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ज्ञानयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)

Jnana Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)

स्वामी विवेकानन्द द्वारा

DevanagariHindipublished332 पृष्ठ

२८० ज्ञानयोग

२८० ज्ञानयोग

की व्यर्थ वासना और फिर इसके आगे स्वर्ग जाकर उसी तरह रहने की वासना—अर्थात् सर्वदा इन्द्रिय और इन्द्रियसुख में लिप्त रहने की वासना ही मृत्यु को लाती है।

यदि हम पशुओं की उन्नत अवस्था मात्र है, तो जिस विचार से यह सिद्धान्त लब्ध हुआ उसी विचार से यह सिद्धान्त भी हो सकता है कि पशुगण मनुष्य की अवनत अवस्था मात्र है। तुमने यह कैसे समझा कि वैसा नहीं है? तुम जानते हो—क्रमविकासवाद का प्रमाण केवल यही है कि निम्नतम प्राणी से लेकर उच्चतम प्राणी तक सभी शरीर परस्पर-सदृश हैं, किन्तु उससे तुमने किस प्रकार यह सिद्धान्त निकाला कि निम्नतम प्राणी से क्रमशः उच्चतम प्राणी जन्मा है, न कि यह कि उच्चतम से क्रमशः निम्नतम प्राणी उत्पन्न हुआ है? दोनों ही ओर समान युक्ति है—और यदि इस मतवाद मे वास्तविक कुछ सत्य है, तो हमारा यह विश्वास है कि एकबार नीचे से ऊपर, फिर ऊपर से नीचे गति होती है—अर्थात् लगातार इस देहश्रेणी का आवर्तन हो रहा है। क्रमसंकोचवाद स्वीकार न करने पर क्रमविकासवाद किस तरह सत्य हो सकता है? जो कुछ भी हो, मै जो कह रहा था कि मनुष्य की लगातार अनन्त उन्नति नही हो सकती यह इससे अच्छी तरह स्पष्ट होजाता है।

'अनन्त' जगत् मे अवश्य अभिव्यक्त हो सकता है, इसे यदि मुझे कोई समझा सके तो मै उसे समझने को प्रस्तुत हूँ, किन्तु हम लगातार सरल रेखा मे उन्नति करते जा रहे है, इस बात पर मेरा बिलकुल विश्वास नहीं है। यह तो एक असंबद्ध प्रलाप मात्र है। सरल रेखा मे किसी प्रकार की गति हो ही नहीं सकती। यदि तुम अपने सामने ही

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सामने एक पत्थर फेको, तो अनन्त काल के बाद एक समय ऐसा आयेगा, जब वह घूमकर गोलाकार मे तुम्हारे निकट फिर आजायेगा। तुमलोगो ने क्या गणित के इस स्वत.सिद्ध सिद्धान्त को नही पढ़ा है कि सरल रेखा अनन्त रूप मे बढ़ाने पर वर्तुलाकार धारण करती है ? अवश्य ही यह ऐसा ही होगा, परन्तु संभव है, मार्ग पर अग्रसर होते होते कुछ इधर उधर होजाय । इसी कारण मै सर्वदा ही प्राचीन धर्मों का मत लेता हूँ — क्या ईसा, क्या बुद्ध, क्या वेदान्त, क्या बाइबिल, सभी कहते है — इस अपूर्ण जगत् को छोड़कर ही समय पर हम पूर्णता प्राप्त करेगे । यह जगत् कुछ भी नही है — अधिक से अधिक उस सत्य की एक भयानक विसदृश अनुकृति अर्थात् छाया मात्र है । सभी अज्ञानी मनुष्य इन इन्द्रियसुखो का उपभोग करने के लिये दौड़ते है ।

इन्द्रियो मे आसक्त होना अत्यन्त सहज है । और भी सहज यह है कि हम अपने प्राचीन अभ्यास के वशीभूत होकर केवल आहार-पान मे मत्त रहे । किन्तु हमारे आधुनिक दार्शनिक इन सभी सुखकर भावो को लेकर उनके ऊपर धर्म का छाप देने की चेष्टा करते है । किन्तु यह मत सत्य नही है । इन्द्रियो की मृत्यु अटल है । हमे मृत्यु से अतीत होना होगा । मृत्यु कभी भी सत्य नही है । त्याग ही हमे सत्य मे पहुँचायेगा । नीति का अर्थ ही त्याग है । हमारे प्रकृत जीवन का प्रत्येक अंग ही त्याग है । हम जीवन के उन्ही क्षणो मे वास्तविक साधुता से युक्त होते है और प्रकृत जीवन का संभोग करते है, जब हम 'मै' की चिन्ता से विरत होते है । 'मै' का जब नाश होता है — हमारे अन्दर के 'प्राचीन मनुष्य' ( 'Old man' ) की मृत्यु होती है, उसी समय हम सत्य मे पहुँचते है । और वेदान्त कहता है — वह

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सत्य ही ईश्वर है, वही हमारा प्रकृत स्वरूप है—वह सर्वदा ही तुम्हारे साथ रहता है और केवल यही नहीं, तुममें ही रहता है। उसी में सर्वदा वास करो। यद्यपि यह बहुत कठिन प्रतीत होता है, तथापि क्रमशः यह सहज हो जायगा। तब तुम देखोगे, उसमें रहना ही एकमात्र आनन्दपूर्ण अवस्था है, अन्य सभी अवस्थाये मृत्यु है। आत्म-भाव मे पूर्ण होना ही जीवन है, और सभी भाव मृत्यु है। हमारे वर्तमान समस्त जीवन को ही केवल शिक्षा के लिये विश्वविद्यालय कहा जा सकता है। प्रकृत जीवन लाभ करने के लिए हमे इसके बाहर जाना होगा।


१३. आत्मा का मुक्त स्वभाव

हम पहले जिस कठोपनिषद् की आलोचना करते थे, वह छान्दोग्योपनिषद् के, जिसकी हम आलोचना करेगे, बहुत समय बाद रचा गया था। कठोपनिषद् की भाषा अपेक्षाकृत आधुनिक है, उसकी चिन्तनशैली भी सबसे अधिक प्रणालीवद्ध है। प्राचीनतर उपनिषदो की भाषा कुछ अन्य प्रकार की थी। वह अति प्राचीन एवं बहुत कुछ वेद के संहिता-भाग की तरह थी। फिर उनमे अनेक बार अनेक अनावश्यक विषयो में से घूम फिर कर तब कही उनका सार मत प्राप्त होता है। इस प्राचीन उपनिषद् में कर्मकाण्डात्मक वेदांश का काफी प्रभाव है। इसीलिए इसका आधे से अधिक भाग अब भी कर्मकाण्डात्मक है। किन्तु अति प्राचीन उपनिषदो के अध्ययन से एक महान लाभ होता है। वह लाभ यह है कि उनके अध्ययन से आध्यात्मिक भावो का ऐतिहासिक विकास जाना जा सकता है। अपेक्षाकृत आधुनिक उपनिषदो मे ये आध्यात्मिक तत्व सब एकत्र संग्रहीत एवं सज्जित पाये जाते हैं। उदाहरण रूप भगवद्गीता को ही ले लीजिये। श्रीमद्भगवद्गीता को अन्तिम उपनिषद कहा जासकता है, क्योकि उसमे कर्मकाण्ड का लेशमात्र भी नहीं है। गीता का प्रत्येक श्लोक किसी न किसी उपनिषद से संग्रहीत है, मानो अनेक पुष्पो के संचयन से एक सुन्दर गुच्छ निर्मित हुआ हो, किन्तु उनमे इन सब तत्वो का क्रम-विकास देखने में नहीं आता। अनेक लोगो के मतानुसार इन आध्यात्मिक तत्वो के क्रम-विकास को जानने की सुविधा ही वेद के अध्य-