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सर्वकोश
क्षेमकुतूहलम् (क्षेमशर्मा - १६वीं शती का शाही पाकशास्त्र एवं आहार-विज्ञान सटीक)

क्षेमकुतूहलम् (क्षेमशर्मा - १६वीं शती का शाही पाकशास्त्र एवं आहार-विज्ञान सटीक)

Kshemakutuhalam of Kshemasharma on Dietetics

क्षेमशर्मा (सम्पादक: चौखम्बा संस्कृत संस्थान) द्वारा

DevanagariSanskritpublished136 पृष्ठ

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पृष्ठ 133

२६० क्षेमकुतूहलम्
ख. गुण- १. मुखवैशद्यकर २. रुचिधारक
३. हृद्रोगशमन ४. मुखवैरस्य नाशन
अथ भुक्तोच्छिष्टान्नदानविधानम्
खाडवं मुखवैशद्यकारकं रुचिधारकम्।
हृद्रोगशमनं चेति मुखवैरस्यनाशनम्॥ १०६॥
मुद्भुक्तोच्छिष्टमन्नं तु भुञ्जन्तु पित्तरोऽधमाः।
तेषामन्नं मया दत्तमक्षय्यमुपतिष्ठतु॥ १०७॥
भुक्तोच्छिष्टान्न विधान
अ. मेरे भोजन (के उपरान्त) अवशिष्ट/ उच्छिष्ट अन्न भाग (अंश) का अधम
पितृगण ग्रहण करें ऐसी धारणापूर्वक विधान है॥१०६-१०७॥
रौरवेऽपुण्यनिलये पद्माम्वुधिनिवासिनाम्।
प्राणिनामुदकं ह्येतदक्षय्यमुपतिष्ठतु॥ १०८॥
आ. शंख संज्ञक अपुण्य स्थान में पद्माम्वुधि में निवासी प्राणियों को अक्षय्य उदक
प्रदान करता हूँ- इसे ग्रहण कीजिए॥१०८॥
अथाचमनोदकपानविधानं गुणाश्च
काले धाराधराणां निपटततितरां व्योम्नि वारिप्रपूर्णे
स्वच्छं त्वम्भोजवृन्दद्युतिमतिसरसि त्वानवीनाच्च कुम्भात्
पूर्णोदानीयमम्भः प्रतिदिनममलं न्यस्तकर्पूरसारं
भुङ्क्ते संसेव्यमानं नृपवरशुचिदं वारि चारोग्यकारि॥ १०९॥
आचमनोदक पान
मेघ कमल समूह (जलपूर्णाकाश) प्रकाशमान् सरास में पतित स्वच्छ जलको नव
घट से प्राप्त- कर्पूर सुगन्धित जल- का पान (सेवन) करते हुए आहार ग्रहण करते
हैं- ऐसा जलपान नृपों को शुचि-पवित्रता तथा आरोग्य प्रदान करता है॥१०९॥
अथेषिकाखण्डकस्य विधानं गण्डूषकरणस्य फलञ्च
दन्तनिष्कोषणं कार्यं रोहिषस्य शलाकया।
ततो गण्डूषकरणमास्योच्छिष्टविशुद्धये॥ ११०॥
द्वादशोत्सवः २६१
इषिका खण्डक विधि
भोजनोपरान्त रोहिण शलाका से दन्त-मध्य को स्वच्छ करें। (दन्त निष्को वर्ण);
फिर उच्छिष्ट मुख की विशुद्धि हेतु गण्डूष धारण करते हैं॥११०॥
अथ जानुस्पर्शनविधानम्
मा करेण करं पार्थ मा गण्डौ मा च चक्षुषी।
जानुनी स्पृश राजेन्द्र भर्तव्या बहवो यदि॥ १११॥
जानुस्पर्शनम्
हे! राजेन्द्र, यदि प्रजा का पालन-पोषण (भर्तव्या बहनो यदि) करने की
अभिलाषा है, तो अपने हाथों (या करेण कर) से हाथ, (हस्त), उभार गण्डस्थल तथा
उभय (दोनों) नेत्रों का स्पर्श नहीं करके, इसके स्थान पर उभय जानु का स्पर्श करना
चाहिए॥१११॥
अथचमनान्ते करमर्दनचन्दनस्य विधानम्
कृष्णागुरुप्रभृतिकैरतिसौरभैश्च
कर्पूरसाररजसाऽऽचमनान्तमुच्चैः।
आराधितत्रिपुरवैरिपदाम्बुजानां
भुक्तावसानकरमर्दन चन्दनं स्यात्॥ ११२॥
करमर्द चन्दनम्
कृष्णागुरु प्रभृति सुगन्धि द्रव्य तथा कर्पूरसार के चन्दन से आचमन करे, उसके
अन्त में त्रिपुरवैरि (भगवान् शंकर) का पूजन (पदाधुजानाम्) करने के उपरान्त,
अयोजन के अन्त में, करमर्दन चन्दन किया जाना चाहिए॥११२॥
अथ भोजनपरिणामार्थश्लोकपाठविधानम्
भोजनान्ते हि सद्भिप्रस्वेतद्वाक्यानि वै पठेत्।
आहारपरिणामार्थमायुर्वृद्धिकराणि च॥ ११३॥
भोजन से परिपाकवार्थ ईश्वर प्रणधान
स्वेत् विप्र (सुब्राह्मण) द्वारा गृहीत आहार का सम्यक् पाचन (परिणाम) के उद्देश्य
से मन्त्र (श्लोक) सत् वाक्यों को भोजनान्त में पाठन (उच्चारण) करना अपेक्षित
है॥११३॥