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ज्ञानयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)

Jnana Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)

स्वामी विवेकानन्द द्वारा

DevanagariHindipublished332 पृष्ठ

१०६ ज्ञानयोग

१०६ ज्ञानयोग

सीधे ढंग से कहे तो जिस प्रकार हमारी उन्नति होती है, जिस प्रकार हमारा स्वरूप प्रकाशित होता है उसी प्रकार देवता भी अपना स्वरूप प्रकाशित करते रहते हैं।

अब हम मायावाद को समझ सकेगे। संसार के सभी धर्मों ने इस प्रश्न को उठाया है—संसार मे इतना असामञ्जस्य क्यों है ? संसार मे इतना अशुभ क्यों है ? किन्तु हम धर्मभाव के प्रथम आविर्भाव के समय इस प्रश्न को उठते नही देखते; इसका कारण यह है कि शायद आदि मनुष्य को जगत् का असामञ्जस्य दिखाई नहीं पड़ता था, उसके चारों ओर कोई असामञ्जस्य नही था, किसी प्रकार का मतविरोध नही था, भले बुरे की कोई प्रतिद्वन्द्विता नहीं थी। केवल उसके हृदय में दो वस्तुओ का संग्राम हो रहा था। एक कहती थी—यह करो, और दूसरी उसी को करने का निषेध करती थी। प्राथमिक मनुष्य भावनाओं के दास थे। उनके मन मे जो आता था वे वही करते थे। वे इन भावनाओं के सम्बन्ध मे विचार करने तथा उनका संयम करने की चेष्टा बिलकुल ही नहीं करते थे। इन सब देवताओं के सम्बन्ध मे भी यही बात है; ये लोग भी उपस्थित प्रवृत्तियों के आधीन थे। इन्द्र आये और उन्होंने दैत्यबल को छिन्न भिन्न कर दिया। जिहोवा किसी के प्रति सन्तुष्ट थे तो किसी से रुष्ट थे, क्यो, यह कोई भी नहीं जानता था, जानना भी नही चाहता था। इसका कारण, उस समय अनुसन्धान की प्रवृत्ति ही लोगो मे नहीं जागी थी, इसलिये वे जो कुछ भी करते थे वही ठीक था। उस समय भले बुरे की कोई धारणा ही नहीं थी। हम जिन्हे बुरा कहते हैं ऐसे बहुत से कार्य देवता लोग करते थे; हम वेदो मे

माया और ईश्वरधारणा का क्रमविकास १०७

देखते है, इन्द्र तथा अन्य देवता अनेक बुरे कार्य करते थे, किन्तु इन्द्र के उपासकों की दृष्टि मे पाप या बुरा काम कुछ भी नहीं था, इसलिये वे इस सम्बन्ध में कोई प्रश्न नहीं करते थे।

नैतिक भाव की उन्नति के साथ साथ मनुष्य के मन में एक युद्ध प्रारम्भ हुआ; मनुष्य के अन्दर मानों एक नई इन्द्रिय का आविर्भाव हुआ। भिन्न भिन्न भाषाओं और भिन्न भिन्न जातियो ने इसको भिन्न भिन्न नाम दिये; कोई कहते है यह ईश्वरी वाणी है, कोई कहते हैं वह पहले की शिक्षा का फल है। जो भी हो, उसने प्रवृत्तियो को दमन करने वाली शक्ति के रूप में काम किया। हमारे मन की एक प्रवृत्ति कहती है, यह काम करो, दूसरी कहती है, मत करो। हमारे भीतर कितनी ही प्रवृत्तियाँ है जो इन्द्रियों के द्वारा बाहर जाने की चेष्टा करती रहती है। और उनके पीछे चाहे कितना ही क्षीण क्यो न हो, और एक स्वर कहता है—बाहर मत जाना। इन दो बातो के संस्कृत नाम है प्रवृत्ति और निवृत्ति। प्रवृत्ति ही हमारे सभी कर्मों का मूल है। निवृत्ति से धर्म की उत्पत्ति है। धर्म आरम्भ होता है–इस “ मत करना ” से; आध्यात्मिकता भी इस “ मत करना ” से ही आरम्भ होती है। जहाँ यह “ मत करना ” नहीं है वहाँ धर्म का आरम्भ ही नहीं हुआ ऐसा समझो। यह जो “ मत करना ” है, यहीं निवृत्ति का भाव आगया। और निरन्तर युद्ध मे रत पाशवीप्रकृति देवताओ के वावजूद भी मनुष्य की धारणा उन्नत होने लगी।

अब मनुष्य के हृदय मे प्रेम ने प्रवेश किया। अवश्य ही इसकी मात्रा बहुत थोड़ी थी और आज भी यह मात्रा