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ज्ञानयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)

Jnana Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)

स्वामी विवेकानन्द द्वारा

DevanagariHindipublished332 पृष्ठ

७२ ज्ञानयोग

७२ ज्ञानयोग

करूँगा ? मै उस यन्त्र से नाना प्रकार की प्रकाश-किरणें इस पर्दे पर डालने की और उन्हे एक स्थान में एकत्रित करने की चेष्टा करूँगा। एक ऐसी अचल वस्तु की आवश्यकता है जिस पर चित्र डाला जा सके। किसी चञ्चल वस्तु पर यह करना असम्भव है, कोई स्थिर वस्तु चाहिये। कारण, मै जो प्रकाश-किरणे डालना चाहता हूँ वे चञ्चल है; इन चञ्चल प्रकाश-किरणों को किसी अचल वस्तु के ऊपर एकत्रीभूत, एकीभूत करके एक जगह लाना होगा। यही बात उन संवादों के विषय मे भी है जिन्हें इन्द्रियाँ मन के आगे और मन बुद्धि के आगे समर्पित करता है, जब तक ऐसी कोई वस्तु नहीं मिल जाती जिस पर यह चित्र डाला जा सके, जिस पर भिन्न भिन्न भाव एकत्रीभूत हो कर मिल सके तब तक यह विषयानुभूति भी पूर्ण नही होगी। वह क्या वस्तु है जो समुदाय को एकत्व का भाव प्रदान करती है। वह कौनसी वस्तु है जो विभिन्न गतियो के भीतर भी प्रतिक्षण एकत्व की रक्षा किये रहती है ? वह कौन सी वस्तु है जिसके ऊपर भिन्न भिन्न भाव मानो एक ही जगह गूँथे रहते हैं, जिसके ऊपर विषय आकर मानो एक जगह वास करते है और एक अखण्ड भाव को धारण करते है ? हमने देखा कि ऐसी कोई वस्तु आवश्यक ह और उस वस्तु का शरीर और मन की तुलना मे अचल होना भी आवश्यक है। जिस पर्दे के ऊपर यह चित्रक्षेपक यन्त्र चित्र डाल रहा है वह इन प्रकाश-किरणो की तुलना मे अचल है, ऐसा न होने पर चित्र पडेगा ही नहीं। अर्थात् इसका एक व्यक्ति ( Individual ) होना आवश्यक है। यही वस्तु, जिसके ऊपर मन यह सब चित्रांकन करता है, यही वस्तु जिसके ऊपर मन और बुद्धि द्वारा ले जायी

मनुष्य का यथार्थ स्वरूप · ७३

जाकर हमारी विषयानुभूति स्थापित, श्रेणीबद्ध और एकत्रीभूत होती है, इसी को मनुष्य की आत्मा कहते हैं।

तो, हमने देखा कि समष्टि मन या महत्, आकाश और प्राण इन दो भागो मे विभक्त रहता है। और मन के पीछे आत्मा रहता है। समष्टि मन के पीछे जो आत्मा है उसको ईश्वर कहते है। व्यष्टि मे यह मनुष्य की आत्मा मात्र है। जिस प्रकार समष्टि मन आकाश और प्राण के रूप मे परिणत हो गया है उसी प्रकार समष्टि आत्मा भी मन के रूप मे परिणत हो गया है। अब प्रश्न उठता है—क्या इसी प्रकार व्यष्टि मनुष्य के सम्बन्ध मे भी समझना होगा? मनुष्य का मन भी क्या उसके शरीर का स्रष्टा है और क्या उसका आत्मा उसके मन का स्रष्टा है? अर्थात् मनुष्य का शरीर, मन और आत्मा—ये तीन विभिन्न वस्तुये है, अथवा ये एक के भीतर ही तीन है, अथवा ये सब एक पदार्थ की ही तीन विभिन्न अवस्थाएँ मात्र है? हम क्रमशः इसी प्रश्न का उत्तर देने की चेष्टा करेगे। जो भी हो, हमने अब तक यही देखा कि पहले तो यह स्थूल देह है, उसके बाद इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि और बुद्धि के भी बाद आत्मा। तो पहली बात यह हुई कि आत्मा शरीर से पृथक तथा मन से भी पृथक वस्तु है। यहीं से धर्म जगत् मे मतभेद देखा जाता है। द्वैतवादी कहते है कि आत्मा सगुण है अर्थात् भोग, सुख, दुःख—सभी यथार्थ में आत्मा के धर्म है; अद्वैतवादी कहते है कि वह निर्गुण है।

हम पहले द्वैतवादियों के मत का—आत्मा और उसकी गति के सम्बन्ध मे उनके मत का वर्णन करके उसके बाद जो मत इसका सम्पूर्ण रूप से खण्डन करता है उसका वर्णन करेगे। अन्त मे

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ज्ञानयोग

अद्वैतवाद के द्वारा दोनों मतों का सामञ्जस्य सिद्ध करने की चेष्टा करेंगे। यह मानवात्मा शरीर और मन से पृथक् है एवं आकाश और प्राण से गठित नहीं है इसीलिये अमर है। क्यो ? मर्त्यत्व या विनश्वरत्व का अर्थ क्या है ? जो विश्लिष्ट हो जाता है वही विनश्वर है। और जो वस्तु कई एक पदार्थों के संयोग से बनती है वही विश्लिष्ट होगी; केवल वह पदार्थ जो अन्य पदार्थों के संयोग से उत्पन्न नहीं है, कभी विश्लिष्ट नहीं होता, इसीलिये उसका कभी विनाश नहीं हो सकता। वह अविनाशी है। वह अनन्त काल से है, उसकी कभी सृष्टि नहीं हुई। सृष्टि तो केवल सयोग मात्र है। शून्य से कभी किसी ने सृष्टि नहीं देखी। सृष्टि के सम्बन्ध में हम केवल यह जानते हैं कि यह पहले से वर्तमान कितनी ही वस्तुओ का नये नये रूप मे एकत्र मिलन मात्र है। यदि ऐसा है तो यह मानवात्मा भिन्न भिन्न वस्तुओ के संयोग से उत्पन्न नहीं है, अतः वह अवश्य ही अनन्त काल से है और अनन्त काल तक रहेगा। इस शरीर का नाश हो जाने पर भी आत्मा रहेगा। वेदान्तवादियों के मत से—जब इस शरीर का नाश हो जाता है तब मनुष्य की इन्द्रियो का मन मे लय हो जाता है, मन का प्राण मे लय हो जाता है, प्राण आत्मा मे प्रविष्ट हो जाता है और उस समय वही मानवात्मा मानो सूक्ष्म शरीर अथवा लिंग शरीर रूपी वस्त्र पहिन कर चला जाता है। इसी सूक्ष्म शरीर मे मनुष्य के समस्त संस्कार वास करते हैं। संस्कार क्या है ? मन मानो तालाब के समान है—और हमारी प्रत्येक चिन्ता मानों उसी तालाब की लहर के समान है। जिस प्रकार तालाब में लहर उठती है, गिरती है, गिरकर अन्तर्हित हो जाती है उसी प्रकार मन मे ये सब चिन्ताओ की तरंगे लगातार

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उठती और अन्तर्हित होती रहती हैं। किन्तु वे एकदम अन्तर्हित भी नही होतीं। वे क्रमशः सूक्ष्मतर होती जाती है, परन्तु वर्तमान रहती ही है। प्रयोजन होने पर फिर उठती हैं। जिन चिन्ताओ ने सूक्ष्मतर रूप धारण कर लिया है उन्हीं मे से कुछ एक को फिर तरङ्गाकार मे लाने को ही स्मृति कहते है। इसी प्रकार हमने जो कुछ ही चिन्ता की है, जो कुछ कार्य हमने किये है सभी कुछ मन के अन्दर अवस्थित है। ये सब सूक्ष्म भाव से ही स्थित रहते है और मनुष्य के मर जाने पर भी ये संस्कार उसके मन मे रहते है—फिर वे सूक्ष्म शरीर के ऊपर कार्य करते रहते है। आत्मा ये ही सब संस्कार एवं सूक्ष्म शरीर रूपी वस्त्र धारण करके चला जाता है और यह विभिन्न संस्कार रूप विभिन्न शक्तियो का समवेत फल ही आत्मा की गति को नियमित करता है। उनके मत से आत्मा की तीन प्रकार की गति होती है।

जो अत्यत धार्मिक हैं उनकी मृत्यु के बाद वे सूर्यरश्मियों का अनुसरण करते है; सूर्यरश्मियो का अनुसरण करके वे सूर्यलोक मे जाते है; वहाँ से वे चन्द्रलोक और चन्द्रलोक से विद्युल्लोक मे उपस्थित होते हैं; वहाँ एक मुक्त आत्मा से उनका साक्षात्कार होता हैं; वे इन जीवात्माओं को सर्वोच्च ब्रह्मलोक मे ले जाते है। यहाँ उन्हे सर्वज्ञता और सर्वशक्तिमत्ता प्राप्त होती है; उनकी शक्ति और ज्ञान प्रायः ईश्वर के समान हो जाता है, और द्वैतवादियों के मत मे वे अनन्त काल तक वहाँ वास करते है, अथवा अद्वैतवादियो के अनुसार कल्पान्त मे ब्रह्म के साथ एकत्व लाभ करते है। जो लोग सकाम भाव से सत्कार्य करते है वे मृत्यु के बाद चन्द्रलोक मे जाते है, वहाँ नाना