ज्ञानयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)
Jnana Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)
स्वामी विवेकानन्द द्वारा
११६ ज्ञानयोग
११६ ज्ञानयोग
वेदान्त अन्य सभी धर्मों और सम्प्रदायों की अपेक्षा अधिक साहस के साथ सत्य का अन्वेषण करने मे अग्रसर हुआ है। वेदान्त ने बीच मे ही किसी जगह पहुँच कर अपने अनुसन्धान को स्थगित नहीं किया, और उसको अग्रसर होने मे एक सुविधा भी प्राप्त थी। वह यह कि वेदान्त धर्म के विकास के समय पुरोहित सम्प्रदाय ने सत्यान्वेषियो का मुख बन्द करने की चेष्टा नहीं की। धर्म मे पूर्ण स्वाधीनता थी। उन लोगों की संकीर्णता थी सामाजिक प्रणाली मे। यहाँ (इंग्लैण्ड मे) समाज खूब स्वाधीन है। भारतवर्ष मे सामाजिक स्वाधीनता नही थी किन्तु धार्मिक स्वाधीनता थी। इस देश मे कोई चाहे जैसी पोशाक पहने अथवा जो इच्छा हो करे, उससे कोई कुछ न कहेगा; किन्तु चर्च मे यदि कोई एक दिन भी न जाय तो तरह तरह की बाते उठ खड़ी होती है। सत्य की चिन्ता करते समय उसे हजार बार सोचना पड़ेगा कि समाज क्या कहता है। दूसरी ओर भारतवर्ष मे यदि कोई इतर जाति के हाथ का खाना खा लेता है तो तुरन्त ही समाज उसे जातिच्युत कर देता है। पूर्व पुरुष जैसी पोशाक पहनते थे उससे ज़रा भी पृथक पोशाक पहनते ही बस, उसका सर्वनाश हो जाता है। मैने यहाँ तक सुना है कि एक व्यक्ति प्रथम बार रेलगाड़ी देखने गया था, इसीलिये जातिच्युत कर दिया गया! मान लो कि यह घटना सत्य नही है, किन्तु यह सच है कि हमारे समाज की यही गति है। किन्तु धर्म के विषय मे देखता हूँ कि—नास्तिक, बौद्ध, जडवादी—सभी प्रकार के धर्म, सभी प्रकार के मतमतान्तर, अद्भुत अद्भुत और बड़े बड़े भयानक मतो का प्रचार हो रहा है, शिक्षा भी हो रही है; अधिक क्या, देवमन्दिरो के द्वार पर ही
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ब्राह्मण लोग जड़वादियों की देवनिन्दा को सुनते सहते हैं ! यह बात उनके धर्म की उदारता और महत्व की ही परिचायक है।
भगवान् बुद्ध ने वृद्धावस्था में शरीरत्याग किया था। मेरे एक अमेरिकन वैज्ञानिक मित्र बुद्धदेव का चरित्र पढ़कर बड़े प्रसन्न होते थे किन्तु बुद्धदेव की मृत्यु उन्हे अच्छी नहीं लगती थी, कारण, कि उन्हे क्रॉस पर नहीं लटकाया गया था। कितनी भ्रमात्मक धारणा है ! बड़ा आदमी होने से ही हत्या किया जाना आवश्यक माना जाता है। भारतवर्ष मे इस प्रकार की धारणा प्रचलित नहीं थी। बुद्धदेव ने भारतीय देवताओं तथा जगत् का शासन करने वाले ईश्वर तक को अस्वीकार करते हुये भारतवर्ष भर का भ्रमण किया किन्तु तथापि वे वृद्धावस्था तक जीवित रहे थे। वे पचासी वर्ष की अवस्था तक जीवित रहे और देश के आधे भाग मे उन्होने अपने धर्म का प्रचार कर लिया था।
चार्वाकों ने भी बड़े बड़े भयानक मतों का प्रचार किया था—उन्नीसवीं शताब्दी मे भी लोग इस प्रकार खुल्लमखुल्ला जड़वाद का प्रचार करने का साहस नहीं करते। ये चार्वाक लोग मन्दिरों और नगरो मे प्रचार करते फिरते थे कि धर्म मिथ्या है, वह केवल पुरोहितो की स्वार्थपूर्ति का एक उपाय मात्र है, वेद केवल धूर्त निशाचरों की रचना है—ईश्वर भी नहीं है, आत्मा भी नहीं है। यदि आत्मा है तो स्त्री-पुत्र आदि के प्रेम से आकृष्ट होकर लौट क्यों नही आता ? इन लोगों की यह धारणा थी कि यदि आत्मा होता तो मृत्यु के बाद भी प्रेम आदि भावना उसको रहती और वह खूब अच्छा खाना, अच्छा पहनना चाहता। ऐसा होने पर भी किसी ने चार्वाको के ऊपर अत्याचार नहीं किया।
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धर्म के विषय मे हमारे यहाँ स्वाधीनता थी, अतएव आज भी धर्म के विषय मे हमारे भीतर महाशक्ति विराजित है। आप लोगो ने सामाजिक स्वतन्त्रता ली थी, इसीलिये आपकी सामाजिक प्रणाली इतनी सुन्दर है। हमने सामाजिक बातो मे बिल्कुल स्वतन्त्रता नही दी, इसलिये हमारे समाज मे सङ्कीर्णता है। आपके देश मे धार्मिक स्वतन्त्रता नहीं दी गई; धर्म के विषय मे प्रचलित मत का उल्लंघन करते ही बन्दूके उठ जाती थीं! उसी का फल यह है कि योरप मे धार्मिक भाव इतना सङ्कीर्ण है। भारतवर्ष में सामाजिक श्रृंखला को खोलना होगा और योरप मे धार्मिक श्रृंखला को तोड़ना पड़ेगा। तभी उन्नति होगी। यदि हम लोग इस आध्यात्मिक, नैतिक या सामाजिक उन्नति के भीतर जो एकत्व है उसको समझ सके, यदि हम जानले कि वे सब एक ही पदार्थ के विभिन्न विकास मात्र है, तो धर्म हमारे समाज के भीतर प्रवेश करेगा, हमारे जीवन का प्रति मुहूर्त धर्म भाव से पूर्ण हो जायगा। धर्म हमारे जीवन के प्रत्येक कार्य मे प्रवेश करेगा, धर्म नाम से जो कुछ भी है वह सब हमारे जीवन मे अपने प्रभाव का विस्तार करेगा। वेदान्त के प्रकाश में आप समझेगे कि समस्त विज्ञान केवल धर्म का ही विभिन्न विकास मात्र है; जगत् की सभी वस्तुये इसी प्रकार हैं।
तो हमने देखा कि स्वाधीनता होने के कारण ही योरप में यह विज्ञान की उत्पत्ति और उन्नति हुई है; और हम देखते हैं कि कितने आश्चर्य की बात है कि सभी समाजों में दो विभिन्न दल देखे जाते हैं। एक संहार करने वाला, दूसरा संगठन करने
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वाला। मान लो कि समाज में दोष है और एक दल उठकर गाली गलौज करने लगा। बहुत दिन तक ये लोग केवल कट्टरपन्थी रहे। सभी देशों और समाजों मे ये लोग देखे जाते हैं; और स्त्रियाँ तो अधिकांश इस चीत्कार में योग दिया करती हैं, कारण वे स्वभाव से भावुक होती है। जो व्यक्ति खड़े होकर किसी विषय के विरुद्ध लेक्चरबाजी करेगा उसके दल की वृद्धि होगी ही। तोड़ना सहज होता है, पागल आदमी जो चाहे तोड फोड़ सकता है, किन्तु किसी वस्तु का बनाना उसके लिये कठिन है।
सभी देशो मे इस प्रकार के गन्दे विषयों के प्रतिवादी किसी न किसी रूप मे पाये जाते हैं, और वे समझते हैं कि केवल गाली-गलौज से और दोषो को प्रकाश मे लाकर ही वे लोगो का उपकार कर रहे हैं। उनको देखने से ऐसा लगता है कि वे कुछ उपकार कर रहे है, किन्तु वास्तव मे वे अनिष्ट ही अधिक करते हैं। एक दिन मे तो कोई काम नहीं होता। समाज एक ही दिन मे तो -बन नहीं गया, और परिवर्तन का अर्थ है, कारणो को दूर करना। मान लो कि बहुत से दोष है, किन्तु केवल गालीगलौज से तो कुछ होगा नही; हमें उनकी जड़ तक जाना पड़ेगा। पहले तो दोष का कारण क्या है यह जानना होगा, फिर उसे दूर करने से दोष स्वतः ही दूर हो जायगा। चिल्लाने से लाभ होने के स्थान पर हानि की ही अधिक सम्भावना है।
किन्तु पूर्ववर्णित दूसरे दल के हृदय में सहानुभूति थी। वे समझ गये थे कि दोषो को दूर करने के लिये उनके कारणों को देखना
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होगा। बडे बड़े साधु महात्माओं का ही यह दल था। एक बात आपको याद रखना चाहिये कि जगत् के सभी बड़े बड़े आचार्य लोग कह गये हैं कि हम नाश करने नहीं आये, किन्तु पहले से जो कुछ है उसे पूर्ण करने आये हैं। प्रायः लोग आचार्यगण का यह महान् उद्देश्य न समझ कर ऐसा कहते हैं कि उन्होने साधारण मनुष्यों की भाँति अनुपयुक्त कार्य किये। इस समय भी बहुधा लोग कहते हैं कि वे लोग (आचार्यगण) जिसको सत्य समझते थे उसे प्रकट रूप से कहने का साहस नही करते थे और वे कुछ अंश मे कायर थे। किन्तु यह बात नहीं है। ये सब एकदेशदर्शी लोग उन सब महापुरुषो के हृदय के अनन्त प्रेम की शक्ति को नहीं समझते हैं। वे तो संसार के समस्त नर-नारियों को अपनी सन्तान के समान देखते थे। वे ही यथार्थ मातापिता है, वे ही यथार्थ देवता हैं, उनके हृदय मे प्रत्येक के लिये अनन्त सहानुभूति और क्षमा थी—वे सदा ही सहने को और क्षमा करने को उद्यत रहते थे। वे जानते थे कि किस प्रकार मानव समाज संगठित हो सकता है; अतएव वे अत्यन्त धैर्य के साथ, अत्यन्त सहिष्णुता के साथ अपनी संजीवनी औषध का प्रयोग करने लगे। उन्होने किसी को गालियाँ नहीं दीं, न भय दिखलाया किन्तु बड़े धैर्य के साथ लोगों को एक एक कदम रख कर मार्ग दिखलाया है। ये उपनिषदो के रचयिता थे। वे अच्छी तरह जानते थे कि ईश्वर सम्बन्धी प्राचीन धारणा अन्य सभी उन्नत नीति-संगत धारणा के साथ मेल नहीं खाती। वे पूरी तरह से जानते थे कि इन सब खण्डन करने वालों के भीतर ही अधिक सत्य है; वे पूरी तरह से जानते थे कि बौद्ध और नास्तिक लोग जो कुछ प्रचार करते हैं उसमें अनेक महान् सत्य हैं; किन्तु
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वे यह भी जानते थे कि जो लोग पहले के मतों से कोई सम्बन्ध न रख कर एक नया मत स्थापित करना चाहते है, जो लोग जिस सूत्र मे माला गुँथी हुई है उसी को तोड़ना चाहते हैं, जो शून्य के ऊपर नूतन समाज का गठन करना चाहते है वे पूरी तरह से असफल होंगे।
हम कभी भी किसी नूतन वस्तु का निर्माण नहीं कर सकते, हम केवल पुरानी वस्तुओ का स्थान परिवर्तन कर सकते है। बीज ही वृक्ष के रूप में परिणत हो जाता है, अतः हमे धैर्य के साथ शान्तिपूर्वक लोगों की सत्य की खोज मे लगी हुई शक्ति को ठीक तरह से चलाना होगा, और जो सत्य पहले ही से ज्ञात है उसी को पूर्ण रूप से जानना होगा। अतएव प्राचीन काल की इस ईश्वर सम्बन्धी धारणा को वर्तमान काल के लिए एकदम अनुपयुक्त कह कर उड़ाये बिना ही उन लोगो ने उसमे जो कुछ सत्य है उसका अन्वेषण आरम्भ किया; उसी का फल वेदान्त-दर्शन है। वे प्राचीन सभी देवताओं तथा जगत् के शासनकर्ता एक ईश्वर के मात्र से भी उच्चतर भावों का आविष्कार करने लगे—इसी प्रकार उन्होने जो उच्चतम सत्य आविष्कृत किया उसी को निर्गुण पूर्णब्रह्म नाम से पुकारते हैं—इसी निर्गुण ब्रह्म की धारणा मे उन्होंने जगत् के बीच में एक अखण्ड सत्ता को देख पाया।
“जिन्होंने इस बहुत्वपूर्ण जगत् में उस एक अखण्ड स्वरूप को देख पाया है, जो इस मर्त्य जगत् मे उस एक अनन्त जीवन को देख पाते हैं, जो इस जड़ता तथा अज्ञान से पूर्ण जगत् मे उसी एक स्वरूप को देख लेते हैं उन्हीं को चिरशान्ति मिलती है और किसी को नहीं।”
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कवि कहते हैं कि “हम जिस समय जगत् में प्रवेश करते हैं उस समय अपने पीछे मानों एक हिरण्मय मेघजाल लेकर प्रवेश करते हैं।” किन्तु यदि सच पूछो तो हम मे से सभी इस प्रकार महिमामण्डित होकर संसार मे प्रवेश नहीं करते; हममें से बहुत से तो कुज्झटिका (कुहरे) की कालिमा अपने पीछे लेकर जगत् मे प्रवेश करते हैं, इसमें कोई सन्देह नहीं। हम लोग, हममें से सभी मानों युद्ध करने के लिये युद्धक्षेत्र मे प्रेरित कर दिये गये हैं। रोते रोते हमे इस जगत् मे प्रवेश करना होगा—यथासाध्य चेष्टा करके अपना मार्ग बनाना होगा—इस अनन्त जीवन-समुद्र में पीछे की ओर कोई चिन्ह तक न छोडकर मार्ग बनाना होगा—सम्मुख की ओर हम अग्रसर हो रहे है, पीछे अनन्त युग पड़े हैं, और सामने भी अनन्त युग पड़े हैं। इसी प्रकार हम चलते रहते है और अन्त मे मृत्यु आकर हमें इस क्षेत्र से अपसारित कर देती है—विजयी अथवा पराजित कुछ भी निश्चित नहीं है; यही माया है।
बालक के हृदय की आशा बलवती होती है। बालकों के विस्फारित नयनों के समक्ष समस्त जगत् मानों एक सुनहले चित्र के समान मालूम पडता है; वह समझता है कि मेरी जो इच्छा होगी वही होगा। किन्तु जैसे ही वह आगे बढ़ता है वैसे ही प्रत्येक पद पर प्रकृति वज्रदृढ प्राचीर के रूप मे उसका गतिरोध करके खड़ी हो
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जाती है। बारम्बार उस प्राचीर को भंग करने के उद्देश्य से वह वेग के साथ उसके ऊपर टक्कर मार सकता है। सारे जीवन भर जितना वह अग्रसर होता जाता है उतना ही उसका आदर्श उससे दूर होता चला जाता है—अन्त मे मृत्यु आ जाती है और सारा खेल समाप्त हो जाता है; यही माया है।
वैज्ञानिक उठे, महाज्ञान की पिपासा लिये। उनके लिये ऐसा कुछ भी नहीं है जिसका वे त्याग न कर सकते हों, कोई किसी प्रकार भी उन्हे निरुत्साह नहीं कर सकता। वे धीरे धीरे आगे बढ़ते हुये प्रकृति के एक के वाद एक गुप्त तत्त्वो का आविष्कार करते है—प्रकृति के अन्तस्तल मे से आभ्यन्तरीण गूढ रहस्यो का उद्घाटन करते हैं—किन्तु इसका उद्देश्य क्या है ? इस सब के करने का क्या उद्देश्य है ? हम इन वैज्ञानिकों का गौरव क्यों करे ? उन्हे कीर्त्ति क्यो मिले ? क्या प्रकृति मनुष्य जितना जान सकता है उससे अनन्त गुना अधिक नहीं जान सकती ? ऐसा होने पर भी क्या वह जड़ नहीं है ? जड़ का अनुकरण करने मे कौन सा गौरव है ? वज्र चाहे कितना ही विद्युत्शक्तिशाली क्यो न हो, प्रकृति उसे चाहे जितनी दूर उठाकर फेक सकती है। यदि कोई मनुष्य उसका शतांश भी कर सकता है तो हम उसे उठाकर आकाश मे पहुँचा देते है ! परन्तु यह सब किस लिये ? प्रकृति के अनुकरण के लिये, मृत्यु के, जड़त्व के, अचेतन के अनुकरण के लिये हम उसकी प्रशंसा क्यों करे ?
मध्याकर्षण शक्ति भारी से भारी पदार्थ को क्षण भर में खण्ड खण्ड कर फेक सकती है, फिर भी वह एक जड़ शक्ति है। जड़