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सर्वकोश
कबीर कृष्ण गीता

कबीर कृष्ण गीता

Kabir Krishna Gita

युगल आनंद विहारी द्वारा

स्रोत: Kabir Krishna Gita - Yugal Anand Vihari · Archive.org (उद्गम)

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कवीरकृष्णगीता ।

१२७

आवत स्वास सो सत्य कबीरा । निकसत मरे निरंजन कीरा ॥
गौर हथीर मन माया जानो । अजर पीर कबीर बखानो ॥
व्यास कहैं कस पीर कबीरा । सत्य कबीर भलदास गंभीरा ॥

कवीरवचन ।

कहैं कबीर कलमुगके आदी । मीन मांस भाखिहैं नर वादी ॥
होय मलेश महदेव ऐहैं । गौ द्विज वधि सिरिया नैगी ऐहै ॥
महादेवहिं महम्मद कहिये । हिंदू केर धर्म नहिं रहिये ॥
तब हम पीर कबीर कहाउव । साथि मलेश गौ द्विजहिं बुचाउव ॥
विष्णु पक्षका भयो प्रकाश । हमरे विष्णुसों कस दुइ भासा ॥

दोहा—दास कबीर कहाउव, रजव गुरु करव संसार ।

सत्यकबीर कहाउव, संतनके निस्तार ॥

जन कबीर भये नरतन धारा । कबीर कहाये जिव तन सारा ॥
हंस कबीर होय भजव सतनामा । अम्बर कबीर अमर सो जाभा ॥
गैनी नाम कबीर कहाउव । बहु बंधनते जीव मुक्ताउव ॥
अविगत कबीर कहाउव तबहीं । स्वयं च अधम उवारव जवहीं ॥
अकह कबीर केह को लीला । अविनाशी नहिं विनस शरीरा ॥
नाम कबीर वास सब देहा । रमैं कबीर रामतन खेहा ॥
रमैं कबीर होय रमता रामा । रमता स्वास जिव तन विश्रामा ॥
दीन दयाल कबीर कहाये । दीन दुखित जिव पालन आये ॥
खसम कबीर कहाये तबहीं । जीव सोहंगदे व्याहेउ जवहीं ॥
काल भरदन कबीर कहाये । यमहिं जीत जिवलोक पठाये ॥