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ज्ञानयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)

Jnana Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)

स्वामी विवेकानन्द द्वारा

DevanagariHindipublished332 पृष्ठ

प्रारंभिक पृष्ठ, भूमिका व प्रस्तावना

ज्ञानयोग

स्वामी विवेकानन्द

<br>

श्रीरामकृष्ण आश्रम,
नागपुर, मध्यप्रदेश

<br>

जून १९५० ] \hfill [ मूल्य ३ रु.

प्रकाशक—

स्वामी भास्करेश्वरानन्द,
अध्यक्ष, श्रीरामकृष्ण आश्रम, नागपुर-१, म. प्र.


श्रीरामकृष्ण-शिवानन्द-स्मृतिग्रन्थमाला

पुष्प-४९ वाँ

( श्रीरामकृष्ण आश्रम, नागपुर द्वारा सर्वाधिकार सुरक्षित )


मुद्रक—

ल. म. पटले
रामेश्वर प्रिंटिंग प्रेस, सिताबर्डी, नागपुर

वक्तव्य

श्री स्वामी विवेकानन्द द्वारा वेदान्त पर दिए गये भाषणों का संग्रह “ज्ञानयोग” है। इन व्याख्यानों में श्री स्वामीजी ने वेदान्त के गूढ़ तत्त्वों की ऐसे सरल, स्पष्ट तथा सुन्दर रूप से विवेचना की है कि आजकल के शिक्षित जनसमुदाय को ये खूब जँच जाते हैं। उन्होने यह दर्शाया है कि वैयक्तिक तथा सामुदायिक जीवन-गठन मे वेदान्त किस प्रकार सहायक होता है। मनुष्य के विचारों का उच्च-तम स्तर वेदान्त है और इसी की ओर संसार की समस्त विचार-धाराएँ शनैः शनैः प्रवाहित हो रही हैं। अन्त मे वे सब वेदान्त में ही लीन होंगी। स्वामीजी ने यह भी दर्शाया है कि मनुष्य के दैवी स्वरूप पर वेदान्त कितना ज़ोर देता है और किस प्रकार इसी मे समस्त विश्व की आशा, कल्याण तथा शान्ति निहित है। हमे पूर्ण विश्वास है कि वेदान्त तथा भारतीय संस्कृति के प्रेमियो को इस पुस्तक से विशेष लाभ होगा।

इस पुस्तक के अधिकांश भाग का अनुवाद बनारस के श्री ब्रह्मेन्द्र शर्मा, एम. ए., शास्त्री, ने किया है और कुछ अंश का श्री अमल सरकार, एम. ए., कोविद, कलकत्ता ने किया है। इन दोनो मित्रो की इस सहायता के लिए हम उनके बड़े कृतज्ञ हैं।

डा. पं. विद्याभास्करजी शुक्ल, एम. एस-सी., पी-एच. डी., कॉलेज ऑफ साइन्स, नागपुर के भी हम बड़े आभारी हैं जिन्होंने इस पुस्तक के प्रुफ-सशोधन कार्य मे हमे बड़ी सहायता दी है।

नागपुर,
ता. १५-६-१९३०

प्रकाशक

अनुक्रमणिका

विषयपृष्ठ
१. सन्यासी का गीत१
२. माया८
३. मनुष्य का यथार्थ स्वरूप३७
४. ,, — ,,६७
५. माया और ईश्वरधारणा का क्रमविकास१०२
६. माया और मुक्ति१२२
७. ब्रह्म और जगत्१४१
८. जगत् (बहिर्जगत्)१६६
९. जगत् (अन्तर्जगत्)१८२
१०. बहुत्व मे एकत्व२०५
११. सभी वस्तुओ मे ब्रह्मदर्शन२२९
१२. अपरोक्षानुभूति२४९
१३. आत्मा का मुक्त स्वभाव२८३
१४. अमरत्व३०७

ज्ञानयोग

१. संन्यासी का गीत

छेड़ो संन्यासी, छेड़ो, छेड़ो वह तान मनोहर,
गाओ वह गान, जगा जो अत्युच्च हिमाद्रि-शिखर पर—
सुगंभीर अरण्य जहाँ है, पार्वत्य प्रदेश जहाँ है,
भव-पाप-ताप ज्वालामय करते न प्रवेश जहाँ है—
जो संगीत-ध्वनि-लहरी अतिशय प्रशान्त लहराती
जो भेद जगत् कोलाहल नभ-अवनी मे छा जाती,
धन-लोभ, यशोलिप्सा या दुर्दान्त काम की माया
सब विधि असमर्थ हुई है छूने में जिसकी छाया,
सत्-चित्-आनन्द-त्रिवेणी करती है जिसको पावन,
जिसमे करके अवगाहन होते कृतकृत्य सुधीजन—
छेड़ो छेड़ो, हाँ छेड़ो वह तान दिव्य लोकोत्तर,
गाओ, गाओ संन्यासी, गाओ वह गायन सुन्दर—
ॐ तत् सत् ॐ

तोड़ो जंजीरे जिनसे जकड़े हैं पैर तुम्हारे—
वे सोने की है तो क्या कसने में तुमको हारे ?

१

२

ज्ञानयोग

अनुराग-घृणा-संघर्षण, उत्तम वा अधम विवेचन,
इस द्वन्द्व भाव को त्यागो, है त्याज्य उभय आलम्बन ।
आदर गुलाम पाये या कोड़ो की मारे खाए,
वह सदा गुलाम रहेगा कालिख का तिलक लगाए;
स्वातन्र्य किसे कहते है—वह जान नही है पाता
स्वाधीन सौख्य जीवन का—उसकी न समझ मे आता
त्यागो संन्यासी, त्यागो तुम द्वन्द्व भाव को सत्वर,
तोडो शृंखल को तोड़ो, गाओ यह गान निरन्तर—
ॐ तत् सत् ॐ

घन अन्धकार हट जाए, मिट जाए घोर महातम,
जो मृगमरीचिका जैसा करता रहता बुद्धि-भ्रम;
मोहक भ्रामक आकर्षण अपनी है चमक दिखाता,
तम से घनतर तम मे वह जीवात्मा को ले जाता ।
जीवन की यह मृग-तृष्णा बढती अनवरत निरन्तर,
मेटो तुम इसे सदा को पीयूष ज्ञान का पीकर ।
यह तम अपनी डोरी मे जीवात्मा-पशु को कसकर
खीचा करता बलपूर्वक दो जन्म-मरण-छोरो पर ।
जिसने अपने को जीता, उसने जय पायी सब पर—
यह तथ्य जान फन्दे मे पड़ना मत बुद्धि गवाँ कर ।
बोलो सन्यासी, बोलो हे वीर्यवान बलशाली,
सानन्द गीत यह गाओ, छेडो यह तान निराली—
ॐ तत् सत् ॐ

“अपने अपने कर्मों का फल भोग जगत् मे निश्चित”
कहते है सब, “कारण पर है सभी कार्य अवलम्बित;

संन्यासी का गीत

'फल अशुभ अशुभ कर्मों के, शुभ कर्मों के है शुभ फल,
किसकी सामर्थ्य बदल दे, यह नियम अटल औ' अविचल ?
इस मृत्युलोक मे जो भी करता है तनु को धारण,
बन्धन उसके अंगो का होता नैसर्गिक भूषण ।"
यह सच है, किन्तु परे जो गुण नाम-रूप से रहता
वह नित्य मुक्त आत्मा है, स्वच्छन्द सदैव विचरता ।
'तत् त्वमसि'—वही तो तुम हो, यह ज्ञान करो दृढ्यांकित,
फिर क्या चिन्ता सन्यासी, सानन्द करो उद्घोषित—

ॐ तत् सत् ॐ

क्या मर्म सत्य का, इसको वे कुछ भी समझ न पाते,
सुत बन्धु पिता माता के स्वप्नो मे जो मदमाते ।
आत्मा अतीत नातो से, वह जन्म-मरण से विरहित,
वह लिंग-भेद से ऊपर, सुख-दुख-भावो से अविजित ।
वह पिता कहाँ किसका है, किसका सुत किसकी माता ?
वह शत्रु मित्र किसका है, उसका किससे क्या नाता ?
जो एक, सर्वमय शाश्वत, जिसका जोड़ा न कहीं है,
जिसके अभाव मे कोई सम्भव अस्तित्व नहीं है,
'तत् त्वमसि'—वही तो तुम हो, समझो हे संन्यासीवर,
अतएव उठो, गाओ तुम, गाओ यह गान निरन्तर—

ॐ तत् सत् ॐ

चिर मुक्त विज्ञ आत्मा है, वह अद्वितीय, वह अतुलित,
अक्लेद्य अशोष्य निरामय, वह नाम-रूप-गुण-विरहित,

४

ज्ञानयोग

उसके आश्रय मे बैठी संसार-मोहिनी माया
देखा करती है अपने मादक स्वप्नों की छाया;
साक्षी स्वरूप माया का आत्मा सदैव है सुविदित,
जीवात्मा और प्रकृति के रूपों मे वही प्रकाशित;
‘तत् त्वमसि’ वही तो तुम हो, समझो हे संन्यासीवर,
उच्च स्वर में यह गाओ, यह तान अलापो सुन्दर—
ॐ तत् सत् ॐ

हे बन्धु, मुक्ति पाने को तुम फिरते कहाँ भटकते ?
इस जग या लोकान्तर मे तुम मुक्ति नहीं पा सकते;
अन्वेषण व्यर्थ तुम्हारा शास्त्रो, मन्दिर मन्दर मे;
जो तुमको खींचा करती वह रज्जु तुम्हारे कर मे।
दुख शोक त्याग दो सारा, तुम वीतशोक बस हो लो,
वह रज्जु हाथ से छोड़ो, बोलो संन्यासी, बोलो—
ॐ तत् सत् ॐ

दो अभय-दान सबको तुम—‘हों सभी शान्तिमय सुखमय,
है-प्राणिमात्र को मुझसे कुछ भी न कहीं कोई भय,
पृथ्वी पाताल गगन मे मैं ही आत्मा चिर-संस्थित,
आशा भय स्वर्ग नरक को मैंने तज दिया अशंकित।’
काटो काटो काटो तुम इस विधि माया के बन्धन,
निःशंक प्राणपण से तुम गाओ गाओ यह गायन,—
ॐ तत् सत् ॐ

चिन्ता मत करो तनिक भी नश्वर शरीर की गति पर,
यह देह रहे या जाए, छोड़ो तुम इसे नियति पर;

संन्यासी का गीत

६

जब कार्य शेष है इसका है, तब जाता है तो जाए;
प्रारब्ध कर्म फिर इसको अब चाहे जहाँ बहाए;
कोई आदर से इसको मालाएँ पहनाएगा,
कोई निज घृणा जताकर पैरों से ठुकराएगा;
तुम चित्त शान्ति मत तजना, आनन्द-निरत नित रहना;
यश कहाँ, कहाँ अपयश है—इस धारा मे मत बहना।
जब निन्दक और प्रशंसक, जब निन्दित और प्रशंसित,
एकात्म एक ही हैं सब, तब कौन प्रशंसित निन्दित ?
यह ऐक्य-ज्ञान हृदयंगम करके हे संन्यासीवर,
निर्भय आनन्दित उर से गाओ यह गान मनोहर—

ॐ तत् सत् ॐ

करते निवास जिस उर मे मद काम लोभ औ' मत्सर,
उसमे न कभी हो सकता आलोकित सत्य-प्रभाकर;
भार्यत्व कामिनी में जो देखा करता कामुक बन,
वह पूर्ण नहीं हो सकता, उसका न छूटता बन्धन;
लोलुपता है जिस नर की स्वल्पातिस्वल्प भी धन में,
वह मुक्त नही हो सकता रहता अपार बन्धन मे;
जंजीर क्रोध की जिसको रखती है सदा जकड़ कर,
वह पार नहीं कर सकता दुस्तर माया का सागर।
इन सभी वासनाओं का अतएव त्याग तुम कर दो,
सानन्द वायुमण्डल को बस एक गूँज से भर दो—

ॐ तत् सत् ॐ

सुख हेतु न गेह बनाओ, किस घर में अमा सकोगे ?
तुम हो महान्, फिर कैसे पिंजड़े के विहग बनोगे ?

ज्ञानयोग -

आकाश अनन्त चँदोया, शय्या धरती तृण-शोभित,
रहने के लिए तुम्हारे यह विश्वगेह है निर्मित;
जैसा भोजन मिल जाए, सन्तोष उसी पर करना;
सुस्वादु स्वाद-विरहित मे कुछ भी मत भेद समझना;
शुद्धात्मरूप का जिसमे सद् ज्ञानालोक चमकता,
कुछ खाद्य पेय क्या उसको अपवित्र कहीं कर सकता ?
उन्मुक्त स्वतंत्र प्रवाहित तुम नदी तुल्य बन जाओ,
छेड़ो यह तान अनूठी, सानन्द गीत यह गाओ—

ॐ तत् सत् ॐ.

ज्ञानी विरले, अज्ञानी कर घृणा हँसेगे तुम पर;
हे हे महान्, तुम उनको मत लखना आँख उठा कर ।
स्वाधीन मुक्त तुम, जाओ, पर्यटन करो पृथ्वी पर,
अज्ञान-गर्त-पतितों का उद्धार करो तुम सत्वर;
माया-आवरण-तिमिर मे जो पड़े वेदना सहते,
तुम उन्हे उबारो जाकर, जो मोह-नदी मे बहते ।
विचरो जन-हित-साधन को स्वच्छन्द मुक्त तुम अविजित
दुख की पीड़ा से निर्भय, सुख-अन्वेषण से विरहित;
सुख दुख के द्वन्द्व-स्थल के तुम परे महात्मन्, जाओ;
गाओ गाओ संन्यासी, उच्चस्वर से तुम गाओ—

ॐ तत् सत् ॐ.

इस विधि से छीजू दिनोंदिन, है कर्म स्वीय बल खोता;
बन्धन छुटता आत्मा का, फिर उसका जन्म न होता;

७

संन्यासी का गीत

फिर कहाँ रह गया—मै तू, मेरा तेरा, नर ईश्वर ?
मै हूँ सब मे मुझमे सब आनन्द परम लोकोत्तर ।
आनन्द परम वह हो तुम आनन्द सहित अब गाओ,
हे बन्धुवर्य संन्यासी, यह तान पुनीत उठाओ—

ॐ तत् सत् ॐ


२. माया

( लन्दन में दिया हुआ भाषण )

माया शब्द प्रायः आप सभी ने सुना होगा। इसका व्यवहार साधारणतः कल्पना, कुहक अथवा इसी प्रकार के किसी अर्थ में किया जाता है, किन्तु यह इसका वास्तविक अर्थ नहीं है। मायावाद रूप एक स्तम्भ पर वेदान्त की स्थापना हुई है, अतः उसका ठीक ठीक अर्थ समझ लेना आवश्यक है। मैं तुमसे तनिक धैर्य की अपेक्षा रखता हूँ, क्योंकि मुझे बड़ा भय है कि कहीं तुम उसे (माया के सिद्धान्त को) ग़लत न समझ लो।

वैदिक साहित्य में कुहक अर्थ में ही माया शब्द का प्रयोग देखा जाता है। यही माया शब्द का सबसे प्राचीन अर्थ है। किन्तु उस समय वास्तविक मायावाद-तत्त्व का उदय नहीं हुआ था। हम वेद में इस प्रकार का वाक्य देखते हैं—"इन्द्रो मायाभिः पुरुरूप ईयते," अर्थात् इन्द्र ने माया द्वारा नाना रूप धारण किये। यहाँ पर माया शब्द इन्द्रजाल अथवा उसी के समान अर्थ में व्यवहृत हुआ है। वेदों के अनेक स्थलों में माया शब्द इसी अर्थ में व्यवहृत हुआ देखा जाता है। इसके बाद कुछ काल तक माया शब्द का व्यवहार एकदम लुप्त हो गया। किन्तु इसी बीच तत्प्रतिपाद्य जो अर्थ या भाव था वह क्रमशः परिपुष्ट हो रहा था। इसके बाद के समय में एक प्रश्न देखा

माया

९

जाता है, “हम जगत् के गुप्त रहस्य को क्यों नहीं जान पाते ?” और इसका इस प्रकार निगूढ़ भाव व्यञ्जक उत्तर प्राप्त होता है:— “हम सब व्यर्थ जल्पना करते है, हम इन्द्रिय-सुख से परितृप्त होने वाले और वासनापर है, अतएव इस सत्य को नीहारावृत करके रखने हैं”—

“नीहारेण प्रावृता जल्प्पा चासुतृप उक्थशासश्चरन्ति !” १

यहाँ पर माया शब्द का व्यवहार तो विल्कुल ही हुआ नहीं, किंतु इससे यही भाव प्रकट होता है कि हमारी अज्ञता का जो कारण निर्धारित हुआ है वह इस सत्य और हमारे बीच कुज्झटिका के समान वर्तमान है। अब इसके बहुत समय के वाद, अपेक्षाकृत आधुनिक उपनिषदो मे माया शब्द का फिर आविर्भाव देखने मे आता है। किन्तु इसी बीच मे इसका प्रभूत रूपान्तर हो चुका है; उसके साथ कई नये अर्थ संयोजित हो गये है; नाना प्रकार के मतवाद प्रचारित और पुनरुक्त हुये है; और अन्त मे माया विषयक धारणा एक स्थिर रूप प्राप्त कर चुकी है। हम श्वेताश्वतर उपनिषद् में पढते हैं—

“मायन्तु प्रकृतिं विद्यान्मायिनन्तु महेश्वरम् ।”

—माया को ही प्रकृति समझो और मायी को महेश्वर जानो। भगवान शंकराचार्य के पूर्ववर्ती दार्शनिक पण्डितों ने इसी माया शब्द का विभिन्न अर्थों में व्यवहार किया है। मालूम होता है, बौद्धों ने भी माया शब्द या मायावाद को कुछ रञ्जित किया है। किन्तु बौद्धों ने इसको प्रायः विज्ञानवाद २


१ ऋग्वेद-दशम मण्डल, ८२ सूक्त, ऋक्।

२ हमारी इन्द्रियों से ग्राह्य समस्त जगत् हमारे मन की ही विभिन्न अनुभूतिमात्र है, इसकी वास्तविक सत्ता नहीं है, इसी मत को विज्ञानवाद या Idealism कहते हैं।

१०

ज्ञानयोग

(Idealism) में परिणत कर दिया था और माया शब्द इसी अर्थ मे साधारणतः आजकल व्यवहृत होता है। हिन्दू लोग जब जगत् को “मायामय” बताते है तब साधारण मनुष्य के मन मे यही भाव उदय होता है कि “जगत् कल्पना मात्र है।” बौद्धो की इस प्रकार की व्याख्या का कुछ आधार है; कारण, एक श्रेणी के दार्शनिक पहले वाह्य जगत् के अस्तित्व मे बिलकुल ही विश्वास नहीं करते थे। किन्तु वेदान्त में वर्णित माया का अन्तिम निश्चित स्वरूप,—विज्ञानवाद, वास्तववाद † (Realism) अथवा किसी प्रकार का मतवाद नहीं है। हम क्या हैं, और अपने चारो ओर हम क्या देखते है, इस सम्बन्ध मे प्रकृत घटना का यह सहज वर्णनमात्र है। मै आपसे पहले ही कह चुका हूँ कि जिनके अन्तःकरण से वेद निकले उनकी चिन्ताशक्ति मूल तत्त्व की खोज में तथा आविष्कार मे ही लगी हुई थी। इन सब तत्त्वों का विस्तृत अनुशीलन करने के लिए मानों उन्हे अवसर ही नहीं मिला और उन्होने इसकी आवश्यकता भी नहीं समझी। वे तो वस्तु-मात्र के अन्तरतम प्रदेश में पहुँचने के लिये ही व्यग्र थे। ऐसा जान पड़ता है मानो उस पार उन्हे कोई बुला रहा था। अतः वे ठहर नहीं सकते थे। वस्तुतः उपनिषदो मे इधर उधर बिखरी हुई आधुनिक विज्ञान की विषयीभूत विशेष प्रतिपत्ति बहुधा भ्रमात्मक होते हुये भी उनके मूल तत्त्वो के साथ विज्ञान के मूल तत्त्वो का कोई प्रभेद नहीं है। यहाँ पर एक दृष्टान्त दिया जाता है। आधुनिक विज्ञान का ईथर (Ether) अथवा आकाशविषयक नवीन तत्त्व उप-निषदो में विद्यमान है। यह आकाश-तत्त्व आधुनिक वैज्ञानिकों के-


† जगत् केवल हमारे मन की अनुभूतिमात्र नहीं है, उसकी वास्तविक सत्ता है, इस मत को वास्तववाद या Realism कहते हैं।

माया ११

ईथर की अपेक्षा अधिक परिपुष्ट रूप से पाया जाता है। किन्तु वह मूल तत्त्व मे ही पर्यवसित था। वे लोग इस आकाशतत्त्व के कार्य की व्याख्या करते समय बहुत से भ्रमो में पड गये थे। जगत् की सम्पूर्ण जीवनी शक्ति जिसका विभिन्न विकास मात्र है वही सर्वव्यापी जीवनी शक्ति-तत्व वेद में—उसके ब्राह्मणांश मे ही प्राप्त हो जाता है। संहिता के एक बड़े मंत्र मे समस्त जीवनी शक्ति के विकासक प्राण की प्रशंसा की गई है। इसी सम्बन्ध में आप लोगों मे से कुछ को यह जानकर आनन्द होगा कि आधुनिक योरोपीय वैज्ञानिको के सिद्धान्तो के सदृश इस पृथिवी के जीवो की उत्पत्ति का सिद्धान्त वैदिक दर्शनों मे पाया जाता है। आप सभी निश्चय ही जानते है कि जीव अन्य ग्रहों से संक्रामित होकर पृथ्वी पर आता है, ऐसा एक मत प्रचलित है। जीव चन्द्रलोक से पृथ्वी पर आता है, किसी किसी वैदिक वैज्ञानिक का यही स्थिर मत है।

मूल तत्त्व के सम्बन्ध में हम देखते है कि उन्होने व्यापक साधारण तत्त्वो की छानबीन मे अतिशय साहस और आश्चर्यजनक निर्भीकता का परिचय दिया है। बाह्य जगत् से इस विश्व-रहस्य के मर्म को निकालने में उन्हे यथा सम्भव उत्तर मिला। और, इस प्रकार उन्होने जितने मूल तत्त्वो का आविष्कार किया था उससे जगत् के रहस्य की ठीक मीमांसा जब नहीं हो सकी, तब, आधुनिक विज्ञान की विशेष प्रतिपत्ति भी उसकी मीमांसा मे अधिक सहायक न हो सकेगी, यह निश्चित है। यदि प्राचीन काल मे आकाशतत्त्व विश्वरहस्य को भेदने मे समर्थ नहीं हुआ तब उसका विस्तृत अनुशीलन भी हमें सत्य की ओर अधिक अग्रसर नहीं कर सकता। यदि यह सर्वव्यापी