सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

ज्ञानयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)

Jnana Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)

स्वामी विवेकानन्द द्वारा

DevanagariHindipublished332 पृष्ठ

२१० ज्ञानयोग

२१० ज्ञानयोग

अतः अब यह स्पष्ट होगया कि यह द्वैतभाव वास्तव मे मिथ्या है। इससे क्या प्राप्त हुआ ? मै पहले व्याख्यान मे ही यह कह चुका हूँ कि जगत् मे ऐसी अवस्था कभी आ ही नही सकती जब सभी कुछ अच्छा हो जायगा और बुरा कुछ भी नहीं रहेगा। इससे अनेक व्यक्तियों की चिर घोषित आशा अवश्य चूर्ण हो जायगी, अनेक इससे भयभीत भी होंगे किन्तु इसे स्वीकार करने के अतिरिक्त मै अन्य उपाय नही देखता। यदि मुझे कोई समझा दे कि वह सत्य है तो मै समझने को तैयार हूँ, परन्तु जब तक मेरी समझ मे नही आता तब तक कैसे मान सकता हूँ ?

मेरे इस कथन के विरुद्ध कुछ युक्तियुक्त मालूम पड़ने वाला एक तर्क है कि क्रमविकास की गति के क्रम से समयानुसार जो कुछ अशुभ हम देखते है सभी चला जायगा—इसका फल यह होगा कि इसी प्रकार कम होते होते लाखों वर्ष के बाद एक ऐसा समय आयेगा जब सभी अशुभ नष्ट हो कर केवल शुभ ही शुभ शेष रह जायगा। ऊपर से देखने पर यह युक्ति एकदम अखण्डनीय मालूम पड़ सकती है। ईश्वरेच्छा से यदि यह सत्य होती तो बड़ा ही आनन्द होता, किन्तु इस युक्ति मे एक दोष है। वह यह कि यह शुभ और अशुभ दोनों को निर्दिष्ट परिमाण मे लेती है। यह स्वीकार करती है कि एक निर्दिष्ट परिमाण मे अशुभ है, मान लो कि वह १०० है, और इसी प्रकार निश्चित परिमाण मे शुभ भी है और यह अशुभ कम होता जा रहा है और केवल शुभ बचता जा रहा है। किन्तु क्या वास्तव मे ऐसा ही है ? जगत् का इतिहास साक्षी है कि शुभ के समान अशुभ भी क्रमशः बढ़ ही रहा है।

बहुत्व में एकत्व २१२

समाज के अत्यन्त निम्न स्तर के व्यक्ति को लीजिये। वह जंगल मे रहता है, उसके भोगसुखों की संख्या कम है, इसलिये उसके दुःख भी कम हैं। उसके दुःख केवल इन्द्रियविषयो तक ही सीमित हैं। यदि उसे पर्याप्त मात्रा मे भोजन न मिले तो वह दुःखी हो जाता है। उसे खूब भोजन दो, उसे स्वच्छन्द हो कर घूमने फिरने और शिकार करने दो, वह पूरी तरह सुखी हो जायगा। उसका सुख-दुःख सभी केवल इन्द्रियो मे ही आबद्ध है। मानलो कि उसका ज्ञान बढ़ने लगा। उसका सुख बढ़ रहा है, उसकी बुद्धि खुल रही है, वह जो सुख पहले इन्द्रियो मे पाता था अब वही सुख उसे बुद्धि की वृत्तियो को चलाने मे मिलता है। वह एक सुन्दर कविता पाठ करके अपूर्व सुख का स्वाद लेता है। गणित की किसी समस्या की मीमांसा करने मे ही उसका सम्पूर्ण जीवन कट जाय, इसी मे उसको परम सुख प्राप्त है। किन्तु इसके साथ साथ असभ्य अवस्था मे जिस तीव्र यंत्रणा का उसने अनुभव नहीं किया, अब उसके स्नायु उसी तीव्र यंत्रणा का अनुभव करने के भी क्रमशः अभ्यासी हो जाते हैं, अत. उसे तीव्र मानसिक कष्ट होता है। एक बहुत ही साधारण उदाहरण लीजिये।

तिब्बत देश मे विवाह नहीं होता, अतः वहाँ प्रेम की ईर्ष्या भी नहीं पाई जाती, फिर भी हम जानते ही है कि विवाह अपेक्षाकृत उन्नत समाज का परिचायक है। तिब्बती लोग निष्कलंक स्वामी और निष्कलंक स्त्री के विशुद्ध दाम्पत्य-प्रेम का सुख नहीं जानते। किन्तु साथ ही किसी पुरुष या स्त्री के पतन हो जाने से दूसरे के मन मे कितनी भयानक ईर्ष्या, कितना अन्तर्दाह उपस्थित हो जाता है ये यह भी नहीं जानते। एक ओर उच्च धारणा से सुख मे वृद्धि हुई अवश्य, किन्तु दूसरी ओर इससे दुःख की भी वृद्धि हुई।