ज्ञानयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)
Jnana Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)
स्वामी विवेकानन्द द्वारा
७० ज्ञानयोग
७० ज्ञानयोग
और प्राण मे पर्यवसित कर दिया। अब आकाश और प्राण को किसी एक वस्तु मे पर्यवसित करना होगा। इन्हे मन नामक उच्चतर क्रिया-शक्ति मे पर्यवसित किया जा सकता है। महत् अथवा समष्टि चिन्ता-शक्ति से प्राण और आकाश दोनो की उत्पत्ति होती है। चिन्ता-शक्ति ही इन दो शक्तियों के रूप मे विभक्त हो जाती है। प्रारम्भ मे यही सर्वव्यापी मन था। इसी ने परिणत होकर आकाश और प्राण रूप धारण किये और इन्हीं दोनो के सम्मिश्रण से समस्त जगत् बना।
अब हम मनस्तत्व की आलोचना करेगे। मै आपको देख रहा हूँ। आँखे विषय को ग्रहण कर रही है और अनुभूतिजनक स्नायु उसे मस्तिष्क मे प्रेरित कर रहे है। आँखे देखने का साधन नही है, वे केवल बाहरी यन्त्र है, कारण देखने का जो वास्तविक साधन है, जो मस्तिष्क मे विषय-ज्ञान को संवाद ले जाता है, उसको यदि नष्ट कर दिया जाय तब मेरी बीस आँखे रहते हुए भी आप मे से किसी को भी मै नही देख सकूँगा। अक्षिजाल (Retina) के ऊपर पूरा अक्स या प्रतिबिम्ब पड़ सकता है फिर भी तुम सब को मै देख नहीं पाऊँगा। अतएव सिद्ध है कि वास्तविक दर्शनेन्द्रिय इस आँख से पृथक् कोई वस्तु है; प्रकृत चक्षुरिन्द्रिय अवश्य ही चक्षुयन्त्र के पीछे विद्यमान है। सभी प्रकार की विषयानुभूति के सम्बन्ध मे इसी प्रकार समझना चाहिये। नासिका घ्राणेन्द्रिय नही है; वह केवल यन्त्र मात्र है, उसके पीछे घ्राणेन्द्रिय है। प्रत्येक इन्द्रिय के सम्बन्ध मे समझना होगा कि पहले तो इस स्थूल शरीर मे बाह्य यन्त्र लगे हुये है; पीछे किन्तु इसी स्थूल शरीर मे इन्द्रियाँ भी मौजूद हैं। किन्तु इन सब से भी काम नही चलता! मान लीजिये, मै आपसे कुछ कह रहा हूँ-
मनुष्य का यथार्थ स्वरूप — ७१
और आप बड़े मनोयोग के साथ मेरी बात सुन रहे हैं, इसी समय यहाँ एक घण्टा बजता है; शायद आप उस घण्टे की ध्वनि को नहीं सुन सकेगे। यह शब्द-तरंग आपके कान मे पहुँच कर कान के पर्दे मे लगी, स्नायुओ के द्वारा यह संवाद् मस्तिष्क मे पहुँचा, किन्तु फिर भी आप उसे क्यों नहीं सुन सके ? यदि मस्तिष्क मे संवाद् वहन करने तक ही समस्त श्रवण-प्रक्रिया सम्पूर्ण हो जाती, तो फिर तुम क्यो नही सुन पा सके ? अतएव मालूम हुआ कि सुनने की प्रक्रिया के लिये और भी कुछ आवश्यक है—मन इन्द्रिय से युक्त नहीं था । जिस समय मन इन्द्रियों से पृथक रहता है उस समय इन्द्रियाँ उसके पास जो कुछ भी संवाद लायेगी मन उनको ग्रहण नही करेगा। जब मन उनसे युक्त रहता है तभी वह किसी संवाद को ग्रहण करने मे समर्थ होता है । किन्तु इससे भी विषयानुभूति , पूर्ण नही होगी । बाहरी यन्त्र संवाद् वहन कर सकता है, इन्द्रियगण उसे भीतर ले जा सकती है और मन इन्द्रियों से संयुक्त रह सकता है, फिर भी विषयानुभूति पूर्ण नही होगी । एक वस्तु और आवश्यक है। भीतर से प्रतिक्रिया आवश्यक है। प्रतिक्रिया से ही ज्ञान उत्पन्न होगा । बाहर की वस्तु ने मानों मेरे अन्दर संवाद-प्रवाह प्रेरित किया। मेरे मन ने उसे लेकर बुद्धि के निकट अर्पण कर दिया, बुद्धि ने पहले से बने हुये मन के संस्कारो के अनुसार उसे सजाया और बाहर की ओर प्रतिक्रिया-प्रवाह की प्रेरणा की, इसी प्रतिक्रिया के साथ साथ विषयानुभूति होती है। मन की जो शक्ति इस प्रतिक्रिया की प्रेरणा करती है उसे ' बुद्धि ' कहते है। किन्तु फिर भी अभी विषयानुभूति पूर्ण नहीं हुई। मान लीजिये, एक चित्रक्षेपक यन्त्र है और एक पर्दा है। मै इस पर्दे पर एक चित्र डालने की चेष्टा कर रहा हूँ। तो मै क्या