसन्त ऋतु
३. ग्रीष्म ऋतु
अथ घोल-मठादिनिर्माणविधिर्गुणाश्च
मस्तुना रहितं गाल्यं दधि शुभ्रतरे पटे।
जीरसैन्धवसंमिश्रं घोलं घनतरं स्मृतम् ॥ २४ ॥
घोल
घोल (मठा-मट्ठा) निर्माण की विधि इस प्रकार है- मस्तु (छाली) रहित दधि को
श्वेतवस्त्र (शुभ्रतरे पटे) में रखकर छानते हैं (मस्तुना रहित गाल्यम्); तथा भृष्ट जीरक
(भुना जीरा) तथा सैन्धव लवण का सामिश्रण करते हैं- इससे घनतर घोल (गाढ़ा
घोल) तैयार हो जायेगा॥२४॥
जीरसैन्धवसंयुक्तं घोलं वातस्य नाशनम्।
अतिसारे च मन्दान्नौ हितं रुच्यं बलप्रदम्॥ २५ ॥
घोल के गुण इस प्रकार हैं-
जीरक तथा सैन्धव लवण युक्त दधि घोल वातनाशक, अतिस्वर एवं अतिसार
नाशक तथा मन्दानि में व्याकरण, रुच्य एवं बलप्रद होता है॥२५॥
अथ हिङ्गुवासितघोलकनिर्माणं गुणाश्च
वस्त्रे दृढतरं बद्धं दधि दुग्धेन गालितम्।
हिङ्गुना धूपिते पात्रे स्थापितं सैन्धवान्वितम् ॥ २६ ॥
हिङ्गुवासित घोलक की निर्माण विधि इस प्रकार है-
दुग-दधि को मजबूत वस्त्र में बाँधकर (वस्त्रे दृढतरं बद्धं)। छानते हैं (गालितम्)।
क्षे. कु. 16

फिर हिंगु तथा सैंधव मिश्रित कर- हिंगु से धूपन से सुगन्धित पात्र में स्थापित करना
चाहिए॥२६॥
घोलकं वातहृद्बल्यमर्शोतिसारनाशनम्।
सुरुच्यं पुष्टिदं वृष्यं पक्वशूलविनाशनम्॥२७॥
घोलक के गुण (हिंगु, सुगन्धित) इस प्रकार है-
१. वातहत २. बल्य ३. रुच्य
४. पुष्टिदा ५. वृष्य ६. पक्वशूल (परिणामशूल)
७. अर्श ८. अतिसार ९. अग्निमांद्य
(नाशक- ६-९)
अथ तक्रनिर्माणविधिर्गुणश्च
तुर्यांशेन जलेन संयुतमतिस्थूलं सदम्लं दधि
प्रायो माहिषमंशुकेन विमले मृद्भाजने गालयेत्।
भृष्टं हिङ्गु च जीरकं च लवणं राजीं च किञ्चिन्मितां
पिष्ट्वा तत्र विमिश्रयेद्भवति तत्तक्रं न कस्य प्रियम्॥२८॥
तक्र
क. विधि- अति स्थूल-सदम्ल दधि (तुर्यांशेन जलेन स्युत) माहिष दधि- (भैंस के
दूध की दधि) में चौथाई भाग जल मिश्रित करके, स्वच्छ कपड़े से छान लेते
हैं-मिट्टी के पात्र में रखते हैं (मृद्भाजने गालयेत्)।
२. भृष्ट हिंगु (भुनी हिंगु), जीरक, लवण तथा राजिका (किंचित मात्रा) को पीसकर
(तक्र दधि) में सम्मिलित कर देते हुए। इस प्रकार का संस्कृत तक्र किसको प्रिय
नहीं होता अर्थात् सभी को इस तक्र की आकांक्षा पान हेतु रहती है (तत्तक्रं न
कस्य प्रियम्)।
तक्रं रुचिकरं वह्निदीपनं पाचनं परम्।
उदरे ये गदास्तेषां नाशनं तृप्तिकारकम्॥२९॥
ख. गुण- १. रुचिकर २. वह्निदीपन
३. पाचन (परम्) ४. तृप्तिकारक
५. उदरगद नाशक (उदर रोग हर)


अथ दुग्धसेवनकालनिरूपणम्
विदाहीन्यन्नपानानि यानि भुङ्क्ते हि मानवः।
तद्विदाहप्रशान्त्यर्थं भोजनान्ते पयः पिबेत्॥३०॥
दुग्धस्यापरे गुणा उक्ता एव।
दुग्ध
व्यक्ति (मनुष्य-मानक) जब विदाही अन्न-पान का सेवन करता है, उनसे उत्पन्न
दाह की शान्त (विदाहप्रशान्त्यर्थम्) करने के लिए भोजन कर चुकने के पश्चात्
(भोजनान्ते पयः पिबेत्) दुग्ध को पान करने से लाभ होता है- ऐसा विधान (दाहनाशक)
है। दुग्ध के अन्य/सामान्य गुण पूर्व में वर्णित हैं (दुग्धस्यापरे गुणा उक्ता एव)॥३०॥
अथ पश्चात्परिवेष्याणि
तत्र रसाला-शिखरिणीनिर्माणविधिर्गुणश्च
आदौ माहिषमम्लमम्बुरहितं दध्याढकं शर्करां
शुभ्रां प्रस्थयुगोन्मितां शुचिपटे किंचिच्च किंचित्क्षिपेत्।
दुग्धेनार्धघनेने मृन्मयनवस्थाल्यां दृढं स्थापये-
देलाबीजलवङ्गचन्दमरिचैर्योगैश्च तद्योजयेत्॥३१॥
भीमेन प्रियभोजनेन रचिता नाम्ना रसाला स्वयं
श्रीकृष्णेन पुरा पुनः पुनरियं प्रीत्या समास्वादिता।
एषा येन वसन्तवर्जितदिने संसेविता नित्यश-
स्तस्य स्यादतिवीर्यवृद्धिरनिशं सर्वेन्द्रियाणां बलम्॥३२॥
रसाला-शिखिरिकी (शिखरिणी)
क. १. विधि- सर्वप्रथम जलरहित (अम्बु रहित) माहिष अम्ल दधि (एक आढक चार
कि.ग्रा.) तथा (शुभ्रा) श्वेत शर्करा (एक प्रस्थ एक कि.ग्रा.)- इन दोनों द्रव्यों को
सम्मिश्रित करते हैं इसको श्वेत वस्त्र में थोड़ा-थोड़ा छोड़ते जायें (शुचि पटे
किंचित्क्ष किंचित्क्षिपेत्)। इसमें आधा दूध (पक्व रहने पर) के साथ छान लेते
हैं- इसको मृत्तिका पात्र में स्थापित कर देते हैं।
२. फिर, एला, लवणं, कर्पूर मरिच तथा अन्य उपयुक्त (सुगन्धित-सुरुचि) वस्तुओं
का चूर्ण रूप में मिश्रण कर देते हैं।

' has an upper circle/loop with a top line cut, then a stroke down, a lower loop, and a vertical bar.
Now look at this word in line 16:
The first character has: a loop at the top? No, it's a loop of 'व' connected to 'य'!
Wait, does it have an upper loop?
Wait, look at "व्यक्तियों" in line 18:
Let's compare the word in line 16 with "व्यक्तियों" in line 18!
In line 18: "पीड़ित व्यक्तियों का शरीर..." -> the word is "व्यक्तियों". It starts with 'व्य'.
In line 16: it has the EXACT same first conjunct: 'व्य'!
Wait, why did I think 'भ'? Because the half-'व' in this font has a small loop, then joins 'य'.
Then the next part is 'क्त्ति' (क+त conjunct with i-matra).
So it is definitely "व्यक्ति"!
"जो व्यक्ति मदोन्मत्त स्त्री के साथ संयोग करने से मानसिक"
Ah, wonderful! It is "व्यक्ति", which makes 100% sense!

Now check line 17:
"रूप से स्विन्न हो गये हैं (प्रमत्त नितासु रतातिखिन्नाः), तथा जिन मनुष्यों का"
Wait, is it "स्विन्न" or "खिन्न"?
Look at line 17:
"रूप से स्विन्न हो गये

पृष्ठ २४२

२४२ क्षेमकुतूहलम्
शशिरंखा (शिखरिणी)
क. विधि- शुभ्र शर्करा युक्त भक्त में भृत दुग्ध को छान होते हैं। यह शशिरंखा
शिखरिणी बन जाती है।
ख. गुण- १. हिमा २. बाल्या
३. रुच्या ४. पुष्टिदा
५. वातहरा ६. श्रेष्ठा
७. पित्तशामक ८. महादाहविनाशिनी
अथाम्ररसाकृतिनिर्माणविधिर्गुणाश्च
शशिरंखा हिमा बाल्या रुच्या पुष्टिप्रदायिनी।
वातपित्तहरा श्रेष्ठा महादाहविनाशिनी ॥ ४० ॥
किञ्चित्कुङ्कुमसंमिश्रं विमस्तु दधि गालितम्।
सशर्करं भवेत्पीता पक्वाम्ररससन्निभा ॥ ४१ ॥
आम्ररसाकृति शिखरिणी
क. विधि- मस्तु रहित दधि को वस्त्र से गलित करते (छानकर) हैं, फिर किञ्चित्
कुंकुम (केशर) मिश्रित कर देते हैं, तथा (बाद में) शर्करा, मिला देते हैं, इससे
पक्वाग्र समान (पके आम के रस के समान पीले रंग (भवेत्पीता) की शिखरिणी
बन जाती है।
ख. गुण- १. लघु २. वर्णवती
३. हिमा ४. सुरुच्या
५. मधुरा ६. बाल्या
७. वातघ्न ८. पित्तहर
९. परम : (७-८)
पीता शिखरिणी या सा लघ्वी वर्णवती हिमा।
सुरुच्या मधुरा बाल्या वातपित्तहरा परा ॥ ४२ ॥


पृष्ठ २४३

द्वादशोत्सवः २४३
अथ रसालानिर्माणविधिर्गुणाश्च
ससितं दधि मध्वाज्यमरिचैलादिसंस्कृतम्।
मथितं कान्तकामिन्या कर्पूरपरिवासितम् ॥ ४३ ॥
रसाला शुक्रला बाल्या रोचिनी वातपित्तहा।
स्निग्धाऽऽतपप्रतिश्यायं विशेषेण विनाशयेत् ॥ ४४ ॥
रसाला
क. विधि- सिता सहित दधि, मधु, घृत, मरिच तथा एला (दोनों चूर्ण) मिश्रित
कर, कान्तकामिनी (पति से प्रेम / उत्कृष्ट अभिलाषिणी) स्त्री के द्वारा मथित तथा
कर्पूर मिलित पदार्थ से (सुगन्धित) को 'रसाला' कहा जाता है।
ख. गुण- १. शुक्रला २. बाल्या
३. रोचिनी ४. वातनाशक
५. पित्तहा ६. स्निग्धा
७. आतपहारीणी ८. प्रतिश्याम विनाशक
रसाला शिखरिण्युक्ता मर्जिंका मार्जिका बुधैः।
कथ्यन्ते बहुनामानि गुणास्तस्या हि योगतः ॥ ४५ ॥
रसाला-शिखरिणी नामावली
पाक विद्या एवं शास्त्र के शताओं (पण्डितों) ने इस भोज्य पदार्थ का विभिन्न
नामकरण किया है, यथा-
१. रसाला २. शिखरिणी गुण द्रव्यों के संयोग
३. मर्जिंका ४. मार्जिका (घटक द्रव्यों के अनुसार)
५. अन्य नाम
मोचाफल रसाला
निर्नीरं मथितं धनेन सहितं संभावितं शर्करा-
धूलीभिर्मरिचोद्भवेन रजसा व्यालोडितं किञ्चन।
जातीचम्पककेतकीसुरभितं मृत्पात्रमध्यस्थितं
जिह्वायां विदधात्युपक्रममिदं मोचाफलैश्चापलम् ॥ ४६ ॥

२४४ क्षेमकुतूहलम्
रसालां रसवद्द्रव्यं मधुरं पित्तनाशनम्।
सुहृद्यं कफकृत्स्तोकं किञ्चिद्विष्टम्भकारकम्॥४७॥
मोचाफल रसाला
क. विधि- निर्नीर (जलरहित) दधि के साथ मोचाफल मथित कर, शर्करा मिलाकर,
मरिच चूर्ण लाती तथा केतकी पुष्प सुगन्धित मृत् भाजन में स्थापित करें। इसका
नाम 'मोचाफल रसाला' है।
यह विशिष्ट रसाला उपक्रम (भोज्य प्रस्तुति) का नाम 'मोचाफल रसाला' है।
ख. गुण- १. बल्य २. मधुर
३. पित्तनाशन ४. सुहृद्य
५. कफकृत् (स्तोक) ६. किंचितविष्टम्भकारकम्
अथ खार्बुजेयं रसालनिर्माणं गुणाश्च
मधुरदधिनो मध्ये शर्करां सन्नियोज्य
शुभविदलितखण्डं प्रक्षिपेत्खार्बुजेयम्।
करविलुलितमानैर्वासितं चातिगन्धै-
र्जिगमिषुजठराग्नि स्थापयत्येव नूनम्॥४८॥
रसालं खार्बुजस्येदं विष्टम्भि रुचिकारकम्।
हृद्यं च कफदं बल्यं पित्तघ्नं मूत्रकृद्धरम्॥४९॥
खार्बुजेय रसाला
क. विधि- मधुर दधि-शर्करा मिश्रित-में खर्बूज खण्ड (खरबूजे के छोटे टुकड़े)
डालकर, हस्त-मर्दन करें तथा सुगन्धित द्रव्यों से सुवासित करते है। इसका नाम
'खार्बुजेय रसाला' है।
यह भृष्ट जाठराग्नि को पुनस्थापित कर देती है।
ख. गुण- १. विष्टम्भि २. रुचिकारक
३. हृद्य ४. कफजनन
५. बल्य ६. पित्तघ्न
७. मूत्रकृत् (उत्तम मशाल) ८. अग्निजनन
द्वादशोत्सवः २४५
अथाम्ररसालानिर्माणं गुणाश्च
सखण्डं खार्बुजं खण्डं चन्द्रार्द्रकविमण्डितम्।
पक्वाम्ररससंयुक्तमत्याराधितवान् रविम्॥५०॥
पक्वाम्ररसखण्डाभ्यां संस्कृतं खार्बुजं दलम्।
वातपित्तहरं सर्वरसालेषूत्तमोत्तमम्॥५१॥
आम्र रसाला
क. विधि- सखण्ड खर्बूज (दल) खण्ड को कर्पूर तथा आर्द्रक से आवृत्त करें तथा
पक्वाम्र रस क्षेपण करते हैं, सूर्यातप में शुष्क करती हैं। इस तरह 'आम्ररसाला'
बन जाती है।
ख. गुण- १. वातघ्न
२. पित्तशामक
३. सर्वोत्तम रसाला (सर्वरसालेषूत्तमोत्तमम्)
अथ पानकानि
अथापक्वाम्रफलपानकनिर्माणविधिर्गुणाश्च
आमाम्रं परिसिन्नं मर्दितं मुष्टिना दृढम्।
पयसाऽर्धयुते तोये शर्करामरिचान्विते॥५२॥
अपक्वाम्ररसोद्भूतं पानकं वातनाशनम्।
कफपित्तकरं किञ्चित् प्रत्यहं यदि सेवितम्॥५३॥
पानक
अपक्वाम्रफल पानक
क. विधि- आम (कच्चे) आम्रफल को परिसिन्न (उबाल) करके, दृष्टि मुष्टि
(मजबूत हाथों की मुट्ठी) से मर्दन करते हैं, फिर इसमें अर्ध दुग्ध मिश्रित
जल में शर्करा एवं मरिच मिला देते हैं। यह 'आम्रफल' पानक तैयार हो
गया।
ख. गुण- १. वातनाशक
२. कफ ] (किंचित वर्धक-प्रत्यहं यदि सेवितम्
३. पित्त ] नित्य या अधिक सेवन करने पर)

२४६ | क्षेमकुतूहलम्
अथ सुपक्वआम्रफलपानकनिर्माणविधिर्गुणाश्च
सुपक्वमाम्रस्य फलं सुमुष्टिना
संमर्दितं शर्करया समन्वितम्।
एलालवङ्गार्द्रकवासवासितं
वर्णान्वितं कस्यन रोचकप्रदम्॥५४॥
पानकं त्वाभ्रसंभूतं स्वाद्वम्लं गुरु पित्तजित्।
सुहृद्यं श्लेष्मकृद्वल्यं वर्ण्यंवृष्यं रुचिप्रदम्॥५५॥
सुपक्वआम्रफल पानक
क. विधि- सुपक्व आम्र फल (भलीभाँति/ पूरे तरह पके) को अपनी मुट्ठी
(स्वमुष्टित्वा) मर्दन करके, शर्करा का मिश्रण करें, एला, लवंग तथा आर्द्रक की
सुगन्ध से सुवासित करें।
इस रीति से वर्णयुक्त पानक किसको रुचिकारक नहीं होता- यह पानक
सर्वप्रिय-स्वाद जनक होता है।
ख. गुण- १. स्वादु २. अम्ल
३. गुरु ४. पित्तजित्
५. सुहृद्य ६. श्लेष्मकृत
७. बल्य ८. वर्ण्य
९. वृष्य १०. रुचिप्रद
अथाम्लिकाफलपानकनिर्माणविधिर्गुणाश्च
अम्लिकायाः फलं पक्वं मर्दितं वारिणा दृढम्।
शर्करामरिचोन्मिश्रं लवङ्गेनाधिवासितम्॥५६॥
अम्लिका फल पानक- १
चिंचा (अम्लिका) के पूर्णपक्व फलों का जल में डालकर मर्दन करके, शर्कर
एवं मरिच चूर्ण- साथ ही लवंग चूर्ण सुगन्धित बनाने हेतु-मिश्रित कर देते हैं। इसे
'अम्लिका पानक' कहते हैं।
चान्त्रेयं शर्करायुक्तं कर्पूरोदकमर्दितम्।
फलमार्द्रकसंयुक्तं प्राह तत्पानकान्तरम्॥५७॥


द्वादशोत्सवः २४७
अम्लिका फल पानक- २
अम्लिका फल को जल में मर्दन करके, शर्करा तथा कर्पूर मिश्रित कर, आर्द्रक
स्वरस जल देते हैं।
अम्लिकाफलसंभूतं पानकं वातनाशनम्।
कफपित्तकरं किञ्चित्सुरुच्यं वह्निबोधकम्॥५८॥
ख. गुण- १. वातनाशक २. किंचित् कफ कारक
३. किंचित् पित्त जनक ४. रुचिकारक
५. वह्निबोधक (अग्नि तीव्र कर)
अथ जम्बूफलपानकनिर्माणविधिर्गुणाश्च
जम्बूफलं त्वस्थिविवर्जितं हि
सुमर्दितं शर्करयाऽम्बुनाऽलम्।
सुवासितं वल्लिजभृङ्गपत्रै
रुचिं विधत्ते विरुचौ जनानाम्॥५९॥
जम्बूफलभवं रुच्यं पानकं कफनाशनम्।
कषायं वातकृत्स्तोकं स्वाद्वम्लं ग्राहिकं वरम्॥६०॥
जम्बूफल पानक
क. विधि- जम्बूफल (अस्थि रहित) को जल में मर्दन करके, शर्करा मिश्रित कर
दें, फिर मरिच, भृंग (त्वक-दालचीनी) तथा पत्र (तेजपत्र) का चूर्ण डालकर
सुगन्धित करें। यह 'जम्बूफलपानक' निर्माण हो गया है।
यह पानक (जम्बूफल पानक) व्यक्तियों की अरुचि विकार को नष्ट करके, रुचि
उत्पन्न कर देता है।
ख. गुण- १. रुच्य २. कफनाशन
३. कषाय ४. किंचित् वातनाशक
५. स्वादु ६. अम्ल
७. ग्राही (वरम्)
अथ बीजपूरपाननिर्माणविधिर्गुणाश्च
मातुलुङ्गरसे योज्यं त्रिगुणं शार्करं जलम्।
कर्पूरमरिचोन्मिश्रं पानकं स्यादिदं वरम्॥६१॥

मातुलुङ्गभवं पानं शूलाजीर्णविनाशनम्।
श्वासकासारुचौ वातविड़बन्धेषु च पूजितम्॥ ६२॥
बीजपूर पानक
क. विधि- बीजर (बीजौरा-विजौरा नीबू) या मातुलय के स्वरस में उससे त्रिगुण
जल में शर्करा (मात्रपूर्वक) मिला दें इसे कर्पूर तथा मरिच चूर्ण से सुगन्धित करें।
ख. गुण- १. शूल २. अजीर्ण
३. श्वासवृद्धि ४. कास
५. अरुचि ६. वातवरोध
७. मलावरोध (नाशक-१-७)
अथ हेमकिरणपानकनिर्माणविधिर्गुणाश्च
शर्करा नालिकेरं च बीजपूररसप्लुतम्।
पटपूतं भवेद्धमकिरणं नाम पानकम्॥ ६३॥
पानकं हेमकिरणं रुच्यं वृष्यं बलप्रदम्।
सुस्निग्धं वातहच्छुभ्रं किञ्चित्कफकरं गुरु॥ ६४॥
क. विधि- शर्करा, नालिकेर जल तथा बीजपूर स्वरस मिश्रण को, पटपूत करके
(वस्त्र से छानकर) रखते हैं। इसको 'हेम किरण पानक' संज्ञा दी जाती है।
ख. गुण- १. रुच्य २. वृष्य
३. बल्य ४. स्निग्ध
५. वातनाशक ६. शुभ्र
७. किंचित् कफवर्धक ८. गुरु (गरिष्ठ)
अथ निम्बूफलपानकनिर्माणविधिर्गुणाश्च
भागैकं निम्बुजं तोयं षड्भागं शर्कराेदकम्।
लवङ्गमरिचोन्मिश्रं पानकं पानकोत्तमम्॥ ६५॥
निम्बूफलभवं पानमत्यम्लं वातनाशनम्।
हृद्यं रुचिकरं भव्यं सर्वाहारस्य पाचकम्॥ ६६॥
निम्बूफलपानक
क. विधि- निम्बुज (नीबू का रस) एक भाग, शर्करा मिश्रित जल-छह भाग मिश्रित
कर, लवंग एवं मरिच चूर्ण डालें।
यह उत्तम पानक (पानकोत्तमम्) बन जाता है।
ख. गुण- १. अत्यधिक अम्ल २. वातनाशक
३. हृद्य ४. रुचिकर
५. भव्य (श्रेष्ठ) ६. सर्वाहार पाचक
अथ कारमर्दकनिर्माणविधिर्गुणाश्च
लवङ्गार्द्रकसंयुक्तं सुपिष्टं वारिणा युतम्।
कारमर्दं करैमर्द समभागसितान्वितम्॥ ६७॥
वातहृद्रुचिदं बल्यं हृद्यमम्लतरं स्मृतम्।
रक्तपित्तकरं चोक्तमकण्ठ्यं कारमर्दकम्॥ ६८॥
कारमर्द पानक
क. विधि- करमर्द (करौंदे-करवन) फलों को जल में सुपिष्ट भलीभाँति पीसकर,
लवंग एवं आर्द्रक के साथ समभाग सिता (शर्करा) कर-मिश्रित तथा गालित
कर (छान) लेते हैं। यह 'करमर्दपानक' प्रस्तुत है।
ख. गुण- १. वातहृत् २. रुचिद
३. बल्य ४. हृद्य
५. अम्लतर ६. समपित्तकर
७. अकण्ठ्य ८. कण्ठ (गल अहितक)
९. आम-पक्व (मधुराम्ल) फलोपयोगी
अथ नारङ्गफलपानकनिर्माणविधिर्गुणाश्च
सुपक्वनारङ्गफलं सुपीड़ितं
संयोजितं शर्करयाऽतिशुभ्रया।
सदार्द्रकं चेन्दुकणेन वासितं
महीतलेकेन न संस्तुतं क्षणम्॥ ६९॥
नारङ्गफलसम्भूतं पानकं वातनाशनम्।
मधुरं विशदं रुच्यं सुस्निग्धं पित्तहृद्गरम्॥ ७०॥
नारङ्गफल पानक
क. विधि- सुपक्व नारंग (नारंगी) फलों को सुपीडितकर (स्वरस निकालने हेतु),

at that first word:
Wait, the first letter has a loop... wait, no, look at:
ह्र or ह्य?
It is ह्य! The loop of य is at the bottom right of ह.
Then above it, is there an e-matra? Yes, an e-matra slanting to the left.
Wait, what is that vertical line?
Wait, there is NO vertical line next to ह!
Wait, look at the next letter: it is 'त'!
Then next: 'त्' joined to 'पा'!
Wait, why does 'त्पा' look like that?
Because 'त्' is on the left, and 'पा' has a vertical stem!
Wait, that vertical stem of 'पा' is what I might have thought was something else!
Wait, let's re-read:
ह्ये - त - त् - पा - न - क... wait!
Is there a त before त्पा?
Wait, if there's a त, and then त्पा, that would be "ह्येतत्पानक"!
Yes! ह्ये - त - त् - पा - न - क = ह्येतत्पानक!
Wait, in Hindi/Sanskrit typing, "ह्येतत्पानक":
ह्येतत् (ह्ये + त + त्) + पानक (पा + न + क) = ह्येतत्पानक!
Yes, exactly! ह्येतत्पानक!
Wait, is

:
भृष्ट (2) जी (1) र (1) यु (1) तं (1) चा (1) थ (1) = 8 syllables!
In the print:
Look at line 32:
"भृष्टजीर्युतं" -> wait, look at the letter between 'जी' and 'यु':
Wait, is that 'र'?
Look at 'जी': it has 'ी' matra.
Then next is 'र्यु'? There is a repha over 'यु'! So it is printed as "भृष्टजीर्युतं".

Let's check line 35:
"तक्रं वातहरं रुच्यं शूलाध्मानार्शसां हितम्।"
Line 36:
"अग्निसंजननं श्रेष्ठं कफपित्तनिबर्हणम्॥८२॥"

Line 43:
"चूर्णान्वितं च तत्तक्रं धूयेद्धृतहिङ्गुना ॥८३॥"
Line 44:
"पार्वत्या विहितं तक्रं सर्वदोषनिबर्हणम्।"
Line 45:
"सुरुच्यं पाचनं दिव्यं महेशाय महाप्रियम् ॥८४॥"

Line 54:
"वातेऽम्लं सैन्धवोपेतं स्वादु पित्ते सशर्करम्।"
Line 55:
"पिबेतक्रं कफे चापि व्योषक्षारसन्व

२५४ क्षेमकुतूहलम्
२. पित्तजन्य रोग : शर्करा युक्त मधुर तक्र
३. कफजन्य रोग : त्रिकटु युक्त क्षारीय तक्र
तक्रप्रशस्तिः
अमरत्वं यथा स्वर्गे देवानांममृताद्भवेत्।
तक्राद्भूभौ तथा नृणाममरत्वं हि जायते॥८६॥
तक्र (प्रशस्ति) प्रशंसात्मक महत्ता
जैसे देव गुणों को स्वर्ग में अमृत सेवन से अरत्व प्राप्त होता है (अमरत्वं यथा
स्वर्गे देवानांममृताद्भवेत्) उसी प्रकार पृथ्वी पर निवासी मनुष्यों को तक्र से हो अमरत्व
की प्राप्ति होती है (तक्राद्भूभौ तथा नृणाममरत्वं हि जायते)॥८६॥
तस्मात्तक्रं नरैः सेव्यं सर्वदोषनिबर्हणम्।
क्षयं मूर्च्छा भ्रमं दाहं रक्तपित्तामयं विना॥८७॥
तक्र के गुण-कर्मादि इस प्रकार है—
१. क्षयरोग २. मूर्च्छा ३. भ्रम
४. दाह ५. रक्तपित्त (रोग-निषिद्ध)
इनके अतिरिक्त (१-५ रोगों से पीड़ित), प्रायः समस्तविकारों में तक्र सेवन
उपयुक्त है (तस्मात्तक्रं नरैः सेव्यं) जो सर्वदोषनिबर्हण (सर्वव्याधिहर) होता है॥८७॥
अथ अच्छिकानिर्माणविधि
गतचिरवासरतक्रं वस्त्रेणागालितं ससैन्धवक्षोदम्।
रुचिकरधूपप्रधूमैर्धूपितमरिचेण रोचनं भवति॥८८॥
अच्छिका
तक्र-दो तीन दिन का पर्युषित (वासी)- वस्त्रेण गालित (कपड़े से छानकर) में
सैंधव सम्मिश्रण तथा रुचिकारक धूपन द्रव्यों से प्रधूमित-सुगन्धित कर लेते हैं।
यह 'अच्छिका' आशुरूप से रोचन प्रभाव करती हैं। (रुचिवर्द्धक)॥८८॥
अथ काञ्जिकनिर्माणविधिः
धान्याम्लमच्छतरयामुनवारिहारि
शुण्ठीरजोलवणजीरकसंस्कृतं यत्।
द्वादशोत्सवः २५५
आवासितं सुरभिहिङ्कणेन यत्ना-
त्तेनाशुशुक्षणकणोऽधिकतां प्रयाति॥८९॥
काञ्जिक
यमुना जल आच्छतर (शुद्धहर/सदृश) में शुण्ठी-लवण-जीरक चूर्ण में सुगन्धित
हिंगु के प्रयोग से, धान्याम्ल (काञ्जी) का निर्माण करते हैं, जो (शीघ्र/अष्ट) गुणवान
अधिक रूप से हो जाता है। यह अमिश्रित द्रव प्रस्तुत है।
काञ्जिक निर्माण विधि
स्वच्छ मृत्तिका घट-सर्षप तैल आलेपित (अन्तरंग), शुद्ध जल परिपूर्ण करके,
राजिका, जीरक, लवण, हिंगु, शुण्ठी तथा हरिद्राचूर्ण क्षेपण कर, घट मुख अतिबद्ध-
दिवस त्रय पर्यन्त-रखते हैं, अन्त में द्रव को पृथक् (उपयुक्त पात्र-बोतल आदि)
संरक्षित कर लेते हैं॥८९॥
करमर्दककाञ्जिकनिर्माणविधिर्गुणांश्च
एलामहौषधिविभावितमाणिमन्थ-
संसिद्धमामकरमर्दककाञ्जिकं यत्।
मन्दं विवर्धयति जाठरकाग्निहोत्रं
निर्वाणदीपमिव गन्धकचूर्णयोगः॥९०॥
करमर्दककाञ्जिक
क. विधि- आम (अपक्व) करमर्दक, के साथ एला, शुण्ठी, सैंधव का सम्मिश्रण
करके कांजिक निर्माण करते हैं। यह जाठराग्नि मन्द होने पर, उसका विवर्धन
करता है, जैसे अग्निहोम के अवसर (प्रक्रिया) में निर्वाणदोष को गंधक चूर्ण का
संयोग (अग्नि को) प्रज्वलित करता है॥९०॥
यः काञ्जिकं पिबति योजितसैन्धवं च
निष्पीडिताईकरसाश्रितजीरकं च।
तस्याग्निरोदनघृतेन शमं न याति
प्रस्फारितैर्वडववारिधिवारिपूरैः॥९१॥
ख. गुण-प्रयोग- सैन्धव युक्त आर्द्रक स्वरस (निष्पीहीत)- जीरक सहित-कांजी
का सेवन (पान) करने से, भक्त (चावल का भात) तथा घृत के सेवन से मन्द

२५६ क्षेमकुतूहलम्
(शान्त) पाचकाग्नि, मन्दता को प्राप्त नहीं होती, जिस प्रकार वडवानल, प्रस्फुरित
जल प्रवाह के कारण शान्त (शमन) नहीं हो पाता।
काञ्जिकं रुचिदं हृद्यं स्वस्थस्याग्निकरं परम्।
वातहृद्बलदं श्रेष्ठं गुर्वाहारस्य पाचकम्॥ ९२॥
कांजिक रुचिकर या रुचिकारक, हृदय को बल देने वालों (हृद्य), स्वस्थ व्यक्ति
की पाचकाग्नि को परम अग्निकर बनाती है॥९२॥
अथ गव्यवासाधिकस्य निर्माणविधिः
उदकरसनिवृत्तंगोमयाग्नौ विपक्वं
नवदलघनसारैर्वासितं बष्कयिण्याः।
पटमिलितसुखण्डं स्थापितं नव्यपात्रे
विगतरससुधांशो गीयते वासधिक्यः॥ ९३॥
गव्य वासाधिक
गोदुग्ध (बरकमिण्या-एक वर्ष की प्रसूता गौ से प्राप्त) को गोमयाग्नि पर
उदकरस निवृत्त (जल जल जाने तक) दुग्ध में, नवीन बल कर्पूर से सुगन्धित
नवमृत्तिकापात्र में स्थापित करें तथा वस्त्रमलित (कपड़े से छान) कर, सुखण्ड (शर्करा)
का मिश्रण करते हैं।
इस रीति से निर्मित 'गव्य वासधिक रस' अमृत का अंश माना जाता है (विगत)
ससुधांशोगीर्यते वासधिक्यः)॥९३॥
अथ महिषीदुग्धजवासाधिकानिर्माणविधिर्गुणाश्च
क्षीरं माहिषसंभवं घनतरं संपाचितं वह्निना
कारीषेण सुवासितं धुसृणकैः संस्थापितं मृन्मये।
पात्रे नव्यतरे सुधूपविहिते भुञ्जन्ति ते मानवा
यैराराधि सितासितोदकरतैर्माघे सदा माधवः॥ ९४॥
वासाधिका सुमधुरा वृष्या मेदःप्रदा गुरुः।
सुस्निग्धा बृंहणी बल्या सुशीता तृप्तिकारिणी॥ ९५॥
महिषीदुग्धजवासाधिक
क. विधि- महिषी दुग्ध (भैंस के दूध) को करीषाग्नि (उपलों की आग पर) घनतर
द्वादशोत्सवः २५७
(गाढ़ा) करके, कर्पूर से सुगन्धित करते हैं, फिर हींग (धुसृण) आदि से सुगन्धित
नवीन मृत्पात्र में रखकर, वासाधिक का निर्माण कर लेते हैं।
इस रीति से प्रस्तुत वासाधिक की व्यक्ति द्वारा सेवन करने से, माघ मास में (गंगा-
यमुना जल में स्नान करके) माधव (भगवान श्रीकृष्ण) की आराधना रत होते हैं।
ख. गुण- १. सुमधुर २. वृष्य
३. मेदःप्रदा ४. गुरुः
५. सुस्निग्ध ६. बृंहिणी
७. बल्या ८. सुशीता
९. तृप्तिकारिणी
अथ करम्भकस्य निर्माणविधिर्गुणाश्च
सुशीतं क्रियते भक्तं दध्याढ्यं दुग्धकावधि।
नातिद्रवं नातिसान्द्रं मिश्रितं तत्करम्भकम्॥ ९६॥
करम्भसंज्ञा ये भक्ष्या हृद्याः शीतातिपुष्टिदाः।
अत्यर्थं मनुजैः सेव्याः शरत्कालनिदाघयोः॥ ९७॥
करम्भक
क. विधि- दध्याढ्य दुग्ध (दूध का दही बनना) में भक्त (चावल का भात) भिक्षेपण
करके, न अधिक सान्द्र (गाढ़ा)- न अधिक द्रव (पतला) पदार्थ बना लेते हैं-
इसको 'करम्भक' कहा जाता है (अर्थात् यह दधिमिश्रित भक्त का स्वरूप है)।
ख. गुण- १. हृद्य २. शीत
३. अतिपुष्टिदा ४. शरद्
५. ग्रीष्म
करम्भसंज्ञक पदार्थों के सामान्य गुण-कर्म इस प्रकार हैं- इस प्रकार ऋतुओं में
अधिक सेवन योग्य मनुष्यों द्वारा (सत्तू दधि मिश्रण की संज्ञा भी करम्भक)।
अथ भोजनान्ते शुद्धदुग्धसेवनविधानम्
गव्यं वा माहिषं क्षीर कारिषानलपाचितम्।
शोषितं षड्विभागेन कदुष्णं प्राशितं बुधैः॥ ९८॥

१५८ क्षेमकुतूहलम्
भोजनान्तर दुग्ध प्रयोग
गौदुग्ध या माहिष दुग्ध-करीषाग्नि (उपलों की आग) पर पक्व तथा षड्भाग
शोषित, कदुष्ण या सुखोष्ण, भोजन करने के पश्चात् (अन्त में) विज्ञ (बुद्धिमान)
मनुष्य को दुग्ध सेवन (पान) करना चाहिए।।९८।।
बहुधा पटसम्पूतं नव्ये पात्रे सुपाचितम्।
सनागरमजादुग्धं सुसिद्धारुणवर्णकम् ।। ९९ ।।
अजादुग्ध सेवन
पटसंपूत (वस्त्र से छानकर), नव्य मृत्तिकापात्र में अजादुग्ध (बकरी के दूध) में
शुण्ठी मिश्रित कर पाकोपरन्त अरुण वर्णीय हो जाने पर- सुखोष्ण पान करना चाहिए।
गव्यं सुशीतलं क्षीरं स्निग्धं गुरु रसायनम्।
अल्पाभिष्यन्दकृद्रक्तपित्तघ्नं वातनाशनम् ।। १०० ।।
१. सुशीतल २. स्निग्ध ३. गुरु
४. रसायन ५. अल्पाभिष्यन्दी ६. समपित्तनाशक
७. वातनाशक
महिषदुग्धस्य गुणाः
माहिषं मधुरं स्निग्धं सुशीतं बृंहणं गुरु।
निद्राकरं मतिहरं स्तोकमग्निप्रबोधकम् ।। १०१ ।।
माहिष दुग्ध
गुण-
१. मधुर २. स्निग्ध ३. अतिशीतल
४. बृंहण ५. गुरु ६. निद्राकर
७. मतिहर ८. अग्नि प्रबोधक (स्तोक)
अथ दुग्धस्य गुणाः
आजं लघुतरं क्षीरं कासश्वासनिबर्हणम्।
दीपनं शोषिणां पथ्यं गव्यदुग्धगुणावहम् ।। १०२ ।।
द्वादशोत्सवः २५९
आजदुग्ध
गुणा-
१. लघुतर २. कास ३. श्वास
४. क्षय (नाशक २-४) ५. दीपन ६. शोष रोगियों को पथ्य
७. गव्य दुग्ध समान गुणवान्
कालक्रमेण वयःक्रमेण च पीतदुग्धस्य गुणाः
वृष्यं बृंहणमग्निदीपनकरं पूर्वाह्नकाले पयो
मध्याह्ने बलवर्धनं कफहरं पित्तापहं दीपनम्।
बाले वृद्धिकरं क्षये क्षयहरं वृद्धेषु रेतोवहं
रात्रौ पथ्यमनेकदोषशमनं क्षीरं सदा चाक्षुषम् ।। १०३ ।।
काल-आयु क्रमानुसार दुग्ध सेवन
अ. प्रातःकाल : बल्य, बृंहण, वृष्य
आ. पूर्वाह्ण : बल्य, कफ-पित्तनाशक, दीपन
इ. बाल्यावस्था : देह वृद्धिकर
ई. क्षीणावस्था : क्षयहर
उ. वृद्धावस्था : वीर्यवर्धक
ऊ. रात्रिकाल : पथ्य (सदैव), अनिक दोषशमन, चक्षुष्य
अथ खाण्डवनिर्माणविधिर्गुणाश्च
कोलामलकजं चूर्णं शुण्ठ्येलाशर्करान्वितम्।
मातुलुङ्गरसेनोक्तं शोषितं सूर्यरश्मिभिः ।। १०४ ।।
एवं तु बहुशोऽभ्यक्तं शोषितं च पुनः पुनः।
ईषल्लवणसंयुक्तं चूर्णं खाडवमुच्यते ।। १०५ ।।
खाण्डव
क. विधि- कोल (बदर) तथा आमलक (धात्री) चूर्ण में शुण्ठी-एला (चूर्ण) तथा
शर्करा मिश्रितकर, मातुलुंग (बीजपूर) स्वरस से प्लावित सूर्य रश्मि में शोषित
(मुहुर्मुहु) का चूर्ण सैन्धवयुक्त बनाये। इसको 'खाण्डव' कहा जाता है।

२६० क्षेमकुतूहलम्
ख. गुण- १. मुखवैशद्यकर २. रुचिधारक
३. हृद्रोगशमन ४. मुखवैरस्य नाशन
अथ भुक्तोच्छिष्टान्नदानविधानम्
खाडवं मुखवैशद्यकारकं रुचिधारकम्।
हृद्रोगशमनं चेति मुखवैरस्यनाशनम्॥ १०६॥
मुद्भुक्तोच्छिष्टमन्नं तु भुञ्जन्तु पित्तरोऽधमाः।
तेषामन्नं मया दत्तमक्षय्यमुपतिष्ठतु॥ १०७॥
भुक्तोच्छिष्टान्न विधान
अ. मेरे भोजन (के उपरान्त) अवशिष्ट/ उच्छिष्ट अन्न भाग (अंश) का अधम
पितृगण ग्रहण करें ऐसी धारणापूर्वक विधान है॥१०६-१०७॥
रौरवेऽपुण्यनिलये पद्माम्वुधिनिवासिनाम्।
प्राणिनामुदकं ह्येतदक्षय्यमुपतिष्ठतु॥ १०८॥
आ. शंख संज्ञक अपुण्य स्थान में पद्माम्वुधि में निवासी प्राणियों को अक्षय्य उदक
प्रदान करता हूँ- इसे ग्रहण कीजिए॥१०८॥
अथाचमनोदकपानविधानं गुणाश्च
काले धाराधराणां निपटततितरां व्योम्नि वारिप्रपूर्णे
स्वच्छं त्वम्भोजवृन्दद्युतिमतिसरसि त्वानवीनाच्च कुम्भात्
पूर्णोदानीयमम्भः प्रतिदिनममलं न्यस्तकर्पूरसारं
भुङ्क्ते संसेव्यमानं नृपवरशुचिदं वारि चारोग्यकारि॥ १०९॥
आचमनोदक पान
मेघ कमल समूह (जलपूर्णाकाश) प्रकाशमान् सरास में पतित स्वच्छ जलको नव
घट से प्राप्त- कर्पूर सुगन्धित जल- का पान (सेवन) करते हुए आहार ग्रहण करते
हैं- ऐसा जलपान नृपों को शुचि-पवित्रता तथा आरोग्य प्रदान करता है॥१०९॥
अथेषिकाखण्डकस्य विधानं गण्डूषकरणस्य फलञ्च
दन्तनिष्कोषणं कार्यं रोहिषस्य शलाकया।
ततो गण्डूषकरणमास्योच्छिष्टविशुद्धये॥ ११०॥
द्वादशोत्सवः २६१
इषिका खण्डक विधि
भोजनोपरान्त रोहिण शलाका से दन्त-मध्य को स्वच्छ करें। (दन्त निष्को वर्ण);
फिर उच्छिष्ट मुख की विशुद्धि हेतु गण्डूष धारण करते हैं॥११०॥
अथ जानुस्पर्शनविधानम्
मा करेण करं पार्थ मा गण्डौ मा च चक्षुषी।
जानुनी स्पृश राजेन्द्र भर्तव्या बहवो यदि॥ १११॥
जानुस्पर्शनम्
हे! राजेन्द्र, यदि प्रजा का पालन-पोषण (भर्तव्या बहनो यदि) करने की
अभिलाषा है, तो अपने हाथों (या करेण कर) से हाथ, (हस्त), उभार गण्डस्थल तथा
उभय (दोनों) नेत्रों का स्पर्श नहीं करके, इसके स्थान पर उभय जानु का स्पर्श करना
चाहिए॥१११॥
अथचमनान्ते करमर्दनचन्दनस्य विधानम्
कृष्णागुरुप्रभृतिकैरतिसौरभैश्च
कर्पूरसाररजसाऽऽचमनान्तमुच्चैः।
आराधितत्रिपुरवैरिपदाम्बुजानां
भुक्तावसानकरमर्दन चन्दनं स्यात्॥ ११२॥
करमर्द चन्दनम्
कृष्णागुरु प्रभृति सुगन्धि द्रव्य तथा कर्पूरसार के चन्दन से आचमन करे, उसके
अन्त में त्रिपुरवैरि (भगवान् शंकर) का पूजन (पदाधुजानाम्) करने के उपरान्त,
अयोजन के अन्त में, करमर्दन चन्दन किया जाना चाहिए॥११२॥
अथ भोजनपरिणामार्थश्लोकपाठविधानम्
भोजनान्ते हि सद्भिप्रस्वेतद्वाक्यानि वै पठेत्।
आहारपरिणामार्थमायुर्वृद्धिकराणि च॥ ११३॥
भोजन से परिपाकवार्थ ईश्वर प्रणधान
स्वेत् विप्र (सुब्राह्मण) द्वारा गृहीत आहार का सम्यक् पाचन (परिणाम) के उद्देश्य
से मन्त्र (श्लोक) सत् वाक्यों को भोजनान्त में पाठन (उच्चारण) करना अपेक्षित
है॥११३॥

पृष्ठ २६२

२६२ क्षेमकुतूहलम्
नेत्रशक्तिवर्द्धकोमन्त्रः
शर्यातिं च सुकन्यां च च्यवनं शक्रमश्विनौ।
भोजनान्ते स्मरेद्यस्तु चक्षुस्तस्य न हीयते ॥११४॥
चक्षुष्यमन्त्र
शर्याति, सुकन्या, च्यवन, इन्द्र, अश्विनौ, (उभयकुमार) को स्मरण करने से नेत्र
(दृष्टि) शक्ति वृद्धि होती है॥११४॥
भोजनस्य परिपाकाय मन्त्रः
अगस्त्यं कुम्भकर्णं च शनिं च वडवानलम्।
आहारपरिणामार्थं संस्मरेच्च वृकोदरम् ॥११५॥
भोजन सुपरिपाक विधान
अगस्त्य मुनि, कुम्भकर्ण, (रावणभ्राता) शनैश्चर, बडवानल एवं वृकोदर
(भीम) का आहार का परिणाम (पाचन) हेतु भोजन के अन्त में स्मरण करना
चाहिए॥११५॥
विष्णुः समस्तेन्द्रियदेहदेही प्रधानभूतो भगवान् यथैकः।
सत्येन तेनान्नमशेषमेतदारोग्यमन्तं परिणाममेतु ॥११६॥
समस्त इन्द्रियाँ शरीर की आत्मा एक ही प्रधानभूत भगवान् विष्णु है- इसे सत्य
(स्मरण करने) के कारण आरोग्य प्राप्ति- निर्व्याधि अवस्था-शरीर को हो सके, तदर्थ
(भगवान विष्णु) का स्मरण किया जाना हितकर है॥११६॥
इत्यादिबहुवाक्यानि भोजनान्तेषु यः पठेत्।
स भवेद्वल्लभो राज्ञां चायुरवाप्नुयात् ॥११७॥
इस प्रकार (पूर्वोक्त) सदवाक्यों- मन्त्रों-स्मरणीय वचनों आदि का जो व्यक्ति
पाठन करता है, वह भोजनार्थी एवं सदोच्चारण के कारण, राजवल्लभ (राजाओं का
प्रिय) हो जाता है, तथा राजा स्वयं दीर्घायुष्य का लाभ प्राप्त करता है (राजा
आयुरवाऽप्नुयात्)॥११७॥
अथ ताम्बूलभक्षणविधानम्
ताम्बूलं स्वर्णवर्णं क्रमुकफलयुतं साग्रमग्र्यं गृहीतं
कर्पूरैणाण्डजाभ्यां कृतखदिरवटीसौरभेणातिपूर्णम्।


पृष्ठ २६३

द्वादशोत्सवः २६३
चूर्णं ग्रावानुजातं शशधरकिरणप्रोज्ज्वलं तेन सार्कं
दत्त्वा विप्राय पूर्वं तदनु नरपतिर्भक्षयेदामदत्तम् ॥११८॥
ताम्बूल भक्षण
स्वर्ण वर्णिय अग्रभाग समान (सहित) ताम्बूल, में पूगखण्ड (क्रमुक), कर्पूर
एवं कस्तूरी मिश्रित सुगन्धित खदिर वटी (कत्था) तथा चन्द्र किरण समान चूर्ण (चूना)
रखकर सर्वप्रथम राजा ब्राह्मण (द्विपु) को प्रदान करे, फिर विश्वस्त व्यक्ति (आप्तदत्तम्)
द्वारा प्राप्त, राजा से स्वयं (नरपतिर्भक्षयेत्) चर्वण (भक्षण) करना चाहिए॥११८॥
अथाजीर्णोपशमनद्रव्याणि
विरुद्धाध्यशनात्यर्थचिन्ताविण्मूत्रधारणात् ।
असात्म्यभोजनाद्द्वेषात्क्रोधात्स्वप्नविपर्ययात् ॥११९॥
इत्यादिकारणैर्जन्तोर्यदा त्वन्नं न पच्यते।
तदाऽन्नपरिपाकार्थमेतद्द्रव्यान्तरं भजेत् ॥१२०॥
पिष्टान्ने सलिलं प्रियालफलजे पथ्या हिता मांसजे
क्षीरे गव्यभवे च तक्रमुचितं मोचाफलं सर्पिषि।
नारङ्गे गुडभक्षणं च कथितं मत्स्योद्भवे काञ्जिकं
गोधूमेऽपि च कर्कटी हितेतरा शेषाणि बुद्ध्या भजेत् ॥१२१॥
अजीर्ण निवारण विधानम्
क. अजीर्ण के हेतु आहार-विहार
१. विरुद्ध भोजन २. अध्यशन ३. अतिचिन्ता
४. असात्म्य भोजन ५. द्वेष ६. क्रोध
७. निद्रा विपर्यय ८. अन्य कारण
ख. अजीर्ण का शमन
१. पिष्टान्न : जल २. मांस : हरीतकी ३. गोदुग्ध : तक्र
४. घृत : कदली ५. नारंग : गुड़ ६. मत्स्य : कर्कटी
अन्य द्रव्यों (आहार-विहार) से उत्पन्न अजीर्ण की स्थिति में (शेषाणि बुद्ध्या
भजेत) स्वबुद्धि/ आवश्यकतानुसार उपयुक्त पाचक द्रव्यों/ उपायों का अनुसरण/
प्रयोग हितकर होता है।