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क्षेमकुतूहलम् (क्षेमशर्मा - १६वीं शती का शाही पाकशास्त्र एवं आहार-विज्ञान सटीक)

Kshemakutuhalam of Kshemasharma on Dietetics

क्षेमशर्मा (सम्पादक: चौखम्बा संस्कृत संस्थान) द्वारा

DevanagariSanskritpublished136 पृष्ठ

२६४ क्षेमकुतूहलम्
ग्रन्थकर्तृवंशवर्णनम्
वंशोऽयं किमु वर्ण्यते सुविमलो नानागुणैरुन्नतो
यत्रैकेन विभीषणश्च भिषजा नीरोगतामाप्तवान्।
श्रीरामादपरेण या सुविदिता लब्धा ह्यकोलापूरी
ग्रामा द्वादश एव चान्यविदुषा लब्धा हि दिल्लिश्वरात्॥१२२॥
ग्रन्थ कर्त्ता-वंश वृत्त
अनेक गुणों से उन्नत तथा सुविमल ग्रन्थकार के वंश का क्या वर्णन किया जा
सकती है अर्थात् उनका वंश अत्युत्तम है। जिस वंश के एक वैद्य (भिषक्) विभीषण
को रोग से विमुक्ति की थी (निरोगता)। एक अन्य चिकित्सक ने भी राम के द्वारा
सुप्रसिद्ध अकोलापुरी को प्राप्त किया था। उसी वंश के अन्य विद्वान (विदुषा) ने दिल्ली
नरेश (दिल्ली खर) से बारह ग्राम (ग्रामा द्वादश) प्राप्त किये थे॥१२२॥
पुत्राः क्षेमभिषग्वरस्य षडिमे नानागुणैरुन्नता
गोपालो शिवपालमाधववरौ नारायणस्त्वद्भुतः।
रामो लक्ष्मणसंज्ञकः सुविदिताः संवत्सराणां शत
जीव्यासुः पृथीतलेऽतिसुखिनो नित्योत्सवैरुत्सुकाः॥१२३॥
भिषखर (चिकित्साकों) में श्रेष्ठ-उत्तम गुणों से युक्त छह (षडिमे) पुत्र हुए-
गोपाल, शिवपाल, माधववर, अद्भुत सम्पन्न नारायण, राम तथा लक्ष्मण। यह समस्त
पृथ्वी पर अतिसुखी, नित्यप्रति अनेक उत्सवों से प्रसन्न (नित्योत्सवैरुत्सुकाः) रह कर
ख्यातनामा थे॥१२३॥
प्रजाक्षेमकृता क्षेमशर्मणा वंशपद्धतिः।
स्वकीया स्वयमावर्त्य वर्णविन्यासशालिना॥१२४॥
वर्णों को यथास्थान चुनावपूर्व स्थापित-कुशल (कवि) वर्णविन्याशाली-क्षेम शर्मा
वे स्वयं स्ववंश परम्परा का परिचर्या, प्रजाक्षेम (प्रजाओं-जनमानस के कल्याणार्थ)
प्रस्तुत था॥१२४॥
परदोषकथास्वनादरा बहवः सन्त्यवनौ सुसज्जनाः।
इति चेतसि सन्निधाय यत्क्रमेवाद्रियतां तदार्यकैः॥१२५॥
इस पृथ्वी पर बहुत से सज्जन (बहवः सत्यवनौ सुसज्जनाः) अन्य व्यक्तियों के


द्वादशोत्सवः २६५
दोषों पर ध्यान नहीं देते (परदोषकथास्वनादरा), इस धारणा को मन में रखकर (चेतसि
सन्निधाय), जो कुछ मैंने लेखन ग्रन्थ रूप में किया है, इसका सम्मान आर्यजन (यत्कृत
मेवाद्रियतां तदार्यकैः:) को करना चाहिए, ऐसी आशा (विश्वासपूर्वक) है॥१२५॥
नन्दन्तां नीतिभाजः सकलवसुमतीजातयः पान्तु विश्वं
दुर्हत्ता यान्तु नाशं भवतु वसुमती सस्यसंपन्नदेशा।
नीरं यच्छन्तु मेघाः कलयतु सुकविः काव्यकौशल्यलीला-
मव्यादव्याजभाजं परिहतदुरितं क्षेमशर्माणमीशः॥१२६॥
नीति का पालन कर्त्ता (नीतिभाज नन्दताम्), समस्त पृथ्वी पर निवास करने वाले
संसार का पालन करें (सकलवसुमतीजातयः पान्तु विश्व), दुर्जन नष्ट हो जायें (दुर्हत्ता
यान्तु नाशं भवतु वसुमती सस्यसंपन्नदेशा), मेघ जल की वर्षा करें (नीरं यच्छन्तु मेघाः
कलयतु), सुकवि काला कुशलता की लीला प्रगट करें (सुकविः काव्यकौशल्यलीलाम-
व्याजभांज परिहत दुरितं) तथा भगवान् शिव शंकर का निष्कयोजन (निष्कास) भजन
कर्त्ता निष्पाप क्षेम शर्मा (क्षेमशर्माणमीशः) की सुरक्षा प्रदान करें।
बाणाकाशसुते नादे (१६०५) वत्सरे विक्रमाङ्किते।
ऊर्जे शुक्लत्रयोदश्यां ग्रन्थः पूर्णोऽयमैन्दवे॥१२७॥
इति श्रीनरवैद्यमन्थात्मजक्षेमशर्माविनिर्मिते क्षेमकुतूहले ग्रन्थे
गोरसपानकादिप्रशंसनो नाम द्वादशोत्सवः॥१२॥
विक्रम संवत्सर सौलह सो पाँच (१६०५) कार्तिक शुक्ल त्रयोदशी सोमवार के
दिन यह ग्रन्थ ने पूर्णता को प्राप्त किया॥१२७॥
इति हिन्दी व्याख्या सहित क्षेमकुतूहल का गोरस-पानक निर्माण-
वर्णननामक बारहवां उत्सव समाप्त॥

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