ज्ञानयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)
Jnana Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)
स्वामी विवेकानन्द द्वारा
१८० ज्ञानयोग
१८० ज्ञानयोग
गया तो अज्ञ लोग उन शब्दो का व्यवहार करने लगे। इसका परिणाम यह हुआ कि शब्दों का महत्व घटने लगा। युगो से ईश्वर शब्द प्रयुक्त होता आया है। सर्वव्यापी एक चैतन्य का भाव एव जो क्या कुछ महान तथा पवित्र है इसी शब्द मे निहित है। यदि कोई निर्बोध इस शब्द का व्यवहार करने के लिये राजी न हुआ तो हमे भी उसकी बात मान लेनी पड़ेगी ? दूसरा कोई आकर कहेगा, “मेरे द्वारा नियोजित यह शब्द अच्छा है इसे स्वीकार करो,” फिर तीसरा आयेगा, अपना एक शब्द लेकर। यदि यही क्रम चलता रहा तो ऐसे बेकार शब्दो का कोई अन्त न होगा। इसीलिए मै कह रहा हूँ कि उस पुराने शब्द का ही व्यवहार करो, लेकिन मन से कुसंस्कारों को दूर कर इस प्राचीन महान शब्द के अर्थ को ठीक तरह से समझ कर उसका और भी उत्तम रूप से व्यवहार करो। यदि तुम लोग भाव-साहचर्य-विधान (Law of Association of ideas) का तात्पर्य समझ जाओ तो तुम्हे पता चलेगा कि इस शब्द से कितने ही महान एव ओजस्वी भावो का संयोग है, लाखो मनुष्यो ने इस शब्द का व्यवहार किया है, करोडो आदमियों ने इस शब्द की पूजा की है और जो कुछ सर्वोच्च व सुन्दरतम है, जो कुछ युक्तियुक्त, प्रेमास्पद या मानवी भावो मे महान और सुन्दर है, वही इस शब्द से सम्बन्धित हैं। अतएव यह सब भावनाओ का उद्दीपक है, इसलिए उसका त्याग करना नितान्त असभव है। जो भी हो, यदि मै आप लोगों को केवल यह कहकर समझाने की चेष्टा करता कि ईश्वर ने जगत की सृष्टि की हैं तो आप लोगो को उसका कोई अर्थ नही सूझता। फिर भी इन सब विचारो के बाद हम उसी प्राचीन पुरुष के पास ही पहुँचे।
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तो हमने अब क्या देखा? हमे यह अनुभव हुआ कि जड, शक्ति, मन, चैतन्य या दूसरे नामो से परिचित विभिन्न जागतिक शक्तियाँ उसी विश्वव्यापी चैतन्य के ही प्रकाश है। जो कुछ तुम देखते हो, सुनते हो या अनुभव करते हो सब उन्हीं की रचनाये हैं, उन्हीं के परिणाम है। इस कथन से और भी ठीक होगा यदि हम कहे, ये सब प्रभु स्वय ही है। सूर्य और ताराओ के रूप मे वे ही उज्ज्वल भाव से विराजते है, वे ही जननी है, धरणी है और समुद्र भी है। वे ही बादलो के रूप मे बरसते है, वे ही फिर वह पवन है जिससे हम साँस ले सकते है, वे ही शक्ति बनकर हमारे शरीर मे कार्य कर रहे है। वे ही भाषण है, भाषणदाता है, फिर सुनने वाले भी है। वे ही यह मच है जिस पर मै खड़ा हूँ, फिर वे ही वह आलोक है जिससे मै तुम्हे देख पाता हूँ; ये सब वे ही है। वे जगत के उपादान व निमित्त कारण हैं, क्रम-सकुचित होकर वे ही अणु का रूप लेते हैं, फिर वे ही क्रमविकसित होकर ईश्वर बन जाते है। वे ही धीरे धीरे अवनत होते है और परमाणु का आकार प्राप्त करते है, फिर समय होते ही अपने रूप मे अपने को प्रकाशित करते है और यही जगत का रहस्य है। "तुम्हीं पुरुष हो, तुम्हीं स्त्री हो, यौवन की चपलता से भरे हुए भ्रमणशील नवयुवक भी भी तुम हो, फिर तुम बुढ़ापे मे लाठी के सहारे कदम बढ़ाते हो, तुम ही सब वस्तुओ मे हो, हे प्रभु तुम ही सब हो।" जगत-प्रपच की केवल इसी व्याख्या से मानवयुक्ति, मानवबुद्धि परितृप्त होती है। साराश यह कि हम उनसे जन्म लेते है, उन्हीं मे जीवित रहने है और उन्हीं मे लौट जाते है।
९. जगत्
( अन्तर्जगत् )
स्वभावतः ही मनुष्य का मन बाहर जाना चाहता है, मानो वह इन्द्रिय-प्रणालियो के द्वारा जैसे शरीर के बाहर झांकना चाहता हो । आँखे जरूर देखेगी, कान जरूर सुनेगे, इन्द्रियाँ जरूर बाहरी जगत को देखती रहेगी । इसीलिये स्वभावतः प्रकृति का सौन्दर्य तथा महिमा मनुष्य की दृष्टि को प्रथम ही आकृष्ट कर लेते है । प्रथमतः बहिर्जगत के वारे मे मनुष्य ने प्रश्न उठाया था; आकाश, नक्षत्रपुञ्ज, नभोमंडल के अन्यान्य पदार्थसमूह, पृथ्वी, नदी, पर्वत, समुद्र आदि वस्तुओं के विषय मे प्रश्न किये गये थे, एवं प्रत्येक प्राचीन धर्म मे हमे इसका कुछ न कुछ परिचय मिलता ही है। पहले पहल मानव का मन अंधकार मे टटोलता हुआ बाहर मे जो कुछ देख पाता था उसे ही पकड़ने की चेष्टा करता था। इसी तरह उसने नदी का एक देवता, आकाश का और कोई देव, मेघ तथा वर्षा का दूसरा अधिष्ठाता देवता मान लिया जिनको हम प्रकृति की शक्ति के नाम से जानते है उन्हे ही सचेतन पदार्थ कहना शुरू हुआ। किन्तु इस प्रश्न की जितनी अधिक खोज होने लगी उतनी ही इन बाह्य देवताओं से मानव के मन को कम तृप्ति मिलने लगी। तब मानव की सारी शक्ति उसके अपने
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ओर ही मुड़कर प्रवाहित होने लगी। अपनी आत्मा के सम्बन्ध मे प्रश्न होने लगा। बहिर्जगत से यह प्रश्न अन्तर्जगत मे आ पहुँचा। बहिर्जगत का विश्लेषण हो जाने पर मनुष्य ने अन्तर्जगत का विश्लेषण करना शुरू किया। किन्तु यह भीतरी मनुष्य के सम्बन्ध मे प्रश्न कब उठ खड़ा होता है जानते हो ?—या तो उच्चतर सभ्यता से इसकी उत्पत्ति होती है, या प्रकृति के विषय मे गंभीरतम अन्तर्दृष्टि से या उन्नति के उच्चतम सोपान पर आरूढ़ होने से।
यह अन्तर्मानव ही आज हमारी आलोचना का विषय है। अन्तर्मानव सम्बन्धी यह प्रश्न मनुष्यो के लिये जितना प्रिय है तथा उसके हृदय को जितना द्रवीभूत कर देता है उतना और कुछ नहीं। कितने वार कितने देशो मे यह प्रश्न पूछा गया है। चाहे वह अरण्यवासी सन्यासी हो, चाहे राजा, प्रजा, अमीर, गरीब, साधु या पापी सभी नर-नारियो के मन मे यह प्रश्न एक बार ज़रूर उठ खड़ा हुआ है कि इस क्षणस्थायी मानव जीवन मे क्या शाश्वत नाम का कुछ भी नहीं है ? इस शरीर का अन्त होने पर भी क्या ऐसा कुछ नहीं है जो कभी नहीं मरता है ? जब यह देह धूल मे मिल जाती है तब क्या ऐसा कुछ नहीं रहता जो जीवित रहता हो ? अग्नि से शरीर भस्मसात होने पर क्या कुछ भी शेष नहीं रहता ? अगर रहता है तो उसका परिणाम क्या है ? वह जाता कहाँ है ? कहाँ से वह आया था ? ये प्रश्न वार वार पूछे गये हैं और जब तक यह सृष्टि रहेगी, जब तक मानव-मस्तिष्क की चिन्तनक्रिया बन्द नहीं होगी तब तक यह प्रश्न पूछा ही जायगा। इससे आप लोग यह न समझे कि इसका उत्तर कभी भी नहीं मिला है—ज्योंही यह
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प्रश्न पूछा गया है त्योंही उत्तर भी मिला है, एवं जितना ही समय बीतता जायगा वह उतना ही महत्वपूर्ण बनता जायगा। वास्तव मे हजारों वर्ष पहले ही उस प्रश्न का निश्चित उत्तर दिया गया था और परवर्ती काल मे वही उत्तर फिर से दुहराया गया व हमारी बुद्धि मे उसका पूर्ण विकास होता गया। अतएव हमे केवल उस उत्तर को फिर से एक बार दुहरा देना है। इन समस्याओं को हम एक नये रूप से जांच करने की कोशिश नहीं करेगे; हम चाहते है कि वर्तमान युग की भाषा मे हम उस सनातन महान सत्य को प्रकाशित करे, प्राचीन की चिन्ता हम नवीनों की भाषा मे व्यक्त करे। दार्शनिकों की चिन्ता हम लौकिक भाषा मे कहेगे—देवताओं की चिन्ता को हम मनुष्यो की भाषा मे प्रकट करेगे, ईश्वर संबंधी चिन्ताएँ मानव की दुर्बल भाषा मे कहते जायेगे ताकि सब उसे समझ सके। क्योकि हम बाद मे देखेगे कि जिस ईश्वरीय सत्ता से ये सब भाव प्रसूत हुए है वह मानवों मे भी वर्तमान है — जिस सत्ता ने इन चिन्ताओं की सृष्टि की है, मानव मे स्वय वह प्रकट होकर स्वय ही इन्हे समझ सकेगी।
मैं तुम लोगों को देख पा रहा हूँ। इस दर्शनक्रिया के लिये कितनी चीजो की ज़रूरत होती है ? पहले तो आँखों की आवश्यकता हम अनुभव करते है—आँखे अवश्य ही रहनी चाहिये। मेरी अन्यान्य इन्द्रियाँ स्वस्थ होते हुए भी यदि मेरी आँखे न हों तो मै तुम लोगो को नहीं देख सकूँगा। अतएव पहले आँखे अवश्य ही रहनी चाहिये। दूसरी बात यह है, आँखों के पीछे और कुछ रहने की आवश्यकता होती है जिसे हम प्रकृत रूप से दर्शनेन्द्रिय कह सकते है। यदि हममें यह न हो तो दर्शनक्रिया असम्भव है। वस्तुतः आँखे कोई
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इन्द्रिय नहीं है, वे दर्शन करने के यंत्र मात्र ही है। यथार्थ इंद्रिय जो चक्षु के पीछे है, मस्तिष्क के स्नायुकेन्द्र में अवस्थित है। यदि वह केन्द्र किसी प्रकार नष्ट हो जाय तो स्वच्छ चक्षुद्वय रहते हुए भी मनुष्य कुछ नहीं देख सकेगा। अतएव दर्शनक्रिया के लिये उस प्रकृत इन्द्रिय का अस्तित्व नितान्त आवश्यक है। हमारी अन्यान्य इन्द्रियों के वारे मे यही एक बात कही जा सकती है। वाहर के कान केवल आवाज को भीतर लेजाने के यत्र है। वह आवाज़ मस्तिष्क मे अवस्थित केन्द्र मे जा पहुँचती है, किन्तु इससे श्रवणक्रिया पूर्ण नही होती। कभी कभी ऐसा भी होता है कि पुस्तकालय में बैठकर तुम ध्यान से कोई पुस्तक पढ़ रहे हो, घड़ी मे बारह बजने की आवाज होती है, किन्तु तुम्हे कुछ सुनाई नही देता। क्यों तुम कुछ नहीं सुन पाए ? यहाँ किस चीज़ की कमी थी ? उस इन्द्रिय के साथ मन का कोई योग नहीं था। अतएव हम देख रहे हैं कि मन का रहना भी नितान्त आवश्यक है। प्रथमतः बहिर्यन्त्र, उसके बाद यह बहिर्यन्त्र मानो किसी विषय को वहन कर इन्द्रिय के निकट ले जाता है, फिर उस इन्द्रिय के साथ मन युक्त रहना चाहिये। जब मस्तिष्क मे अवस्थित उस इन्द्रिय का मन से कोई योग नहीं रहता है तब कर्ण-यन्त्र तथा मस्तिष्क के केन्द्र पर किसी भी विषय का प्रभाव पड़ सकता है किन्तु हमे कोई अनुभव नहीं होगा। मन भी केवल वाहक है, उसे इस विषय का प्रभाव और भी भीतर वहन कर बुद्धि को प्रदान करना पड़ता है। अब बुद्धि को उसका निश्चय करना पडता है, परन्तु इससे भी पर्याप्त फल नहीं होता। बुद्धि को उसे फिर और भी भीतर ले जाकर शरीर के राजा आत्मा के पास पहुँचाना पड़ता है। उनके पास पहुँचने पर वे आदेश देते हैं कि "हाँ यह