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कबीर कृष्ण गीता

Kabir Krishna Gita

युगल आनंद विहारी द्वारा

स्रोत: Kabir Krishna Gita - Yugal Anand Vihari · Archive.org (उद्गम)

Devanagarihipublished168 पृष्ठ

साधुके लक्षण - रमता और बैठाका भाव

११८

कबीरकृष्णगीता ।

जहँ कबीर समर्थ गुरु आपे । सुखपे पान नाक किम थापे ॥
पूछहु सत्यकबीरसे जाई । कबीर कहै सोइ बीज ठहराई ॥
कहै व्यास तुम करता स्वाधी । कबीर समर्थ करता सुखखानी ॥

कृष्णवचन ।

कहै कृष्ण व्यास निज दासा । गुरुके एक रोम प्रति आसा ॥
करता हरता दाता भुगता । गूह बैरागी योगी जुगता ॥
कौनहु पंथ गुरु सम नहीं कोई । सबपर श्रेष्ठ कबीर गुरु सोई ॥
सुन सतनाम कबीर गोसाई । गूही विरक्त गत देहैं चिन्हाई ॥

गरुडव्यासवचन ।

गरुड व्यास हरि चरण लपटाने । कबीर चरण गहि विनती ठाने ॥
कबीरसे पूछहिं व्यास निरुवारा । रमता बैठे भाव विचारा ॥
स्थिर रमता भेद बताऊं । ग्रेही औ बैराग सुनाऊं ॥
तुम कहैं प्रिय रमताकी बैठे । बैरागी प्रिय औ गूह गूढा ॥
धर्मदास तुम्हरे कंडहारा । नाम बोहित तुव नाम अधारा ॥
और सबके तुम हो सुखदाई । सुक्त पंथ मोहि कहो समुझाई ॥

कबीरवचन ।

कहै कबीर गरुड सुख व्यासा । कृष्ण सभेत सुनहु सब दासा ॥
कहै कबीर सुनो सुनि व्यासा । भो मोहि प्रीत भजे मोहि दासा ॥
ग्रेही भक्त सो उत्तम आहि । बैरागी उत्तम गूह माही ॥
ग्रेही भक्त आपन कुल तारे । बैरागी औरन निस्तारे ॥
ग्रेही भक्तसो ना कर भाऊ । बैरागी पारस निरभाऊं ॥
साकट आमिष अहारी प्रेता । खोवे हीरा जन्म अचेता ॥
धन्य भाग जो राधेव नामा । नाम भक्त प्रीत सुखधामा ॥

कवीरकृष्णगीता ।

११९

बिन सतनाम तरे नहिं कोई । क्रीतम नाम ते काज न होई ॥
सत्यनाम सदुरु लख पावे । यम फंद काट सुकतावे ॥
अगरलोक ले राखें हंसा । छूटे जन्म मरणकी संसा ॥
सदुरुकी आसा चित राखे । सोई करे शिष्य जो गुरु भाषे ॥
केते शिष्य गुरुको तज भागे । तीर्थ व्रतकी आसा लागे ॥
तीर्थ व्रत कोइ तारे नाही । सबे सुकत गुरुसेवा भाहीं ॥
एक लाभ दिसंतर होई । साध दरश गुरु लाभ है सोई ॥
औ तन मन दृढ रहे गुरुसेवा । ते फल सब घर बैठे लेवा ॥
अथवा जो मन होय उदासा । देखिय संतनकेर विलासा ॥
तो गुरु सेवा महँ कोइ राखी। करहु दिसंतर दानेहं साखी ॥
गुरुकहैं अकेला तजे न भाई । कल्पे गुरु तेहि दोष बहु भाई ॥
गुरु आज्ञा जो करे दिसंतर । नाम सुरत गुरु ध्यान निरंतर ॥

दोहा—सात पांच संमत भरी, गुरु सेवा चित राख ।

तब गुरु आज्ञा लेयके, करे दिसंतर जाय ॥

करे दिसंतर देखे देश । देखे राजा रंक नरेशा ॥
ज्ञानीके दशा विचारे लेखे । काम क्रोधका सुरचा पेखे ॥
मनकी दशा चीन्हु विसरावे । मन मायाका रंग न भावे ॥
जहँलग कुपंथ धोखा भ्रमा । तहँलग आय मन माया कर्मा ॥
नागिन नारका चौंट बचावे । नाम ध्यानसो दशा जुगावे ॥
आपा त्यागे रहे दीनता । शब्द प्रकाशे नाम लीनता ॥

१२०

कबीरकृष्णगीता ।

सत्यनामकी यहिमा भाषे । तृष्णा लोभ न मनयें राखे ॥
रहे असोच सो आपन कामा । पल २ निशि दिन आठहु याभा ॥
पर पोषण भिक्षा नहीं लाजा । निच पिच करहि बल सभाजा ॥
बेगमी रहे भरोसे साहेब । सोई संत सब माहि सुसाहेब ॥
आवे सहज विचार सो पावे । परिहरि आश्रिष अंकुर फल पावे
सत्यपुरुष कहैं भोग लगाने । महाप्रसाद संत मिल पावे ॥
कोइ जीव वचन नहीं पावे । सबर्म राम कबीर कहावे ॥
कोई फकीर होय पाले देहा । मकरा तजि गोहसो नेहा ॥
जो साहेब भेजे सो पावे । रुखा सूखा नहीं विलगावे ॥
क्या पाटम्बर क्या टाटम्बर । क्या चिंतामणि क्या पीतांबर ॥
जो साहेब भेजे सो सही । कलपत भिक्षा लेना नहीं ॥
विन मांगे कोइ कोट चढावे । सो लीजे कछु दोष न आवे ॥
सहज अजाची भिक्षा आवे । आप चुगे औ सबहि चुगावे ॥
गुरु पूजा संतन सेवकाई । सबसो भीत सुमत सुचिताई ॥
वह माया कहु कौने काजा । जो नहीं परमारथ पथ साजा ॥
एक जो माया जोगवहि भाई । विलसहि आप औरन डहकाई ।
यह माया है यमकी फांसी । नाम विना भरणें चौरासी ॥
दोहा-माया है दो भांतिकी, जो कोइ जाने खाय ।
एक मिलोवे नामको, एक नरक ले जाय ॥
आसुरी माया आपाहि पोवे, गाढे परे न हट ।
सातकी सो परमारथ, संतन घाले मूठ ॥
माया जुगवे कौन गुण, अंत न आवे काज ।

कबीरकृष्णगीता ।

१२१

सत्यनाम जुगावहु, माया परमारथ साज ।
संखपछन ले माया, भक्तिहीन जो होय ॥
ता तेहि यम ले आसे, नरक परे पुन रोय ॥
रंक जीव जो सोई, सोई माहि धनवंता ।
धनवंता तो हरि भजे, तो हरष मिले भगवंता ॥
रंक धनीको नहिं चाहे, चाहे प्रेम प्रतीत ।
गुरुभक्ता मोहि भावे, कहैं कबीर अतीत ॥
गुरुभक्ता मम भक्ता, साथ भक्त मम दास ।
हरिभक्ता सोऊ हम, कहैं कबीर हरि व्यास ॥
आत्मपूजा जिव दया, परआत्मको सेव ।
कहैं कबीर सत्यनाम भज, सहज परम पद लेव ॥

पांचहुको लखे परंपंचा । नाम भजे जिव पावे संचा ॥
पांचों परंपंची तन सुगता । पांच तीन साथे अवधूता ॥
सुर नर अज हरि हर सुनि जेतै । तन घर पांच तीन घर तेतै ॥
विरला गुरु गम परखि भये न्यारा । सो वांचे जिन शब्द विचारा ॥
जो राजामहैं थाको माना । शब्द महंत महातम जाना ॥
शब्द विना जग बाउर अंधा । शब्द विना जग परे यमफंदा ॥
सहुर शब्द परख पंथ चाला । जो जीते जग बरवस काला ॥
मन काल निरंजन अंसा । अज्ञानीको करे विधंसा ॥
ज्ञान प्रवेश होय मन सांचा । नाम बचे जिव यमसों वांचा ॥
भजे नाम जो मन चितलाई । पांच पचीस तीन थक जाई ॥
गगट होय कला सतनामा । शब्द परख चले तेहि शुभ कामा ॥

६

१२२

कबीरकृष्णगीता ।

दोहा—नैन नासिक जिभ्या, श्रवण इंद्री स्थान ।

पाचों आने सहज घर, सोई सिद्ध प्रवान ॥

जिभ्या बंका घाट जुगावे । मिथ्या चुगल आमिस न भावे ॥

जो बोले सो अक्षर सूचा । नाम भक्त सतसंगत ऊंचा ॥

जो साहेब देय धार वृत्त मेवा । सहज भाव कर दोनो लेवा ॥

जैसा भीठा दधि घृत खोवा । फिरका साग ताहि संजोवा ॥

जिभ्या अग्रवास रस भीठा । रसना उतर कंठ तर फीका ॥

दोहा—जैसा भीठा घृत पक, तैसा फीका साग ।

सत्यनाम सो राचे, कहैं कबीर वैराग ॥

ग्रेही साध सेवा करे, भाव भक्त आनंद ।

कहैं कबीर वैरागी, निरवानी निरद्वंद्व ॥

शब्द विचारे पंथ चले ज्ञान गली दे पांव ।

क्या रमता क्या बैठे क्या गृह कंदल छांव ॥

सुरत सोहागिल सो सही, जो गुरु आज्ञा माहिं ।

गुरु आज्ञा जो भेटे, ताहि कुशल हो नाहिं ॥

पिय सन्मुख सेवा करे, जो पतिव्रता जान ।

पिय तज जो जित तित रमे, वरत भंग तप मान ॥

गुरुआज्ञा ले आवे, गुरु आज्ञा ले जाय ।

कहैं कबीर सो संत प्यारे, बहुविध अमृत खाय ॥

कहैं कबीर गुरु प्रेमवश, क्या नेरे क्या दूर ।

जाको चित जासों बसे, सो तेहि सदा हजूर ॥

कबीरकृष्णगीता ।

१२३

गुरुआज्ञाते जो रमे, रमतें तजे शरीर ।
ताके सुक्त हजूर हैं, सदुरु कहें कबीर ॥
गुरुके सन्मुख जो रहे, सहे कसौटी दुःख ।
कहें कबीर वा दुःख पर, वारों कोटिन सुख ॥
सदुरु अधम उधारन, दयासिंधु गुरु नाम ।
गुरु विन कोई न तर सके, क्या जप अल्लह राम ॥
गुरु सुक्तावे जीव कहें, चौरासी बंद छोर ।
सुक्त प्रवाना देहिं जो, यमसो तिनका तोड़ ॥
वेद पुराण साधु गुरु, सवन कहा निज बात ।
गुरुते अधिक न दूसर, क्या हरि क्या पितु मात ॥
ताते शब्द विवेक कर, कीजिये सो साज ॥
जोहि विध गुरुसो प्रीत रह, कजि सोई काज ॥
गुरुसो प्रीत निवाहिये, जेहि तत निवहे संत ।
प्रेम बिना ढिग दूर है, प्रीत निकट गुरु कंथ ॥
सोइ नाचना नाचिये, जेहि निवहे गुरुप्रेम ।
कहें कबीर गुरु प्रेम विन, कितहु कुशलना क्षेम ॥
तन मन सीस निछावर, दजि सरबस प्राण ।
कहें कबीर दुख सुख हरे, सदा रहे गलतान ॥
तब जो गुरु प्रिय बैन कहि, शिष्यहि चितवे दीठ ।
तो रहिये गुरु सन्मुख, कबहुं न दजि पीठ ॥
गुरु मारे झटकारे, गुरु बोरे गुरु तात ।
गुरुसों प्रीत निवाहिये, गुरु भौ निधि काडिहार ॥

ज्ञान दशा और मनकी दशाका वर्णन (गुरुमुखी और मनमुखी)

१२४

कबीरकृष्णगीता ।

सनेह प्रेम गुरु चरणमें, जेहि प्रकार सो होय ।
क्या नरे क्या दूर बस, प्रेम भक्त सुख सोय ॥
जेहि विधि शिष्यके मन बसे, गुरुपद परमसनेह ।
कहैं कबीर काफर ठिग, क्या पर्वत बन ग्रेह ॥
सोई साधपतिव्रता जो, सदा जरे पिय आग ।
लाभ हानि बिसराइके, रहे चरण गुरु लाग ॥
जो गुरु पूरा होय तो, शिष्यहिं लेय निवाह ।
शिष्यभाव सुत जानिये, सुतते श्रेष्ठ शिष्य आय ॥
अबुध सुबुध सुत मात पितृ, सबहिं करे प्रतिपाल ।
अपनी और निवाह गुरु, शिष्य सुख लहे निज चाल
जैसे सती संग जरे, आस पतीकी त्याग ।
सुघर कूर सोचे नहीं, शिष्य पतिव्रत सोहाग ॥
सरबस सीस चढाइके, तन कृत सेवा सार ।
शुभ पियास सहि ताड़ना, गुरुकी सुरति निहार ॥
गुरुको दोष रतिक नहीं, शिष्य न साथे आप ।
शिष्य ना छोड़े मनमता, गुरुहिं दोष दे पाप ॥
जैसी सेवा शिष्य करे, तस फल प्राप्त होय ।
जो बोवे सो लुवे, कहैं कबीर विलोय ॥
कहैं कबीर गुरु सो मिले, नाम होय प्रकाश ।
गुरु मिलिशिष्य भौनिधि तरे, सुनहुकृष्ण मुनिव्यास
सुनियो संतन साध मिल, कहैं कबीर समुझाय ।
जेहि विधि गुरुसो प्रीत होय, कीजे सोइ उपाय ॥

कविरत्नमणिगीता ।

१२५

व्यासवचन ।

चिनती व्यास कीन्ह पंग देकी । तुमसन काहु न देख विवेकी ॥
ज्ञान दसा औ मनकी दसा । सत्यकवीर करो प्रकाशा ॥

कवीर वचन ।

कहैं कवीर निरनै टकसारा । मनमत ज्ञानमता निरुवारा ॥
ज्ञान अंग प्रथम गुरु करई । गुरुको शब्द हृदय गह धरई ॥
गुरु तो ऐसा कीजे भाई । पूर्ण ज्ञान सत चाल ददाई ॥
सचलोकले जीव पहुँचावे । दया क्षमा सुखसिंधु समावे ॥
पूछे गुरुसे होय गलताना । जो गुरु कहे सोई सतमाना ॥
गुरुसुख ज्ञान विचारे लीन्हा । मन औ ज्ञान भिन्न तब कीन्हा ॥
दया क्षमा औ शील संतोषा । ज्ञान दया औ जीवपंथ मोषा ॥
विष्णो ज्ञान साकट अज्ञानी । शीतल ज्ञान क्रोध मन जानी ॥
असंत औ आतुर ज्ञाना । शील ज्ञान बेशील अज्ञाना ॥
निरगुण ज्ञान औ ज्ञान अतीला । धीरज ज्ञान अज्ञान हडीला ॥
आप खाय औरहिं देय ज्ञाना । गुरु साधू तज खाय अज्ञाना ॥
सेवा ज्ञान न उस अज्ञाना । कामी मन निहकामी ज्ञाना ॥
तीर्थ व्रत तप मनको भाऊ । नाम भक्त पुन ज्ञान लखाऊ ॥
चंचल मन स्थिर गुरु ज्ञाना । चंद भान ज्ञान अगनित भाना ॥
दिवस ज्ञान अज्ञान भौ राती । अवरण ज्ञान अभै नाजाती ॥
आतम पूजा ज्ञान बखाना । मनमत सिला धात व्रत ठाना ॥
दुबल सुपद ज्ञान प्राति ठाना । डिम धार को पूजे अज्ञाना ॥

१२६

कवीरक्षणगीता ।

मात पिता सेवे शुभ ज्ञाना । तात जननी तज त्रिय मन माना ॥
डिंभ अहंकार दुर्ता मन छाया । अछत दीन लघु ज्ञान सुभाया ॥
पालक ज्ञान घालक यम बाजी । जैसे जग मनमत दिज काजी ॥
बोलता ज्ञान तन मन अंकारा । जाग्रित ज्ञान स्वप्न मन चारा ॥
ज्ञान परमार्थ स्वार्थ मन मूढ़ । जुवा मनुज ज्ञान पद बूढ़ ॥
अपन पराया एक सम जाना । और तोर मन बुध विगराना ॥
मात पिता सिर देय सो ज्ञाना । अहिब नारी विष खोट अज्ञाना ॥
भीस अजाची ज्ञानको अंगा । धूमधाम जांचक मनरंगा ॥
देह दाग मनमता कहावा । मन दागे जो ज्ञान सुभावा ॥
नाच छाछ विश्वा नट ठाढी । यह मनमता यम चौकी गाढी ॥
भीन नास मद क्षण मन बाजी । कसतुरी मिमयाय असत बन खाजी ॥
चाहे बैराग तजे नहिं रानी । सन्यासी संग्रह मन चारी ॥
झंसे मन पुलकित होय आना । सरगुन गुरु मन सट्टुर ज्ञाना ॥
चाहे भिस्त तजे नहिं मोहा । मोह अज्ञान ज्ञान निरमोहा ॥
सतगुण ज्ञान रज तम मन दीसा । मन मलेश गुण पांच पचीसा ॥
जागे ज्ञान सोय अज्ञाना । सो जागा जिन राम पहिचाना ॥
सोइ अज्ञान गुरु सेवा नहिं कीन्ह ॥ गुरुको सार असार नहिं चीन्ह ॥
ज्ञान अमर मन मरे नसाई । ज्ञान पारस मन सुरत होय जाई ॥
ज्ञान अमर पद सार सो बाहर । सट्टुर भिल आवे शिष्य ठाहर ॥
बाहरसे घट ब्रह्म समाना । सो जिवलोक ते न्यारा निरवाना ॥
अभी ज्ञान सो सत्य कवीर । बिबै निरंजन नीर सरिर ॥
जीव अभी सो नाम कवीरा । देह निरंजन बिबै शरीरा ॥

कलियुगमें कबीर साहब क्यों प्रकट हुए ?

कवीरकृष्णगीता ।

१२७

आवत स्वास सो सत्य कबीरा । निकसत मरे निरंजन कीरा ॥
गौर हथीर मन माया जानो । अजर पीर कबीर बखानो ॥
व्यास कहैं कस पीर कबीरा । सत्य कबीर भलदास गंभीरा ॥

कवीरवचन ।

कहैं कबीर कलमुगके आदी । मीन मांस भाखिहैं नर वादी ॥
होय मलेश महदेव ऐहैं । गौ द्विज वधि सिरिया नैगी ऐहै ॥
महादेवहिं महम्मद कहिये । हिंदू केर धर्म नहिं रहिये ॥
तब हम पीर कबीर कहाउव । साथि मलेश गौ द्विजहिं बुचाउव ॥
विष्णु पक्षका भयो प्रकाश । हमरे विष्णुसों कस दुइ भासा ॥

दोहा—दास कबीर कहाउव, रजव गुरु करव संसार ।

सत्यकबीर कहाउव, संतनके निस्तार ॥

जन कबीर भये नरतन धारा । कबीर कहाये जिव तन सारा ॥
हंस कबीर होय भजव सतनामा । अम्बर कबीर अमर सो जाभा ॥
गैनी नाम कबीर कहाउव । बहु बंधनते जीव मुक्ताउव ॥
अविगत कबीर कहाउव तबहीं । स्वयं च अधम उवारव जवहीं ॥
अकह कबीर केह को लीला । अविनाशी नहिं विनस शरीरा ॥
नाम कबीर वास सब देहा । रमैं कबीर रामतन खेहा ॥
रमैं कबीर होय रमता रामा । रमता स्वास जिव तन विश्रामा ॥
दीन दयाल कबीर कहाये । दीन दुखित जिव पालन आये ॥
खसम कबीर कहाये तबहीं । जीव सोहंगदे व्याहेउ जवहीं ॥
काल भरदन कबीर कहाये । यमहिं जीत जिवलोक पठाये ॥

१२८

कबीरकृष्णगीता ।

जोगजीत तब नाम हमारा । जब जीते योग माया निराकारा ॥
सतसुक्ति तब नाम हमारा । जब सत् प्रकाश कीन्ह संसारा ॥
बंदीछोर तबहिं कहलावा । जब यम बंदिछोर सुकावा ॥
मनकहैं जीत सुनीन्द्र कहाये । करुणामय होय दया ददाये ॥
सब फुलवा बेलि हमारी । निरंजन कहैं सौंपा वारी ॥
निरंजन पुत्र पुत्री अष्टंगी । मम द्रोही जो ताको संगी ॥
हमरे दुष्ट मित्र नहीं कोई । सर्वहिं व्यापक न्यारा सोई ॥
साधु द्रोह सोई मम द्रोहा । साधुसेवक मम सेवक बोहा ॥
जो मम संतकी सेवा करई । हमहिं जानके गुरुको धरई ॥
ताहि सुकिका संशय नहीं । गुरु साध भक्ता मम आहीं ॥
गुरुदोही सो साधुको द्रोही । अपने राम न भेटेउ बोही ॥
जगमहैं चहुंयुग गुरुऔ रामा । राजा राम गुरु सुखधामा ॥
गुरु राम दोय नाम हमारा । राम असोच गुरु भौकंडहारा ॥
अगम ज्ञान मन पूछहिं बाला । बहुहरहिं पूछेऊं पीर व्याला ॥
पीर परा ईसब दिन मेरा । सोई पीर जेहिपीर जिव केरा ॥
कहौकहां लग विकृत कलाजग । निरंजन एक मम रोम तनलग ॥

व्यासवचन ।

व्यास चरण गहि पुलकितभयऊं । सत्य कबीर मोहिं मानद दियऊं
बडे भाग मम सुखदेवकेरा । और गडुरके भाग बधेरा ॥
व्यासदेव कृष्णहिं सिर नाये । धन्य तुम कृष्ण कबीर चिन्हाये ॥
कबीर बिना को राखे जिवको । गुरु बिन कौन चिन्हावे पिवको ॥
गुरु विष्णु सत सतको अंशा । सोई सत्यकबीर कुलवंशा ॥

सब देवताओंका कबीरसाहबका शिष्य होना

कवीरकृष्णगीता ।

१२९

सबके मूल कवीर ठहराने । कवीरके डर यमराज डराने ॥
कृष्णवचन ।

कहैं कृष्ण सुन व्यास मत धीरा । सब सट्टुणके गुरु कवीरा ॥
लेहु पान सबही मम दीक्षा । सत्यकवीर कहैं अर्णहु सीसा ॥
सट्टुर कवीर गुरु करहु रे भाई । श्रीकृष्ण सबको ससुझाई ॥
जहैलग सट्टुण देवता रहऊ । सबन धाय सट्टुर पद गहऊ ॥
उभै कहे विष चक्षु नीरा । देहु प्रवाना सत्य कवीरा ॥
कवीरवचन ।

कहैं कवीर सुनो सब देवा । कृष्णसो पूछहु हमरी भेवा ॥
हम हैं अजर भुक्तके दाता । हमरे शरण यम त्रास निपाता ॥
जो हम कहा शब्द सहिदानी । शब्दकी चाल चले सो ज्ञानी ॥
सबन कहा अपौं शिर तोही । देहु पान आपन कर मोही ॥
सत्यकवीर तब आरती कीन्हा । अभी अंक सो वीरा दीन्हा ॥
चरणोदकदे तिलक कर दीन्हा । तुलसि माल दे सिखवनकीन्हा ॥
सब जिव जानहु एक समाना । जीवघात तज ब्रह्म अभिमाना ॥
साधु गुरु सम सेवा मानी । सुख स्थिर सट्टुरकी वाणी ॥
गुरु कर्ता गुरु सम नहीं कोई । गुरु कर्ता ते भेछ है सोई ॥
करता देही धर गुरु करही । तो करता करता होय परही ॥
सब महाँ करता नाम कवीरा । रमें राम होय सकल शरीरा ॥
सर्व यई सो राय लखाहीं । राम सो अंश कवीरके आहीं ॥
जग महाँ उलटी भाव दिखाये । जो स्वामी सो दास कहाये ॥
करता आद कवीर भये दासा । राम कृष्णकी महिमा प्रकाशा ॥

लक्ष्मी आदि देवियोंके गुरुमुख होनेका वृत्तान्त

१३०

कबीरकृष्णगीता ।

सबमो राम सो रमहिं कबीरा । जैसे घृत व्यापक है क्षीरा ॥
बैठा नवर बराबर पोखे । पाप नाचि तबै पुण्य कर चोखे ॥
ना कोइ पाप जिवघातसमाना । साधुसेवासम पुण्य न आना ॥
गुरुके भक्तसमान नहिं दूजा । पतिव्रता जिमि भियपद पूजा ॥
सद्गुरु पिव सो जीवके आहीं । पतिव्रताते गुरुभक्तभेदआहीं ॥
तिन स्वामीके भक्त सुरलोक । गुरु भियभक्त सो जीवनिसोका ॥
भ्रान मंजार देह धर सोई । गुरु साधुको निन्देउ सोई ॥
हरदम नाम कबीरको गावे । तासु हृदय कबीर सयावे ॥
तजे अभक्ष सुभक्ष सो पावे । भीन मास यदार रत नहिं भावे ॥

दोहा--मधुर मम पाय कसतुरी, माक्षी घोंघी चुन ।

मत्स्य मास मद त्यागे, पहुँचे पुरुष सनीप ॥

पान परवाना पावे, सुमरे सत्य कबीर ।

कहे कबीर घर पहुँचे, बहुर न धरे शरीर ॥

ब्रह्मा विष्णु महेश भवानी । लक्ष्मी गायनि सकुचानी ॥

हम सब गुरुविनकोहिपंथ जायव । ना जानो केहि खान समायव ॥

हमरे स्वामी तेहि सिर दीन्हा । हम तीनों मिल केहि पग लीन्हा ॥

लक्ष्मीवचन ।

लक्ष्मी कहे सुनो ब्रह्माणी । सुन सेवहु कबीर सुखवाणी ॥

चहिये कबीरके दीक्षा लीजे । सत्यकबीर चरण चित दीजे ॥

कह लक्ष्मी मम पति सिरदारा । थो मम पतिके सद्गुरु सारा ॥

यह कह लक्ष्मी विष्णुपहँआई । सीस नाय चरण चित लाई ॥

आज्ञा करिये स्वामी मोरा । तब गुरु करो कबीरबदिछोरा ॥

कबीरकृष्णगीता ।

१ ३१

विष्णुवद्भन ।

हंसके विष्णु तवआयसु दीन्हा । हम जो चहत सोईतुम कीन्हा ॥

दोहा-धन्य भाग तेहि नारको, विष्णव जाको स्वामी ।

बहुर भाग तेहि पुरुषको, जेहि घर विष्णव वामी ।

कहैं कृष्ण नरिअर कर लेहू । सीस निछावर नरियर देहू ॥

दोहा-पान मिष्ठान्न नरियर, पुंगी फल पुष्प श्वेत ।

श्वेत वस्त्र सिंहोसन, साजहु थार समेत ॥

कंचन थार जोत प्रकाश । हीरा माणिक अथ सुवासा ॥

कृष्ण लाय पीछे निज नारी । चले भक्त राधे झझकारी ॥

पुन सत शिवको सिधाई । कबीरके चरण परससवआई ॥

कहैं कृष्ण सुन सत्यकबीर । दीजे शरण नार त्रिय धीर ॥

लक्ष्मीबचन ।

लक्ष्मी कहे विविध कर जोरी । हमको तारहु यमसोबांदिछोरी ॥

कबीरबचन ।

दोहा-कहैं कबीर सुन लक्ष्मी, सोई नार सुलक्ष ।

तन स्वामी जिव पीव कहैं, सेवा करती दक्ष ॥

अपने पति तज आन न जोवे । सोई नार पतिव्रता होवे ॥

पतिव्रता निज प्रियपद पूजा । जग महीं पतितज सृष्टि न दूजा ॥

दोहा-पिय चरणोदक जूठन, पतिव्रताको आधार ।

पियहे अंबू अगिन घसे, सिरदे हने पहार ॥

सवपर सत्यनाम गुरुरूपा । अजर अमर गुरु सत् सख्पा ॥

जीव सबे गुरु समर्थ केरा । जासु प्राण वस जाके चेरा ॥

१३२

कबीरकृष्णगीता ।

तुम तो लक्ष्मी सत्यकी माया । साधु संतपर करिहो दाया ॥
सुनहु कृष्ण स्त्री गुरु स्वामी । तन गुरुपति पति गुरु निज नार्मी।
कृष्णवचन ।

कहैं कृष्ण हम दासी दासा । एक मत घर तब संत विलासा ॥
तब कबीर प्रसाद चढावा । सत्यनाम कहैं भोग लगावा ॥
यम त्रिण तोड दीन्ह परवाना । लक्ष्मी पान पाय सुख माना ॥
चरणामृत सीत प्रसादा । लीन्ह लक्ष्मी सचको स्वादा ॥
सात दंडवत कीन्ह स्वसम कहैं । तीन दंडवत संत तनपति कहैं ॥
कहा कृष्ण अब हम गतिपावा । घर साकट वैष्णव करवावा ॥
केते पुरुष आय गुरु शिष्या । नारी साकट घर प्रेत परेखा ॥

दोहा-भक्ति करे जो स्त्री, तो वीसिये घर माहिं ।
साकट स्त्री भुंभनी; नहिं जैये तेहि पाहिं ॥

स्त्री बेटी बेटा भानजी । मात पितु बंधु परिजन काजी ॥
ये सब सरगुण भ्रम पसारा । मोर मोर कर मरे संसारा ॥
मोर मोर का करहु रे भाई । मोर आप पगु देख तवाई ॥
सब गुण शूद्र तासु धराई । भक्ति बिना कछु काम न आई ॥
अपने मन सब भक्त कराहीं । सार भक्त विन नरक भोगाहीं ॥
सार भक्त सतनाम कबीरा । भजै कबीर न घरै शरीरा ॥
चौथा पद सदुरु स्थाना । सदुरु सत्य कबीर निरवाना ॥
निरगुण भक्त पतिव्रत शरीरा । एक स्वसम सो सत्य कबीरा ॥
त्रिगुण भक्त सो आवा जाहीं । चौरासी मई भटका खाहीं ॥

कबीरकृष्णगीता ।

१३३

दोहा--सतगुण रजगुण तमगुण, तिनके तीन सुभाव ॥
कौन सिरजे कौन पोखे, कोइ संहार कराव ।

रजगुण तमकी उत्पत जाना । सतगुण सोवत जन्म सिराना ॥
तमगुण रुद्र काल संहारे । त्रिगुण निरंजन भसम कर धारे ।
बांचे विष्णु सतगुण सत ठाई । सत्यके मूलसत्य कबीर सतसोई
जेहि जस रुचे तैसो गुरु कीजे । विन गुरुजीव काल वस दीजे ॥

दोहा--सावित्री ओ गौरा, मगन भये हरि बैन ।

कहैं हमहू गुरु करों, सत्य कबीर सुख चैन ॥
कहैं कृष्ण कबीरसे वाणी । शिष्य होन चाहैं त्रिय दाय प्राणी ॥
कबीरवचन ।

कहैं कबीर खीवस स्वामी । पति कहैं पूछ नाम भज नामी ॥
गायत्रीगौरावचन ।

कहैं गायत्री गौरा बहोरी । सबके स्वामी तुम बंदिछोरी ॥
दुतिया माहि कोइ हित नाहीं । दिन दश कच्चा सुख जगमाहीं ॥
अंतकाल जब काल गरासे । तब गुरु विन नहिं कोइ निकसे ॥
अधा अंछंगी तेहमें तानी । लक्ष्मी तुव शरण हम कालअधीनी
सत्यकबीर तुम गुरु पितु माता । तुम्हरी दया बने सब वाता ॥
हम चीन्हा तुम साहेब आहूँ । सब बनजिया तुमही गुरु साहूँ ॥
तुम जेहि चितबहु सो तर जाईं । तुम विन जियरा नरक भोगाईं ॥
गौरा कहैं विहसिके वाणी । हमहू लखा कबीर सहिदानी ॥
जबहिं विष्णु हरिनाकुश मारा । शिव गुणसुत छिन असुरहिं मारा
हमहू शिवगण आईं हां । बैठे हरिनाकुश सिरमाहा ।
जब कबीर विष्णुके माथे । तब देखा मैं शिवके साथे ॥

१३४

कवीरुक्षणगीता ।

कवीरवचन ।

कहैं कवीर सही तुम कहा । होहू शिष्य कपिलमुनि पहा ॥

दोहा-कपिला गऊ कपिल मुनि, हो सट्टरु हो तास ।

तास शिष्य मम पुत्री, तुम्हरे होय निवाह ॥

कृष्णवचन ।

कहा कृष्ण गौरा सावित्रिहिं । एके वृक्ष डारभै निवधिहिं ॥

भूल कवीर निरंजन डारा । साखा त्रिगुण पत्र संसारा ॥

पाँच पचीस जीव संग परऊ । हंस चाल तज बक मग गहू ॥

हंस सोई जिन सट्टरु चीन्हा । सट्टरु सत्यकवीर चित दीन्हा ॥

दोहा-सावत्री औ गौरा, भई कपिलमुनि शिष्य ।

विष्णुआदिक कवीर प्रमोधा, भयो सवन मन हर्ष ॥

तेहि छिन मात्र रुद्र अज आये । देश सुल्क सुख हरहि सुनाये ॥

पूछा विष्णु मृत्युलोक कहानी । चतुरावन शिव कहा बखानी ॥

ब्रह्माशिववचन ।

महा आनंद होत सब ठाऊं । भौ मृत्युलोक वैकुंठ सुभाऊं ॥

विष्णव मया सकल जग जाई । सत्यकवीर जपे दुनियाई ॥

राम कवीर करे पंथ जागा । जग सब भक्त भयउ मद त्यागा ॥

विष्णव होय सो गिने न काहू । कहैं के को तुम अज शिव आहू ॥

कृष्णवचन ।

कहैं कृष्ण यह भलि है बाता । तुम अंकुल काहे अकुलाता ॥

तुमहु भक्त करहु भल चाहहू । तजहु क्रोध सट्टरु पहिचानहू ॥

महादेववचन ।

कहैं महादेव तमकके बाता । सट्टरु तुमहि विष्णु जगदाता ॥

कबीरकृष्णगीता ।

१३५

कृष्णवचन ।

कहे कृष्ण हम सदुरु नाहीं । सदुरुके पदरजको छाहीं ॥
सदुरु एके सत्य कबीरा । काया वीर सतनाम कबीरा ॥
काया वीर बोलता पवना । आद पवनसो स्वास अजौना ॥
खंस हंस सरवर तनयाहीं । अमी अहार सदा सुखयाहीं ॥
सोहंग हंस अंस सतनामा । सोहंग करता पुरुष वखाना ॥
सोहंग एक कबीरते छोटा । सबसे बडे सोहंग रूप मोटा ॥
सोहंग स्वास एकहि नाऊ । अनंत नाम स्वासके भाऊ ॥
दोहा—अनंत नाम एक स्वासके, स्वासा सबके माहिं ।

निरंजन अद्या अज हरिहर, जतरूवास विना कोई नाहिं
सो स्वासा स्वासा विस्तारहि । आद स्वासा सो भौ सोहंग छाही।
वास सोहंग सो ओंकार भो तीनी । सबके रचना कबीरजी कीन्ही
दोहा—राम कबीरके अंश हैं, कबीर रामके अंश ।

राम कबीरके वंश हैं, कबीर रामके वंश ॥
सत्य सो पिता पुत्र होय धाया । तबहिं पुत्र पिता कहलाया ॥
स्वासा सत्यकबीरको अंसा । देह निरंजन घट पर संसा ॥
ब्रह्माशिववचन ।

सुनि ब्रह्मा शिव अचरज भयऊ । तबहीं शिव अस बोले लियऊ ॥
सही कबीर बडे हैं भाई । मोह कहा भूतको राई ॥
जासे हम तुम सब मिल हारा । एक बेर नहिं कैयो बारा ॥
कबीर करता हम तबहीं चीन्हा । खरा जबाब जब हम कह दीन्हा
ब्रह्मा कहे कबीर करतारा । कबीर कला सो अपरम्पारा ॥
निरंजन जाके ढर भौ माना । कबीरके त्राससो काल डेराना ॥

सत्यलोकके हंसोंके रूपका वर्णन

१३६

कबीरकृष्णगीता ।

कृष्णवचन ।

इतना सुन कृष्ण कबीरपहँ हेरा । तब कबीर भगटे तेहि बेरा ॥

सत्यनाम कहि शब्द उचारा । अडुत लीला कला विस्तारा ॥

सोभा लोक रोम एक प्रगटा । अडुत चंद सूर भौ घटा ॥

दोहा-सिंहासन पर बैठे, सट्टरु सत्यकबीर ।

अमित कला छबिको कहे, अडुत हंस मन हीर ॥

धन्य भाग्य वैकुंठके, जहँ प्रगटे सत्यनाम ।

सट्टरु देव अनंदही, रजगुण तमगुण धाम ॥

कला गुप्त किये सत्यकबीरा । जैसेको तैसे यतधीरा ॥

सबे देव थरहर पग लागे । परसत चरण सकल भगभागे ॥

अजहरवचन ।

अजहर सबे कहे हरसेती । सबे शरण गहो यही सुनेती ॥

दोहा-ब्रह्मा विष्णु महेश्वर, सबन कृष्ण समुझाय ।

फिर यह अवसर कहाँ मिले, गहो कबीरके पाँव ॥

हरषत अजहर लीन्हो पाना । नारि पुरुष एक मत निरवाना ॥

चरणाभूत सबहिन कहँ दीन्ह। सबन माँग प्रीतिसो लीन्ह। ॥

कबीरवचन ।

कहे कबीर सुनो त्रियदेवा । आपन अंस रचहु जग सेवा ॥

ठीका पुरे तुम लोक सिधावो । पितुके सेवा अंस बैठावो ॥

सट्टरु भाकि हृदय महँ राखहु । मात पिता सेवा सत भाषहु ॥

माता पिता सबे भल होई । सट्टरु सेय तरे कुल दोई ॥

काम क्रोध आपा घट काढव । सेवा साध सखा घर बाढव ॥

कबीरकृष्णगीता ।

१३७

कहैं कबीर सत्यकी चाली । तरे शिष्य ठागे सुर नाली ॥
सत्य कहे होय कारज जिवके । सत्य गहे मिलिहै निज पियके ॥

दोहा-सत्य ताहि कहैं कहिये, रती न मिथ्या जाहि ।

कहैं कबीर कृष्णगीता, विष्णु व्यास चित चाहि ॥

कहैं कबीर सुनो सब कोई । भाषों काया प्रचे सोई ॥
काया सो जो अमर ना रहई । जिवरा योनी नहि औतरई ॥
षोडश शशि सोहंसन भाला । चकित चंद है कलात्रियभाळा ॥
यनिमाली कंठ माल विराजे । कोटिन रवि शशि नखछविछाजे ॥
छत्र सिंहसन जगमग जोती । हंस खान शशि तिहुँ पुर पोती ॥
अमरलोक सो अमर हंसा । अमृतफल भोजन निहंससा ॥
अमर चीर तन विमल विराजे । देह सुवास प्राणमें छाजे ॥
श्वेत भंवर पंकज विन नाला । अभी सिंधुतट कुंज रिसाला ॥
कमोदनि विमलश्वेत उजियारी । मन पृथ्वी तन फल फुलवारी ॥
विमल सुगंध विटप फलपाता । पक्षी केलिकरें रंग राता ॥
त्रिधि विहंगम मय कर जूहा । चंद उदै फल फूल सबूहा ॥
विहसहि हंस महा रस खानी । दसनपांति मन जगमग वाणी ॥
काया अमर सुगंध अंजोरा । योजन शत सुवास धनघोरा ॥
हंस काया अस अमरलोक । परस पुरुष पद हंस निसोका ॥
यह शोभा संक्षेप वखाना । अद्भुत शोभा अकह अंमाना ॥
सत्यनामका लेय परवाना । निराकारका मर्दन माना ॥
सो पावे यह काया भाई । कहैं कबीर जिन मोहि लौलाई ॥
कोट सूर्य छवि हंसन काया । बहुत अंजोर संक्षेप सुनाया ॥