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ज्ञानयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)

Jnana Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)

स्वामी विवेकानन्द द्वारा

DevanagariHindipublished332 पृष्ठ

१६ ज्ञानयोग

१६ ज्ञानयोग

सौन्दर्य का लक्ष्य है, ऐश्वर्य का लक्ष्य है, शक्ति का लक्ष्य है, और तो और, धर्म का भी लक्ष्य है। साधु और पापी दोनों मरते हैं, राजा और भिक्षुक दोनों मरते हैं, सभी मृत्यु को प्राप्त होते हैं। तब भी जीवन के प्रति यह विषम ममता विद्यमान है। हम क्यो इस जीवन की ममता करते हैं ? क्यो हम इसका परित्याग नहीं कर पाते ? यह हम नहीं जानते। यही माया है।

माता बड़े यत्न से सन्तान का लालन पालन करती है। उसका समस्त मन, समस्त जीवन मानो इसी सन्तान के लिये है। बालक बड़ा हुआ, युवावस्था को प्राप्त हुआ और शायद दुश्चरित्र एवं पशु होकर प्रतिदिन अपनी माता को मारने पीटने लगा, किन्तु माता फिर भी पुत्र पर मुग्ध है। जब उसकी विचारशक्ति जागृत होती है तब वह उसे अपने स्नेह के आवरण मे ढक कर रखती है। किन्तु वह नहीं जानती कि यह स्नेह नहीं है; एक अपरिज्ञेय शक्ति ने उसके स्नायु-मण्डल पर अधिकार कर लिया है। वह इसे दूर नहीं कर सकती। वह कितनी ही चेष्टा क्यों न करे, इस बन्धन को तोड़ नहीं सकती। यही माया है।

हम सभी कल्पित सुवर्ण लोमों* की खोज मे दौड़ते फिरते हैं। सभी के मन मे होता है कि यह हमारा ही प्राप्तव्य है; किन्तु


* सुवर्ण लोम (Golden Fleece):—ग्रीक पौराणिक साहित्य की कथा है कि ग्रीस के अन्तर्गत थेसाली देश मे राजवंशी आथामास की पत्नी नेफ़ेल के गर्भ से फ्रिक्सस नामक पुत्र और हेल नाम की कन्या ने जन्म लिया। कुछ दिन के बाद नेफ़ेल की मृत्यु होने पर आथामास ने कैडमस की कन्या ईनो के साथ विवाह किया। ईनो ने सपत्नी की सन्तान के प्रति विद्वेष होने के कारण नाना

माया १७

उनमे से कितने मनुष्य इस संसार मे जीवित है ? सभी ज्ञानी लोग समझते हैं कि इस सुवर्ण लोम को प्राप्त करने की उनकी दो करोड़ मे एक से अधिक सम्भावना नही है ; तथापि प्रत्येक मनुष्य उसके लिये कठोर प्रयत्न करता है; किन्तु अधिकांश किसी को कुछ प्राप्त नहीं होता; यही माया है।

इस संसार मे मृत्यु रात दिन गर्व से मस्तक ऊँचा किये घूम रही है; हम सोचते है कि हम सदा जीवित रहेगे। किसी समय राजा युधिष्ठिर से यह प्रश्न पूछा गया कि "इस पृथ्वी पर अत्यन्त आश्चर्य की बात क्या है ?" राजा ने उत्तर दिया था, "नित्य ही लोग चारों ओर मर रहे हैं किन्तु जो जीवित है वे समझते है कि वे कभी मरेगे ही नही।" यही माया है।


प्रकार से अपने पति को फ्रिक्सस की देवताओ को बलि चढ़ा देने से सहमत किया। किन्तु बलिदान के पूर्व ही फ्रिक्सस की स्वर्गीया माता की आत्मा उनके सम्मुख आविर्भूत हुई और एक सुवर्ण लोम युक्त मेढे को उनके निकट लाकर उनको उस पर चढ़ कर समुद्र पार भाग जाने का आदेश देने लगी। मार्ग मे उसकी बहिन हेल गिर कर डूब गई—फ्रिक्सस ने कृष्ण सागर की पूर्व दिशा मे कलचिस नामक स्थान में उतर कर वहाँ के जिउस देवता को उसी मेंढे की बलि चढ़ा कर उसकी खाल को मार्स ( मंगल ) देवता के कुञ्ज मे टाँग दिया। एक दैत्य उसकी रखवाली के लिये नियुक्त हुआ। कुछ दिन बाद इस सुवर्ण लोम की खाल को लाने के लिये आथामास का भतीजा जैसन उसके प्रतिद्वन्द्वी पेलियस द्वारा नियुक्त किया गया और वह आर्गो नामक एक बड़े जहाज मे अनेक प्रसिद्ध वीर पुरुषों सहित बैठ कर नाना प्रकार के बाधा-विघ्नो को पार करता हुआ उक्त सुवर्ण लोम के लाने में सफल हुआ। ग्रीक पुराणों में यह कथा Argonautic Expedition नाम से विख्यात है।

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