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ज्ञानयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)

Jnana Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)

स्वामी विवेकानन्द द्वारा

DevanagariHindipublished332 पृष्ठ

२७६ ज्ञानयोग

२७६ ज्ञानयोग

उत्तर देगा। और वास्तविक बात भी ऐसी ही है। जिसने निम्नतर भोगवासनाओं का अन्त कर लिया है, वही धर्माचरण कर सकता है। हम लोगो को भोग भोगकर आघातो द्वारा सीखना होगा, जहाँ तक हमारी दौड है, वहाँ तक दौड लेना होगा। जब इस संसार मे हमारी दौड निवृत्त होती है, तभी हम लोगों की दृष्टि के समक्ष परलोक प्रतिभात होता है।

इस विषय मे और एक विशेष समस्या हमारे मन मे उत्पन्न हुई। सुनने मे बात तो बडी कर्कश है, परन्तु है वह वास्तविक सत्य कथा। यह विषय-भोगवासना किसी किसी समय और एक रूप धारण करके उदित होती है—उसमे बडी विपदाशंका है, फिर भी वह आपाततः रमणीय है। यह बात तुम सर्वदा सुनते हो। अत्यन्त प्राचीन काल मे भी यह धारणा थी—वह प्रत्येक धर्म-विश्वास के अन्तर्गत है और वह यह है कि एक ऐसा समय आयेगा जब संसार का समस्त दुःख समाप्त हो जायगा, केवल सुखांश ही अवशिष्ट रह जायगा और पृथ्वी स्वर्गराज्य मे परिणत हो जायगी। पर मेरा इस बात पर विश्वास नहीं है। हमारी पृथ्वी जैसी है, वैसी ही रहेगी। अवश्य ही यह बात कहना बहुत भयानक है, किंतु यह न कहकर और कोई मार्ग देखता ही नहीं हूँ। यह बात रोग के समान है। मस्तक से उतारो तो पैर मे जायगा। एक स्थान से हटा देने से दूसरे स्थान मे चला जायगा। कुछ भी क्यों न करो, वह किसी भी तरह पूर्णरूपेण दूर नहीं हो सकता। दुःख भी इसी तरह है। अति प्राचीन काल मे लोग जगल मे रहा करते थे और एक दूसरे को मारकर खा लेते थे। वर्तमान काल मे मनुष्य एक दूसरे मनुष्य का मांस नहीं

अपरोक्षानुभूति २७७

खाता, परन्तु एक दूसरे को ठगा खूब करता है। मनुष्य प्रतारणा करके नगर का नगर, देश का देश ध्वस कर डालता है। निश्चय ही यह किसी बहुत बड़ी उन्नति का परिचायक नहीं है। और तुम लोग जिसे उन्नति कहते हो, उसे भी मैं बडा नहीं समझता—वह तो 'वासना की लगातार वृद्धि मात्र है। यदि मुझे कोई विषय अति स्पष्ट रूप से ज्ञात होता है, तो वह यही है कि वासना से केवल दुःख का ही आगमन होता है—वह तो याचक की अवस्था मात्र है। सर्वदा ही कुछ न कुछ के लिये याचना करना—किसी दूकान आदि मे जाकर किसी न किसी वस्तु के पाने की इच्छा रहती ही है। बस चाहना, चाहना, चाहना! सारा जीवन ही केवल तृष्णाग्रस्त याचक की अवस्था है—वासना की दुर्निवार तृष्णा है। यदि वासना पूर्ण करने की शक्ति समयुक्तान्तर श्रेणी (Arithmetical progression) के नियमानुसार बढे, तो वासना की शक्ति समगुणितान्तर श्रेणी (Geometrical progression) के नियमानुसार बढ़ती है। अनन्त जगत् के समस्त सुखदुःख की समष्टि सर्वदा ही समाने है। समुद्र मे यदि एक तरंग कहीं से उठती है, तो निश्चय कहीं पर एक गर्त उत्पन्न होगी। यदि किसी मनुष्य को सुख प्राप्त हुआ है, तो निश्चय ही किसी दूसरे मनुष्य या पशु को दुःख हुआ है। मनुष्य की सख्या वढ रही है, पशु की संख्या घट रही है। हम उनका विनाश करके उनकी भूमि छीन रहे है, हम उनका समस्त खाद्यद्रव्य छीन रहे है। तब हम किस तरह कह कि सुख लगातार बढ़ रहा है? प्रबल जाति दुर्बल जाति का ग्रास कर रही है, किन्तु तुम लोग क्या समझते हो कि प्रबल जाति कुछ सुखी होगी? नहीं, वे एक दूसरे का सहार ही करेगी, मेरी समझ में नहीं आता कि सुख का युग किस तरह आयेगा। यह तो