ज्ञानयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)
Jnana Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)
स्वामी विवेकानन्द द्वारा
२७२ ज्ञानयोग
२७२ ज्ञानयोग
को वक्तृताशक्ति, तीक्ष्ण मेधा अथवा वेदाध्ययन के द्वारा नहीं पाया जा सकता।
यह 'वेदों के द्वारा लाभ नहीं की जा सकती' ऐसा कहना ऋषियों के लिये परम साहस का कार्य था। पहले ही कहा है, ऋषि चिन्ता-जगत् मे बडे साहसी थे, वे किसी के द्वारा भी रोके जानेवाले नहीं थे। हिन्दू लोग वेद को जिस सम्मान की दृष्टि से देखते है, उस भाव से ईसाई लोग बाइबिल को कभी नहीं देखते। ईसाइयों की ईश्वर-वाणी के विषय मे ऐसी धारणा है कि किसी मनुष्य ने ईश्वरानु-प्राणित होकर उसे लिखा है, किन्तु हिन्दुओ की धारणा है—जगत् मे जो सभी विभिन्न पदार्थ हैं, उसका कारण यह है कि वेद मे इन इन पदार्थों का नाम उल्लिखित है। उनका विश्वास है कि वेद के द्वारा ही जगत् की सृष्टि हुई है। ज्ञान नाम से जो कुछ समझा जाता है, वह वेद मे ही है। जिस प्रकार आत्मा अनादि अनन्त है उसी प्रकार वेद का प्रत्येक शब्द भी पवित्र एवं अनंत है। सृष्टिकर्ता के समस्त मन का भाव ही मानो इस ग्रन्थ मे प्रकाशित है। वे इस भाव से वेद को देखते है। यह कार्य नीतिसंगत क्यों है?—क्योकि इसे वेद कहता है। यह कार्य अन्याय क्यो है?—क्योकि इसे वेद कहता है। वेद के प्रति प्राचीनो की ऐसी श्रद्धा रहने पर भी इन ऋषियो का सत्यानुसन्धान मे कितना साहस है, देखो। उन्होने यह कहा कि 'नही, बारंबार वेदपाठ करने पर भी सत्यलाभ की कोई सम्भावना नहीं है'। अतएव वही आत्मा जिसके प्रति प्रसन्न होती है, उसीको वह अपना स्वरूप दिखलाती है। किन्तु इससे एक और आशका उठ सकती है कि इसमे भी उस पर पक्षपात का दोष हुआ, इसलिये निम्नलिखित वाक्य भी इसके साथ कहे गये है। 'जो असत्कार्य करनेवाले है और जिनका मन शान्त
अपरोक्षानुभूति २७३
नहीं है, वे कभी भी इसे नहीं पा सकते ; केवल जिनका हृदय पवित्र है, जिनका कार्य पवित्र है, जिनकी इन्द्रियाँ संयत हैं, उन्हीं के निकट यह आत्मा प्रकाशित होती है।'
आत्मा के सम्बन्ध में एक सुन्दर उपमा दी गयी है। आत्मा को रथी, शरीर को रथ, बुद्धि को सारथी, मन को लगाम और इन्द्रियों को अश्व की उपमा दी गई है। जिस रथ के घोड़े अच्छी तरह संयत हैं, जिस रथ की लगाम खूब मज़बूत है और सारथी के द्वारा दृढ़रूप से पकड़ा हुआ है, वही रथ विष्णु के उस परम पद को पहुँच सकता है, किन्तु जिस रथ के इन्द्रिय रूपी घोड़े दृढ़भाव से संयत नहीं हैं तथा मनरूपी लगाम दृढ़भाव से संयत नहीं रहती वही रथ अन्त में विनाश की दशा को प्राप्त होता है। सभी प्राणियों के मध्य में अवस्थित आत्मा चक्षु अथवा किसी दूसरी इन्द्रिय के समक्ष प्रकाशित नहीं होती, किन्तु जिनका मन पवित्र हुआ है, वे ही उसे देख पाते हैं। जो शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध से अतीत है, जो अव्यय है, जिसका आदि अन्त नहीं है, जो प्रकृति के अतीत है, अपरिणामी है, उसे वे प्राप्त करते हैं, वे मृत्यु-मुख से मुक्त होते हैं। किन्तु उसे पाना बहुत कठिन है, यह मार्ग तेज क्षुरधारा के समान अत्यंत दुर्गम है। मार्ग बहुत लम्बा एव विपद्व्याप्त है, किन्तु निराश मत होना, दृढ़तापूर्वक चले जाओ, 'उठो, जागो, जिसकी कोई सीमा नहीं है, उसी चरमलक्ष्य पर पहुँच्चो, वहाँ तक पहुँचे बिना निवृत्त मत होओ।'
हम देखते हैं, समस्त उपनिषद के भीतर प्रधान बात यह अपरोक्षानुभूति ही है। इसके सम्बन्ध में मन में समय समय पर अनेक प्रकार के प्रश्न उठेंगे—विशेषतः आधुनिक लोगों के लिए इसकी उपकारिता के
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