कबीर कृष्ण गीता
Kabir Krishna Gita
युगल आनंद विहारी द्वारा
स्रोत: Kabir Krishna Gita - Yugal Anand Vihari · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 135, कुल 168 में से
संदर्भ में पढ़ेंकबीरकृष्णगीता ।
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सत्यनाम जुगावहु, माया परमारथ साज ।
संखपछन ले माया, भक्तिहीन जो होय ॥
ता तेहि यम ले आसे, नरक परे पुन रोय ॥
रंक जीव जो सोई, सोई माहि धनवंता ।
धनवंता तो हरि भजे, तो हरष मिले भगवंता ॥
रंक धनीको नहिं चाहे, चाहे प्रेम प्रतीत ।
गुरुभक्ता मोहि भावे, कहैं कबीर अतीत ॥
गुरुभक्ता मम भक्ता, साथ भक्त मम दास ।
हरिभक्ता सोऊ हम, कहैं कबीर हरि व्यास ॥
आत्मपूजा जिव दया, परआत्मको सेव ।
कहैं कबीर सत्यनाम भज, सहज परम पद लेव ॥
पांचहुको लखे परंपंचा । नाम भजे जिव पावे संचा ॥
पांचों परंपंची तन सुगता । पांच तीन साथे अवधूता ॥
सुर नर अज हरि हर सुनि जेतै । तन घर पांच तीन घर तेतै ॥
विरला गुरु गम परखि भये न्यारा । सो वांचे जिन शब्द विचारा ॥
जो राजामहैं थाको माना । शब्द महंत महातम जाना ॥
शब्द विना जग बाउर अंधा । शब्द विना जग परे यमफंदा ॥
सहुर शब्द परख पंथ चाला । जो जीते जग बरवस काला ॥
मन काल निरंजन अंसा । अज्ञानीको करे विधंसा ॥
ज्ञान प्रवेश होय मन सांचा । नाम बचे जिव यमसों वांचा ॥
भजे नाम जो मन चितलाई । पांच पचीस तीन थक जाई ॥
गगट होय कला सतनामा । शब्द परख चले तेहि शुभ कामा ॥
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