कबीर कृष्ण गीता
Kabir Krishna Gita
युगल आनंद विहारी द्वारा
स्रोत: Kabir Krishna Gita - Yugal Anand Vihari · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 133, कुल 168 में से
संदर्भ में पढ़ेंकवीरकृष्णगीता ।
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बिन सतनाम तरे नहिं कोई । क्रीतम नाम ते काज न होई ॥
सत्यनाम सदुरु लख पावे । यम फंद काट सुकतावे ॥
अगरलोक ले राखें हंसा । छूटे जन्म मरणकी संसा ॥
सदुरुकी आसा चित राखे । सोई करे शिष्य जो गुरु भाषे ॥
केते शिष्य गुरुको तज भागे । तीर्थ व्रतकी आसा लागे ॥
तीर्थ व्रत कोइ तारे नाही । सबे सुकत गुरुसेवा भाहीं ॥
एक लाभ दिसंतर होई । साध दरश गुरु लाभ है सोई ॥
औ तन मन दृढ रहे गुरुसेवा । ते फल सब घर बैठे लेवा ॥
अथवा जो मन होय उदासा । देखिय संतनकेर विलासा ॥
तो गुरु सेवा महँ कोइ राखी। करहु दिसंतर दानेहं साखी ॥
गुरुकहैं अकेला तजे न भाई । कल्पे गुरु तेहि दोष बहु भाई ॥
गुरु आज्ञा जो करे दिसंतर । नाम सुरत गुरु ध्यान निरंतर ॥
दोहा—सात पांच संमत भरी, गुरु सेवा चित राख ।
तब गुरु आज्ञा लेयके, करे दिसंतर जाय ॥
करे दिसंतर देखे देश । देखे राजा रंक नरेशा ॥
ज्ञानीके दशा विचारे लेखे । काम क्रोधका सुरचा पेखे ॥
मनकी दशा चीन्हु विसरावे । मन मायाका रंग न भावे ॥
जहँलग कुपंथ धोखा भ्रमा । तहँलग आय मन माया कर्मा ॥
नागिन नारका चौंट बचावे । नाम ध्यानसो दशा जुगावे ॥
आपा त्यागे रहे दीनता । शब्द प्रकाशे नाम लीनता ॥