कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 459, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ेंखण्ड ९ ] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ४२९
पश्चिम दिक्कला, दक्षिण दिक्कला और उत्तर दिक्कला, हे इस चतुष्कल पादकी 'प्रकाशवान्' इस गुणसे युक्त उपासना
सोम्य ! यह ब्रह्मका 'प्रकाशवान्' नामक चार कलाओंवाला करता है, इस लोकमें प्रकाशवान् होता है और प्रकाशवान्
पाद है।' वह, जो इसे इस प्रकार जाननेवाला पुरुष ब्रह्मके लोकोंको जीत लेता है ॥ १-३ ॥
षष्ठ खण्ड
अग्निद्वारा द्वितीय पादका उपदेश
'अग्नि तुझे [ दूसरा ] पाद बतलावेगा'—ऐसा कहकर तब ] [ सत्यकामने कहा-] 'भगवन् ! मुझे [ अवश्य ]
ऋषभ मौन हो गया । दूसरे दिन उसने गौओंको गुरुकुल- बतलावें ।' तब उसने उससे कहा-'पृथ्वी कला है, अन्तरिक्ष
की ओर हाँक दिया । वे सायंकालमें जहाँ एकत्रित हुईं वहीं कला है, द्युलोक कला है और समुद्र कला है । सोम्य ! यह
अग्नि प्रज्वलित कर गौओंको रोक समिधाधान कर अग्निके ब्रह्मका चतुष्कल पाद 'अनन्तवान्' नामवाला है।' वह, जो
पश्चिम पूर्वाभिमुख होकर बैठ गया । उससे अग्निने 'सत्यकाम !' इसे इस प्रकार जाननेवाला पुरुष ब्रह्मके इस चतुष्कल पादकी
ऐसा कहा । तब उसने 'भगवन् !' ऐसा प्रत्युत्तर दिया । 'अनन्तवान्' इस गुणसे युक्त उपासना करता है, इस लोकमें
'सोम्य ! मैं तुझे ब्रह्मका एक पाद बतलाऊँ ?' [अग्निने कहा, अनन्तवान् होता है और अनन्तवान् लोकोंको जीत लेता है।१-४।
सप्तम खण्ड
हंसद्वारा तृतीय पादका उपदेश
'हंस तुझे [तीसरा] पाद बतलावेगा' ऐसा [कहकर अग्नि [ सत्यकाम बोला--] 'भगवन् ! मुझे बतलावें ।' तब वह
निवृत्त हो गया ] । दूसरे दिन उसने गौओंको आचार्यकुलकी उससे बोला-'अग्नि कला है, सूर्य कला है, चन्द्रमा कला है
ओर हाँक दिया। वे सायङ्कालमें जहाँ एकत्रित हुईं वह उसी जगह और विद्युत् कला है । सोम्य ! यह ब्रह्मका चतुष्कल पाद
अग्नि प्रज्वलित कर, गौओंको रोक और समिधाधान कर 'ज्योतिष्मान्' नामवाला है।' जो कोई इसे इस प्रकार जानने-
अग्निके पश्चिम पूर्वाभिमुख होकर बैठा । तब हंसने उसके समीप वाला पुरुष ब्रह्मके इस चतुष्कल पादको 'ज्योतिष्मान्' ऐसे
उतरकर कहा—'सत्यकाम !' उसने उत्तर दिया-'भगवन् !' गुणसे युक्त उपासना करता है, वह इस लोकमें ज्योतिष्मान् होता
[ इसने कहा— ] 'सोम्य ! मैं तुझे ब्रह्मका पाद बतलाऊँ ?' है तथा ज्योतिष्मान् लोकोंको जीत लेता है ॥ १-४॥
अष्टम खण्ड
मद्गुद्वारा चतुर्थ पादका उपदेश
'मद्गु तुझे [ चौथा ] पाद बतलावेगा' ऐसा [ कहकर [ सत्यकाम बोला-] 'भगवन् ! मुझे अवश्य बतलावें ।' वह
हंस चला गया ] । दूसरे दिन उसने गौओंको गुरुकुलकी ओर उससे बोला-'प्राण कला है, चक्षु कला है, श्रोत्र कला है
हाँक दिया। वे सायकालमें जहाँ एकत्रित हुईं वहीं अग्नि और मन कला है । सोम्य ! यह ब्रह्मका चतुष्कल पाद
प्रज्वलित कर गायोंको रोक समिधाधान कर अग्निके पीछे 'आयतनवान्' नामवाला है।' वह, जो इसे इस प्रकार जानने-
पूर्वाभिमुख होकर बैठ गया । मद्गुने उसके पास उतरकर वाला पुरुष ब्रह्मके इस चतुष्कल पादकी 'आयतनवान्' ऐसे
कहा—'सत्यकाम !' तब उसने उत्तर दिया-'भगवन् !' गुणसे युक्त उपासना करता है, इस लोकमें आयतनवान् होता
[ मद्गु बोला— ] 'सोम्य ! मैं तुझे ब्रह्मका पाद बतलाऊँ ?' है और आयतनवान् लोकोंको जीत लेता है ॥ १-४ ॥
नवम खण्ड
सत्यकामका आचार्यसे पुनः उपदेश-ग्रहण
सत्यकाम आचार्यकुलमें पहुँचा । उससे आचार्यने कहा- तू ब्रह्मवेत्ता-सा दिखलायी दे रहा है; तुझे किसने उपदेश दिया
'सत्यकाम !' तब उसने उत्तर दिया-'भगवन् !' 'सोम्य ! है ?' ऐसा [ आचार्यने पूछा ] । तब उसने उत्तर दिया,