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ज्ञानयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)

Jnana Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)

स्वामी विवेकानन्द द्वारा

DevanagariHindipublished332 पृष्ठ

२१८ ज्ञानयोग

२१८ ज्ञानयोग

किस प्रकार हम इस तत्व को जान सकते है ? यह मन जो इतना भ्रान्त और दुर्बल है, जो इतने सहज मे विभिन्न दिशाओं मे दौड़ जाता है, इस मनको भी सबल किया जा सकता है—जिससे वह उस ज्ञान का—उसी एकत्व का आभास पा सके। उस समय वही ज्ञान पुनः पुनः मृत्यु के हाथो से हमारी रक्षा करता है।

“यथोदकं दुर्गे वृष्टं पर्वतेषु विधावति। एवं धर्मान् पृथक् पश्यंस्तानेवानुविधावति।” (कठ० अ० २, वल्ली १, श्लोक १४)

“जल उच्च दुर्गम भूमि में बरस कर जिस प्रकार पर्वतों में से होकर विकीर्ण हो दौड़ता है, उसी प्रकार जो व्यक्ति गुणों को पृथक् करके देखता है वह उन्हीं का अनुवर्तन करता है।” वास्तविक शक्ति एक है, केवल माया मे पड़ कर अनेक होगई है। अनेक के पीछे मत दौड़ो, बस उसी एक की ओर अग्रसर होओ।

“हंसः शुचिषद्वसुरन्तरिक्षसद्धोता वेदिषदतिथिर्दुरोणसत्। नृषद्वरसदृतसद्व्योमसदब्जा गोजा ऋतजा अद्रिजा ऋतं बृहत्।” (कठ० अ० २, वल्ली २, श्लोक २)

“वह (वही आत्मा) आकाशवासी सूर्य, अन्तरिक्षवासी वायु, वेदिवासी अग्नि और कलशवासी सोमरस है। वही मनुष्य, देवता, यज्ञ और आकाश मे है, वही जल मे, पृथिवी पर, यज्ञ मे और पर्वत पर उत्पन्न होता है; वह सत्य है, वह महान् है।”

“अग्निर्यथैको भुवनं प्रविष्टो रूपं रूपं प्रतिरूपो बभूव। एकस्तथा सर्वभूतान्तरात्मा रूपं रूपं प्रतिरूपो बहिश्च।”

“वायुर्यथैको भुवनं प्रविष्टो रूपं रूपं प्रतिरूपो बभूव। एकस्तथा सर्वभूतान्तरात्मा रूपं रूपं प्रतिरूपो बहिश्च।” (कठ० अ० २, वल्ली २, श्लोक ९-१०)

“जिस प्रकार एक ही अग्नि जगत् मे प्रविष्ट होकर दाह्य वस्तु के रूपभेद से भिन्न भिन्न रूप धारण करती है उसी प्रकार सब भूतों का एक अन्तरात्मा नाना वस्तुओं के भेद से उस उस वस्तु

बहुत्व में एकत्व २१९

का रूप धारण कर लेता है, और सब के बाहर भी रहता है। जिस प्रकार एक ही वायु जगत् मे प्रविष्ट होकर नाना वस्तुओ के भेद से तत्तद्रूप हो गयी है उसी प्रकार वही एक सब भूतो का अन्तरात्मा नाना वस्तुओं के भेद से उस उस रूप का हो गया है और उनके बाहर भी है।” जब तुम इस एकत्व की उपलब्धि करोगे तभी यह अवस्था होगी, उससे पूर्व नही। यही वास्तविक सुखवाद है—सभी जगह उसका दर्शन करना। अब प्रश्न यही है कि यदि यह सत्य है, यदि वह शुद्ध स्वरूप अनन्त आत्मा इन सब के भीतर प्रवेश करके रहता है तब यह क्यो सुख दुख भोग करता है? क्यों वह अपवित्र होकर दुःख भोग करता है। उपनिषद कहते हैं कि वह दुःखानुभव नही करता।

“सूर्यो यथा सर्वलोकस्य चक्षुर्न लिप्यते चाक्षुषैः वाह्यदोषै। एकस्तथा सर्वभूतान्तरात्मा न लिप्यते लोकदुःखेन बाह्यः।”
(कठ० अ० २, वल्ली २, श्लोक ११)

“सभी लोको का चक्षुरूप सूर्य जिस प्रकार चक्षुग्राह्य वाह्य अपवित्र वस्तु के साथ लिप्त नही होता उसी प्रकार एक मात्र सब प्राणियो का अन्तरात्मा जगत् सम्बन्धी दुःख के साथ लिप्त नहीं होता, कारण वह फिर भी जगत् के अतीत है।” हमे एक रोग ऐसा हो सकता है जिसके कारण हमे सभी कुछ पीले रंग का दिखाई दे, किन्तु इससे सूर्य पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता।

“एको वशी सर्वभूतान्तरात्मा एकं रूप बहुधा यः करोति। तमात्मस्थ येऽनुपश्यन्ति धीरास्तेषां सुखं शाश्वतं नेतरेषाम्।”
(कठ० अ० २, वल्ली २, श्लोक १२)

“जो एक है, सब का नियन्ता एवं सब प्राणियों का अन्तरात्मा, जो अपने एक रूप को अनेक प्रकार का कर लेता है, उसका दर्शन जो ज्ञानी पुरुष अपने मे करते है, वे ही नित्य सुखी है, अन्य नहीं।”

“नित्योऽनित्यानां चेतनश्चेतनानामेको