सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
कबीर कृष्ण गीता

कबीर कृष्ण गीता

Kabir Krishna Gita

युगल आनंद विहारी द्वारा

स्रोत: Kabir Krishna Gita - Yugal Anand Vihari · Archive.org (उद्गम)

Devanagarihipublished168 पृष्ठ

पृष्ठ 70, कुल 168 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 70

५६

कबीरकृष्णगीता ।

विष्णुवचन ।

उठके कृष्ण केहं कर जोरी । कल भखमीन कौनगति मोरी ॥
मीनरूप है विष्णुके स्वामी । जीव भक्षकके कस गत कामी ॥

कबीरवचन ।

कहैं कधीर सुनो भगवाना । मीन भक्ष गडघात निदाना ॥
परनारीरत नरक अधोरा । लोहू पीव भिक्षा मह बोरा ॥
द्वादश तेहि योजन भौसागर । भिक्षा मूत्र कमि दचागर ॥
नरकको कुंड सात यम कीन्हा । घोर नरक भौसागर चीन्हा ॥
भिक्षाकुंड ॥ १ ॥ मूत्रकुंड ॥ २ ॥ रावीकुंड ॥ ३ ॥ रक्तकुंड ४
खरवारकुंड ॥ ५ ॥ नासिकामलकुंड ॥ ६ ॥ धातुकुंड ॥ ७ ॥
सुनहु आठे अग्रिकुंड ॥ ८ ॥ पांचसौ ते रे बडे सुंड ॥
पांचसौ योजन चकराई भाई । लक्ष योजन के हैं गहराई ॥
भौसागरका भंवर भयावन । बूडे पापी अधिक अपावन ॥
राम चीन्ह पुन चीन्हे नामा । सत्यनाम सो सुखके धामा ॥
सत्यनामको वेद न जाने । निराकार कह वेद बखाने ॥
निरंजन के स्वासा ते आयवेदा । आगे कैसे जाने भेदा ॥
वेद नीत बहु विमल बखाने । तांत्रिक घात सुनी मन जाने ॥

दोहा-वेद मते वैकुंठ मिल, दया भाव सतसंग ।

तांत्रिक नरक बुडावे, वैदिक रामप्रसंग ॥

परे बाढ मछरी जस भाई । सलिता बूडे मीन उतराई ॥
पलटत पानी चले जो मीना । परे सलिठ नीको तिन कीन्हा ॥
देहैं लोभ चारा बहुताई । परे फांस मन मति अरुझाई ॥