कबीर कृष्ण गीता
Kabir Krishna Gita
युगल आनंद विहारी द्वारा
स्रोत: Kabir Krishna Gita - Yugal Anand Vihari · Archive.org (उद्गम)
सब देवताओंका कबीरकी स्तुति करना और कबीरका उपदेश देना
४०
कबीरकृष्णगीता ।
जब बन डगठा आग धंधाना । तब बनते मधुकर विलगाना ॥
जैसे बिन निरास अल भयऊ । तैसे माया लोभित पछतयऊ ॥
चरण कमल गुरु प्रथम न सेवा । काल वस्य तब भयऊ बहेवा ॥
विपत परत को सभर्थ चीन्हा । होय सुशील उपकारसो चीन्हा ।
अनचीन्हे विपत जो होय सहाई । तो तेहि जानिय सभर्थ साई ॥
दोहा-सत्यकबीर मोहि अनचीन्ह, सियरे परिचय नाहि ॥
कपिलमुनि भज गाठे कबीर, छोड़ाय लीन्ह जमपाहीं
बाघ निरंजन काल कसाई । तेहि सुख ते लिय कपिल छोड़ाई
कपिला गऊ कपिल मुनि कहहीं । सतकबीर सो सभर्थ अहहीं ॥
उत्तर विवान आव सत सीसा । विष्णु व्यास सुख कपिलसिरदीसा
स्तुति कीन्ह सिंहासन सारा । कंचन भर ले चरण पखारा ॥
महाप्राण कहैं दीजे अज्ञा । निराधार कबीर कहु सज्ञा ॥
पूछाहि ज्ञान विष्णु अरु व्यासा । छोटे बड़े सुनहि विश्वासा ॥
विष्णुवचन ।
कहैं कृष्णगीता मत सारा । पाठ कीय सुख लहे सो चारा ॥
पाठ करै समुझे पंथ चाले । सचदयासो जिव प्रति पाले ॥
आप जीवके रक्षा करई । ताके संकट साहेव हरई ॥
अपनी रक्षा औरकी हानी । ऐसे चाल नहा अघरानी ॥
कहैं कृष्ण सुन व्यास प्रवीना । सुनो कथा निरगुणको चीन्हा ॥
दोहा-कहैं कृष्ण कबीरसे, होय अधीन कर जोर ॥
कहिये कथा आदि उत्पतकी, सत कबीर बंदीछोर ॥
कवीरकृष्णगीता ।
४१
कवीरवचन ।
कहैं कवीर निर्गुणकी कथा । निर्गुण सर्गुण प्रगट जथा ॥
प्रथम सत्पुरुष निर्गुण सोई । तिनके निर्गुण सर्गुण होई ॥
त्रिगुण न्यारा निर्गुण सो जानी । सो सत्यपुरुष अमृततन खानी ॥
रचा लोक अमृतकी काया । देह हिरंमर सुवास सुहाया ॥
अमृत अयको लोक संवारा । इच्छा सुर्त सकल विस्तारा ॥
प्रथमहिं सुरत अंस प्रगटाये । सुरत विहंग सकल निरमाये ॥
शब्द अजर सतनाम वखाना । तासु अंस सुरति उत्पाना ॥
प्रथमहिं ज्ञान अंस सुखदाई । दुतिय विवेक विचार निरमाई ॥
त्रितय सहजशील निरबाना । चौथे क्षमा संतोष वखाना ॥
पंचय निरंजन छठयें भवानी । सतयें योगजीत जम हानी ॥
अठयें धीरज नवें शुचि भाऊ । दसयें दया दीनता आऊ ॥
एकादसे सत सुकित नामा । द्वादश दुरमत नाम निहकामा ॥
त्रैदस आद कुम निरमाऊ । चतुर्दश जलहरंग झलकाऊ ॥
पंचैदस सो प्रेम प्रमारथ । षट्यैदस अचित पद सारथ ॥
श्रवदास कहनकी छोटा । सत्रह सुतसे काल अटोटा ॥
सोरह सुत एकपुत्री वामअंगी । देख निरंजन प्रेम उभंगी ॥
जाहे सुत जो दीयदिय स्वामी । पुरुष आज्ञा बैठे सब धामी ॥
निरंजन धरहिं अकुलाने । चौसठ जुग छिन सेवा ठाने ॥
देख अंगी काल ललचाने । होय अधीन बहु विनती ठाने ॥
दीन्हो लाय संग अष्टभुजी । मानसरोवर राज करोजी ॥
अस जिवरा ताही कहैं दीन्ह। । पारस स्वास विस्तार जोकीन्ह। ॥
व्यासका कबीरसे सत्यलोक दिखानेकी प्रार्थना करना
४२
कबीररुणगीता ।
दोहा- उठी अवाज पुरुषकी, मानसरोवर जाहु ।
बांये दहिने जिन हेरहु, सन्मुख होय सुख लाहु ॥
अमर चोलना जीवको दीन्हा । बिसरहिंनहिंजिवपुरुषपरवीना ॥
चले निरंजन आज्ञा पाई । मानसरोवर वैठे जाई ॥
मानसरोवर हंसनि रहहीं । अद्भुत चंद्र सूर्य छवि लहहीं ॥
गावहिं सब मंगल अति प्रीति । होय झनकार अनाहद रीति ॥
एक २ हंसनि छवि अनलेखा । अमरचौर काछे बहु भेषा ॥
पग अंगुली नख चंद्रकी खानी । तरवन रवि शाशि जुथलोभानी ॥
जंघ नाभी कटि चंद्रकी रासी । उरसर कंमल नाल बिनु भांसी ॥
चंद्र सूर्यकी खान हंसनी । सुखछविनिरखअकहसुखहंसनी
शोभा कौन हंसनि छवि कहऊँ । उपमा सरिस न कुछजगलहऊँ ॥
नित आरती समान सरोवर । लोककी नार नर्क न्यारा घर ॥
तहां हंसनी सुखुच्छि सयानी । शोभा अमल चंद्रकी खानी ॥
मांग टीका पटवासी सुंदर । चंद्र चौथ विधु अद्भुत दिनकर ॥
निरख हंस सब एक टक लाये । पुरुष कला छविरूप सुहाये ॥
एक कामनि सेंदुर रवि कोटी । सेंदुर सद्रु नाम अटोटी ॥
सोहे बेसर हंसनि नाका । उगे चंद्र जुथथप बांका ॥
बांका सोइ जेहि कौन नवावे । सो कबीर सब जगगुण गावे ॥
कबीरनाम भये अस सोभा । सोभा सुनत सबन मन लोबा ॥
व्यास उवाच ।
कहै व्यास देखे विन स्वाधी । कस पतिआव सो अंतयाभी ॥
कलउ भक्त गुरुवचन विश्वासी । तीनों जुग देखे विन रासी ॥
कबीरकृष्णगीता ।
४३
कबीरवचन ।
कहे कबीर देह धर देखौ । आप माहिं तुम सबहिं परेसौ ॥
कोट चंद्रके सोभा जिवके । नर्क देह धर सुख नहिं पिवके ॥
ऐसे समय हंस एक पूरा । सत्कबीर जये सो सूरा ॥
ठांका देह पूरा घट जाई । पुष्प विधान हंस बैठाई ॥
हंस सहस्र सठिहार बहुता । आसपास लागे सभ जुगता ॥
परिछन हंस विवान चढि आये । अधर धजा फहराय सहाये ॥
दोहा-वाजत वाजत सरस अति, होत अंजोर अपार ।
उतरे हंस वैकुंठ तब, नाम कबीर उचार ॥
भाये हंस वैकुंठ को जवहीं । अद्वुत चंद्र सूर्य उगे तवहीं ॥
चला हंस कबीर पगु पारा । मस्तक पग दीन्हा बलभारा ॥
सकल हंस परिक्रमा करहीं । कबीर चरण रज सिरपर धरहीं ॥
हंसवचन ।
कहे हंस कबीर यम बांचे । विना कबीर काल धर नाचे ॥
सदुरु मोकेह दीन्ह परवाना । सत्कबीर सभ गुरुकहैं जाना ॥
यम त्रिण तोड काल सुख भूका । पाय प्रवाना झगरा चूका ॥
सरगुण त्रिविध झगरा ठागा । तैतिस कोट देव सब भागा ॥
जेहि पूजहु सो कछु भल माने । बिन पूजे सब झगरा ठाने ॥
ताने निर्गुण भक्त अधारा । जप कबीर यमराजहिं छारा ॥
दोहा-धन्य कबीरको नाम है, धन्य कबीरको शरण ।
जो कबीर लौ लावे, ताको जरा न मरण ॥
कबीरका उपदेश
४४
कबीरकृष्णगीत ।
चरण टेक चले हंस सुजाना । सत्यकबीर कहत घर ताना ॥
पुन वैकुंठ भये अंधियारा । बोले कृष्ण धन्य करतारा ॥
सत्यकबीर जन गुप्तहोय फिरहीं । तिनके दास ऐसे सुख करहीं ॥
सबे देव विनती अनुसारा । ले चलहु जहां अस उजियारा ॥
कबीरवचन !
कहे कबीर सत्यलोक जो जाई । अस उजियार जो तोहिं मिलाई ॥
दोहा--कर्म भर्म सब त्यागे, त्यागे जगके आस ।
सबमहैं एक ब्रह्म लखि, कबीर भजन सुखरास ॥
सबे कहें शोहिं दीजे पाना । यमसे जीव बचजाय ठिकाना ॥
कहे कबीर सुनो सब कोई । सदुरु सेय मुकफल लेई ॥
कहौं सो करौं सबहिं तब तारौं । जन्ममरण दुख दारुण टारौं ॥
सबे देव सुमरो रामके नामा । छांडो भूत प्रेत अब कामा ॥
जो जाको गुरु रामसो ताही । गुरुविन राम न तारेउ काही ॥
करहु भक्त दाया सत ठानी । अंस पृथ्वी तन घर भर नामी ॥
करु नित संतनकी सेवकाई । हृदय कबीर नाम जौलाई ॥
निरगुण सरगुण एक समाना । बीज वृक्ष विस्तार बखाना ॥
सुखमंडन पितु मातु जथाई । हृदय प्रीत पिव सदुरु साई ॥
जो कोई भक्त करे गुरुसेवा । सेवा भक्त सार पद लेवा ॥
अमृत सेवे अमृतफल लेई । विषतरु सेवे विष मिल लेई ॥
अमृतफल गुरुराम कबीरा । आगे तारव पुण्य शरीरा ॥
विन कौडी सौदा मिल नाहीं । गुरु विनको गहिहै पुन बाहीं ॥
गुरु सोई जो अंतहु मीठा । जन्ममरण सब लागे सीठा ॥
कलियुगका वृत्तान्त
कबीरकृष्णगीता ।
४५
दोहा-जन्ममरण सरगुण गुरु, निरगुण अजर कबीर ।
शरण कबीरके जो गहे, सो बहुरन धरे शरीर ॥
कथा प्रसंग कहा सुनि व्यासा । भक्ति सुक्ति महिमा प्रकाशा ॥
भक्त सुक्त पंथ सत दाय। सत्यनाम भज अम्बर काया ॥
कहे कबीर सुनो विष्णु प्यासा । सत्यकबीर जपो हर स्वासा ॥
आद अनादिको नाम कबीरा । कल प्रगटहिं अघ नासन हीरा ॥
अब तोहिं अंत खोल हम कहा । सत्यकबीरजपकलिनिरवाहा ॥
ताहि न देउं मैं पान प्रवाना । जोजीवघातआमिश भषजाना ॥
दोहा-महापुनीत पवित्र जिव, गुरु भक्ता सोइ संत ।
पर आपन जिव एक लखे, ताहि कबीर मिल कंथ ॥
विष्णु-व्यासवचन ।
कहे सो विष्णु व्यास सिर नाई । कलयुग सुनिये जो आमिश खाई ॥
कहे कृष्ण कलयुग व्योहारा । कोइन करि है सत्य विचारा ॥
बूठहिं जगलग लेपवे साही । अतीत ब्राह्मणको धका दिवाही ॥
गुरुसे शिष्य सरवर करि बोले । तेहि दोष मरकट होय डोले ॥
गुरुके धन चौराय जो खाई । ताके घर फांसी सब जाई ॥
गुरुसे सरवर पितहिं दे गारी । साधुद्रोह जिवघात खुवारी ॥
जीवदयामय दाय। जानो । जीव घात मम घात बखानो ॥
काया विष्णु कंवल दल सोहा । भज कबीर गुरु पद मोहा ॥
सत्यकबीरको चाल निगारी । सुर नर सुनि गण जानेनहारी ॥
कलिमें होइ हैं प्रापत राजा । नृप बिगरे परजा अघ छाजा ॥
कलियुगमें तरनेका मार्ग
४६
कबीरकृष्णगीता ।
कलिके ब्राह्मण काल सुभाऊ । अजिया सुतवष झस परखाऊ ॥
प्रथम मीन भवै विष्णु सरुपा । पैठ पताल जला अंधकूपा ॥
कुर्मके नखसों मृतुका आना । राई प्रवान मृतुका सो जाना ॥
सो मृतुका हरमुख विवलई । फेनसमान उठा जब कई ॥
लै फेन पवन जल लाया । शीर साठी तस पृथ्वी जमाया ॥
पृथ्वी सात औ सात अकाशा । कदलीखंभदल पृथ्वीपर चासा ॥
विष्णु जल थलमाहि समाना । विष्णु अन्न पान पकवाना ॥
जो मीन दैह पूरण कर सेवे । जलमह भात डारि कर सेवे ॥
ताके संतत भक्त गर होई । पूजे कछु मुख पावे सोई ॥
विठल ब्रह्मरूप है मोरा । बावन नरसिंह राक्षस बल तोरा ॥
परसरामचंद्र सो हमही । कृष्ण चौध निहकलंकका जवहीं ॥
नारद व्यास औ सबमें वासा । रजगुण तमगुण सहगुण वासा ॥
चौथा स्वासा कबीरको दासा । स्वासा पार सतपुर वासा ॥
पंचयै निरंजन जिव घटवारा । कबीर मोहर लख पार उतारा ॥
जो नहीं भये कबीरके दासा । ता कहै काल निरंजन आसा ॥
पुण्य लीन्ह रस त्रस जिव केरा । पुन्यमान जस तरे विव भेरा ॥
पापिहिं डार दिये यम खाई । जार खोर चौरासी भमाई ॥
पाप पुण्य महीं नाहिं उबारा । दया सत् परमारथ सुधारा ॥
नाम कबीर प्रताप उबारा । क्रीतम नाम जपेउं यम मारा ॥
आद नाम कबीर दुखहरना । क्रीतम त्रिगुण नाम तप मरना ॥
जन्म मरण दुख बडे जंगाला । जन्म मरण झरकावे काला ॥
कबीरकृष्णगीता ।
४७
तेहि दुख कबीर गुरु पगु गहा। सत्यकबीर जप हंस निरवहा ॥
सरगुण श्रेष्ठ विष्णु अधिकारा । निर्गुण सत्यकबीर जिव तारा ॥
निर्गुण भक्त बिना जमलूटे । निर्गुण बिना न संगय छूटे ॥
नकल निर्गुण कहिये निराकारा । तिन जो जीवहि कीन्ह खुवारा ॥
दूजे निर्गुण मन यम अंसा । तजि धरती साध निहसंसा ॥
चाथे निर्गुण नीर लखाया । पंचये निर्गुण पवन बहाया ॥
छठये निर्गुण गगन बखाना । सतये सत्यकबीर निरबाना ॥
आतम पवन और तन आदी । सो राम कबीरका नादी ॥
नांद निरंजन नांद अष्टंगी । नांद सुरति सोहंग तरंगी ॥
नांद पुत्र शिष्य गुरु मुख जाये । बिना शिष्य कस मुख कहाये ॥
सीखे सुने शब्द कहैं खोजा । जहां सांच ताके भये सोजा ॥
असल सांच एक कपदी दूजा । असल बोलता तज भ्रम पूजा ॥
दोहा—असल सुरति साहेब का, नर सुरत अनुहार ॥
सबै रूप तन भासे, जोत पुंज उजियार ॥
नख सिख विमल सुठ आति लोना। अथर सिंहासन अंकित भवना ॥
सिंहासनके अथर सकल सब । अथर सिंहासन सत्यकबीर जप ॥
जाके दस्त पयाना लहजीऊ । कहे कबीर ताके सोइ पीऊ ॥
पुरुष सरूप यह हंस कडिहारा। पहुँचे हंस पुरुष दरवारा ॥
कंचन पृथ्वी हंस सब रहहीं । निज२दीप सबे मुख लहहीं ॥
जेते अंस प्रगट होय आवा । धर सरूप सो नाम धरावा ॥
पुरुष अमान सीलके खानी । समर्थ नाम अकह सो जानी ॥
सबे नाम है साहेब केरा । अकह नाम सो हंस निवैरा ॥
सद्गुरु और गुरुके लक्षण और चिह्न
( ४८ )
कविरक्तुणगीता ।
अकह नाम सो सद्गुरु भाषा । सद्गुरु सब पूरण अभिलाषा ॥
जासों डोरी पुरुषकी पावे । सत्पुरुष सम तेहि चित्तलोवे ॥
केने गुरुवा कपट कराहीं । सीखहिं शब्द सिखावत नाहीं ॥
कपटी गुरु जो शब्द न देई । पूजा पाठ लेख पुन लेई ॥
पूछे शिष्य तब ज्ञानके बाता । पूजा थोर क्रोध गुरु ताता ॥
गुरु सो जेहि अस कत सिष भाऊ। पूजे बिन पूजे एक ताऊ ॥
पूजा लेय पुनि राह बतावे । अमरलोक ले जिव पहुँचावे ॥
अकह कथाको गम न पावे । सो सद्गुरु कवीर समुझावे ॥
जे शिष्य बहुत गम्य कर बोले । गुरुकी सेवा करे दिल खोले ॥
मात पिताको सेवक जो सुत । सोइ सपूत जो गुरु सेवा जुगत ॥
दोहा-सेवा देवा लेवा करे, पखलधार तब जान ॥
गुरु सोई जो ज्ञान दे, सेवक सेवा ठान ॥
सेवक होय करे गुरु निंदा । ज्ञान पाय कहे गुरु दाहनबिंदा ॥
चेला गुरु पूंजी दे खोई । गुरु बिन सेवा लाभ न होई ॥
कविरचन ।
दोहा- कहैं कवीर सुन देव मुनि, कृष्णकपिल मुनि व्यास ।
तुम सब सेवो साधु गुरु, छोड़ धर्म विश्वास ॥
धर्म विश्वास कालकी फांसी । प्रेत भूत आस दुखरासी ॥
गुरु तज सकल आस दुखखानी । गुरु बिन नर्क परे अभियानी ॥
गुरु सोई जो अंतहु गीठा । जन्म मरण गुरु लागे सीठा ॥
सकलदेववचन व कुबेरका गुरु उपदेश लेना
कवीरकृष्णगीतः ।
४९
सकलदेव वचन ।
सकल देव उठ चरण यनावा । श्रीहरिविलस गलताव सुनावा ॥
हम सब परे निरंजन फांसा । सत्यकवीर काटे यम त्रासा ॥
जन्मत भरत बहुत दुख पावा । अब कवीरके चरण चितलावा ॥
यमसे एक तुम राखन हारा । कवीर वांचे सब यमके चारा ॥
कवीरवचन ।
कहैं कवीर तुम सब तन धरहूँ । क्रितम देह हरि सेवा करहूँ ॥
अमृतदेह अमर घर जाई । क्रितम देह घर ठार समाई ॥
सत्य देह हंसके संग। सत्य देह विदेह प्रसंगा ॥
अब सुनो ज्ञान पान परचाई । थित पान दे लोक पठाई ॥
उठे कुबेर हरिपद लपटाने । सत्य कवीर गुरु लरन सो ठाने ॥
कृष्णवचन ।
कहैं कृष्ण पुलाकित होय वाणी । सत्यकवीर सट्टुर सुखदानी ॥
कोट जन्म तप पुंज जेहि होई । सतकवीर कहैं सेवहिं सौई ॥
उठे हर्षित हरि आज्ञा पाई । कवीरके सन्मुख महिपर धाई ॥
कहैं कुबेर सीस महि लाई । आद पुरुष कवीर प्रगटाई ॥
कवीर वचन ।
कहैं कवीर तुम हरि गुरु भजहूँ । तजहु कुपंथ आमिख भष तजहूँ ॥
देवता आमिख लेय मधुवासा । और आमिख बहु देव गरासा ॥
कुबेर वचन ।
कहैं कुबेर मोहिं आपन करहूँ । दे परवाना कर्मज हरहूँ ॥
तुमही कर्ता मूल सकलके । तीन लोककर भक्त न कलके ॥
तुम्हरे अंस जीव सब स्वाभी । निरंजनके मूल तुम अंतर्थाभी ॥
५०
कबीरकृष्णगीता ।
कबीर वचन ।
सत्कबीर विहस कह बाता । सहि कुबेर शरण यम आता ॥
आरती साज अब आन तुरंता । नीरयर पान मिष्टान्न भुगंता ॥
बहुत सुगंध फूल बहुताई । सुरत सुवास सेत फललाई ॥
मेवा वस्तर पटंबर छाजा । लोक प्रभाव उदै मनु साजा ॥
अन्हद शब्द सो मंगलचारा । सानंद सट्टुर भक्त अपारा ॥
सबे देव मिल मंगल गावहिं । जै २ सत्कबीर उचारहिं ॥
साजेड थार जोत प्रकाशा । अथर थार सिंहासन स्वासा ॥
भोग लगाय पुरुष सतनामा । लियो छोर यम फंदते प्राणा ॥
यमराजा सो त्रिण नोडाई । काल भूतके सुंह भुकाई ॥
शब्द वाक्य कह दीन्हों बीरा । सुरति समानी सत्य कबीरा ॥
चरणामृत तुलसी माला । दीन्हें तिलक सर्व सुखचाला ॥
कहहिं सिखावन दंडवत गुरुसाता । तीन दंडवत साथ पिपुमाता ॥
रहिय गुरुके चरण लौलीना । रामनाम गुरु साधुहिं चीन्हा ॥
केतो पढके निडर रहई । गुरुकी शक्ति सबे निरवहई ॥
पढा देवता दया जेहि हिये । दयाहीन यम कातर हिये ॥
गुरु सिवायकछु आस न करिये । सट्टुर भज सतलोक पगु धरिये ॥
सट्टुर सत्यकबीर निज नामा । जहाँ प्रेम तँहँवा गुरुनामा ॥
बिना प्रेम जग होत बिगाना । तात मात बिन प्रेम बिगाना ॥
आन सो प्रेम करे सो सुरखा । कबीर कृष्ण तरे सब पुरखा ॥
कबीर बिना कोई तारे नाहीं । त्रिभुवन सब परंपची आहीं ॥
कृष्णका दीक्षा लेनेके लिये प्रार्थना करना
कवीरकृष्णगीता ।
५१
एक सत्यकवीर सत्य बोलहीं । और सबे माया बस डोलहीं ॥
धन्य सो सत्यकवीर कंडहारा । नरक परत बहु जीवहिं तारा ॥
दोहा--सर्वमई है साहेव, सबे रूप सत्यनाम ।
गुरुसरूप चित ध्यान धर, और ध्यान बेकाम ॥
धाय विष्णु धर चरण कवीरा । गहीर्ष कर कवीर मिल हीरा ॥
कृष्णवचन ।
कहे कृष्ण मैं नाती तोरा । पिता निरंजन भक्षक गेरा ॥
दोहा--हमरी कौन बतावे, खाये सबे पितु काल ।
आज तारु मेरे आजा, देहौ मोहर टकसार ॥
कवीरवचन ।
कहे कवीर कृष्ण धर धीरा । कोई दिन गति तोहि देहौ वीरा ॥
पान प्रसाद नरियर मिष्ठाना । दीन्ह कवीर कृष्ण कई पाना ॥
सुनहु विष्णु मयशरगकी बाता । सत् सतोषुण मम अंस विधाता ॥
पारसपान प्रसाद यह खाहु । उपजे दृढ अंकुर गुरु पाहु ॥
पान प्रसादके अस प्रतापा । जन्म २ को भिटही पापा ॥
रहे मान कन्या वर जैसी । मनीह मनावे सेंदुर चढ तैसी ॥
विना लिखा सोइ मानद आना । चरणाघृतसे हंस निरवाना ॥
जब लिख बीरा दीन्ह पुन जाहीं । पूरा शिष्य सद्गुरु पंथ माहीं ॥
दोहा--सबे देवता दसकत, मोहर सत्यकवीर ।
विना मोहर सुलतानको, माल न लगे तीर ॥
जिन वनजारे लीन्ह प्रवाना । मोहर देख घटैत भय माना ॥
५२
कबीरकृष्णगीता ।
दोहा--कहैं कबीर कृष्णसे, मनमो राखो धीर ।
आगे वीरा देव तोहि,हमार अंस तुम वीर ॥
व्यासवचन ।
कहैं व्यास कबीर हर वंसा । सबके मूल कबीर निहसंसा ॥
अपने मन सब सदुरु चेला । सदुरु शिष्य जेहि नाम थिला ॥
हम सब सदुरु निंदे सुनि जेतै । सबके सदुरु कबीर गति देतै ॥
रवि प्रकाश भौ तिगिर नासा । कीतम त्रिगुण तिगिर तन भासा ॥
निर्गुण भक्त प्रकाश रवि जाना । निरगुण सरगुण माहिं समाना ॥
निर्गुण स्वासा सरगुण देहीं । यमसे बांचे कबीर सनेहीं ॥
कबीरवचन ।
दोहा--कहैं कबीर हम सब घट, राम रूप तन स्वास ।
स्वासा पुरुष नार तन, स्वासा विकसत न नास ॥
व्यास सुखदेव वचन
कहैं व्यास सुखदेव कर जोरी । यम तन कांच जीव बंदी छोरी ॥
यह तन विनसत बार न लगे । ना जानो स्वासा कब वागे ॥
कपिलमुनि गाय सो तुमहि बचाया । जो बांचे सो कबीरकी दाया ॥
दीजे सुख पान मोहिं आतुर । सुखे प्रथम चेतै सो चातुर ॥
वाघ निरंजन सब जिव गार्ई । सवा लाख नित खाय कसाई ॥
सो जिव बांचे काल तुम आसा । नाम कबीर जाहिपर बासा ॥
दोहा--एक ठांव बन कपिल मुनि, दूसर स्वास सुखदेव ।
सब जिव प्रासे वाघ यम, तुम कबीर लख लेव ॥
तब कबीर जिव उपजी दाया । मानिद पान सो सबहिं खवाया ॥
मनका वर्णन - मनकी ४० प्रकृति
कवीरकृष्णगीता ।
५३
कवीरवचन ।
कहैं कवीर निःशंक अव होहू । निरंजन वाष न आसे तोहू ॥
अव तुम सुनहु और एक वाता । प्रथम गुरुहैं पिता औ माता ॥
रज बीज माता पिताके चोला । पुरुषअंश तेहि तेज अमोला ॥
पांच तत्व प्रकृति पचीसा । चौदह यम त्रिगुण तैंतीसा ॥
रोम २ सब आरि तन जिवके । तन मन काल मार वल पिवके ॥
दोहा--चालिस सेरको मन भयो, चालिसमहैं एक सार ।
एक सांच सब झूठा, स्वास सार तन छार ॥
गुप्त प्रगट दस इंद्री लखहू । पचीस प्रकृती तैंतीसा भाषहू ॥
गुणभा तीन मिले अठतीसा । अक्षा अंस एक मन दीसा ॥
भाउं न चालिस चालिस जीऊ । जीवके सत्यनाम है पीऊ ॥
जीव अमर सो अमर कवीरा । सत्यकवीर सुक्त मन हीरा ॥
शरे तत्व औ गुण प्रकृती । अमर सो हंस पुरुषको रीती ॥
पांच अफीके काया बाहर । अमरलोक आसन तेहि ठाहर ॥
ब्रह्मा विष्णु महेश जग अधपत । अधपतकी मत क्रीतम मलगत ॥
निरंजन पुनि तन घर मरऊ । ऊंच नीच बहु क्रीतम कियऊ ॥
अजब दिल निरंजन नाऊ । नाना रंग बसाये गार्ऊ ॥
अहंकार बस राहु अलाहू । ताते कोई न पावे थाहू ॥
कुमत कुसंग क्रोध अध चाली । ये सब विकट निरंजन माली ॥
आप निरंजन अल्लह कहाये । अजानिल्ल एक और बनाये ॥
दुनिया अजजिल्ल जग जानो । असल अजानिल्ल प्रभुको मानो ॥
गुरु और गुरुओंका वर्णन
५४
कबीरकृष्णगीता ।
तुरक अजानिल्ल हिंदू धर्मराई । है भक्षक रक्षक नहि भाई ॥
आप अजानिल्ल अलह कहलावा । अलह अलाहकी रूप छिपावा ॥
जीव का करे काल छल कीन्हा । जीव भुलाने खसम न चीन्हा ॥
जीवके खसम सो अमर कबीरा । विन परचे धरे धर चीरा ॥
देवा देवी जार गवारा । सटुरु खसम सो अमर भतारा ॥
असछी सटुरु सत्य कबीरा । नकली सटुरु बहु भौ भीरा ॥
बोरहिं शिष्यको नरक मंझारा । कहहिंके भौजल पार उतारा ॥
वेद पुराण कुराण पढ़ै सब । गुरुभत त्याग मनमत गहै सब ॥
वोर छोर गायत्री माहीं । सत्य दया तेहि माहे दढाहीं ॥
पंडित काजी यमके अगुवा । आप बाल बालें पछ लगुवा ॥
द्विजके कहे चले संसारा । सो द्विज मनमत बात अपारा ॥
कलयुग आवत है चल भाई । लै २ पान लोक बलि जाई ॥
करिहै निरंजन कलिय विचारा । वट२ कुमत उपजहि संसारा ॥
ब्राह्मण कलिमें मछरी खैहैं । विष्णु देह धर नरके जैहैं ॥
धरिहैं निरंजन रूप मलीक्षा । गऊ विगहिं दुख देहिं अदीक्षा ॥
बडा प्रपंच करि है जिव लागी । अनंत रूप धर नट बट पागी ॥
दोहा—चोरी और छिनारी, आमिष भष जिव घात ।
यह सब करिहैं निरंजन, जीवन वड उत्पात ॥
काजी रूप निरंजन पांडे । एके काल दोऊ घर भांडे ॥
एके विष्णौ दुतिय दूबे । त्रिविध तिवारी पांडे चौबे ॥
छठयें सतयें अठयें नौवें । दसयें दस प्रकार द्विज सोमे ॥
कबीरकृष्णगीता ।
५५
नौवैं नौ नारी प्रमोधा । दसवैं दस द्वार जिन सोधा ॥
अठवैं अष्ट कमल जो भिन्ना । सतयै सत्य वाक गहि लीना ॥
षट्ये षड्स त्यागे भाई । पाठै पचर्यै वेद पढाई ॥
चौवै चार वेद जो राता । तिवारी त्रिगुण देव भगु माता ॥
दूवै दुवधा दूर बहावे । एक असल सत्यनाम समावे ॥
एक सो जन कबीर विष्णो गता । दयाशील पतिपाल अगतगत ॥
व्यास सुखदेव वचन ।
कहे सुखदेव व्यास कर जोरी । कहहु चौरासी केतिक खोरी ॥
कबीरवचन ।
कहैं कबीर सुनो सब कोई । चार खान चौरासी लक्ष होई ॥
नौ लख जलमो जीव समाना । चौदह लक्ष पंछी परवाना ॥
ऊमि कीट सत्ताइस लाख । तीस लाख स्थावर भाषा ॥
चार लाख मालुष तन जाना । मालुष देह परमपद जाना ॥
चार खान अब सुनहु व्यासा । चौरासी चार निरंजन फांसा ॥
अंडज पिंडज ऊष्मज अंकुरा । चार खान जिव एकहिं पूरा ॥
पुरुष दीन्ह जिव अम्बर चोला । इच्छारूपी उडुगण खोला ॥
सौ चोला को निरंजन पैन्हा । नरक कलमा काया जिव दीन्हा ॥
भये असतो निरंजन जबते । आनके आप लियो अब जबते ॥
कुमत असत जिव घात निरंजन । जिव पालक सतनाम सो सज्जन ॥
आपन जनमल ताहु दुखदाई । त्रियसुत निराकार निज खाई ॥
कहेो जीव कैसेके बांचे । सत्यनाम विन यमघर नांचे ॥
मीन भक्षककी गतिका वर्णन
५६
कबीरकृष्णगीता ।
विष्णुवचन ।
उठके कृष्ण केहं कर जोरी । कल भखमीन कौनगति मोरी ॥
मीनरूप है विष्णुके स्वामी । जीव भक्षकके कस गत कामी ॥
कबीरवचन ।
कहैं कधीर सुनो भगवाना । मीन भक्ष गडघात निदाना ॥
परनारीरत नरक अधोरा । लोहू पीव भिक्षा मह बोरा ॥
द्वादश तेहि योजन भौसागर । भिक्षा मूत्र कमि दचागर ॥
नरकको कुंड सात यम कीन्हा । घोर नरक भौसागर चीन्हा ॥
भिक्षाकुंड ॥ १ ॥ मूत्रकुंड ॥ २ ॥ रावीकुंड ॥ ३ ॥ रक्तकुंड ४
खरवारकुंड ॥ ५ ॥ नासिकामलकुंड ॥ ६ ॥ धातुकुंड ॥ ७ ॥
सुनहु आठे अग्रिकुंड ॥ ८ ॥ पांचसौ ते रे बडे सुंड ॥
पांचसौ योजन चकराई भाई । लक्ष योजन के हैं गहराई ॥
भौसागरका भंवर भयावन । बूडे पापी अधिक अपावन ॥
राम चीन्ह पुन चीन्हे नामा । सत्यनाम सो सुखके धामा ॥
सत्यनामको वेद न जाने । निराकार कह वेद बखाने ॥
निरंजन के स्वासा ते आयवेदा । आगे कैसे जाने भेदा ॥
वेद नीत बहु विमल बखाने । तांत्रिक घात सुनी मन जाने ॥
दोहा-वेद मते वैकुंठ मिल, दया भाव सतसंग ।
तांत्रिक नरक बुडावे, वैदिक रामप्रसंग ॥
परे बाढ मछरी जस भाई । सलिता बूडे मीन उतराई ॥
पलटत पानी चले जो मीना । परे सलिठ नीको तिन कीन्हा ॥
देहैं लोभ चारा बहुताई । परे फांस मन मति अरुझाई ॥
जीव बधनेका पाप
कवीरकृष्णगीता ।
५७
यह विध सिरजन बट जिव आये । यहां निरंजन कीर वझाये ॥
छिन्न सुखदे सब सुख हर लीन्हा । अन्मर जन्म जीव नहिं दीन्हा ॥
कहा करो जो काल नसायो । विना पेयादा दाय न पायो ॥
कहैं कवीर जो संतका द्रोही । निश्चय काल गरासे बोही ॥
कोटिन जीव वधे कर पापा । तेहि जो अजिया सुख एक लापा ॥
अजियासुत दूध भाई दौई । सो सांचा जिन शब्द विलौई ॥
सद्गुरु शब्द लखे अरि हीता । सब भक्षक एक सद्गुरु मीता ॥
जो जेहि काटे सो तेहि मारे । मारन छल तेहि काल सुधारे ॥
कोट बालक वधे एक त्रिया बालक । कोट त्रिया वधे पाप एक गायक ॥
कोट गाय वधे एक झख सार्व । झख मछरी कोटिन बुधतार्व ॥
कोटिन पाप बसे तेहि माहीं । विप्रघातसम पातक तार्व ॥
कोट विप्र वधे विष्णव एका । विष्णव वध होय पाप अनेका ॥
जीवत महितन भरत प्रतमाळा । तब तक नरक भोग बस काळा ॥
मालुष तन धर भक्त न कीन्हा । भक्तही बूढे कमीना ॥
सद्गुरु भक्त प्राप्त जिव होई । कहैं कवीर सतलोक गये सोई ॥
सद्गुरु भक्त प्राप्त बडभागी । बडे भाग्य बैरागी अलुरागी ॥
जन्म अनेक तब पुण्य कमाई । होय मास बासी सो जन्मे आई ॥
बनवासी न करे विवाहा । काहु पुरुष सुख दधि न बाहा ॥
सात जन्म जो सततन राखा । तब सो सब पुरुष पत भाषा ॥
सात जन्म सो पियासंग जरई । तब सो पतिव्रता औतरई ॥
सात जन्म पतिव्रत कमावे । सत्तभक्त कर सद्गुरु पावे ॥
सात जन्म करे गुरुसेवा । तजे आस सब देवी देवा ॥
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कबीरसाहबसे दर्शन देनेके लिये सब देवताओंका प्रार्थना करना
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कबीरकृष्णगीता ।
तीरथ वरतका तेजहिं आसा । गुरुके चरण केवल विश्वास । ॥
घात झोह तजे परनारी । आग्नि तजे ले बिसम विचारी ॥
हंसहि रंभर लोकहिं जाहीं । विष्णु सतगुन गुरु तारहिं ताहीं ॥
सतकबीर हंसन गते होई । सत्यकबीर निज सद्गुरु सोई ॥
गुरु सद्गुरु परमगुरु लोई । कहै कबीर अब गुप्त हम होई ॥
प्रगट होउं जब इच्छा तोही । मैं तो जात अबहि जग सोई ॥
एक बेर अब पृथ्वी जाऊं । यम सिर तोंड जीव सुत्काऊं ॥
सब मिल सुमरो सद्गुरु नामा । छांडहु कीतम देय सो वामा ॥
रामनाम सद्गुरु प्रवाना । सद्गुरु सत्यकबीर निरवाना ॥
सद्गुरु गये काल अरहैरा । ज्ञानधनुष कर ध्यान पवैरा ॥
मोरेउ मन माया अभिमानी । तारेउ साधु संत गलतानी ॥
तीन लोक बनकाथा भयऊ । तेहि मह बाघ सिंह ठग रहैऊ ॥
सत्यकबीर जो होय सहाई । तौन जीव यम जीत वनाई ॥
व्यासवचन ।
कहै सुख व्यास कृष्ण सो रोई । सत्यकबीर सम और न कोई ॥
दया करेहु तम कृष्ण गोसाई । सत्यकबीर कहैं लेहु बलाई ॥
कृष्णवचन ।
कहैं खनंग आरि व्यास समेता । कहैं कृष्ण अर्जुन समहैता ॥
कहैं कृष्ण सतनाम कबीरा । न्यारा व्यापक सकल शरीरा ॥
दोहा—तुमहिसे सब प्रगटे, तुमते सब विस्तार ।
निराकार सिर मर्दन, सो कबीर औतार ॥
देहु दरश सत्पुरुष अनादी । तुव दर्शन विन जरो ब्रह्मादी ॥
कपिलमुनिका पान परवाना लेना
कबीरकृष्णगीता ।
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प्रगट सत्यकबीर देहु दरशन । कहैं कृष्ण मोहि पर होहु प्रशन ॥
कबीर दरश विन कृष्ण अधीरा । प्रगट भये तब सत्यकबीरा ॥
भौ वैकुंठ महा अज्ञानी । पुष्प विमान चढ़ि पहुँचे आनी ॥
भये सुवास वैकुंठ अंजोरा । सत्यकबीर देख चहुँ ओरा ॥
अधर विमान उत्तर नहिँ नीचा । आवत अभी सबनपर सींचा ॥
रतुत २ बोले सब देवा । अष्टांग दंडवत आशिष लेवा ॥
कहैं गरुड हरि होहु सवारी । उठ कबीरके चरणन पारी ॥
कहैं कृष्ण सुन गरुड सुजाना । अपना योग्य बात नहिँ आना ॥
हम सेवक कबीरके आही । स्वामीसे सरवर नहिँ चाही ॥
समर्थ अधरते करिहैं दया । इतना कहत आप प्रभुराया ॥
आय विमान वैकुंठ तेहि ठयऊ । स्तुति सकल देव मुनि कियऊ ॥
कृष्ण व्यास पंडो पगु लगे । चरण पखार सकल मिल पागे ॥
पूछहिँ ज्ञान कपिलमुनि देवा । सत्यकबीर कहु सत्यको भेवा ॥
दोहा—श्रोता वक्ता कौन घर, जब नर आवे नींद ।
शब्द विराजे कौन घर, पूछहिँ कपिल मुनींद ॥
कबीरवचन ।
सिद्ध जाहि दरबार महँ, ब्रह्मरंध्रके तीर ।
श्रोता वक्ता एक शब्द सुतसंग, मुनिसो कहैं कबीर ॥
कपिलमुनिवचन ।
कहैं कपिलमुनि मोकहैं तारो । निरंजन वाघसो मोहि उबारो ॥
हृदय जपिहों तुन्हरो नामा । जेहि दिन यमसों छोरैहु प्राणा ॥