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ज्ञानयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)

Jnana Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)

स्वामी विवेकानन्द द्वारा

DevanagariHindipublished332 पृष्ठ

२६२ ज्ञानयोग

२६२ ज्ञानयोग

नही हो सकी इसी प्रकार प्रत्यक्षवाद और विज्ञानवाद ( Idealism ) का तर्क अनंत काल से चला आरहा है। इस प्रकार का तर्क निश्चय ही चलता है, परन्तु हम जानते है कि जगत् है और वह चल रहा है। हमलोग केवल एक शब्द का भिन्न भिन्न अर्थ करके यह तर्क किया करते है। हमारे जीवन के अन्यान्य सभी प्रश्नों के सम्बन्ध मे भी ऐसा ही है—हमे प्रत्यक्षानुभूति प्राप्त करनी होगी। जैसे बाह्य विज्ञान मे—उसी तरह परमार्थ विज्ञान मे भी हमें कुछ पारमार्थिक व्यापार को प्रत्यक्ष करना होगा। उसी पर धर्म स्थापित होगा। अवश्य ही किसी भी धर्म के किसी भी मत में विश्वास रखना होगा, इस युक्तिहीन दावे मे कोई आस्था नहीं की जा सकती। उससे मनुष्य के मन की अवनति होती है। जो व्यक्ति तुम्हे सभी विषयों मे विश्वास करने को कहता है, वह अपने को भी नीचे गिराता है, और यदि तुम उसके वचनो पर विश्वास करते हो तो वह तुम्हे भी नीचे गिराता है। जगत् के साधुगणो को हमसे केवल यही कहने का अधिकार है कि उन्होंने अपने मन का विश्लेषण किया है तथा उन्होने कुछ सत्य पाया भी है, हम भी वैसा करे, फिर हम उन पर विश्वास करेगे, उसके पहले नहीं। यही धर्म का सार है। किन्तु यदि वास्तविक दृष्टि से देखा जाय तो जो धर्म के विरुद्ध तर्क करते है, उनमे से निन्यानवे प्रतिशत व्यक्ति अपने मन का विश्लेषण करके नहीं देखते, वे सत्य को पाने की चेष्टा नही करते। इसलिये धर्म के विरोध मे उनकी युक्ति का कोई मूल्य नहीं है। यदि कोई अन्धा मनुष्य निश्चय करके कहे, "तुम लोग, जो कि सूर्य के अस्तित्व मे विश्वास करनेवाले हो, सभी भ्रान्त हो" तो उसके इस वाक्य का जितना मूल्य होगा, उतना ही मूल्य इनके वाक्य का होगा। इसलिये जो अपने मन का विश्लेषण नहीं करते और धर्म को एकदम

अपरोक्षानुभूति २६३

उड़ा देने, और लोप करने में अग्रसर है, उनकी बातो मे हमे थोड़ी भी आस्था करने की आवश्यकता नहीं।

इस विषय को ही विशेषतया समझना एवं अपरोक्षानुभूति का भाव मन मे सर्वदा जागरूक रखना उचित है। धर्म लेकर ये सब झगडे, मारामारी, विवाद-विसंवाद उसी समय चले जायेंगे, जब कि हम समझेगे कि धर्म किसी ग्रन्थविशेष या मन्दिरविशेष मे बँधा हुआ नहीं है, अथवा इन्द्रिय द्वारा भी उसका अनुभव सम्भव नही है। यह अतीन्द्रिय तत्त्व की अपरोक्षानुभूति है। जिन व्यक्तियो ने वास्तविक ईश्वर एव आत्मा की उपलब्धि की है, वे ही प्रकृत धार्मिक है और यह प्रत्यानुभूति न होने पर उच्चतम धर्मशास्त्रवेत्ता जो धाराप्रवाह धर्म-वक्तृता दे सकते हैं उनमे तथा अत्यन्त सामान्य अज्ञ जड़वादी में कोई भेद नही है। हम सब नास्तिक है, इसे हम लोग क्यो नहीं मान लेते ? केवल विचारपूर्वक धर्म के समग्र सत्य मे संमति देने मात्र से हम धार्मिक नहीं हो सकते। एक ईसाई या मुसलमान अथवा अन्य किसी दूसरे धर्मानुयायी की बात लो। ईसा के उस पर्वत पर के धर्मोपदेश का स्मरण करो। जो कोई व्यक्ति इस उपदेश को कार्य-रूप मे परिणत कर सके, वह उसी क्षण देवता हो सकता है, सिद्ध हो सकता है। तथापि कहा गया है कि पृथ्वी मे इतने करोड़ ईसाई है। क्या तुम कहना चाहते हो, ये सभी ईसाई है? वास्तविक इसका अर्थ यह है कि ये किसी न किसी समय इस उपदेश के अनुसार कार्य करने की चेष्टा कर सकते है। दो करोड लोगो मे एक भी सच्चा ईसाई है या नहीं, इसमें संदेह है।

भारतवर्ष मे भी इस तरह कहा गया है कि तीस कोटि वेदान्ती हैं। यदि प्रत्यक्षानुभूति-सम्पन्न व्यक्ति हजार में एक भी होते,