कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ
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हो जाता है । वायु ही इन सब जलोंको अपनेमे लीन कर लेता
चतुर्थ खण्ड
[ अध्याय ४
४२८
- छान्दोग्योपनिषद् *
हो जाता है । वायु ही इन सब जलोंको अपनेमे लीन कर लेता
है । यह अधिदैवत दृष्टि है ॥ १ २ ॥
अब अध्यात्मदर्शन कहा जाता है—प्राण ही सवर्ग है ।
जिस समय यह पुरुष सोता है, प्राणको ही वागिन्द्रिय प्राप्त
हो जाती है, प्राणको ही चक्षु, प्राणको ही श्रोत्र और प्राणको
ही मन प्राप्त हो जाता है । प्राण ही इन सबको अपनेमें लीन
कर लेता है । वे ये दो ही सवर्ग हैं—देवताओंमें वायु और
इन्द्रियोंमें प्राण ॥ ३-४ ॥
एक बार कपिगोत्रज शौनक और कक्षरसेनके पुत्र
अभिप्रतारीसे, जब कि उन्हें भोजन परोसा जा रहा था, एक
ब्रह्मचारीने भिक्षा माँगी, किंतु उन्होंने उसे भिक्षा नहीं दी ।
तब उसने कहा—'भुवनोंकेरक्षक उस एक देव प्रजापतिने चार
महात्माओको ग्रस लिया है । कापेय ! अभिप्रतारिन् ! मनुष्य
अनेक प्रकारसे निवास करते हुए उस एक देवको नहीं
देखते, तथा जिसके [ब्रह्मचारीके रूपमें आये हुए भगवान्के]
लिये यह अन्न है उसे ही नहीं दिया गया ।' उस वाक्यका
कपिगोत्रोत्पन्न शौनकरने मनन किया और फिर उस [ब्रह्मचारी]
के पास आकर कहा—'जो देवताओका आत्मा, प्रजाओंका
उत्पत्तिकर्ता, हिरण्यदंष्ट्र, भक्षणशील और मेधावी है, जिसकी
बड़ी महिमा कही गयी है, जो स्वयं दूसरेसे न खाया जानेवाला
और जो वस्तुतः अन्न नहीं है उनको भी भक्षण कर जाता
है, ब्रह्मचारिन् ! उसीकी हम उपासना करते हैं।' [ ऐसा कह-
कर उसने सेवकोको आज्ञा दी कि ] 'इस ब्रह्मचारीको भिक्षा
दो' ॥ ५-७ ॥
तब उन्होंने उसे भिक्षा दे दी । वे ये [ अग्न्यादि और
वायु ] पाँच [ वागादिसे ] अन्य हैं तथा इनसे [ वागादि
और प्राण ] ये पाँच अन्य हैं । इस प्रकार ये सब दस होते
हैं । ये दस कृत ( कृतनामक पासेमे उपलक्षित द्यूत ) हैं ।
अत सम्पूर्ण दिशाओमे ये अन्न ही दस कृत हैं । यह विराट् ही
अन्नादी ( अन्न भक्षण करनेवाला ) है । उसके द्वारा यह सब
देखा जाता है । जो ऐसा जानता है उसके द्वारा यह सब
देख लिया जाता है और वह अन्न भक्षण करनेवाला होता है ॥८॥
चतुर्थ खण्ड
जवालापुत्र सत्यकामद्वारा गुरुकी आज्ञाका पालन
जवालाके पुत्र सत्यकामने अपनी माता जवालाको
सम्बोधित करके निवेदन किया—'पूज्ये ! मैं ब्रह्मचर्यपूर्वक
[ गुरुकुलमे ] निवास करना चाहता हूँ, बता मैं किस
गोत्रवाला हूँ ?' उसने उससे कहा—'हे बेटा ! तू जिस
गोत्रवाला है उसे मैं नहीं जानती । युवावस्था में, जब कि मै
बहुत कार्य करनेवाली परिचारिणी थी, मैने तुझे प्राप्त किया
था । मै यह नहीं जानती कि तू किस गोत्रवाला है ? मै तो
जबाला नामवाली हूँ और तू सत्यकाम नामवाला है । अत तू
अपनेको 'सत्यकाम जाबाल' बतला देना ।' उसने हारिद्रुमत
गौतमके पास जाकर कहा—'मैं पूज्य श्रीमान्के यहाँ ब्रह्मचर्य-
पूर्वक वास करूँगा; इसीसे आपकी सन्निधिमें आया हूँ।'
उससे [ गौतमने ] कहा—'सोम्य ! तू किस गोत्रवाला है ?'
उसने कहा—'भगवन् ! मैं जिस गोत्रवाला हूँ उसे नहीं
जानता । मैने मातासे पूछा था । उसने मुझे यह उत्तर दिया
कि 'युवावस्था मे, जब कि मैं बहुत काम धन्धा करनेवाली
परिचारिणी थी, मैने तुझे प्राप्त किया था । म यह नही जानती
कि तू किस गोत्रवाला है ? म जबाला नामवाली हूँ और तू
सत्यकाम नामवाला है।' अतः गुरो ! मे सत्यकाम जाबाल
हूँ।' उससे गौतमने कहा—'ऐसा स्पष्ट भाषण कोई ब्राह्मणेतर
नहीं कर सकता । अत. सोम्य ! तू समिधा ले आ, मै तेरा
उपनयन कर दूँगा, क्योंकि तूने सत्यका त्याग नही किया ।'
तब उसका उपनयन कर चार सौ कृश और दुर्बल गौएँ
अलग निकालकर उससे कहा—'सोम्य ! तू इन गौओंके पीछे
जा ।' उन्हें ले जाते समय उसने कहा—'इनकी एक सहस्र
गायें हुए बिना में नहीं लोटूँगा ।' जबतक कि वे एक सहस्र
हुईं वह बहुत वर्षोंतक वनमे ही रहा ॥ १-५ ॥
पञ्चम खण्ड
सत्यकामको वृषभद्वारा ब्रह्मके एक पादका उपदेश
तब उससे साँडने 'सत्यकाम !' ऐसा कहा । उसने
'भगवन् !' ऐसा उत्तर दिया । [ वह बोला—] 'हे सोम्य !
हम एक सहस्र हो गये हैं, अब तू हमे आचार्यकुलमें पहुँचा
दे ।' [ साँडने कहा ] '[ क्या ] मैं तुझे ब्रह्मका एक पाद
बतलाऊँ ?' तब [ सत्यकामने ] कहा—'भगवन् ! मुझे
[ अवश्य ] बतलावे ।' साँड उससे बोला—'पूर्व दिक्कला,