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सर्वकोश
कबीर कृष्ण गीता

कबीर कृष्ण गीता

Kabir Krishna Gita

युगल आनंद विहारी द्वारा

स्रोत: Kabir Krishna Gita - Yugal Anand Vihari · Archive.org (उद्गम)

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कबीरकृष्णगीता ।

१३३

दोहा--सतगुण रजगुण तमगुण, तिनके तीन सुभाव ॥
कौन सिरजे कौन पोखे, कोइ संहार कराव ।

रजगुण तमकी उत्पत जाना । सतगुण सोवत जन्म सिराना ॥
तमगुण रुद्र काल संहारे । त्रिगुण निरंजन भसम कर धारे ।
बांचे विष्णु सतगुण सत ठाई । सत्यके मूलसत्य कबीर सतसोई
जेहि जस रुचे तैसो गुरु कीजे । विन गुरुजीव काल वस दीजे ॥

दोहा--सावित्री ओ गौरा, मगन भये हरि बैन ।

कहैं हमहू गुरु करों, सत्य कबीर सुख चैन ॥
कहैं कृष्ण कबीरसे वाणी । शिष्य होन चाहैं त्रिय दाय प्राणी ॥
कबीरवचन ।

कहैं कबीर खीवस स्वामी । पति कहैं पूछ नाम भज नामी ॥
गायत्रीगौरावचन ।

कहैं गायत्री गौरा बहोरी । सबके स्वामी तुम बंदिछोरी ॥
दुतिया माहि कोइ हित नाहीं । दिन दश कच्चा सुख जगमाहीं ॥
अंतकाल जब काल गरासे । तब गुरु विन नहिं कोइ निकसे ॥
अधा अंछंगी तेहमें तानी । लक्ष्मी तुव शरण हम कालअधीनी
सत्यकबीर तुम गुरु पितु माता । तुम्हरी दया बने सब वाता ॥
हम चीन्हा तुम साहेब आहूँ । सब बनजिया तुमही गुरु साहूँ ॥
तुम जेहि चितबहु सो तर जाईं । तुम विन जियरा नरक भोगाईं ॥
गौरा कहैं विहसिके वाणी । हमहू लखा कबीर सहिदानी ॥
जबहिं विष्णु हरिनाकुश मारा । शिव गुणसुत छिन असुरहिं मारा
हमहू शिवगण आईं हां । बैठे हरिनाकुश सिरमाहा ।
जब कबीर विष्णुके माथे । तब देखा मैं शिवके साथे ॥