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सर्वकोश
कबीर कृष्ण गीता

कबीर कृष्ण गीता

Kabir Krishna Gita

युगल आनंद विहारी द्वारा

स्रोत: Kabir Krishna Gita - Yugal Anand Vihari · Archive.org (उद्गम)

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कवीरकृष्णगीता ।

१२९

सबके मूल कवीर ठहराने । कवीरके डर यमराज डराने ॥
कृष्णवचन ।

कहैं कृष्ण सुन व्यास मत धीरा । सब सट्टुणके गुरु कवीरा ॥
लेहु पान सबही मम दीक्षा । सत्यकवीर कहैं अर्णहु सीसा ॥
सट्टुर कवीर गुरु करहु रे भाई । श्रीकृष्ण सबको ससुझाई ॥
जहैलग सट्टुण देवता रहऊ । सबन धाय सट्टुर पद गहऊ ॥
उभै कहे विष चक्षु नीरा । देहु प्रवाना सत्य कवीरा ॥
कवीरवचन ।

कहैं कवीर सुनो सब देवा । कृष्णसो पूछहु हमरी भेवा ॥
हम हैं अजर भुक्तके दाता । हमरे शरण यम त्रास निपाता ॥
जो हम कहा शब्द सहिदानी । शब्दकी चाल चले सो ज्ञानी ॥
सबन कहा अपौं शिर तोही । देहु पान आपन कर मोही ॥
सत्यकवीर तब आरती कीन्हा । अभी अंक सो वीरा दीन्हा ॥
चरणोदकदे तिलक कर दीन्हा । तुलसि माल दे सिखवनकीन्हा ॥
सब जिव जानहु एक समाना । जीवघात तज ब्रह्म अभिमाना ॥
साधु गुरु सम सेवा मानी । सुख स्थिर सट्टुरकी वाणी ॥
गुरु कर्ता गुरु सम नहीं कोई । गुरु कर्ता ते भेछ है सोई ॥
करता देही धर गुरु करही । तो करता करता होय परही ॥
सब महाँ करता नाम कवीरा । रमें राम होय सकल शरीरा ॥
सर्व यई सो राय लखाहीं । राम सो अंश कवीरके आहीं ॥
जग महाँ उलटी भाव दिखाये । जो स्वामी सो दास कहाये ॥
करता आद कवीर भये दासा । राम कृष्णकी महिमा प्रकाशा ॥