ज्ञानयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)
Jnana Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)
स्वामी विवेकानन्द द्वारा
३४ ज्ञानयोग
३४ ज्ञानयोग
के शब्दों मे यही प्रकृति है। किन्तु चाहे देवोपासना के द्वारा हो, चाहे मूर्तिपूजा द्वारा, चाहे दार्शनिक विचारों के अवलम्बन से आचरित हो, अथवा देव चरित्र, पिशाच चरित्र, प्रेत चरित्र, साधु चरित्र, ऋषि चरित्र, महात्मा चरित्र अथवा अवतार चरित्र की सहायता से अनुष्टित हो, सभी धर्मों का, चाहे वे उन्नत धर्म हो चाहे अपरिणत, सभी का उद्देश्य एक ही है। सभी धर्म इस प्रकृति के बन्धन को तोडने की थोडी बहुत चेष्टा कर रहे है। सक्षेप मे सभी धर्म स्वाधीनता की ओर अग्रसर होने की कठोर चेष्टा कर रहे हैं। जाने या अनजाने मनुष्य समझ गये है कि वे बन्दी हैं। वे जो बनने की इच्छा करते है सो नहीं है। जिस समय, जिस मुहूर्त में उन्होने अपने चारों ओर दृष्टिपात किया उसी मुहूर्त मे वे समझ गये कि वे बन्दी है। उसी क्षण उन्हे अनुभूति हो गई कि वे बन्दी है। वे यह भी समझे कि इस सीमा से जकडा हुआ जो कोई भी उनके भीतर रह रहा है वह देह से भी अगम्य स्थान को उड जाना चाहता है। ससार के उन निम्नतम धर्मों मे भी जहाँ दुर्दान्त, नृशंस, आत्मीयों के घरो मे लुक छिप कर फिरने वाले, हत्या तथा सुराप्रिय मृत पितर या मृत-प्रेतों की पूजा की जाती है उनमे भी स्वाधीनता का यह भाव हम पाते हैं। जो लोग देवताओं की उपासना करते है वे उन्ही सब देवताओ को अपनी अपेक्षा अधिक स्वाधीन देखते है—द्वार बन्द होने पर भी देवता लोग घर की दीवारों को पार करके आ सकते है; दीवारे उनके मार्ग मे बाधक नहीं होतीं, ऐसा भक्त का विश्वास होता है। यही स्वाधीनता का भाव क्रमशः बढते बढते अन्त मे सगुण ईश्वर के आदर्श मे परिणत होता है। इस आदर्श का केन्द्रीय भाव है—ईश्वर माया से अतीत है। मुझे मानों ऐसा लगता है कि मै दूर से आता हुआ एक शब्द सुन रहा हूँ और देखता हूँ कि
माया ३५
भारत के प्राचीन आचार्य, प्राचीन ऋषि जगल मे बैठे इस प्रश्न पर विचार कर रहे है, बड़े बडे वयोवृद्ध पवित्रमय महर्षिगण भी इसकी मीमांसा करने मे असमर्थ रहे है परन्तु एक बालक उनके बीच खड़े हो कर घोषणा करता है—" हे दिव्य धामवासी अमृत के पुत्रगण ! सुनो, मुझे मार्ग मिल गया है। जो अन्धकार से अतीत है उसे जान लेने पर अन्धकार के बाहर जाने का मार्ग मिल जाता है।
शृण्वन्तु विश्वे अमृतस्य पुत्राः ।
आ ये धामानि दिव्यानि तस्थुः ॥
वेदाहमेतं पुरुषं महान्तमादित्यवर्णं तमसः परस्तात् ।
तमेव विदित्वाऽतिमृत्युमेति नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय ॥
(श्वेताश्वतर उपनिषद्)
इसी उपनिषद् से हमे यह उक्ति भी मिलती है कि यह माया हमे चारों ओर से घेरे हुये है एवं वह अति भयङ्कर है। माया के बीच मे से होकर कार्य करना असम्भव है। जो यह कहता है कि “मै इस नदी के तट पर बैठा हूँ, जब सारा पानी समुद्र मे पहुँच जायगा तब मै नदी के पार जाऊँगा,” वह उतनी ही भूल करता है जितनी कि यह कहने वाला कि “जब तक पृथिवी पूर्ण मङ्गलमय नहीं हो जाती उतने दिन कार्य करते रहने के बाद सुख भोग करूँगा। दोनो ही बाते असम्भव है। माया के बीच मे से रास्ता नही है, माया के विरुद्ध चल कर ही रास्ता मिलेगा—यह बात भी माननी पड़ेगी। हमारा जन्म प्रकृति के सहायक रूप मे नहीं वरञ्च प्रकृति के विरोधी के रूप मे हुआ है। हम बन्धन के कर्ता होकर भी स्वय को बन्दी बनाने की चेष्टा करते है। यह मकान कहाँ से