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ज्ञानयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)

Jnana Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)

स्वामी विवेकानन्द द्वारा

DevanagariHindipublished332 पृष्ठ

४२ ज्ञानयोग

४२ ज्ञानयोग

युग को प्राचीन युग की अवनत अवस्था ही मानते हैं। जगत् की अवनति क्रमशः बढ़ती ही गई। इसके बाद जब जलप्रलय हुआ तो अधिकांश जगत् उसमे डूब गया। फिर उन्नति आरम्भ हुई। और अब यह जगत् अपनी उसी प्राचीन पवित्र अवस्था को प्राप्त करने के लिये धीरे धीरे अग्रसर हो रहा है। आप सब Old Testament (पुराने बाइबिल) मे जलप्रलय की कथा जानते ही है। यही एक कथा प्राचीन बेबीलोन, मिस्र, चीन एवं हिन्दू धर्म मे भी प्रचलित थी। हिन्दू शास्त्र मे जलप्रलय का इस प्रकार का वर्णन मिलता है,—महर्षि मनु जब एक दिन गंगातट पर सन्ध्या वन्दन मे लगे थे, तब एक छोटी सी मछली ने उनसे आकर कहा—'मुझे आश्रय दीजिये।' मनु ने उसी क्षण पास रक्खे हुए पात्र मे उसे रख कर उससे पूछा—'तू क्या चाहती है?' मछली बोली—'एक बड़ी भारी मछली मुझे मार डालने के लिये मेरा पीछा कर रही है। मेरी रक्षा कीजिये।' मनु उसे घर ले गये, प्रातःकाल देखा, वह बढ़ कर पात्र के बराबर गई है। मछली बोली—'मै अब इस पात्र में नहीं रह सकती।' तब मनु ने उसे एक कुण्ड मे रख दिया। दूसरे दिन वह कुण्ड के बराबर हो गई और कहने लगी—'मै इसमे भी नहीं रह सकती।' तब मनु ने उसे नदी में डाल दिया। प्रातःकाल को देखा कि उसका शरीर सारी नदी मे फैल गया है। तब उन्होने उसे समुद्र मे डाल दिया। तब मछली कहने लगी,—'मनु, मै जगत् का सृष्टिकर्ता हूँ। मै जलप्रलय से जगत् को ध्वंस करूँगा। तुम्हे सावधान करने के लिये मै मछली का रूप धारण करके आया था। तुम एक बहुत बडी नौका बना कर सभी प्रकार के प्राणियो का एक एक जोडा उसमे रख कर उनकी रक्षा करो और स्वय भी सपरिवार उसमे बैठो।

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सभी स्थान जब उस जल मे डूब जाएँगे तब उस जल में तुम्हे मेरा एक सींग (काँटा) दिखेगा, तुम नौका को उससे बाँध देना। उसके बाद जल घट जाने पर नौका से उतर कर प्रजावृद्धि करना।' इसी प्रकार भगवान के कथनानुसार जलप्रलय हुआ और मनु ने अपने परिवार सहित प्रत्येक जन्तु के एक एक जोड़े और उद्भिदों के बीज की प्रलय से रक्षा की, और प्रलय समाप्त हो जाने पर इस नौका से उतर कर वे प्रजा उत्पन्न करने मे लग गये—और हम लोग मनु के वंशज होने से मानव कहलाने लगे (मन् धातु से मनु बनता है; मन् धातु का अर्थ है मनन अर्थात् चिन्ता करना)। अब देखो, मनुष्य की भाषा उस आभ्यन्तरीण सत्य को प्रकाशित करने की चेष्टा मात्र है। मेरा स्थिर विश्वास है कि यह सब कथा और कुछ नहीं, मानो एक छोटा बालक, जिसकी एकमात्र भाषा अस्फुट अस्पष्ट शब्दराशि ही है, अपनी तोतली भाषा मे एक महान् गम्भीर दार्शनिक सत्य को प्रकाशित करने की चेष्टा कर रहा है—केवल उसके पास इसको प्रकाशित करने के लिये कोई उपयुक्त इन्द्रिय अथवा अन्य कोई उपाय नहीं है। उच्चतम दार्शनिक और शिशु की भाषा मे प्रकार का कोई भेद नहीं है, भेद है केवल मात्रा (Degree) का। आजकल की विशुद्ध, प्रणालीबद्ध, गणित के समान कटी छँटी भाषा और प्राचीन ऋषियों की अस्फुट रहस्यमय पौराणिक भाषा मे अन्तर केवल मात्रा की अधिकता और अल्पता का है। इन सब कथाओं के पीछे एक महान् सत्य छिपा है जिसे प्रकाशित करने की प्राचीन लोगों ने चेष्टा की है। बहुधा इन सब प्राचीन पौराणिक कथाओं के भीतर ही महामूल्य सत्य रहता है, और दुख के साथ कहना पड़ता है कि आधुनिक लोगों की चटपटी भाषा मे बहुधा

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भूसी ही रहती है, तत्व नहीं रहता। अतएव, रूपक मे सत्य छिपा है यह कह कर और आजकल के 'राम' 'श्याम' की समझ मे नहीं आता यह कह कर सभी प्राचीन बातो को ताक पर रख देना चाहिये, इसका भी कोई अर्थ नही है। 'अमुक महापुरुष ने ऐसा कहा है, अतएव इस पर विश्वास करो' इस प्रकार बोलने के कारण ही यदि सभी धर्म उपहासास्पद हो जाते है तब आजकल के लोग और भी उपहासास्पद हैं। आजकल यदि कोई मूसा, बुद्ध अथवा ईसा की उक्ति को उद्धृत करता है तो उसकी हँसी उड़ाई जाती है; किन्तु हक्सले, टिण्डल अथवा डार्विन का नाम लेते ही बात एकदम अकाट्य और प्रामाणिक बन जाती है। 'हक्सले ने यह कहा' बहुतो के लिये तो इतना ही कहना पर्याप्त है! सचमुच ही हम कुसस्कारो या अन्ध-विश्वासो से मुक्त हो गये हैं। पहले था धर्म का कुसस्कार, अब है विज्ञान का कुसंस्कार; किन्तु पहले के कुसस्कार के भीतर एक जीवन-दायक आध्यात्मिक भाव रहता था पर आधुनिक कुसंस्कार द्वारा तो केवल काम और लोभ ही उत्पन्न होता है। वह अन्धविश्वास था ईश्वर की उपासना को लेकर और आजकल का अन्धविश्वास है महाघृणित धन, यश और शक्ति की उपासना को लेकर। यही भेद है। अब हम ऊपर कही हुई पौराणिक कथा के सम्बन्ध मे विवेचना करेंगे। इन सब कथाओ के भीतर यही एक प्रधान भाव देखने मे आता है कि मनुष्य जिस अवस्था मे पहले था अब उससे गिरी हुई दशा मे है। आजकल के तत्वान्वेषी लोग इस बात को एकदम अस्वी-कार करते हैं। क्रमविकासवादी विद्वानों ने तो मानो इस सत्य का सम्पूर्ण रूप से ही खण्डन कर दिया है। उनके मत मे मनुष्य एक विशेष प्रकार के क्षुद्र मांसल जन्तु( Mollusc ) का क्रमविकास मात्र है,

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अतएव पूर्वोक्त पौराणिक सिद्धान्त सत्य नहीं हो सकता। किन्तु भारतीय पुराण तो दोनो ही मतो का समन्वय करता है। भारतीय पुराणों के मत के अनुसार सभी प्रकार की उन्नति तरंग के आकार की होती है। प्रत्येक तरंग एक बार उठती है, फिर गिरती है, गिर कर फिर उठती है, फिर गिरती है, इसी प्रकार क्रम चलता रहता है। प्रत्येक गति ही चक्राकार होती है। आधुनिक विज्ञान की दृष्टि से देखने पर भी मनुष्य केवल क्रमविकास का परिणाम है, यह बात सिद्ध नहीं होती। क्रमविकास कहने के साथ साथ ही क्रमसंकोच की प्रक्रिया को भी मानना पडेगा। विज्ञानवेत्ता ही तुमसे कहते है कि किसी यन्त्र मे तुम जितनी शक्ति का प्रयोग करोगे उतनी ही शक्ति तुम्हे उसमे से मिलेगी। असत् (कुछ नही) से कभी भी सत् (कुछ) की उत्पत्ति नही हो सकती। यदि मानव—पूर्ण मानव—बुद्ध-मानव ईसा-मानव, एक क्षुद्र मांसल जन्तु का क्रमविकास ही है तो इस क्षुद्र जन्तु को भी क्रमसंकुचित बुद्ध कहकर मानना पडेगा। यदि ऐसा नहीं तो ये सब महापुरुष कहाँ से उत्पन्न हुए? असत् से सत् की उत्पत्ति तो कभी होती नही। इसी रूप से हम शास्त्र के साथ आधुनिक विज्ञान का समन्वय कर सकते हैं। जो शक्ति धीरे धीरे अनेक सीढियो से होती हुई पूर्ण मनुष्य के रूप मे परिणत होती है वह कभी भी शून्य मे से उत्पन्न नहीं हो सकती। वह कही न कहीं वर्तमान थी; और यदि तुम विश्लेषण करते करते इसी प्रकार के क्षुद्र जन्तुविशेष या जीवाणु (Protoplasm) तक ही पहुँच कर उसी को आदिकारण सिद्ध करते हो तो यह निश्चय है कि इसी जीवाणु मे यह शक्ति किसी न किसी रूप मे विद्यमान थी। आजकल यही एक महान विचार चल रहा है कि क्या यह देह ही जो पञ्चभूत की