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सर्वकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

पृष्ठ 465, कुल 832 में से

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पृष्ठ 465

खण्ड १० ] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ४३५
चतुर्थ खण्ड
द्युलोककी अग्निके रूपमें उपासना
हे गौतम ! यह प्रसिद्ध द्युलोक ही अग्नि है । उसका इस द्युलोकरूप अग्निमें देवगण श्रद्धाका हवन करते हैं । उस
आदित्य ही समिध् है, किरणें धूम हैं, दिन ज्वाला है, चन्द्रमा आहुतिसे सोम राजाकी उत्पत्ति होती है ॥ १-२ ॥
अङ्गार है और नक्षत्र विस्फुलिङ्ग ( चिनगारियाँ ) हैं । उस
पञ्चम खण्ड
पर्जन्यकी अग्निके रूपमें उपासना
गौतम ! पर्जन्य ही अग्नि है; उसका वायु ही समिध् है, विस्फुलिङ्ग हैं । उस अग्निमें देवगण राजा सोमका हवन करते
बादल धूम है, विद्युत् ज्वाला है, वज्र अङ्गार है तथा गर्जन हैं, उस आहुतिसे वर्षा होती है ॥ १-२ ॥
षष्ठ खण्ड
पृथिवीकी अग्निके रूपमें उपासना
गौतम ! पृथिवी ही अग्नि है । उसका संवत्सर ही समिध् अवान्तर दिशाएँ विस्फुलिङ्ग हैं । उस इस अग्निमें देवगण
है, आकाश धूम है, रात्रि ज्वाला है, दिशाएँ अङ्गारे हैं तथा वर्षाका हवन करते हैं; उस आहुतिसे अन्न होता है ॥ १-२॥
सप्तम खण्ड
पुरुषकी अग्निके रूपमें उपासना
गौतम ! पुरुष ही अग्नि है । उसकी वाक् ही समिध् है, विस्फुलिङ्ग हैं । उस इस अग्निमें देवगण अन्नका होम करते
प्राण धूम है, जिह्वा ज्वाला है, चक्षु अङ्गार है और श्रोत्र हैं । उस आहुतिसे वीर्य उत्पन्न होता है ॥ १-२ ॥
अष्टम खण्ड
स्त्रीकी अग्निके रूपमें उपासना
गौतम ! स्त्री ही अग्नि है । उसका उपस्थ ही समिध् है, जो सुख होता है, वह विस्फुलिङ्ग है । उस इस अग्निमें देवगण
पुरुष जो उपमन्त्रण करता है वह धूम है, योनि ज्वाला है वीर्यका हवन करते हैं; उस आहुतिसे गर्भ उत्पन्न होता
तथा जो भीतरकी ओर करता है, वह अङ्गार है और उससे है ॥ १-२ ॥
नवम खण्ड
पाँचवीं आहुतिसे 'पुरुष' की उत्पत्ति
इस प्रकार पाँचवीं आहुतिके दिये जानेपर आप 'पुरुष' है । इस प्रकार उत्पन्न होनेपर वह आयुःपर्यन्त जीवित रहता
शब्दवाची हो जाते हैं । वह जरायुसे आवृत्त हुआ गर्भ दस है । फिर मरनेपर कर्मफल भोगनेके लिये प्रस्थित हुए उस जीवको
या नौ महीने अथवा जबतक पूर्णायु नहीं होता तबतक माताकी अग्निके प्रति ही ले जाते हैं, जहाँसे कि वह आया था और
कुक्षिके भीतर ही शयन करनेके अनन्तर फिर उत्पन्न होता जिससे उत्पन्न हुआ था ॥ १-२ ॥
दशम खण्ड
जीवोंकी त्रिविध गति
वे जो इस प्रकार जानते हैं तथा वे जो वनमें श्रद्धा और अर्चि-अभिमानी देवताओंको प्राप्त होते हैं. अर्चि-अभिमानी
तप इनकी उपासना करते हैं [ प्राणप्रयाणके अनन्तर ] देवताओंसे दिवसाभिमानी देवताओंको; दिवसाभिमानियोंसे