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ज्ञानयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)

Jnana Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)

स्वामी विवेकानन्द द्वारा

DevanagariHindipublished332 पृष्ठ

१४० ज्ञानयोग

१४० ज्ञानयोग

सुनी थी, किन्तु उसे सुनकर तुम ठीक मार्ग पर नहीं चले। जिस मुक्ति के महान् आदर्श का तुमने अनुभव किया था वह सत्य है, किन्तु उसे बाहर की ओर खोजकर तुमने भूल की। इसी भाव को अपने निकट और निकटतर लाते चलो जब तक कि तुम यह न जान लो कि यह मुक्ति, यह स्वाधीनता तुम्हारे अन्दर ही है, वह तुम्हारी आत्मा की अन्तरात्मा है। यह मुक्ति बराबर तुम्हारा स्वरूप ही था, और माया ने तुम्हे कभी भी आक्रान्त नहीं किया। तुम्हारे ऊपर शक्ति विस्तार करने की माया की कभी सामर्थ्य ही न थी। बालक को भय दिखाने पर जो बात होती है उसी प्रकार तुम भी स्वप्न देख रहे थे कि प्रकृति तुम्हे नचा रही है और इससे मुक्त होना तुम्हारा लक्ष्य है। केवल इसे बुद्धि से जानना ही नहीं, प्रत्यक्ष करना, अपरोक्ष करना, हम इस जगत् को जितने स्पष्ट रूप से देखते है उससे अधिक स्पष्ट रूप से देखना। तभी हम मुक्त होंगे, तभी हमारी गड़बड़ समाप्त होगी; तभी हृदय की समस्त चञ्चलता स्थिर हो जायगी, तभी सारा टेढ़ापन सीधा हो जायगा, तभी यह बहुत्वभ्रान्ति चली जायगी, तभी यह प्रकृति, यह माया अभी के भयानक अवसादकारक स्वप्न न होकर अति सुन्दर रूप मे दीखेगी, और यह जगत् जो इस समय कारागार के समान प्रतीत हो रहा है वह ऐसा न होकर क्रीड़ाक्षेत्र के रूप मे दीख पड़ेगा, तब सब विपत्तियाँ, विशृंखलाये, और तो और, हम जो सब यन्त्रणाये भोग रहे है वे भी ब्रह्मभाव मे परिणत हो जायँगी—उस समय वे अपने प्रकृत स्वरूप मे दीख पड़ेगी—सभी वस्तुओ के पीछे, सभी का सारसत्ता स्वरूप वह मौजूद है ऐसा मालूम पडेगा और मालूम पड़ेगा कि वही हमारा वास्तविक अन्तरात्मा स्वरूप है।


७. ब्रह्म और जगत्

अद्वैत वेदान्त के इस विषय की धारणा करना अत्यन्त कठिन है कि जो ब्रह्म अनन्त है वह सान्त अथवा ससीम किस प्रकार हुआ। यह प्रश्न मनुष्य सर्वदा करता रहेगा किन्तु जीवन भर इस प्रश्न का विचार करते रहने पर भी उसके हृदय से यह प्रश्न कभी दूर नही होगा—जो असीम है वह सीमित कैसे हुआ ? मैं अब इसी प्रश्न को लेकर आलोचना करूँगा । इसको ठीक प्रकार से समझाने के लिये मैं नीचे दिये हुये चित्र की सहायता लूँगा ।

(क) ब्रह्म
(ग)<br>देश<br>काल<br>निमित्त
(ख) जगत्

इस चित्र मे (क) ब्रह्म है और (ख) है जगत् । ब्रह्म ही जगत् हो गया है। यहाँ पर जगत् शब्द से केवल जड जगत् ही नही किन्तु सूक्ष्म तथा आध्यात्मिक जगत् भी उसके साथ ग्रहण करना होगा—स्वर्ग, नरक—एक शब्द मे, जो कुछ भी है जगत् शब्द से यह समस्त ही लिया जायगा । मन एक प्रकार के परिणाम का नाम है, शरीर एक दूसरे प्रकार के परिणाम का—इत्यादि, इत्यादि । यही सब कुछ लेकर जगत् है। यही ब्रह्म (क) जगत् (ख) बन गया है—देश-काल-निमित्त (ग) मे से होकर आने से, यही अद्वैतवाद की मूल बात है। देश-काल-निमित्त रूपी काँच मे से हम ब्रह्म को देखते है, और इस प्रकार नीचे की ओर से देखने से ब्रह्म हमे जगत् के रूप मे दीखता है। इससे यह स्पष्ट है कि जहाँ ब्रह्म है वहाँ देश-काल-निमित्त नहीं है। काल वहाँ रह नहीं सकता, कारण