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सर्वकोश
कबीर कृष्ण गीता

कबीर कृष्ण गीता

Kabir Krishna Gita

युगल आनंद विहारी द्वारा

स्रोत: Kabir Krishna Gita - Yugal Anand Vihari · Archive.org (उद्गम)

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कवीरक्षणगीता ।

मात पिता सेवे शुभ ज्ञाना । तात जननी तज त्रिय मन माना ॥
डिंभ अहंकार दुर्ता मन छाया । अछत दीन लघु ज्ञान सुभाया ॥
पालक ज्ञान घालक यम बाजी । जैसे जग मनमत दिज काजी ॥
बोलता ज्ञान तन मन अंकारा । जाग्रित ज्ञान स्वप्न मन चारा ॥
ज्ञान परमार्थ स्वार्थ मन मूढ़ । जुवा मनुज ज्ञान पद बूढ़ ॥
अपन पराया एक सम जाना । और तोर मन बुध विगराना ॥
मात पिता सिर देय सो ज्ञाना । अहिब नारी विष खोट अज्ञाना ॥
भीस अजाची ज्ञानको अंगा । धूमधाम जांचक मनरंगा ॥
देह दाग मनमता कहावा । मन दागे जो ज्ञान सुभावा ॥
नाच छाछ विश्वा नट ठाढी । यह मनमता यम चौकी गाढी ॥
भीन नास मद क्षण मन बाजी । कसतुरी मिमयाय असत बन खाजी ॥
चाहे बैराग तजे नहिं रानी । सन्यासी संग्रह मन चारी ॥
झंसे मन पुलकित होय आना । सरगुन गुरु मन सट्टुर ज्ञाना ॥
चाहे भिस्त तजे नहिं मोहा । मोह अज्ञान ज्ञान निरमोहा ॥
सतगुण ज्ञान रज तम मन दीसा । मन मलेश गुण पांच पचीसा ॥
जागे ज्ञान सोय अज्ञाना । सो जागा जिन राम पहिचाना ॥
सोइ अज्ञान गुरु सेवा नहिं कीन्ह ॥ गुरुको सार असार नहिं चीन्ह ॥
ज्ञान अमर मन मरे नसाई । ज्ञान पारस मन सुरत होय जाई ॥
ज्ञान अमर पद सार सो बाहर । सट्टुर भिल आवे शिष्य ठाहर ॥
बाहरसे घट ब्रह्म समाना । सो जिवलोक ते न्यारा निरवाना ॥
अभी ज्ञान सो सत्य कवीर । बिबै निरंजन नीर सरिर ॥
जीव अभी सो नाम कवीरा । देह निरंजन बिबै शरीरा ॥