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ज्ञानयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)

Jnana Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)

स्वामी विवेकानन्द द्वारा

DevanagariHindipublished332 पृष्ठ

२४ ज्ञानयोग

२४ ज्ञानयोग

ression) * के नियम से बढ़ेगी। जंगली मनुष्य समाज के सम्बन्ध मे अधिक नहीं जानता। किन्तु हम उन्नतिशील लोग जानते है कि हम जितने ही उन्नत होगे, हमारी सुख और दुःख के अनुभव करने की शक्ति उतनी ही तीव्र होगी। हममे से तीन चौथाई मनुष्य जन्म से ही जो पागल रहते है यह प्रायः सभी जानते है। यही माया है।

अतएव, हम देखते है कि माया संसार-रहस्य की व्याख्या करने के निमित्त कोई विशेष मतवाद नहीं है। संसार मे घटनांये जिस प्रकार होती रही हैं, माया उन्हीं का वर्णन मात्र है। विरुद्ध भाव ही हमारे अस्तित्व की भित्ति है; सर्वत्र इन्हीं भयानक विरुद्ध भावों के बीच मे से होकर हम चलते हैं। जहाँ मगल है वहीं अमगल रहता है; जहाँ अमंगल है वहीं मंगल है। जहाँ जीवन है मृत्यु वहीं छाया की भाँति उसका अनुसरण कर रही है। जो हँस रहा है उसीको रोना पड़ेगा; जो रो रहा है वह भी हँसेगा। यह क्रम बदल नहीं सकता। हम लोग अवश्य ही ऐसे स्थान की कल्पना कर सकते है जहाँ केवल मङ्गल ही रहेगा, अमङ्गल रहेगा नही; जहाँ हम केवल हँसेंगे, रोयेगे नही। किन्तु जब तक ये सब कारण समान रूप से विद्यमान हैं तब तक इस प्रकार का संघटन स्वयं ही असम्भव है। जहाँ हमें हँसाने की शक्ति विद्यमान है वहीं रुलाने की भी शक्ति प्रच्छन्न रूप से विद्यमान है; जहाँ सुख उत्पन्न करने वाली शक्ति विद्यमान है दुःख देने वाली शक्ति भी वही छिपी हुई है।


* समयुक्तान्तर श्रेणी नियम जैसे ३।५।७।९ इत्यादि, यहाँ पर प्रत्येक परवर्ती अपने पूर्ववर्ती अङ्क से दो दो अधिक है। समगुणितान्तर जैसे ३।६।१२।२४ इत्यादि यहाँ पर प्रत्येक परवर्ती अङ्क अपने पूर्ववर्ती अङ्क का दुगुना है।

माया २९

अतएव वेदान्त-दर्शन आशावादी अथवा निराशावादी नहीं है। वह तो दोनो ही बातों का प्रचार करता है; सारी घटनाये जिस प्रकार होती है वह उसे उसी रूप में ग्रहण करता है; अर्थात् उसके मत मे यह संसार मङ्गल और अमङ्गल, सुख और दुःख का मिश्रण है; एक को बढ़ाओ, दूसरा भी साथ साथ बढ़ेगा। केवल सुख का संसार अथवा केवल दुःख का संसार होही नहीं सकता। इस प्रकार की धारणा ही स्वतःविरोधी है। किन्तु इस प्रकार का मत व्यक्त करके और इस विश्लेषण के द्वारा वेदान्त ने यही एक महारहस्य का मर्म निकाला है कि मङ्गल और अमङ्गल ये दो एकदम विभिन्न सत्तायें नहीं है। इस संसार मे ऐसी एक भी वस्तु नहीं है जिसे एकदम मंगल जनक या एकदम अमङ्गल जनक कहा जा सके। एक ही घटना जो आज शुभ जनकं मालूम पड़ती है, कल अशुभ मालूम पड सकती है। एक ही वस्तु जो एक व्यक्ति को दुःखी करती है दूसरे को सुखी बना सकती है। जो अग्नि बच्चे को जला देती है, वही अनशन से जर्जर व्यक्ति के लिये उत्तम खाद्यान्न भी पका सकती है। जिस स्नायुमण्डल के द्वारा दुःख का ज्ञान हमारे अन्दर प्रवेश करता है, सुख का ज्ञान भी उसी के द्वारा हमे मिलता है। अमङ्गल का निवारण करने का एक मात्र उपाय मङ्गल का निवारण ही है, अन्य कोई उपाय नहीं है—यह निश्चित है। मृत्यु का निवारण करने के लिये जीवन का निवारण करना पड़ेगा। मृत्युहीन जीवन और असुख-हीन सुख ये बातें अपनी ही विरोधी हैं, इनमे कोई सत्य नहीं है। कारण, दोनो ही एक ही वस्तु का विकास हैं। कल जो शुभदायक लगता था आज वह वैसा नहीं लगता। जब हम विगत जीवन की आलोचना