ज्ञानयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)
Jnana Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)
स्वामी विवेकानन्द द्वारा
३२० ज्ञानयोग
३२० ज्ञानयोग
कुछ अनुभव या कल्पना कर पाते है वही हमारा जगत् है--वाह्य वस्तुओं को हम इन्द्रियो के द्वारा प्रत्यक्ष कर सकते है और भीतर की . वस्तु को हम मानस-प्रत्यक्ष अथवा कल्पना कर सकते है । अत-एव जो कुछ हमारे शरीर के बाहर है वह इन्द्रियो के भी बाहर है और जो हमारी कल्पना के बाहर है वह हमारे मन के बाहर है और इसलिये हमारे जगत् के बाहर है। अतएव कार्य-कारण-सम्बन्ध के बहिर्देश मे स्वाधीन शास्ता आत्मा रहता है। ऐसा होने से ही वह नियमों के अन्तर्गत सभी वस्तुओं का नियमन करता है। आत्मा नियम से अतीत है, इसीलिये निश्चय ही मुक्तस्वभाव है; वह किसी प्रकार भी मिश्रणोत्पन्न पदार्थ नही हो सकता--अथवा किसी कारण का कार्य नहीं हो सकता। उसका कभी विनाश नहीं हो सकता, कारण विनाश का अर्थ हे किसी यौगिक पदार्थ का अपने उपादानों मे परिणत हो जाना। अतएव जो कभी संयोग से उत्पन्न नहीं हुआ उसका विनाश किस प्रकार होगा ? उसकी मृत्यु होती है या विनाश होता है ऐसा कहना केवल एक असम्बद्ध प्रलाप है।
किन्तु 'यही पर इस प्रश्न का निश्चित सिद्धान्त नहीं मिला। अब हम और भी सूक्ष्मता की ओर बढ रहे है और आप में से कुछ लोग शायद भयभीत भी हो रहेहोंगे। हमने देखा कि यह आत्मा भूत, शक्ति एव चिन्ता रूप क्षुद्र जगत् के अतीत एक मौलिक ( Simple ) पदार्थ है, अतः इसका विनाश असम्भव है। इसी प्रकार उसका जीवन भी असम्भव है। कारण, जिसका विनाश नहीं उसका जीवन भी कैसे हो सकता है ? मृत्यु क्या है ? मृत्यु एक पृष्ठ या पहलू है, और जीवन उसी का एक दूसरा पृष्ठ या पहलू है। मृत्यु का और एक नाम है
अमरत्व ३२१
जीवन, और जीवन का और एक नाम है मृत्यु। अभिव्यक्ति के विशिष्ट रूप को हम जीवन कहते है, और उसीके अन्य रूपविशेष को मृत्यु कहते है। जब तरंग ऊपर की ओर उठती है तो मानो जीवन है और फिर जब वह गिर जाती है तो मृत्यु है। जो वस्तु मृत्यु के अतीत है वह निश्चय ही जन्म के भी अतीत है। मै आपको फिर उसी सिद्धान्त की याद दिलाता हूँ कि मानवात्मा उसी सर्वव्यापी जगन्मयी शक्ति अथवा ईश्वर का प्रकाश मात्र है। तो हम देखते है कि वह जीवन और मृत्यु दोनों के परे है। आप न कभी उत्पन्न हुये थे, न कभी मरेगे। हमारे चारो ओर जो जन्म और मृत्यु दीखती है वह क्या है? यह तो केवल शरीर की है, कारण आत्मा तो सदा सर्वदा वर्तमान है। आप कहेगे, “यह कैसे? हम इतने लोग यहाँ पर बैठे हुए है और आप कहते है, आत्मा सर्वव्यापी है!” मै पूछता हूँ, जो पदार्थ नियम के, कार्य-कारण-सम्बन्ध के बाहर है उसे सीमित करने की शक्ति किसमे है? यह गिलास एक सीमित पदार्थ है; यह सर्वव्यापक नहीं है, क्योकि इसके चारो ओर की जड़राशि इसको इसी रूप मे रहने को बाध्य करती है, इसे सर्वव्यापी होने नहीं देती। यह अपने आस पास के प्रत्येक पदार्थ के द्वारा नियन्त्रित है, अतएव यह सीमित है। किन्तु जो वस्तु, नियम के बाहर है, जिसके ऊपर कोई पदार्थ क्रिया नहीं करता वह कैसे सीमित हो सकती है? वह सर्वव्यापक होगी ही। आप सर्वत्र विद्यमान है। फिर यह कैसे हो रहा है कि मैं जन्म लेता हूँ, मरने वाला हूँ आदि आदि। यही अज्ञान है, मन का भ्रम है। आपका न कभी जन्म हुआ था, न आप कभी मरेंगे। आपका जन्म भी नहीं हुआ, न पुनर्जन्म होगा। आवागमन का क्या अर्थ है? कुछ नहीं। यह सब मूर्खता है। आप सब जगह मौजूद है। आवागमन जिसे कहते है
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