ज्ञानयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)
Jnana Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)
स्वामी विवेकानन्द द्वारा
४८ ज्ञानयोग
४८ ज्ञानयोग
हम जिन्हें पञ्चभूत कहते है उनका कोई अस्तित्व नहीं है, किन्तु दूसरा मत सिद्ध नहीं किया जा सकता।
शरीर के भीतर यह जो शक्ति का विकास देखा जाता है यह क्या है? हम सभी यह बात सरलता से समझ सकते हैं कि यह शक्ति जो कुछ भी हो, यही शक्ति जड़ परमाणुओ को लेकर उनसे एक विशेष आकृति—मनुष्य देह—को तैयार करती है। और कोई आकर तुम्हारे मेरे शरीर को नहीं बनाता। दूसरा कोई मेरे लिये खा रहा है ऐसा मैने कभी नही देखा। मुझे ही इस भोजन का सार शरीर मे लेकर उससे रक्त, मास, अस्थि आदि का गठन करना होता है। यह अद्भुत शक्ति क्या है? भूत भविष्य के सम्बन्ध मे कोई भी सिद्धान्त मनुष्यो को भयावह प्रतीत होता है, बहुत लोगों को तो यह केवल एक अमानुषिक बात मालूम होती है। अतएव वर्तमान मे क्या होता है, हम यही समझने की चेष्टा करेंगे। हम वर्तमान विषय को ही लेगे। वह शक्ति क्या है जो इस समय हमारे भीतर बैठी काम कर रही है? हम देख चुके हैं कि सभी प्राचीन शास्त्रो मे इस शक्ति को लोगो ने इसी शरीर के समान शरीर से सम्पन्न एक ज्योतिर्मय पदार्थ माना है; उनका विश्वास था कि इस शरीर के चले जाने पर भी वह शरीर रहेगा। क्रमशः हम देखते हैं कि केवल ज्योतिर्मय देह कहने से सन्तोष नहीं होता—एक और भी ऊँचा भाव लोगों के मन पर अधिकार करता दिखाई देता है। वह यह है कि किसी प्रकार का शरीर शक्ति का स्थान नही ले सकता। जिस किसी वस्तु की आकृति है वह वस्तु केवल बहुत से परमाणुओं का एक समूह है, अतएव उसको चलाने के लिये और कुछ भी चाहिये। यदि इस शरीर
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का गठन और परिचालन करने के लिये इस शरीर के अतिरिक्त किसी अन्य वस्तु की आवश्यकता है तो इसी कारण से उस ज्योतिर्मय देह का गठन और परिचालन करने के लिये भी तदतिरिक्त और कुछ चाहिये। यही “ और कुछ ” आत्मा नाम से पुकारा जाने लगा। आत्मा ही मानो इस ज्योतिर्मय देह के भीतर से स्थूल शरीर के ऊपर काम कर रहा है। यही ज्योतिर्मय शरीर मन का आधार कहा जाता है, और आत्मा इससे अतीत है। आत्मा मन नहीं है, वह मन के ऊपर कार्य करता है और मन के भीतर से शरीर के ऊपर कार्य करता है। तुम्हारे एक आत्मा है, मेरे भी एक आत्मा है सभी के पृथक् एक-एक आत्मा है और एक-एक सूक्ष्म शरीर भी है; इसी सूक्ष्म शरीर की सहायता से हम स्थूल शरीर के ऊपर कार्य करते है। अब प्रश्न उठा—आत्मा और उसके स्वरूप के सम्बन्ध मे। शरीर और मन से पृथक् इस आत्मा का क्या स्वरूप है ? बहुत से से वाद प्रतिवाद होने लगे, बहुत से सिद्धान्त और अनुमान माने जाने लगे, बहुत से दार्शनिक अनुसन्धान होने लगे—मै आपके समक्ष इस आत्मा के सम्बन्ध मे उन्होने जो कई एक सिद्धान्त अपनाये है उनका वर्णन करने की चेष्टा करूँगा। भिन्न-भिन्न दर्शनों का इस एक विषय मे मतैक्य देखा जाता है कि आत्मा का स्वरूप जो कुछ भी हो, उसकी कोई आकृति नही है, और जिसकी आकृति नहीं वह अवश्य ही सर्वव्यापी होगा। काल मन के अन्तर्गत है—देश भी मन के अन्तर्गत है। काल को छोड़ कार्य-कारण-भाव भी नहीं रह सकता। क्रमवर्तिभाव को छोड़ कार्य-कारण-भाव भी नहीं रह सकता। अतएव, देश-काल-निमित्त मन के अन्तर्गत है और यह आत्मा, मन से अतीत और निराकार है, इसलिये वह भी अवश्य
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ही देश-काल-निमित्त से अतीत है। और जब वह देश-काल-निमित्त से अतीत है तो अवश्य ही अनन्त होगा। अब इस वार हिन्दूदर्शन का उच्चतम विचार आता है। अनन्त कभी दो नही हो सकते। यदि आत्मा अनन्त है तो केवल एक ही आत्मा हो सकता है, और यह जो अनेक आत्माओ की धारणा है—तुम्हारा एक आत्मा, मेरा दूसरा आत्मा—यह सत्य नहीं है। अतएव मनुष्य का प्रकृत स्वरूप एक ही है, अनन्त और सर्वव्यापी, और यह व्यवहारिक जीव मनुष्य के इस वास्तविक स्वरूप का केवल एक सीमाबद्ध भाव है। इसी हिसाब से पूर्वोक्त पौराणिक तत्व भी सत्य हो सकते है कि व्यवहारिक जीव, चाहे वह कितना ही वडा क्यो न हो जाय फिर भी मनुष्य के इस अतीन्द्रिय प्रकृत स्वरूप का अस्फुट प्रतिबिम्बमात्र ही है। अतएव मनुष्य का प्रकृत स्वरूप—आत्मा—जो कार्य-कारण से अतीत है—जो देश-काल से अतीत है—अवश्य ही मुक्त स्वभाव है—वह कभी बद्ध नही था, उसको बद्ध करने की शक्ति किसीमे नहीं थी। यह व्यवहारिक जीव, यह प्रतिबिम्ब देश-काल-निमित्त के द्वारा सीमाबद्ध है, इसलिये यह बद्ध है। अथवा किन्ही-किन्ही दार्शनिको की भाषा मे यो कहेगे कि “मालूम होता है कि जैसे वह बद्ध हो गया है, परन्तु वास्तव मे वह बद्ध नही है।” हमारी आत्मा के भीतर यथार्थ सत्य केवल इतना ही है—यही सर्वव्यापी, अनन्त चैतन्यस्वभाव है; हम स्वभाव से ही ऐसे है—चेष्टा करके हमे ऐसा बनने की आवश्यकता नही। प्रत्येक आत्मा ही अनन्त है इसलिये जन्म और मृत्यु का प्रश्न उठ ही नहीं सकता। कुछ बालक परीक्षा दे रहे थे। परीक्षक कठिन कठिन प्रश्न पूछ रहे थे। उनमे यह भी प्रश्न था—‘पृथिवी गिरती क्यों नहीं?’ वे मध्याकर्षण के नियम आदि सम्बन्धी उत्तर की आशा कर रहे थे। अधिकांश बालक-बालिक
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कोई उत्तर नही दे सके। कोई कोई वालक मध्याकर्षण या और कुछ कह कह कर उत्तर देने लगे। उनमें से एक बुद्धिमती वालिका ने एक और प्रश्न करके इस प्रश्न का समाधान कर दिया—"पृथिवी गिरेगी कहाँ पर ?" यह प्रश्न ही गलत है। पृथिवी कहाँ गिरे ? पृथिवी के लिये पतन और उत्थान का कोई अर्थ नहीं है। अनन्त देश का ऊपर और नीचे कैसा ? यह दोनों तो आपेक्षिक है। जो अनन्त है वह कहाँ जायगा और कहाँ से आयेगा ? जब मनुष्य भूत और भविष्य की चिन्ता का—उसका क्या क्या होगा, इस चिन्ता का—त्याग कर देता है, जब वह देह को सीमाबद्ध और इसीलिये उत्पत्ति-विनाश-शील जान कर देहाभिमान का त्याग कर देता है, उसी समय वह एक उच्चतर अवस्था मे पहुँच जाता है। देह भी आत्मा नहीं, मन भी आत्मा नहीं; कारण इनका ह्रास और वृद्धि होती है। केवल जड़ जगत् से अतीत आत्मा ही अनन्त काल तक रह सकता है। शरीर और मन प्रतिनियत परिवर्तनशील है। ये दोनो ही कई एक परिवर्तनशील घटनाश्रेणियो के नाममात्र है। ये मानो एक नदी के समान है जिसका प्रत्येक जलपरमाणु नियत, चञ्चल है। तब भी हम देखते है कि यह वही एक नदी है। इस देह का प्रत्येक परमाणु नियतपरिणामशील है; कोई भी व्यक्ति कुछ क्षण को भी एक ही रूप का शरीर नहीं रख सकता। तथापि मन के ऊपर एक प्रकार का संस्कार बैठ गया है जिसके कारण हम इसे एक ही शरीर कह कर विवेचना करते हैं। मन के सम्बन्ध मे भी यही बात है। क्षण मे सुखी, क्षण मे दुःखी, क्षण मे सबल, क्षण मे दुर्बल—नियत परिणामशील भँवर के समान। अतएव मन भी आत्मा नहीं हो सकता, आत्मा तो अनन्त है। परिवर्तन केवल ससीम वस्तु मे ही सम्भव है। अनन्त मे किसी प्रकार का