क्षेमकुतूहलम् (क्षेमशर्मा - १६वीं शती का शाही पाकशास्त्र एवं आहार-विज्ञान सटीक)
Kshemakutuhalam of Kshemasharma on Dietetics
क्षेमशर्मा (सम्पादक: चौखम्बा संस्कृत संस्थान) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२५४ क्षेमकुतूहलम्
२. पित्तजन्य रोग : शर्करा युक्त मधुर तक्र
३. कफजन्य रोग : त्रिकटु युक्त क्षारीय तक्र
तक्रप्रशस्तिः
अमरत्वं यथा स्वर्गे देवानांममृताद्भवेत्।
तक्राद्भूभौ तथा नृणाममरत्वं हि जायते॥८६॥
तक्र (प्रशस्ति) प्रशंसात्मक महत्ता
जैसे देव गुणों को स्वर्ग में अमृत सेवन से अरत्व प्राप्त होता है (अमरत्वं यथा
स्वर्गे देवानांममृताद्भवेत्) उसी प्रकार पृथ्वी पर निवासी मनुष्यों को तक्र से हो अमरत्व
की प्राप्ति होती है (तक्राद्भूभौ तथा नृणाममरत्वं हि जायते)॥८६॥
तस्मात्तक्रं नरैः सेव्यं सर्वदोषनिबर्हणम्।
क्षयं मूर्च्छा भ्रमं दाहं रक्तपित्तामयं विना॥८७॥
तक्र के गुण-कर्मादि इस प्रकार है—
१. क्षयरोग २. मूर्च्छा ३. भ्रम
४. दाह ५. रक्तपित्त (रोग-निषिद्ध)
इनके अतिरिक्त (१-५ रोगों से पीड़ित), प्रायः समस्तविकारों में तक्र सेवन
उपयुक्त है (तस्मात्तक्रं नरैः सेव्यं) जो सर्वदोषनिबर्हण (सर्वव्याधिहर) होता है॥८७॥
अथ अच्छिकानिर्माणविधि
गतचिरवासरतक्रं वस्त्रेणागालितं ससैन्धवक्षोदम्।
रुचिकरधूपप्रधूमैर्धूपितमरिचेण रोचनं भवति॥८८॥
अच्छिका
तक्र-दो तीन दिन का पर्युषित (वासी)- वस्त्रेण गालित (कपड़े से छानकर) में
सैंधव सम्मिश्रण तथा रुचिकारक धूपन द्रव्यों से प्रधूमित-सुगन्धित कर लेते हैं।
यह 'अच्छिका' आशुरूप से रोचन प्रभाव करती हैं। (रुचिवर्द्धक)॥८८॥
अथ काञ्जिकनिर्माणविधिः
धान्याम्लमच्छतरयामुनवारिहारि
शुण्ठीरजोलवणजीरकसंस्कृतं यत्।
द्वादशोत्सवः २५५
आवासितं सुरभिहिङ्कणेन यत्ना-
त्तेनाशुशुक्षणकणोऽधिकतां प्रयाति॥८९॥
काञ्जिक
यमुना जल आच्छतर (शुद्धहर/सदृश) में शुण्ठी-लवण-जीरक चूर्ण में सुगन्धित
हिंगु के प्रयोग से, धान्याम्ल (काञ्जी) का निर्माण करते हैं, जो (शीघ्र/अष्ट) गुणवान
अधिक रूप से हो जाता है। यह अमिश्रित द्रव प्रस्तुत है।
काञ्जिक निर्माण विधि
स्वच्छ मृत्तिका घट-सर्षप तैल आलेपित (अन्तरंग), शुद्ध जल परिपूर्ण करके,
राजिका, जीरक, लवण, हिंगु, शुण्ठी तथा हरिद्राचूर्ण क्षेपण कर, घट मुख अतिबद्ध-
दिवस त्रय पर्यन्त-रखते हैं, अन्त में द्रव को पृथक् (उपयुक्त पात्र-बोतल आदि)
संरक्षित कर लेते हैं॥८९॥
करमर्दककाञ्जिकनिर्माणविधिर्गुणांश्च
एलामहौषधिविभावितमाणिमन्थ-
संसिद्धमामकरमर्दककाञ्जिकं यत्।
मन्दं विवर्धयति जाठरकाग्निहोत्रं
निर्वाणदीपमिव गन्धकचूर्णयोगः॥९०॥
करमर्दककाञ्जिक
क. विधि- आम (अपक्व) करमर्दक, के साथ एला, शुण्ठी, सैंधव का सम्मिश्रण
करके कांजिक निर्माण करते हैं। यह जाठराग्नि मन्द होने पर, उसका विवर्धन
करता है, जैसे अग्निहोम के अवसर (प्रक्रिया) में निर्वाणदोष को गंधक चूर्ण का
संयोग (अग्नि को) प्रज्वलित करता है॥९०॥
यः काञ्जिकं पिबति योजितसैन्धवं च
निष्पीडिताईकरसाश्रितजीरकं च।
तस्याग्निरोदनघृतेन शमं न याति
प्रस्फारितैर्वडववारिधिवारिपूरैः॥९१॥
ख. गुण-प्रयोग- सैन्धव युक्त आर्द्रक स्वरस (निष्पीहीत)- जीरक सहित-कांजी
का सेवन (पान) करने से, भक्त (चावल का भात) तथा घृत के सेवन से मन्द