कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
( ७१८ ) बघेलवंशवर्णन ।
शम्भुशतक जगदीशहू शतकै । विरच्योतुष्टपुनि जेहिं बुधसुछकै ॥
जस तुम भक्त अहौ नारायण । तस ईश्वरीप्रसाद नरायण ॥
जस पूरण सुख तुमते भयऊ । तैसहि उनहूँ ते सुख ठयऊ ॥
नृप पछाहियनमें कछु रूरो । बूँदी नृपति जानते पूरो ॥
तेंहिंके आये भो सुख आधो । तुम सम कोउ न कृष्ण अवराधो ॥
अति प्रसन्न करि दण्ड प्रणामा । गमन्यो पुनि भूपति सुखधामा ॥
सकल देव संतन गृह जाई । यथा योग बहु द्रव्य चढ़ाई ॥
रामनगर गो सुरसरि पारा । गो लेवाय सो नृपति उदारा ॥
दोहा-रामराजसिंहकोसतिय, घर दिय पठै ससैन ॥
आपरेल चढ़ि आयकै, मिरजापुरहिसचैन ॥ ५१ ॥
पुनि बग्घी असवार है, सैन्य सहित सुख पाय ॥
रीवांको आवत भयो, लै संपति समुदाय ॥ ५२ ॥
बंधु कसौटाको विदित, वंशपती महराव ॥
महाराज सों यक समय, विनय वचन मुखगाव ॥ ५३ ॥
नाहक हमें अशुद्ध जग, कहत अहैं सब लोग ॥
विमुख आपते जो भये, यहां बड़ो डर सोग ॥ ५४ ॥
स.-आपहिके हमहैं करुणानिधि आप जो लीजिये मागहिपानी
तौ अंहिती हमरे जे अहैं जे असत्य बतात तिन्हें परै जानी॥
दीजिये भात कृपाकारिकै सुधरै मम लीजिये सत्य या मानी ॥
श्रीरघुराज कह्यो हँसिकै यदुराज सुधारिहैं है सति वानी॥१॥
दोहा-भात देत सुनि नृपतिको, बरजे बहु जन वृंद ॥
महाराज कह मानिहैं, कहिहैं जस गोविंद ॥ ५५ ॥
अस कहि यक कागज लिख्यो, यह अशुद्धहै नाहिं ॥
अशुद्ध अहै यह यक लिख्यो, धरि दीन्ह्यो हरि पाहिं५६
नयन मूँदि जगदीश ढिग, पंडा तुरतहिं जाय ॥
लै आयो कागज सोई, यह अशुद्ध नहिं आय ॥ ५७ ॥
बघेलवंशवर्णन । ( ७१९ )
नृप जगदीश निदेश लहि, शुद्ध मानि विख्यात॥
वंशपतीको करिलियो, भातहिमें अवदात ॥ ५८ ॥
पंडा तुलसीरामको, अग्निहोत्र करवाय ॥
कियो अग्निहोत्री विदित, रह्यो सुयश जग छाय॥ ५९॥
दशहजार मुद्रा अउर, दो हजारको ग्राम ॥
दै गोविंदगढ़ वास दिय, दै शुभ धाम अराम ॥२६०॥
छप्पय-श्रीरघुराज सुवाजपेयि किय रह यश छाई ॥
याचक सोइ सोइ वस्तु लही जोई मुख गाई ॥
विप्र जे याज्ञिक रहे लहे ते द्रव्य हजारन ॥
भूषण बसन अमोल हेत असवारी वारन ॥
कवि वंश कहै युगलेश चलि, देशान देश नरेश मधि ॥
ह्वै विन कलेश मुख गाय यश, भये धनेश सुरेश सधि १
कुंडलिया-सबनरनाहनते अधिक, बादशाह कियमान॥
महाराज रघुराजसों, कौन सुजान जहान ॥
कौन सुजान जहान, सुकवि करि सकै बखानै॥
जो बखश्यो वसु वसन, जननकहँ बे परमानै ॥
मानै निज लखि तजे भूप कलकत्ते महँ तब ॥
युगलदास यह कृपा जानिलीजै सँतिके सब ॥ १ ॥
कवित्तघनाक्षरी ।
वाजिन सवार राज राजिन कराय तहां निज असवारी साथ शाह सोधवायो है ॥
लाट कोठि कुरसीमें बांधवेशको बैठाय निज असवारीको जलूस दर्शायो है ॥
देखि सब भूप लेखि निजते अधिक मान शरमाय शीशते बिशेषिहीं नवायोहै ॥
सांच यदुराज कृपा जानै रघुराज परजौन सब राजनते अधिक बनायो है ॥१॥
दोहा-लाख लाय मुद्रा नज़र, देनचहे नरनाह ॥
तिनको लियो न मानि तृण, शाह सहित उत्साह॥६१॥
मुद्रा सहस पचासकी, दियो अँगूठी नाथ ॥
लै सराहि रघुराजको, पहिरिलियो निज हाथ ॥ ६२ ॥
( ७२० ) बघेलवंशवर्णन ।
कवित्त ।
महादेवजीके सम देव नर दानवमें भयो न त्रिलोकी माहिं राम भक्ति धारीहै ॥
सीय बेष कीन्ही सती ताहि त्यागि दीन्ह्यो जौन दक्षकी सुता जो रही प्राणनते प्यारीहै
अब कलिकालतो कराल या कलुषमयो तामें वैसोहोय नहिं परत निहारी है ॥
महाराज विश्वनाथ तनै रघुराज वैसो भयो युगलेश कछु कहत उचारी है॥१॥
छीतूदास भगत पधारे एक समै रीवां कातिकते फागुनलों रहे सुख छायकै ॥
फगुवाके रोज रैन निकसे बजार मग राम सिय लषणको गजभै चढ़ायकै ॥
दीनबंधु धाम ढिग एक बनियाको घर रह्यो तासु सुत लै खीलौनादी चलायकै॥
चौंकि उठ्यो गज झूल जरी डोलि उठे द्रुत कोउ जन जाय कह्यो नृपको सुनायकै २
दोहा-भोर होत तेहिं बणिकको, भूपति लियो लुटाय ॥
द्वै हजारको बसनतेहिं, लीन्ह्यो तुरत मँगाय ॥ ६३ ॥
आधे आधे सो दियो, मोहन दशरथ काहिं ॥
दीनबंधु सो सुनि कियो, वणिक सहाय तहाँहिं ॥ ६४ ॥
वणिक पुत्र भगिजातभो, छीतूदासहि पास ॥
आय भक्त महराज ढिग, शासन दिय सहुलास ॥६५॥
क्षमि आगस यहि वणिकको, दीजै लूटि देवाय ॥
कुटी सिधारव कालिह हम, सुनि बोल्यो नरराय ॥६६॥
वह भगवत भागवतको, कियो महा अपराध ॥
याको देन न कहिय प्रभु, और न होई बाध ॥६७॥
यहि अपराधी वणिकको, कीन्ह्यो जौन सहाय ॥
उंचिता दंड सोउ पायहै, यह प्रभु देहि सुनाय ॥६८॥
पुनि जिन कुटी भक्त पगु धारे । महाराज उर अति मुद धारे ॥
परममित्र मंत्री यशवारा । रह्यो जौन प्राणनको प्यारा ॥
मुख्य देवान कह्यो जेहिं काहीं । लाट खिलत दीन्ह्यो मुदमाहीं ॥
ताहूको गुणि वणिक सहाई । कामकाजते दियो छोड़ांई ॥
रहे जे कामकाजी तेहि संगा । तिनहूँ छोड़ाय दियो सउमंगा ॥
दाक्षण देउरा नगर ललामा । तँहँ जेहिं थान अहै सरेंनामों ॥
बघेलवंशवर्णन । (७२१)
लालशिवबकशसिंह तेहि नामा । धीर वीर अतिहीं मतिधामा ॥
तासु अनुज भगवतसिंह तैसे । वचन जासु अंगद पग कैसे ॥
तेहिं शिवबकश सिंह सुत रूरो । लालरणदवनसिंह गुण पूरो ॥
कैयक अनुज तासुके जानो । तिनमें दिरगजसिंह सुजानो ॥
लालरणदवनसिंह पर मीती । कॅरि रघुराज मीत गुणि नीती ॥
सकल बघेलखंड जों राजी । कियें मुखतार परम है राजी ॥
दोहा-माधवगढ़ ढिग पार सरि, कछिया टोला गावँ ॥
नावँ जासु दिलराजसिंह, मालिकहै तेहिं ठावँ ॥ ६९॥
अमरसिंह कल्याणसिंह, तासु सुवन गुणग्राम ॥
महाराज परसन्न है, तिनहूंको दिय काम ॥ २७०॥
बांकेधौंवा सिंहको, कोष काम करिदीन ॥
देशी परदेशी बहुत, काम दियों सुखभीन ॥७१॥
तिन सबको मुखतारके, भूपति किय आधीन ॥
ते सब अबलों करतहैं, काम लोभते हीन ॥७२॥
छंद-यक काल अकाल कराल पर्यो ॥
विन अन्न दुखी बहु जीव मर्यो ॥
माहिमें कँगला सहसान जुरे ॥
सरि औसर राहन रोज फिरे ॥ १ ॥
बहु पर्गन बांधवदेश ठये ॥
विन अन्न दुखी सब जीव भये ॥
रघुराज गरीबनेवाज महा ॥
दिय अन्न तिन्हें मुदमें उमहा ॥ २ ॥
अंगरेजहु जौन निदेश कियो ॥
रुपया तेहिं पंचसहस्र दियो ॥
जोहिं औरेहु देशानके कँगला ॥
विन अन्न न शोक लहैं अचला ॥ ३ ॥
४६
( ७२२ ) बघेलवंशवर्णन ।
दोहा-झूर अन्न केतेन दियो, केतेन दै पकवान ॥
केतेनको पैसा दियो, केतेन मुद्रादान ॥ ७३ ॥
सोरठा-जौलौं रह्यो अकाल, लाखन रुपया खर्च करि ॥
किय दीनन प्रतिपाल, को कृपालु रघुराज सम ॥ १ ॥
कौन गरीबनेवाज, महराज रघुराज सम ॥
छायो सुयश दराज, समुद्रांतलौं अवनि तल ॥ २ ॥
सवैया-तीक्षण जासु प्रताप दिनेशको आतप तेज महीप सरै ॥
तापित है रिपु तासु महेश कलेशित वासु अरण्यकरै ॥
भाषतहैं युगलेश सही यह मानै उरैंमें विशेष नरै ॥
श्रीरघुराज नरेशके देशन शीतको पेस करै पसरै॥१॥
महाराज रघुराज सपूती । है अपूर्व जिनकी करतूती ॥
पितुते अधिकै राज्यबढ़ायो । पितुते अधिकै द्रव्य कमायो ॥
पितुते अधिक कोष किय भारी । भूपति श्रीरघुराज सुखारी ॥
एक अनूपम शहर बसायो । गोविंदगढ़ तेहिं नाम धरायो ॥
रीवांमें जस रहे मकाना । तिनते अधिक तहां निरमाना ॥
ताल विशाल एक बनवायो । विश्वनाथ नृप नाम सुहायो ॥
जाके तीर तीर सरमांहीं । विरचायो बहु मंदिर काहीं ॥
तिनमें रघुपति यदुपति मूरति । पधरायो परिकर युत अति रति ॥
दोहा-प्रति उत्सव जो करतहैं, साधुन सेवा वेश ॥
सीयव्याह उत्सव तहां, करत नरेश हमेश ॥ ७४ ॥
छीतूदास सुसंत यक, सादर तिनहिं बोलाय ॥
करत व्याह उत्सव सुखद, अगहन मास सोहाय॥ ७५ ॥
संत महंतहुँ विप्र अपारा । जुरैं नारि नर कइक हजारा ॥
तिनको विविध भांति सन्मानी । वांछित अशन देत रति ठानी ॥
मांडव रुचिर रचाय उछाह । सीय रामको करत विवाहा ॥
सबको मंडप तर बोलवाई । सादर विदा करत हरषाई ॥
बघेलवंशवर्णन । ( ७२३ )
मुद्रा अमित दुशालन जोरी । कोहुंको देत हाथ युग जोरी ॥
कोहूको पट और बनाता । मुद्रन सहित देत हरषाता ॥
कोहुको लोइया और रजाई । देत रुपैयन युत सुखदाई ॥
रुपिया और उपरना रासी । कोहुको भूपति देत हुलासी ॥
दोहा–देत रुपैया सबनको, बचै न कोउ नर नारि ॥
सुख छावत गावत सुयश,जात अयन पग धारि॥ ७६ ॥
भरत लषण रिपुदवन युत, सीय रामको फेरि ॥
भूषण वसन अमोल दै, विदा करत छवि हेरि ॥
छीटूदास सुसंतको, साधुन सेवा हेत ॥
द्वादशसै मुद्रा वसन, अमित मोद युत देत ॥ ७७ ॥
जनकपुरी मम सोपुरी,समय सो जनक प्रमोद ॥
जनक सरिस नृप जनकहैं,चलि चलि मग चहुँ कोद ७८
स०–औधपुरी मुद औध किधौं, किधौं वृंदावनै दिपै मंदिर भारी
जानकीरामकी झांकी कहूँ कहूँ राधिका माधवकी मनहारी ॥
झालरी शंख बजै चहुँ ओर बसैं जहँ संत अनंत सुखारी ॥
भूप रच्यो है गोविंदगढ़ सो अनूपम मैं निज नैन निहारी॥ १ ॥
दोहा–छन छन छन घन ध्यान मन, तनक न तन धन भान ॥
धन धन धन जन ज्ञान पन, कन कन वनकनसान ७९॥
| छ | छ | छ | घ | ध्या | म | त | क | त | ध | भा |
| न | न | न | न | न | न | न | न | न | न | न |
| ध | ध | ध | ज | ग्या | प | क | क | व | क | सा |
सोरठा–जेहिं गोविंद गढ़माहिं, दुखहीको दुखदेखिये ॥
डर परलोक सदाहिं, जहँ सब लोगन को अहै ॥२४०॥
( ७२४ ) बघेलवंशवर्णन ।
दंडनीय जहँ एक निसाना । रागरागिणी भेद विधाना ॥
क्रोध जहां क्रोधहिं पर होई । लोभ करै यशकों सब कोई ॥
जहां अधर्महिं को: है त्यागा । निज तियसों ठानब अनुरागा ॥
जहँ गृह चित्र करैं चित चोरी । बंधन जहां पशुनकों जोरी ॥
वचन असत्य कहत रोजगारी । सुताव्याह गावहिं तिय गारी ॥
चलत कुपथं जहां गज माते । कुटिल धनुष जहँदृग दरशाते ॥
सुभटनके अँग जहां कठोरा । कर्कश जहँ झिल्ली गण शोरा ॥
जहां निर्द्धनी यती निहारी । वारि नीचि गति जहां निहारी ॥
दोहा-कंपध्वजामें देखिये, बँधे धौरहर धौल ॥
शोभा सब संसारते, बसी भूप पुर नौल ॥ ८१ ॥
सोरठा-कहुँ गोविंदगढ़ माहिं, कबहूँ रीवाँ नगरमें ॥
श्रीरघुराज सोहाहिं, सब राजनके मुकुट मणि॥१॥
कबित्त घनाक्षरी ।
बंदी जे न ताकत मुसद्दी कामकाजी सबै बैठे दुहूंओर दर्दी दीननको दिलराज॥
कदी दीहवारे औ अमद्दी सरदार आगे बैठे अरिकरनं गरद्दी रणकै गराज ॥
देवनद्दी कैसी किति दिपत्ति विसद्दी जासु युगलेश साहिबी विहद्दी मनो देवराज॥
रद्दी कर दुर्जन अनंदी कर सज्जनको राजै राजगद्दी पर महाराज रघुराज ॥१॥
देन समै जोई जोई याचि राख्यो याचकहै सोई सोई देत सांच लगत न वारहै॥
भूषणअमोल गाँव वसन अमोल म्याना वाजि गज नोल मुद्रा कैयक हजारहै ॥
कहै युगलेश ऐसी रीतिहै हमेशा केरी देखत न देश कोष नेकुर्कै विचारहै ॥
राजनके राज महाराज रघुराज ऐसो आजु तौन दूजो राजा राजत उदारहै॥२॥
पटु सब विद्यन में हटत न काहूसों है निपट निशंक बुद्धि नेकु नैं हलति है ॥
चटपट जानिलेत अटपट बात सब बात कपटीनकी न केंसहू चलतिहै ॥
बघेलवंशवर्णन। (७२५)
महाराज रघुराज निकट पाखंडी कोटि कुटिलऊ सटपटै थिति उसलति है ॥
कवि नटखटनकी कूर बहुकटठनकी चुगुल चवाइनकी दाल ना गलतिहै ॥ ३ ॥
सुमति गणेश लसै साहिबीमें त्यों सुरेश धनमें धनेश शत्रु नाशनमहेशहैं ॥
तेजमें दिनेश मुदजनन प्रजेश प्रजापालनमें वेश सम राजत रमेशहैं ॥
गावत नरेश दीह निजहिं निवेश सभा सुयश विशेष जासु छाजै देश देशहै ॥
भन युगलेश रघुराजसे सुमतधारी सुत बांधवेश औ परेससेवा पेसहै ॥ ४ ॥
करयुग जोरि कमलापतिसों कमलाजी कहै युगलेश बार बार कहैं वैन कल ॥
रावरो भगत विश्वनाथ तनै रघुराज जन्यो तन्यो जासु यश चारु स्वच्छभल ॥
असित पदारथ ते सित हैगये हैं सबै परत पिछानि नाहिं जाय जहांजौने थल ॥
वसिये निरंतर की ताहि ऐके अंतरकी उदधिको अंतर न छोड़िजैये छोनी तल ५
भागवत पढ़यो भागवत को विश्वास मान्यो जननि सुभद्रा श्रीसुभद्रारूप जानिये॥
रामभक्त परमअनन्य महा भागवत विश्वनाथसिंह जासु जनक बखानिये ॥
भागवतदास नाम तिनहीं सों पायो भयो भागवत रूप कंठ भागवत गानिये ॥
भागवत सेवी रघुराजसिंह भागवत जाकें उर भौंन भगवंत भौन मानिये ॥ ६॥
सवैया-याचक वृंद मलिंदनको गण पाय सुपास अनंदित हीमें॥
आय मनोरथ पूरणकै यश गान करें चहुँ ओर महीमें॥
भाषतहैं कवि देशानि जाय नरेशनके दरवारनहीमें ॥
दान करीके कपोलनमें कीहरी रघुराजके हाथनहींमें७
दोहा-महाराज रानी सबै, गौरी सम महिमाथ ॥
लसैं पतिव्रत धर्मरत, तजैं न कबहूं साथ ॥ ८२ ॥
महाराज रघुराजके, अमित चरित्र अनूप ॥
युगलदास वरण्यो कछुक, निजमतिके अनुरूप ॥ ८३॥
जामें सुचित चरित सब, ऐसो अष्टक वेश ॥
विरचतहै युगलेश यह, सुखप्रद सुकवि विशेष ॥८४॥
( ७२६ ) बघेलवंशवर्णन ।
अष्टक नृप रघुराज कृत, युगलदास मुदकंद ॥
सार्थ गतागत चंद्र ऋषि, सिंहवलोकन छंद ॥८५॥
अथगतागत सवैया ।
तों यश शीश मही सरसाय यसारस हीम शशी सजतो ॥
तोमह तेज भसो विरमाहि हिमा रवि सो भजते हमतो ॥
तो जग नैरव सोहत चारु रुचा तहँ सों वरणै गजतो ॥
तों रघुराज भजै नहिं लोग गलोहिनजै भज राघुरतो ॥१॥
अर्थ-हेरघुराजसिंह तिहारो श्रीवृंदावन अरु श्रीजगन्नाथपुरीमें सुवर्णतुलादानादि
महादानरूप जो यह यशहै शीश मही कहे महीके शीशमें अथवा सब राजनके
यश ते शीश कहे शिरा मँही कहे पृथ्वीमें सरसाय कहे अधिकायकै सारस
हीम शशी सजतो. कहे सारस जो है कमल अरु हिम जोहै पाला अरु शशी
जो है चंद्रमा ताकों सजतो कहे अपनी शोभाते साजैहै कहै शोभित करै है यह
प्रतीपालंकारते सारस अरु हिम अरु शशीकी शोभा सब ऋतुमें सब कालमें
एकरस नहीं रहै है कमल झरिजाय है हिम गलिजाइहै शशी क्षीण हैजाइहै अरु
संकलंकहै अरु तिहारो यश सब कालमें एक रस रहै है अरु निःकलंकहै
याते उन सबनते अधिकहै यह व्यतरेकालंकार व्यंजित भयो, अरु तोमह
तेज भसो विरमाहि. कहे तिहारो जो महातेजहै सो वीर जे हैं बड़े २ राजा
तिनमें भसो कहे भासितहै ताते तिहारे तेजते तेऊ शंकित रहै हैं कि हमारी
राज्यं न लैले यह सूचितभयों अथवा विरमाहि कहे सब जगमें तिहारो तेज
विशेषकै रमैहै ताते तुम्हारे तेज करिकै सब राजा निस्तेज ह्वैगये यह ध्वनित
भयों यांहीते, हिमा रविसों भजतें हमतो. कहे आपने हियमें हम तो तुम्हारें
तेज को रवि सों कहै सूर्यसे भजै हैं कहे भजन करै हैं अर्थात् वर्णन करै हैं
यह उपमालंकारते सूर्य कमलनको आनंद देइहैं अरु तम नाश करै हैं अरु
सबको सुधर्ममें प्रवृत्त करै हैं ॥ अरु आपको तेज सज्जनके हृदयकमलको
आनंद देइहैं औ सब राजनके वीरताकें मदको, अज्ञानको नाश करै हैं अरु
सबकें अधर्म नाश करि सबकों धर्ममें प्रवृत्त करै हैं यह अनुभया भेद रूप-
कालंकार ध्वनित भयो अरु, तोंजग नै रव सोहत चारु. कहै जगमें तिहारो जो
है नै कहै नीति ताको जो रव कहे शोरकि रघुराजसिंह बड़े नीतिमान्हैं सो चारु
कहै सुंदर सोहतहै अरु रुचा तहँ सो वरनै जगतों, तहाँ कहै तौने जगमें सो
नीतिकों रव सबको रुचाहै कहै सबको नीक लगै है अर्थात् नीतिकों बखान
जो कोई करत सुनै है सो तहँ खड़ा रहिजाइहै अरु वरनै गजतो कहै सोऊ
जन गजत कहै गर्जनाको करत अर्थात् बड़ो शोर करत सर्वत्र वर्णन करै हैं
कि रघुराजसिंह बड़े नीतिमान्हैं ॥ ताते आपके नीतिके सुनिबेते सबको उत्कंठा
अतिशयरूप वस्तु व्यंजित भयो इससे जैसी आपकी नीतिहै तैसी आपकीहीं
नीतिहै यह अनन्वयालंकार ध्वनित भयो ताते आपकी राज्यम अनीति नहीं है
यह वस्तु सूचित भयो अरु गर्जत वर्णन करै है ताते इनके बरोबर ऐसों
नीतिवारो पृथ्वीमें कोई नहीं है याते निःशंक ৺ यह हेतु व्यंजित भयो ताते,
रघुराज भजै नहिं लोग गलोहि. कहै या भांतिकें जे तुम रघुराजसिंह हौ तिन-
कों जो कोई लोग गलोहि कहै गलते अरु हियते नहीं भजै हैं कहै नहीं भजन
करै हैं अर्थात् तुम्हारे नामको मुखते उच्चारण करत जाको गल नहीं चलै है
अरु जो तुम्हारे नामको हियमें नहीं धारण करै हैं ॥ नैजैभजरा कहै ताकों
जरा कहै नेक कबहूं जै नहीं भयो, अर्थात् वह सबसो हारिही गयो है अरु
घुरतोकहै घुरिजातहै अर्थात् वह नाश हैजाइहै यह i प्रस्तुत कारि प्रस्तुत
प्रगट प्रस्तुत अंकुर नाम यह प्रमाण करिकै प्रथम प्रस्तुत कहै वर्णनीय जे हैं
आप तिनते दूजे प्रस्तुत जे हैं श्रीरघुनाथजी तिनको वर्णन कवित्तके चारिहूँ
तुकमें विदितई है यह प्रस्तुतांकुर अलंकारतें आपकी श्रीरघुनाथजीकी उपमा
व्यंजित भई ॥ १ ॥
दोहा-जन्मअष्टमी आदिदैं, उत्सव जे भगवान ॥
तिनमें वितरत जननको, मुद्रा पट सहसान ॥ ८६ ॥
विराजत" space "वासव" space "वासव" space "सो" space "निगुणी" space "गुणी" space "पारस ॥"
Yes, "पारस ॥" has space before ॥.
Line 22 (L22):
पार सबै करतो जु भवै भवै सो रघुराज भजो कर साहस॥५॥
Let's check:
"पार" space "सबै" space "करतो" space "जु" space "भवै" space "भवै" space "सो" space "रघुराज" space "भजो" space "कर" space "साहस॥५॥"
Notice: "साहस॥५॥" - no spaces around dandas and ५: "साहस॥५॥".
Line 23 (L23):
सोहत भावसों क्रीट शिरै दिये दीपत जासु शिषत्तु विमोहत॥
Wait, let's examine:
Word 1: "सोहत"
Word 2: "भावसों"
Word 3: "क्रीट" (or "किरीट"? It is clearly "क्रीट": क + ्र + ी + ट = क्रीट!)
Word 4: "शिरै" (or "शिर"? It has an ai-matra: "शिरै"!)
Word 5: "दिये"
Word 6: "दीपत"
Word 7: "जासु"
Word 8: "शिषत्तु"
बघेलवंशवर्णन । ( ७२९ )
जोहत भाग ह्वै जात सभाग सभागतसों सब सोच विछोहत ॥
छोहत तापै सबै जगहै गहजो रघुराजपगे अजसोहत ॥ ६ ॥
घनाक्षरी ।
शारद शशीसों कोई शारद पयोदहीसो हीसो गुनि कहै कोई लस्यों सम पारद ॥
पारदरशाति नहिं कहि कहि काहु मति मति कहे कोई घनसारहुकी पारद ॥
भार दरशात पेन्हे भूप मोती हीरा हार हार गई द्युति भाषै कविवृंद मारद ॥
नारदकोहुते है बेहद रघुराज जस जस मही तस स्वर्ग गावती है शारद ॥ १ ॥
दोहा-अष्टक कष्ट करै न जग, जगत पार धन नष्ट ॥
नष्ट नहीं चित पुष्ट कवि, कवित तुष्टकर अष्ट ॥ ८७ ॥
सवैया-भूप अजीत२भयो लियो जीत रिपून नहीं कोउ बांचो ॥
तासु तनय नृप जयसिंह जयसिंह होत भयो रणरंगमें राचो ॥
तासुत श्रीविश्वनाथ भयो विश्वनाथहू दान कृपानमें सांचो ॥
तासुत जो रघुराज समै रघुराज भो तौन अचंभव सांचो ॥ १ ॥
कवित्त ।
जाहि जपि पतितहू पावन परम होत होहिंगे भये हैं गये केते हरिधामको ॥
जाको यश गावत न पावत सुकवि पार सबको अधार जो देवैया मन कामको ॥
जाके बल शंकर विरंचि सनकादि ऋषि जागत रहत जग यामिनि त्रियामको ॥
चिरंजीव होवें महाराज रघुराज सदा याचै युगलेश वेश सोई राम नामको ॥ १ ॥
अंगनि सुछबिकोटि वारिने अनंग जासु कालको विहाल करै शोर धनु घोरको ॥
मार्तंड पावको प्रताप जासु ताप करै शशिहूको शीतल करैत यश ठोरको ॥
चरित अशेष जासु शेषहु न अशेष लहै नाम कहै पामर पुनीत होत जोरको ॥
चिरंजीव होवै महाराज रघुराज सदा याचै युगलेश सोई कोशल किशोरको ॥ २ ॥
जोलों राम निज नाम धाम गुण ग्राम राखौ कीबो काल कर्महु प्रपंच पंच भाषिये ॥
जौलौं विधि आदि सिधि देवनको अधिकार नित प्रीतिको विचार कीबे अबलाखिये ॥
( ७३० ) बघेलवंशवर्णन ।
जोलौं दीनबंधु दृग देखो दाया दीह दास तोलौं युगलेश विनय मोरिं यश साखिये ॥
राज्यश्रीअखंड सुखयुत संयुत सुधर्मसाज भूप रघुराज महाराज आप राखिये ॥ ३ ॥
सोरठा-ग्रंथ भयो जब पूर, उचित मंगलाचरणपर ॥
श्रीहरि गुरु सुख पूर, चरण कमल वंदन करूं ॥ ५४ ॥
कवित्त ।
निरत जासु नाम हरिदास हरिरूप सीय राम सेव हीमें जिन्हें जात रैन दिन ॥
कोहू सों न कहै देखि संत निज आश्रमै सादर करत सत्कार आयो छिन छिन॥
कहैं युगलेश मान रजोगुणि वाहननि चढें नहिं कबों या स्वभावरहो सब दिन॥
कहौं हरिरूप पर हरिते सरसरूप लिये द्वै अनूप श्री है येतो रहै तेहि विन॥१॥
दोहा-घरचो सर्प यक को विछी, यक को दुःखित कीन्ह ॥
हरिचरणामृत पाय तहँ, द्रुत निर्विष करिदीन्ह ॥ ८८ ॥
ऐसे चरित अनेक हैं, को कह आनन एक ॥
नेक कृपा लहि नाथ मैं, वरण्यों है सविवेक ॥ ८९ ॥
जो करताहै ग्रंथको, सोउ वरणै निज वंश ॥
युगलदास याते करत, कछु निज मुख परशंस ॥ २९०॥
कवित्त ।
देश गुजरात ते नरेश संग आये यहां पुस्तिबहु तिन्हें कहां लौं गिनाइये ॥
चैनसिंह भे दिवान अति मतिमान खास कलम सुवंश राय तिनकों सुनाइये ॥
लल्लू खास कलम कहायें नाम मंशाराम भूपति अजीत बहु मान्यो सो जनाइये॥
कायत प्रसिद्ध साधु सुमति अगाध तासु वंश गिरिधारी लाल नाम जासु गाइये १
दोहा-महाराज विश्वनाथ तेहि, मान्यों करि अति प्यार ॥
सोय खास कलमहि कियो, लखि तिहि बुद्धि अपार ९१
भोदूलाल दिवान सुजाना । रहेतें अस मन कियें अमाना ॥
यह संकोच पुरुषतें भारी । करौ न हमरौ हुकुम सुखारी ॥
बघेलवंशवर्णन । ( ७३१ )
अस विचारि नरनाथहिं पाहीं । कह्यों सुघर इनही सुख माहीं ॥
इन्हे खास कलमी रघुनाथी । दै राखिये निकट कर साथी ॥
सुनि विश्वनाथ हियेकी जानी । राख्यो अपने ढिग सुखमानी ॥
ग्रंथ अनूपम अमित बनायों । सादर तासों मुदित लिखायो ॥
तेहि सुत युगलदास मम नामा । विश्वनाथ नृप ढिग अभिरामा ॥
रह्यों बालते जे किय ग्रंथा । लिख्यो अहैं जिनमें हरिपंथा ॥
दोहा-महाराज रघुराजके, अब निवसों नित पास ॥
तासु हुकुम लहि ग्रंथ यह, विरच्यों सहित हुलास॥९२॥
नृपचरित्र यह ग्रंथको, कियो नाम अभिराम ॥
बाँचि सुकवि सज्जन सुमति, लहैं सदा सुखधाम॥९३॥
ग्रंथ रामरसिकावली, रच्यो जो नृप रघुराज ॥
तहँ कबीर इतिहास में, यहै ग्रंथहैं भ्राज ॥ ९४ ॥
इति सिद्धिश्रीमहाराजाधिराजश्रीमहाराजा बहादुर श्रीकृष्णचन्द्र कृपापात्राधिकारी
श्रीरघुराजसिंहजूदेवकृते श्रीरामरसिकावल्यां ग्रंथान्तर्गत श्रीयुगलदासकृत
बघेलवंशवर्णनं नाम आगम निर्देश ग्रंथसमाप्तः ॥
सूचना ।
बीज सूक्ष्म कारण जिसे, गावत हैं बुध वेद ।
तेहि जानन को युक्तिसो, बीजक नाम अखेद॥
बीजक लीन्हा हाथमें, पाया धन सोइ शोध ।
ताते बीजक नाम है, भया सबन को बोध ॥
बीजक लीन्हे हाथमें, सूझे नहीं धन धाम ।
मुक्ता धन पाये बिना, बीजक सबै निकाम ॥
याकी टीकानेकहैं, बहु विधि कथ्यो सिद्धान्त।
विश्वनाथ नृप रामरत, जान्यो यह वृत्तान्त ॥
राम प्रत्यय टीका करी, बहु पाण्डित्य तेहि मांहि।
पढ़े विचारे जाहि को, राम भक्ति जन पाहिं ॥
चिन्तामणि अरुकल्पतरु, शब्द जगतके मांहि ।
अपनी अपनी भावना, सबही पावत जाँहि ॥
राम उपासना दृढहुते, रीवाँ नरेश सुभूप ।
अपनी मनकी भावना, वर्णन कीन्ह सुरूप ॥
तेहि ग्रन्थको शुद्ध करि, कहुं २ टिप्पण दीन ।
युगलानन्द मोहि कहत हैं, क्षमियो परम प्रवीन ॥
संदिग्ध ठौर जेते रहे, टिप्पणी करी बनाय ।
बाकी अब कछु होयजो, लीजो संत सजाय ॥
गुरु थल हाता जानिये, शिवहर जन्म स्थान ।
भारत पथिक मोहि कहत हैं, पंथ कबीर न आन ॥
श्रीवेङ्कटेश प्रेसवर, प्रसिद्ध सकल जहान ।
तामें छप्यो या ग्रन्थ है, सबको सुखद समान ॥
इति श्रीकबीर साहब कृत बीजककी पाखण्ड खण्डनी टीका
रसीदपुर (शिवहर) वाले स्वामी युगलानन्द कबीर पंथी
भारत पथिक द्वारा संशोधिता समाप्त हुई ।
क्रयपुस्तकें—(भाषा काव्य.)
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नाम. की. रु. आ.
रामरसायन रामायन-रसिकविहारीकृत ... .... ... .... ४-०
रसिकप्रिया सटीक ... ... ... ... .... ... १-४
रामचंद्रिका सटीक कवि केशवदास प्रणीत ... .... २-०
काव्यनिर्णयभाषा छन्दबद्ध [भिखारीदासकृत] मनहरण छन्दोंमें कठिन
(अलंकार) वर्णन... ... ... ... ... .... १-४
जगद्विनोद [ पद्माकरकृत नायकाभेद ].. .... ... ... ०-६
रसराज [ मतिरामकृत नायकाभेद ] ... ... ... ०-६
ब्रजविलास बड़ा मोटेअक्षरका टिप्पणीसहित ... ... .. ५-०
ब्रजविलास मध्यमअक्षर टिप्पणी सहित विलायती जिल्द ग्लेज .... २-०
तथा रफ़ू कागजका ... .... ... ... ... १-८
ब्रजविलास छोटा अक्षर ग्लेज ... .... ... .... ... १-०
, ” ” रफ़ू... ... ... ... ०-१२
ब्रजचरित्र (श्रीराधाकृष्णजीकी सर्वलीला सुगम दोहा चौबोलोंमें
वर्णित हैं)... ... ... .... ... .... ३-०
प्रेमसागर बड़ा ग्लेज कागजका... ... ... : ... १-८
प्रेमसागर बड़ा रफ़ू .... .... ... ... १-४
भक्तमाला रामरसिकावळी बड़ी रीवाँधिपति महाराज रघुराजसिंहकृत
अत्युत्तम छन्दबद्ध जिसमें चारोंयुगोंके भक्तोंकी भिन्न २ कथा हैं
और यह द्वितीयावृत्ति उत्तर चरित्र समेत अत्युत्तम नई छपी है ४-०
रामस्वयंवर श्रीममहाराजरघुराजसिंहकृत (काव्यदेखनेयोग्य) ... ४-८
रुक्मिणीपारिणय-महाराज श्रीरघुराजसिंहजूदेव प्रणीत ... ... १-८
भक्तमाल नाभाजीकृत सटीक (छन्दबद्ध) ... ... ... १-४
महाभारत भाषा सबलसिंहकृत—तुलसीदासजीके रामायणकी रीतिसे दोहा
चौपाईमें १८ अठारहोंपर्व ... ... ... .... ... ३-८
( २ ) जाहिरात ।
नाम. की. रु. आ.
तथा प्रथम भाग ( ३-आदि, सभा, वनपर्व ) .... ... ... १-०
तथा द्वितीय भाग ( २-विराट, उद्योगपर्व ) ... ... ... १-०
तथा तृतीय भाग ( ८-भीष्म, द्रोण, कर्ण, शल्य, गदा, सौप्तिक,
ऐषिक, स्त्रीपर्व ) .... ... ... ... ... १-०
तथा चतुर्थ भाग ( ५-शान्ति, अश्वमेध, आश्रमवासिक, कुशल, स्वर्गा-
रोहणवर्णन ) .... ... ... ... .... १-०
विजयमुक्तावली ( महाभारतका सूक्ष्म वृत्तांत छंद बद्ध ) .... १-०
❊ परिहासदर्पण ... ... .... ... ... .... ०-६
अर्जुनगीता भाषा .... ... ... ... ... ... ०-४
शनिकथा कायस्थकी .... ... ... .... ... ... ०-१॥
शनिकथाराघवदासकृत ... ... ... ... ... ... ०-२
शनिकथा बड़ी पं० रामप्रतापजीकृत ... ... ... .... ०-८
रुक्मिणी मंगल बड़ा ( पद्मभक्तकृत मारवाडी भाषा ) .... ... १-४
हनुमानबाहुक पंचमुखी कवच समेत मूल ... ... ... ०-१॥
नासिकेतपुराणभाषा ( स्वर्गनरकका वर्णन ) ... ... ... ०-६
नरसीमेहताका मामेरा बड़ा ... ... ... ... ... ०-५
विस्मिलपरिवारका स्वांग ( इश्कचमन ) ... ... ... ०-८
सूर्यपुराणादि २२५ रत्न अतिउत्तमकागज और जिल्दबंधा ... ०-८
सूर्यपुराणादि २२५ रत्न रफू ... ... ... ... ०-६
ज्ञानमाला .... ... .... ... .... ... ... ०-२
मंगलदीपिका अर्थात् शाखोच्चार... ... ... ... ०-१॥
दंपतिवाक्यविलास-जिसमें सब देशांतरकी यात्रा और धंधेके
सुखको पुरुषने मंडन और स्त्रीने खंडन किया है दोहा
कवित्तोंमें ( सुभाषित ) ... ... ... ... ०-१२
रसरंग ( ज्ञानभक्तिमार्गी अजबरँगीले पद्य कृष्णगढ़
महाराज प्रणीत ) ... ... ... ... ... ०-८
जाहिरात । ( ३ )
नाम. की. रु. आ.
दादूरामोदय संस्कृत—दादूपंथी साधुओंको ... ... ... ०-१०
श्यामकामकैलि ... .... ... ... ... ... ... ०-४
परमेश्वरशतक .... ... ... ... ... .... ०-६
भक्तिप्रबोध ... ... .... ... ... .... ०-२
भावपंचाशिका कविवृंदजीकृत ... .... ... ... ... ०-२
प्रेमशतक ... ... ... ... ... .... ०-४
मदनमुखचपेटिका भाषाटीका .... ... .... ... .... ०-४
प्रेमवाटिका भाषा ( रोचक भजन ) .... ... ... ... ०-२
हनुमत्पताका छन्दबद्ध ( वीररसके रोचककवित्त ) .... .... ०-३
नामप्रताप छन्दबद्ध ( श्रीरामनाम माहात्म्य ) ... ... ... ०-१॥
शृंगारांकुर भाषा—छन्दबद्ध ( रसकाव्य ) ... ... ... ०-२
जगन्नाथशतक—इसमें रघुराजसिंह रीवाँधिपतिके बनायेहुये १००
कवित्त विनयके हैं ... ... .... ... ... ... ०-३
नैषधकाव्य मनहरणछन्दोमें राजा नल
दमयन्तीका सम्पूर्ण उदाहरणों समेत चरित्र .... ... १-०
सुन्दरीतिलक ( शृंगाररसके चुहचुहाते हुए
कवित्त भारतेन्दु बाबू हरिश्चन्द्रजी संगृहीत ) ... .... ०-६
विक्रमविलास ( छन्दबद्ध वैतालपचीसी ) .... ... ... ०-८
मसलानामा ( मसलोंके उदाहरणमें शिक्षावर्णन ) .... .... ०-२
काव्यसंग्रह ( प्राचीन रोचक कवित्त सवैया ) ... .... ... ०-८
काव्यरत्नाकर ( एक २ समस्यामें रोचकता
पूर्वक अनेक कवियोंकी चातुरीके कवित्त ) .... .... ... ०-८
आरती संग्रह २९ आरतीका .... ... .... ... .... ०-१॥
हनुमानसाठिका ( हनुमानजीकें ओजवर्द्धक ६० कवित्त ) ... ०-१॥
भाषाभूषण ( नायकाभेद मधुर छंदबद्ध ) .... ... ... ०-२
अनुरागरसभाषा ( नारायणस्वामिकृत ) पद्योंमें.... ... ... ०-३
( ४ ) जाहिरात ।
नाम. की. रु. आ.-
प्रेमपुष्पमंजरी ( अच्छे २ भजन व पंजाबदेशके भी पद हैं.... ०-२
कृष्णचरितावली ( कृष्णकी छोटी २ लीला ) ... ... ... ०-४
प्रेमपचासा ( चित्रकाव्य ) ... ... .... ... .... ०-३
सुदामाचरित्र अत्युत्तम छंदबद्ध ... .... ... ... ... ०-३
होलीचौताल संग्रह ... ... .... ... ... ... ०-४
सुदामाकी बारहखड़ी ... ... .... .... ... ०-१
द्रौपदीकी बारहमासी ... ... ... ... ... ०-१
दुर्गाचालीसी ... ... ... ... ... .... ०-१
माता पिता पूजनविधि .... ... .... .... ... ०-१
बारहमासी संग्रह ... ... .... .... ... ०-१॥
हरदेवकी बारहखड़ी कलियुगका चरित्र ... ... ... ... ०-२
छन्दरत्नमाला [ पिंगल ] ... ... ... ... ०-२
गोपीवियोगकी बारहखड़ी [ लालाशालिग्रामकृत दत्तलालकी बारहखडी
सहित ] ... .... ... ... ... .... ०-२
नशाखण्डनचालीसी ४० कवित्तोंमें सब नशोंका खण्डन... ... ०-२
मिलापदर्पण ( मेलमिलाप शिक्षा ) ... ... ... ०-२
श्राद्धदर्पण ( श्राद्धमण्डन ) ... ... ... ... ०-२
ब्रह्मज्ञानदर्पण ... ... ... ... ... ०-२
पंजाबपंकजपराग [ महन्त रघुवीरदासकृत ] ... ... ... ०-४
प्रेमपुष्पलता ( उत्तमभजन ) .... ... ... ... .... ०-८
कबीरउपासनापद्धति- ( साधारणतःसर्वसाधारणको और विशेषतः कबीर
पंथियोंको सदाचार बतानेवाली अद्वितीय पुस्तक ) ... ०-१०
संपूर्ण पुस्तकोंका " बड़ा सूचीपत्र " अलग है मँगालीजिये.
पत्ता-खेमराज श्रीकृष्णदास,
“ श्रीवेङ्कटेश्वर ” ( स्टीम् ) प्रेस-बंबई.