कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंबघेलवंशवर्णन । ( ७२९ )
जोहत भाग ह्वै जात सभाग सभागतसों सब सोच विछोहत ॥
छोहत तापै सबै जगहै गहजो रघुराजपगे अजसोहत ॥ ६ ॥
घनाक्षरी ।
शारद शशीसों कोई शारद पयोदहीसो हीसो गुनि कहै कोई लस्यों सम पारद ॥
पारदरशाति नहिं कहि कहि काहु मति मति कहे कोई घनसारहुकी पारद ॥
भार दरशात पेन्हे भूप मोती हीरा हार हार गई द्युति भाषै कविवृंद मारद ॥
नारदकोहुते है बेहद रघुराज जस जस मही तस स्वर्ग गावती है शारद ॥ १ ॥
दोहा-अष्टक कष्ट करै न जग, जगत पार धन नष्ट ॥
नष्ट नहीं चित पुष्ट कवि, कवित तुष्टकर अष्ट ॥ ८७ ॥
सवैया-भूप अजीत२भयो लियो जीत रिपून नहीं कोउ बांचो ॥
तासु तनय नृप जयसिंह जयसिंह होत भयो रणरंगमें राचो ॥
तासुत श्रीविश्वनाथ भयो विश्वनाथहू दान कृपानमें सांचो ॥
तासुत जो रघुराज समै रघुराज भो तौन अचंभव सांचो ॥ १ ॥
कवित्त ।
जाहि जपि पतितहू पावन परम होत होहिंगे भये हैं गये केते हरिधामको ॥
जाको यश गावत न पावत सुकवि पार सबको अधार जो देवैया मन कामको ॥
जाके बल शंकर विरंचि सनकादि ऋषि जागत रहत जग यामिनि त्रियामको ॥
चिरंजीव होवें महाराज रघुराज सदा याचै युगलेश वेश सोई राम नामको ॥ १ ॥
अंगनि सुछबिकोटि वारिने अनंग जासु कालको विहाल करै शोर धनु घोरको ॥
मार्तंड पावको प्रताप जासु ताप करै शशिहूको शीतल करैत यश ठोरको ॥
चरित अशेष जासु शेषहु न अशेष लहै नाम कहै पामर पुनीत होत जोरको ॥
चिरंजीव होवै महाराज रघुराज सदा याचै युगलेश सोई कोशल किशोरको ॥ २ ॥
जोलों राम निज नाम धाम गुण ग्राम राखौ कीबो काल कर्महु प्रपंच पंच भाषिये ॥
जौलौं विधि आदि सिधि देवनको अधिकार नित प्रीतिको विचार कीबे अबलाखिये ॥